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Tuesday, July 21, 2009

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम....... महफ़िल-ए-नौखेज़ और "फ़ैज़"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३१

ज की महफ़िल बड़ी हीं खुश-किस्मत है। आज हमारी इस महफ़िल में एक ऐसे शम्म-ए-चरागां तशरीफ़फ़रमां हैं कि उनकी आवभगत के लिए अपनी जबानी कुछ कहना उनकी शान में गुस्ताखी के बराबर होगा। इसलिए हमने यह निर्णय लिया है कि इनके बारे में या तो इन्हीं का कहा कुछ पेश करेंगे या फिर इनके जानने वालों का कहा। इनकी शायरी के बारे में उर्दू के एक बुजुर्ग शायर "असर" लखनवी फ़रमाते हैं: "इनकी शायरी तरक़्की के मदारिज (दर्जे) तय करके अब इस नुक्ता-ए-उरूज (शिखर-बिन्दु) पर पहुंच गई है, जिस तक शायद ही किसी दूसरे तरक्क़ी-पसंद (प्रगतिशील) शायर की रसाई हुई हो। तख़य्युल (कल्पना) ने सनाअत (शिल्प) के जौहर दिखाए हैं और मासूम जज़्बात को हसीन पैकर (आकार) बख़्शा है। ऐसा मालूम होता है कि परियों का एक ग़ौल (झुण्ड) एक तिलिस्मी फ़ज़ा (जादुई वातावरण) में इस तरह मस्ते-परवाज़ (उड़ने में मस्त) है कि एक पर एक की छूत पड़ रही है और क़ौसे-कुज़ह (इन्द्रधनुष) के अक़्कास (प्रतिरूपक) बादलों से सबरंगी बारिश हो रही है।" पंजाब के सियालकोट में जन्मे इस बेमिसाल शायर को "उर्दू" अदब और "उर्दू" शायरी का बेताज बादशाह माना जाता है। "अंजुमन तरक्की पसंद मुस्सनफ़िन-ए-हिंद" के आजीवन सदस्य रहने वाले इन शायर को सोवियत युनियन ने १९६३ में "लेनिन पीस प्राइज" से नवाज़ा था। इतना हीं नहीं "शांति के नोबल पुरस्कार" के लिए भी इन्हें दो बार नामांकित किया गया था। उर्दू के आलोचक मुम्ताज हुसैन के अनुसार इनकी शायरी में अगर एक परंपरा क़ैश(मजनूं) की है तो एक मन्सूर की। जानकारी के लिए बता दूँ कि मन्सूर एक प्रसिद्ध ईरानी वली थे जिनका विश्वास था कि आत्मा और परमात्मा एक ही है और उन्होंने "अनल-हक" (सोऽहं-मैं ही परमात्मा हूं) की आवाज़ उठाई थी। उस समय के मुसलमानों को उनका यह नारा अधार्मिक लगा और उन्होंने उन्हें फांसी दे दी। ये शायर जिनकी हम आज बात कर रहे हैं, वो मार्क्सवादी थे, इसलिए उनमें भी यह भावना कूट-कूट कर भरी थी।

फ़ैज़ अहमद "फ़ैज़" आज के उर्दू शायरों में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हैं। जी हाँ, हम "फ़ैज़" की हीं बात कर रहे हैं, जिन्होंने कभी कहा था कि "हम परवरिशे-लौहो-क़लम करते रहेंगे,जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे" यानि कि हम तख्ती और कलम का प्रयोग करते रहेंगे और जो भी दिल पर गुजरती है उसे लिखते रहेंगे। "फ़ैज़" का मानना था कि जब तक दिल गवाही दे, तब तक हीं लिखें, मजबूरन लिखना या फिर बेमतलब कलम को तकलीफ़ देना बड़ी बुरी बात है। अपनी पुस्तक "नक्शे-फ़रियादी" की भूमिका में ये कहते हैं: "आज से कुछ बरस पहले एक मुअय्यन जज़्बे (निश्चित भावना) के ज़ेरे-असर अशआर (शे’र) ख़ुद-ब-ख़ुद वारिद (आगत) होते थे, लेकिन अब मज़ामीन (विषय) के लिए तजस्सुस (तलाश) करना पड़ता है...हममें से बेहतर की शायरी किसी दाखली या खारिजी मुहर्रक (आंतरिक या बाह्य प्रेरक) की दस्ते-निगर (आभारी) होती है और अगर उन मुहर्रिकात की शिद्दत (तीव्रता) में कमी आ जाए या उनके इज़हार (अभिव्यक्ति) के लिए कोई सहल रास्ता पेशेनज़र न हो तो या तो तजुर्बात को मस्ख़ (विकृत) करना पड़ता है या तरीके-इज़हार को। ऐसी सूरते-हालात पैदा होने से पहले ही ज़ौक और मसलहत का तक़ाज़ा यही है कि शायर को जो कुछ कहना हो कह ले, अहले-महफ़िल का शुक्रिया अदा करे और इज़ाज़त चाहे।" उर्दू के सुप्रसिद्ध संपादक "प्रकाश पंडित" ने "फ़ैज़" पर एक पुस्तक लिखी थी "फ़ैज़ और उनकी शायरी"। उसमें उन्होंने "फ़ैज़" से जुड़ी कई सारी मज़ेदार बातों का ज़िक्र किया है। "फ़ैज़" की शायरी के बारे में ये लिखते हैं: फ़ैज़ अहमद "फ़ैज़" आधुनिक काल के उन चंद बड़े शायरों में से हैं जिन्होंने काव्य-कला में नए प्रयोग तो किए लेकिन उनकी बुनियाद पुराने प्रयोगों पर रखी और इस आधार-भूत तथ्य को कभी नहीं भुलाया कि हर नई चीज़ पुरानी कोख से जन्म लेती है। यही कारण है कि इनकी शायरी का अध्ययन करते समय हमें किसी प्रकार की अजनबियत महसूस नहीं होती। इनकी शायरी की "अद्वितीयता" आधारित है इनकी शैली के लोच और मंदगति पर, कोमल, मृदुल और सौ-सौ जादू जगाने वाले शब्दों के चयन पर, "तरसी हुई नाकाम निगाहें" और "आवाज़ में सोई हुई शीरीनियां" ऐसी अलंकृत परिभाषाओं और रुपकों पर, और इन समस्त विशेषताओं के साथ गूढ़ से गूढ़ बात कहने के सलीके पर।

"फ़ैज़" साहब दिल के कितने धनी थे, इसका पता "प्रकाश पंडित" को लिखे उनके खत से चलता है। "प्रकाश" साहब ने उनसे जब किताब प्रकाशित करने की अनुमति माँगी तो उन्होंने बड़े हीं सुलझे शब्दों में अपने को एक नाचीज़ साबित कर दिया। आप खुद देखिए कि उन्होंने क्या लिखा था।

बरादरम प्रकाश पण्डित, तस्लीमा !
आपके दो ख़त मिले। भई, मुझे अपने हालाते-ज़िन्दगी में क़तई दिलचस्पी नहीं है, न मैं चाहता हूं कि आप उन पर अपने पढ़ने वालों का वक्त ज़ाया करें। इन्तिख़ाब (कविताओं के चयन) और उसकी इशाअत (प्रकाशन) की आपको इजाज़त है। अपने बारे में मुख़्तसर मालूमात लिखे देता हूं। पैदाइश सियालकोट, 1911, तालीम स्कॉट मिशन हाई स्कूल सियालकोट, गवर्नमेंट, कालेज लाहौर (एम.ए.अंग्रेज़ी 1933, एम.ए. अरबी 1934)। मुलाज़मत एम.ए. ओ. कालेज अमृतसर 1934 से 1940 तक। हेली कालेज लाहौर 1940 से 1942 तक। फ़ौज में (कर्नल की हैसियत से) 1942 से 1947 तक। इसके बाद ‘पाकिस्तान टाइम्ज़’ और ‘इमरोज़’ की एडीटरी ताहाल (अब तक)। मार्च 1951 से अप्रैल 1955 तक जेलख़ाना (रावलपिंडी कान्सपिरेंसी केस के सिलसिले में)। किताबें ‘नक्शे-फ़र्यादी’, ‘दस्ते सबा’ और ‘ज़िन्दांनामा’।

-"फ़ैज़"
बेरुत, लेबनान
25-6-1981

फ़ैज़ साहब के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है। बाकी बातें आगे किसी कड़ी में करेंगे। अभी हम आगे बढने से पहले इन्हीं का एक शेर देख लेते हैं। हाल में हीं रीलिज हुई (या शायद होने वाली) फिल्म "सिकंदर" के एक गाने में इनके इस शेर का बड़ी हीं खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया है।

गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले,
चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले


आज हम जिस गज़ल को लेकर हाज़िर हुए हैं,उसे हमने एलबम "फ़ैज़ बाई आबिदा" से लिया है। ज़ाहिर है कि उस एलबम की सभी गज़लें या नज़्में फ़ैज़ की हीं लिखी हुई थी और आवाज़ थी "बेग़म" आबिदा परवीन की। "बेग़म" साहिबा के बारे में हमने पिछले एक एपिसोड में बड़ी हीं बारीकी से बात की थी। इसलिए आज इनके बारे में कुछ भी न कहा। वक्त आया तो इनके बारे में फिर से बात करेंगे। अभी तो आज की गज़ल/नज़्म का लुत्फ़ उठाईये:

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम|
धुल के निकलेगी अभी, चश्म-ए-महताब से रात||

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम|

और मुश्ताक निगाहों की सुनी जायेगी,
और उन हाथों से मस्स होंगे ये तरसे हुए हाथ||

उनका आँचल है कि रुख़सार के पैराहन हैं,
कुछ तो है जिससे हुई जाती है चिलमन रंगीं,
जाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छांवों में,
टिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक कि नहीं||

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम|

आज फिर हुस्न-ए-दिलारा की वही धज होगी,
वो ही ख्वाबीदा सी आँखें, वो ही काजल की लकीर,
रंग-ए-रुख्सार पे हल्का-सा वो गाज़े का गुबार,
संदली हाथ पे धुंधली-सी हिना की तहरीर।

अपने अफ़कार की अशार की दुनिया है यही,
जाने मज़मूं है यही, शाहिदे-ए-माना है यही,
अपना मौज़ू-ए-सुखन इन के सिवा और नही,
तबे शायर का वतन इनके सिवा और नही।

ये खूं की महक है कि लब-ए-यार की खुशबू,
किस राह की जानिब से सबा आती है देखो,
गुलशन में बहार आई कि ज़िंदा हुआ आबाद,
किस सिंध से नग्मों की सदा आती है देखो||

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम|




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

फ़ल्सफ़े इश्क़ में पेश आये सवालों की तरह
हम ___ ही रहे अपने ख़यालों की तरह

आपके विकल्प हैं -
a) उलझे, b) पशेमां, c) बहते, d) परेशाँ

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था -"सूरज" और शेर कुछ यूं था -

कहीं नहीं कोई सूरज, धुंआ धुंआ है फिज़ा,
खुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो...

शरद जी जाने क्यों सुराग और सूरज को लेकर पशोपश में रहे, पर दिशा जी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ सही जवाब पेश किया. दिशा जी का शेर गौर फरमाएं -

गर न चमके सूरज तो दुनिया में रोशनी कहाँ होगी
न तो सुबह का नाम बचेगा न चाँद में चाँदनी रहेगी

मंजू जी ने अपनी कविता के कुछ अंश यूं पेश किये -

राह दिखता सूरज जग को,रीति,नीति,विवेक बतलाता .
सत्य,नियम आनुसाशन का पालन, जीवन को सफल बनता

मनु जी ठहरे 'वजन" वाले इंसान तो नाप तोल कर सही जवाब दिया इस शेर के साथ -

यार बना कर मुझ को सीढी, तू बेशक सूरज हो जा..........
देख ज़रा मेरी भी जानिब, मुझको भी कुछ बख्श जलाल..

और
अभी तो दामने-गुल में थी शबनम की हसीं रंगत
अभी सूरज उधर ही चल पड़ा है हाथ फैलाए

कुलदीप अंजुम साहब आपने शायर एकदम सही बताया पर हर बार की तरह आप निदा साहब के कुछ शेर याद दिलाते तो मज़ा आता, सुमित जी को महफिल की ग़ज़ल पसंद आई, अच्छा लगा जानकार.

कल सदी का सबसे बड़ा सूर्य ग्रहण होने वाला है, चलते चलते सूरज को सलाम करते हैं शमिख फ़राज़ जी की इस शायरी के साथ -

तेरी यादों ने पिघलाया है ऐसे
कि सूरज को छुआ हो मैंने जैसे
हाँ मैंने हर सिम्त हर तरफ से
हाँ मैंने हर लपट और कुछ निकट से....

जलता रहे सूरज वहां आसमान पर और यहाँ हम सबके जीवन में यूँहीं उजाले कायम रहे इसी दुआ के साथ लेते हैं आपसे इजाज़त अगली महफिल तक. खुदा हाफिज़.
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, July 17, 2009

तेरी आवाज़ आ रही है अभी.... महफ़िल-ए-शाइर और "नासिर"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३०

"महफ़िल-ए-गज़ल" के २५वें वसंत (यूँ तो वसंत साल में एक बार हीं आता है, लेकिन हम ने उसे हफ़्ते में दो बार आने को विवश कर दिया है) पर हमने कुछ नया करने का सोचा, सोचा कि क्यों ना अपनी और अपने पाठकों की याद्दाश्त की मालिश की जाए। गौरतलब है कि हम हर बार एक ऐसी गज़ल या गैर फिल्मी नज़्म लेकर हाज़िर होते हैं, जिसे जमाना भुला चुका है या फिर भुलाता जा रहा है। आज कल नए-नए वाद्ययंत्रों की बाढ-सी आ गई है और उस बाढ में सच्चे और अच्छे शब्द गुम होते जा रहे हैं। इन्हीं शब्दों, इन्हीं लफ़्ज़ों को हमें संभाल कर रखना है। तो फिर गज़लों से बढिया खजाना कहाँ मिलेगा, जहाँ शुद्ध संगीत भी है, पाक गायन भी है तो बेमिसाल लफ़्ज़ भी हैं। इसलिए हमारा यह फ़र्ज़ बनता है कि ऐसी गज़लों, ऐसी नज़्मों को न सिर्फ़ एक बार सुने बल्कि बार-बार सुनते रहें। फिर जिन फ़नकारों ने इन गज़लों की रचना की है,उनके बारें में जानना भी तो ज़रूरी है और बस जानना हीं नहीं उन्हें याद रखना भी। अब हम तो एक कड़ी में एक फ़नकार के बारे में बता देते हैं और फिर आगे बढ जाते हैं। अगर हमें उन फ़नकारों को याद रखना है तो कुछ अंतराल पर हमें पीछे भी मुड़ना होगा और बीती कड़ियों की सैर करनी होगी। यही एक वज़ह थी कि हमने २५वें एपिसोड से पिछले एपिसोड तक प्रश्नों की श्रृंखला चलाई थी और यकीन मानिए, उन प्रश्नों का हमें बहुत फ़ायदा हुआ..यकीनन आप सबको भी असर तो दिखा हीं होगा। तो इन पाँच कड़ियों के बीत जाने के बाद हमें अपना विजेता भी मिल गया है। हमने तो यह सोचा था कि विजेता एक होगा, जिससे हम तीन गज़लों की माँग करेंगे और उन गज़लों को ३१वें एपिसोड से ३५वें एपिसोड के बीच में सुनवाएँगे। लेकिन यहाँ तो दो-दो लोग जीत गए हैं। इसलिए हम अपनी पुरानी बात पर अडिग तो नहीं रह सकते,लेकिन वादा भी तो नहीं तोड़ा जा सकता। सारी स्थिति को देखते हुए, हमने यह निर्णय लिया है कि "शरद" जी और "दिशा" जी हमें अपनी पसंद की पाँच-पाँच गज़लों का नाम(हो सके तो एलबम का नाम या फिर फ़नकार का नाम भी) भेज दें, हाँ ध्यान यह रखें कि उन गज़लों में कुछ न कुछ भिन्नता जरूर हो ताकि हर एपिसोड में हमें एक हीं बात न लिखनी पड़े(आखिर उन गज़लों के बारे में हमें जानकारी भी तो देनी है) , फिर उन ५-५ गज़लों में से हम ३-३ उन गज़लों का चुनाव करेंगे जो आसानी से हमें उपलब्ध हो जाएँ और इस तरह जमा हुए इन ६ गज़लों को ३२वें से ४०वें एपिसोड के बीच महफ़िल-ए-गज़ल में पेश करेंगे। तो हम अपने दोनों विजेताओं से यह दरख्वास्त करते हैं कि वे गज़लों (या कोई भी गैर फ़िल्मी नज़्म) की फ़ेहरिश्त hindyugm@gmail.com पर जितनी जल्दी हो सके, मेल कर दें। गज़लें किस क्रम में पोस्ट की जाएँगी, इसका निर्णय पूर्णत: हमारा होगा, ताकि कुछ न कुछ तो सरप्राइज एलिमेंट बचा रहे।

चलिए अब हम अपने पुराने रंग में वापस आते हैं और एक नई गज़ल से अपनी इस महफ़िल को सजाते हैं। आज की गज़ल को हमने जिस एलबम से लिया है उसका नाम है "चंद गज़लें, चंद गीत"। इस एलबम में एक से बढकर एक गज़लें हैं,लेकिन हमने उस गज़ल का चुनाव किया है जो औरों-सी होकर भी औरों से अलग है। ऐसा क्यों है, वह आप खुद समझ जाएँगे। आज की गज़ल को अगर आप गुनगुनाएँगे तो आपको कुछ सालों पहले रीलिज हुई एक हिंदी फ़िल्म "दिल का रिश्ता" के शीर्षक गाने की याद आ जाएगी- "दिल का रिश्ता बड़ा ही प्यारा है,कितना पागल ये दिल हमारा है।" ना ना- हम अर्थ में समानता की बात नहीं कर रहे, बल्कि इस गाने की धुन उस गज़ल से हू-ब-हू मिलती है, आखिर मिले भी क्यों ना, जब उसी से उठाई हुई है। नदीम-श्रवण साहबान पाकिस्तानी गीतों और गज़लों के जबर्दस्त प्रशंसक रहे हैं और इसका प्रमाण उनके कई सारे गानों की धुनों में छुपा है। मसलन "मुसर्रत नज़ीर" के "चले तो कट हीं जाएगा सफ़र" को इन दोनों ने बना दिया "तुम्हें अपना बनाने की कसम खाई है", "नुसरत" साहब के "सानु एक पल चैन न आए", "किस्सेन दा यार न विछड़े" और "किन्ना सोणा" को इन दोनों फ़नकारों ने क्रमश: "मुझे एक पल चैन न आए", "किसी का यार न बिछड़े" और "कितना प्यारा तुझे रब ने बनाया" का रूप दे दिया। गज़लों से तो इन दोनों का खासा लगाव रहा है। मल्लिका-ए-तरन्नुम "नूरजहां" के "वो मेरा हो न सका", "बेगम अख्तर" के "ऐ मोहब्बत तेरे अंज़ाम पर रोना आया" और "मेहदी हसन" साहब के "ना कोई गिला" को नए रूप में जब ढाला गया तो ये बन गए क्रमश: "दिल मेरा तोड़ दिया उसने" , "कितना प्यारा है ये चेहरा जिसपे हम मरते हैं" और "गा रहा हूँ इस महफ़िल में" । इतनी बेदर्दी से इन गज़लों का दोहन किया गया है कि सुन कर शर्म आती है, लेकिन क्या कीजिएगा पैसों की इस दुनिया में ईमानदारी का क्या मोल। और पहले तो छुप-छुपकर चोरियाँ होती थीं, लेकिन आज तो संगीतकार खुले-आम कहते हैं कि हम नहीं चाहते थे कि किसी अंग्रेजी गाने से धुन की नकल करें,क्योंकि लोगों ने वह गाना सुना होता है, इसलिए हमने यह धुन तुर्की से उठाई है तो यह धुन स्पेन से। वैसे हम भी कहाँ उलझ गए, आज की गज़ल की बात करते-करते न जाने किस भावावेश में बह निकले। जिस गज़ल को लेकर हम प्रस्तुत हुए हैं उसे अपनी आवाज़ से मक़बूल किया है "गुलाम अली" साहब ने। शायद संगीत भी उन्हीं का है। वैसे "गुलाम अली" साहब पर एक कड़ी लेकर हम पहले हीं हाज़िर हो चुके हैं, इसलिए आज की कड़ी को गज़लगो के सुपूर्द करते हैं।

८ दिसम्बर १९२५ को अंबाला में जन्मे "सैय्यद नासिर रज़ा काज़मी" छोटी बहर की गज़लों के बेताज़ बादशाह माने जाते हैं। १९४० में इन्होंने जनाब "अख्तर शेरानी" के अंदाज़ में रूमानी कविताएँ और नज़्मों की रचना शुरू की। आगे चलकर जनाब "हाफ़िज़ होशियारपुरी"(इनकी बात हमने महफ़िल-ए-गज़ल की १८वीं कड़ी में की थी, जब हमने इक़बाल बानो की आवाज़ में "मोहब्बत करने वाले कम न होंगे" सुनवाया था) की शागिर्दगी में इन्होंने गज़ल-लेखन शुरू किया। "मीर तक़ी मीर" की गज़लों का इन पर गहरा असर था, इसलिए इनकी गज़लों में "अहसास-ए-महरूमी" को आसानी से महसूस किया जा सकता है। "हाफ़िज़" साहब का प्रकृति प्रेम इनकी लेखनी में भी उतर गया था। "याद के बे-निशां जज़ीरों से, तेरी आवाज़ आ रही है अभी"- इस पंक्ति में "जज़ीरों" का प्रयोग देखते हीं बनता है। "नासिर काज़मी" के बारे में कहा जाता है कि ये गज़लों को न सिर्फ़ कलम और कागज़ देते थे, बल्कि अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा भी उनके साथ पिन कर देते थे। इन्होंने ज़िन्दगी की छोटी-छोटी अनुभूतियों को ग़ज़ल का विषय बनाया और अपनी अनुभव सम्पदा से उसे समृद्ध करते हुए एक ऐसे नये रास्ते का निर्माण किया, जिस पर आज एक बड़ा काफ़िला रवाँ-दवाँ है। इनके जीवन काल में इनका सिर्फ़ एक ही ग़ज़ल संग्रह ‘बर्ग-ए-नै’ सन् १९५२ में प्रकाशित हो सका, जिसकी ग़ज़लों ने सभी का ध्यान आकृष्ट किया। इनका दूसरा और महत्वपूर्ण संग्रह ‘दीवान’ इनके निधन के कुछ महीनों बाद प्रकाशित हुआ, जिसकी ग़ज़लों ने उर्दू जगत में धूम मचा दी। एक ही जमीन में कही गयी इनकी पच्चीस ग़ज़लों का संग्रह ‘पहली बारिश’ भी इनकी मृत्यु के बाद ही सामने आया। इन्होंने न सिर्फ़ गज़लें लिखीं बल्कि एक ऐसा दौर भी आया, जब गज़लों से इन्हें हल्की विरक्ति-सी हो गई । उस दौरान इन्होंने "सुर की छाया" नामक एक नाटिका की रचना की, जो पूरी की पूरी छंद में थी। गज़लों और नाटिकाओं के अलावा इन्हें दूसरी भाषाओं की पुस्तकों का तर्ज़ुमा करना भी पसंद था। "वाल्ट विटमैन" के "क्रासिंग ब्रुकलिन फ़ेरि" का अनुवाद "ब्रुकलिन घाट के पार" उर्दू भाषा की एक मास्टरपिश मानी जाती है। इनके बारे में बातें करने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन आज बस इतना हीं। चलिए आगे बढने से पहले, इन्हीं का लिखा एक शेर देख लेते हैं, जिन्हें कितनों ने "गुलाम अली" साहब की आवाज़ में कई बार सुना होगा:

अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ।


गुलाम अली साहब की आवाज़ की मिठास को ज्यादा देर तक थामे रखना संभव न होगा। इसलिए ज़रा भी देर किए बिना आज की गज़ल से मुखातिब होते हैं। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

दिल में इक लहर-सी उठी है अभी,
कोई ताज़ा हवा चली है अभी।

शोर बरपा है खाना-ए-दिल में,
कोई दीवार-सी गिरी है अभी।

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी,
और ये चोट भी नई है अभी।

याद के बे-निशां जज़ीरों से,
तेरी आवाज़ आ रही है अभी।

शहर की बे-चराग़ गलियों में,
ज़िंदगी तुझको ढूँढती है अभी।


कुछ शेर जो इस गज़ल में नहीं हैं:

सो गए लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी

भरी दुनिया में दिल नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमीं है अभी

वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

कहीं नहीं कोई ___, धुंआ धुंआ है फिज़ा,
खुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो...

आपके विकल्प हैं -
a) दीपक, b) चाँद, c) सूरज, d) रोशनी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "वहशत" औए शेर कुछ यूं था -

तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया...

सबसे पहले सही जवाब दिया दिशा जी ने, बधाई हो. दिशा जी ने कुछ शेर भी फरमाए -

वहशत इस कदर इंसा पर छायी है
कि जर्रे जर्रे में दहशत समायी है
कहाँ से लाऊँ अब मैं अमन का पानी
ये मुसीबत खुद ही तो बुलायी है...

बहुत खूब दिशा जी...
शरद जी ज़रा से देरी से आये पर इस शेर को सुनकर समां बाँध दिया आपने -

ग़म मुझे, हसरत मुझे, वहशत मुझे, सौदा मुझे,
एक दिल देके खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे ।

वाह...
शमिख जी आपने बिलकुल सही पहचाना, साहिर साहब को सलाम...वाह क्या ग़ज़ल याद दिलाई आपने ख़ास कर ये शेर तो लाजवाब है -

फौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदायें डूब गईं
जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बायें डूब गईं

मंजू जी ने अपने शेर में महफिल-ए-ग़ज़ल की ही तारीफ कर डाली, शुक्रिया आपका...और अंत में हम आपको छोड़ते हैं वहशत शब्द पर कहे मनु जी के बड़े अंकल और हम सबके चाचा ग़ालिब के इस सदाबहार शेर के साथ...

इश्क मुझको नहीं 'वहशत' ही सही
मेरी 'वहशत' तेरी शोहरत ही सही...

वाह....मनु जी आप बीच का एक एपिसोड भूल गए...अरे जनाब कहाँ रहता है आपका ध्यान आजकल.....चलिए अब आनंद लीजिये आज की महफिल का, और हमें दीजिये इजाज़त अगले मंगलवार तक.खुदा हाफिज़.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, July 14, 2009

कोई जुगनू न आया......"सुरेश" की दिल्लगी और महफ़िल-ए-ताजगी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२९

लीजिए देखते-देखते हम अपनी महफ़िल को उस मुकाम तक ले आएँ, जहाँ पहला पड़ाव खत्म होता है और दूसरे पड़ाव की तैयारी जोर-शोर से शुरू की जाती है। आज महफ़िल-ए-गज़ल की २९वीं कड़ी है और २५वीं कड़ी में सवालों का जो दौर हमने शुरू किया था, उस दौर उस मुहिम का आज अंत होने वाला है। अब तक बीती चार कड़ियों में हमने बहुत कुछ पाया हीं है और खुशी की बात यह है कि हमने कुछ भी नहीं खोया। बहुत सारे नए हमसफ़र मिले जो आज तक बस "ओल्ड इज गोल्ड" के सुहाने सफ़र तक हीं अपने आप को सीमित रखे हुए थे। हमने हर बार हीं यह प्रयास किया कि सवाल ऐसे पूछे जाएँ जो थोड़े रोचक हों तो थोड़े मुश्किल भी, जिनके जवाब अगर आसानी से मिल जाएँ तो भी पढने वाले को पिछली कड़ियों का एक चक्कर तो ज़रूर लगाना पड़े। शायद हम अपने इस प्रयास में सफ़ल हुए। वैसे अभी तक तो सवालों का बस तीन हीं लोगों ने जवाब दिया है, जिनमें से दो हीं लोगों ने अपनी सक्रियता दिखाई है। अब चूँकि आज इस मुहिम का अंतिम सोपान है, इसलिए यकीनन नहीं कह सकता कि गुजारिश का कितना असर होगा, फिर भी लोगों से यही दरख्वास्त है कि कम से कम आज की कड़ी के प्रश्नों पर माथापच्ची कर लें। वैसे कहते भी हैं कि "अंत भला तो सब भला।" चलिए, आगे बढने से पहले पिछली कड़ी का हिसाब-किताब करते हैं। दिशा जी ने एक बार फिर से सबसे पहले सही जवाब दिया और उनके जवाब के बाद शरद जी भी अपने जवाब के साथ हाजिर हुए। इस तरह दिशा जी को मिले ४ अंक और शरद जी को ३ अंक। इस तरह अंकों का माज़रा कुछ इस तरह बनता है: शरद जी: १३ अंक, दिशा जी: १२ अंक, कुलदीप जी: १ अंक। अंकों का यह अंकगणित अगर इसी तरह चलता रहा तो अगली कड़ी आते-आते शरद जी और दिशा जी १६ अंकों के साथ शीर्ष पर विराजमान हो जाएँगे। शरद जी तभी अकेले विजयी हो सकते हैं, जब आज की कड़ी का जवाब वे दिशा जी से पहले दे दें। देखते हैं क्या होता है! हम आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब आज के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इस तरह, पाँचों कड़ियों को मिलाकर जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) एक ऐसे सूफ़ी संत जिनके गुरू यूँ तो पेशे से माली थे, लेकिन उन्होंने "दस्तूर-उल-अमल", "इस्लाह-उल-अमल", "लताइफ़-इ-ग़ैब्या", "इशरतुल तालिबिन" जैसी पुस्तकों की रचना की थी। इस महान संत के पूर्वज बरसों पहले "सुरख-बुखारा" से "मुल्तान" आए थे।
२) संगीत की एक विधा, जिसकी शुरूआत "ली स्क्रैच पेरी" और "किंग टैबी" जैसे संगीत के निर्माताओं ने की थी और "अगस्तस पाब्लो" और "माइकी ड्रेड" जैसे महानुभावों ने इसका प्रचार-प्रसार किया था। २००७ में इसी संगीत की रूमानियत से सनी "कव्वालियों" की एक एलबम रीलिज हुई थी।


हिंदी संगीत उद्योग ने यूँ तो कई सारे फ़नकारों को ज़र्रे से उठाकर अर्श तक पहुँचाया है, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी हुआ है कि अच्छे खासे गुणी लोग उतना रूतबा,उतना सम्मान न पा सके, जिनके वे हक़दार थे। ऐसे हीं फ़नकारों में से एक हैं स्वर-कोकिला लता मंगेशकर के बेहद अज़ीज़ श्री "सुरेश वाडेकर" साहब। न जाने कितनी हीं कालजयी रचनाओं को इन्होंने स्वर-बद्ध किया है। इनकी वाणी में इतनी मिठास है कि सुनने वाला एक बार इनकी तरफ़ कान करे तो तब तक नहीं हिलता जब तक इनके कंठों से आ रही ध्वनि विश्राम करने के लिए कहीं ठहर न जाए। हमने पिछली दो कड़ियों में मुजफ़्फ़र अली की फिल्म "गमन" की बातें की थी, जिसके गीतों को संगीत से सजाया था जयदेव ने। "सुरेश वाडेकर" की संगीत यात्रा की शुरूआत एक तरह से "गमन" से हीं हुई थी। १९७६ में आयोजित "सुर श्रृंगार" प्रतियोगिता, जिसके कई सारे निर्णयकर्त्ताओं में जयदेव भी एक थे को जितने के बाद इन्हें जयदेव की तरफ़ से गायकी का निमंत्रण मिला। "सीने में जलन" अगर इनका पहला गीत न भी हुआ तो भी शुरूआती दिनों के सदाबहार गाने में इसे ज़रूर हीं गिना जा सकता है। लता दीदी इनकी आवाज़ से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल","खय्याम","कल्याण जी-आनंद जी" जैसे संगीतकारों से इनकी सिफ़ारिश कर डाली। अब अगर आवाज़ में दम हो और सिफ़ारिश लता दीदी की हो तो किस संगीतकार में इतना माद्दा है कि प्रतिभा को उभरने से रोक सके। सो, इनकी गाड़ी चल निकली। वैसे प्रसिद्धि का सही स्वाद इन्होंने तब चखा जब राज कपूर की फिल्म "प्रेम रोग" में "संतोष आनंद","नरेंद्र शर्मा" और "अमिर क़ज़लबश" जैसे धुरंधरों के लिखे और "एल-पी" के संगीत से सजे गानों को गाने का इन्हें अवसर मिला। उस पर से किस्मत ये कि दोगानों में इनका साथ दिया स्वयं लता मंगेशकर ने। "प्रेम रोग" के अलावा "क्रोधी", "हम पाँच", "प्यासा सावन","मासूम", "सदमा", "बेमिसाल", "राम तेरी गंगा मैली", "ओंकारा" जैसी फिल्मों में भी इन्होंने सदाबहार गाने गाए हैं। इनकी मखमली आवाज़ का हीं जादू है कि २००७ में महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें "महाराष्ट्र प्राईड अवार्ड" से सम्मानित किया है।

यूँ तो फ़नकार के लिए यही खुशी की बात होती है कि उनके फ़न को दुनिया मे पहचान मिले,लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इस फ़न को लोगों में बाँटना चाहते हैं, ताकि आने वाले दिनों में उन जैसे कई और महारथी मैदान में उतर सकें। "सुरेश वाडेकर" साहब भी कुछ ऐसा हीं कर रहे हैं। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को सुधिजनों तक पहुँचाने के लिए "संगीत प्रशिक्षण संस्थान" की स्थापना की है। इस बारे में अपना अनुभव बाँटते हुए वे कहते हैं:- "मेरे पास अपना क्या है? हमने पूज्य गुरु से जो सीखा है, उसे आने वाली पीढ़ी को और बच्चों को दे रहा हूँ। आखिर उसे छाती पर बाँधकर कहाँ ले जाएँगे। विद्या को जितना बाँटेंगे, मस्तिष्क उतना ही जागृत और परिष्कृत होगा। गाना सिखाने से आपका अपना रियाज तो होगा ही, आपकी सूझबूझ और खयाल विस्तृत होगा। जो आदमी खुद की आत्मसात विद्या को छाती पर बाँधकर ले जाता है, वह दुनिया का सबसे बड़ा स्वार्थी व कंजूस व्यक्ति है। विद्या बाँटने से बढ़ती है, न घटती है और न ही कम होती है।" "वाडेकर" साहब में नाम-मात्र का भी दंभ नहीं है। यह बात उनके इन वक्तव्यों से ज़ाहिर होती है: "मैं बहुत भाग्यशाली रहा कि जब-जब भी अच्छे और कुछ अलग किस्म के गाने बने तो मुझे बुलाया गया। हमारा बड़ा भाग्य रहा कि पूरी इंडस्ट्री में जब अनेक नामचीन और स्थापित गायक कार्यरत थे तो रवीन्द्र जैनजी ने मुझे अवसर दिया। यह मामूली बात नहीं है कि जब फिल्म इंडस्ट्री में पैर रखना मुश्किल होता था तो मुझ जैसे नए कलाकार के हिस्से में इतनी मुश्किल तर्जे आई और गाने को मिली। आज उन्हीं सब बुजुर्गों, गुरुजनों और सुनने वालों के आशीर्वाद से मैं ३३ साल से गाने की कोशिश कर रहा हूँ।" इन महानुभाव के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन बाकी फिर कभी। अब आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की गज़ल हमने ली है "आप की दिल्लगी" नामक एलबम से। वैसे हमारी यह बदकिस्मती है कि लाख कोशिशों के बावजूद आज की गज़ल के गज़लगो और संगीतकार के बारे में हम जानकारी हासिल नहीं कर पाए। सुकून इस बात का है कि इसी एलबम की एक और गज़ल "क्या ये भी ज़िंदगी" है के बारे में कुछ मालूमात हासिल हुए हैं। जैसे कि उस गज़ल की रचना की है स्वर्गीय "कृष्णमोहन जी" ने और संगीत से सजाया है "मधुरेश पाइ" ने। हो सकता है कि आज की गज़ल के रचनाकार भी यही दोनो हो। "मधुरेश पाइ" "सुरेश वाडेकर" जी के शिष्य हैं और उन्हीं के "संगीत विद्यालय" से प्रशिक्षित हुए हैं। ये ज्यादातर मराठी गीतों, गज़लों और भक्ति-संगीत पर काम करते हैं। वैसे इनकी प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण है स्वर-कोकिला लता मंगेशकर के साथ इनका तैयार किया हुआ एलबम "सादगी"। कभी समय मिले तो इस एलबम की गज़लों को ज़रूर सुनिएगा। आखिर कुछ तो बात है इस इंसान में और इसके संगीत में कि लता दीदी १७ सालों बाद किसी एलबम पर काम करने को राजी हो गईं। कभी "सादगी" और इससे १७ साल पहले रीलिज हुए "सज़दा" के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगे, अभी इन दो मिसरों पर गौर फरमाईयेगा। बड़े दिनों बाद कुछ लिखा है मैने:

खुदा मेरी खुदी का जो तलबगार हो गया,
बिना कहे कोई मेरा मददगार हो गया।


यकीनन बड़ी देर हो गई। वक्त को अब ज्यादा थामे रहना मुनासिब न होगा। तो लीजिए पेश है आज की गज़ल:

कोई जुगनू न आया खेलता-हँसता अंधेरे में,
मैं कितनी देर तक बैठा रहा तन्हा अंधेरे में।

तुम्हारे साथ क्यों सुलगी तुम्हारे घर की दीवारें,
बुझा दो रोशनी कि सोचते रहना अंधेरे में।

अगर अंदर की थोड़ी रोशनी बाहर न आ जाती,
मैं अपने आप से टकरा गया होता अंधेरे में।

अगर खुद जल गया होता तो शायद सुबह हो जाती,
मैं सूरज की दुआ क्यों माँगने बैठा अंधेरे में।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया
हर गाँव में ____ नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया...

आपके विकल्प हैं -
a) दहशत, b) वहशत, c) बरकत, d) गुरबत

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था -"मिजाज़" और सबसे पहले इसे पहचाना अदा जी ने, सही शेर कुछ यूं था -

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला कीजिये...

जी हाँ, बशीर साहब का लिखा हुआ शेर है ये, बशीर बद्र साहब के कुछ और शेर याद दिलाये कुलदीप अंजुम साहब ने -

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलने में

फाख्ता की मजबूरी कि ये भी तो कह नहीं सकती
कि कौन सांप रखता है उसके आशियाने में

वाह साहब....अंजुम साहब ने मिजाज़ शब्द पर भी कुछ शेर सुनाये -

वो ही मिजाज़ वो ही चाल है ज़माने की ,
हमें भी हो गयी आदत फरेब खाने की !

विजेता अदा जी के शेर का भी जिक्र करें -

मिज़ाज-ए-गरामी,दुआ है आपकी
बड़ी ख़ूबसूरत अदा है आपकी...

क्या बात है अदा जी...दिशा जी ने कुछ यूं फ़रमाया अपना मिजाज़ -

सुना है मौसम ने अपना मिज़ाज बदला है
तभी तो कहीं पे बाढ़ और कहीं पे सूखा है...

आज के हालत पर सही कटाक्ष...मंजू गुप्ता जी लगता है जहाँ रहती है वहां मानसून आ चुका है तभी तो कह रही हैं -

मौसम का मिजाज़ आशिकाना है .
मेघा सन्देश पिया को दे आना...

शरद जी ने अपने मित्र की एक ग़ज़ल पेश की. कुछ उसकी झलक पेश है -

शहरे-वफ़ा का आज ये कैसा रिवाज है
मतलबपरस्त अपनों का ख़ालिस मिजा़ज है ।
फुटपाथ पर ग़रीबी ये कहती है चीख कर
क्यूँ भूख और प्यास का मुझ पर ही राज है ।
जलती रहेंगीं बेटियाँ यूँ ही दहेज पर
क़ानून में सुबूत का जब तक रिवाज है ।
शायद इसी का नाम तरक्की है दोस्तो,
नंगी सड़क पे हर बहू-बेटी की लाज है ।

गज़लकार चाँद "शेरी" को हमारा भी सलाम कहियेगा....शमिख फ़राज़, अम्बरीश श्रीवास्तव, और राज भाटिया जी, हमारी भी यही दुआ है कि आप इस महफिल में आयें तो कभी वापस न जायें. अर्श जी आप तो खुद भी अच्छे गुलुकार हैं और बिना कुछ कहे सुने चले गए, बुरी बात....चलिए अब दीजिये इजाज़त अगली महफिल तक. खुदा हाफिज़.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, July 10, 2009

मैं ख्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है....... "बेग़म" की महफ़िल में "सलीम" को तस्लीम

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२८

रात कुछ ऐसा हुआ जैसा होता तो नहीं, थाम कर रखा मुझे मैं भी खोता तो नहीं - आने वाली फिल्म "कमीने" में लिखे "गुलज़ार" साहब के ये शब्द हमारी आज की महफ़िल पर बखूबी फिट हो रहे हैं। अहा! आज की महफ़िल नहीं, दर-असल पिछली महफ़िल के जवाबों के साथ ऐसा हीं कुछ हुआ है, जो अमूमन होता नहीं है। हमारे "शरद" साहब, जिनका बाकी सभी लोहा मानते हैं और एक तरह से हमारी मुहिम को उन्होंने हीं थाम कर रखा है, वही भटकते हुए दिखे। पहले प्रयास में बस एक सही जवाब, क्या जनाब! आपसे ऐसी तो उम्मीद नहीं थी हमारी। और यह देखिए आपने गलत रास्ता दिखाया तो कुलदीप भाई भी उसी रास्ते पर चल निकले। यह अलग बात है कि आप दोनों ने "दिशा" जी का सही जवाब आने के बाद अपनी टिप्पणियाँ हटा दी,लेकिन हमारी पैनी निगाहों से आप दोनों बच न सके। हमने आपकी कारस्तानी पकड़ हीं ली और भाईयों "ऐसा भी तो नहीं होता" कि आप अपने जवाब हटा लें। अब चूँकि पहला सही जवाब "दिशा" जी ने दिया, इसलिए एक बार फिर से ४ अंक उन्हीं के हिस्से में जाते हैं। दूसरा सही जवाब देने के लिए "शरद" जी को पुनश्च ३ अंकों से नवाज़ा जाता है। कुलदीप जी आप दुबारा आए और इस बार सही जवाब के साथ आए, लेकिन चूँकि आपने एपिसोड नंबर्स नहीं दिए, इसलिए कायदे से तो आपको कुछ भी नहीं मिलना चाहिए था, लेकिन आपके परिश्रम से खुश होकर हम आपको १ अंक देते हैं। इन तीनों महारथियों के अलावा किसी ने भी सवालों का जवाब देना सही नहीं समझा। कोई बात नहीं, "वो सारे चुप जो बैठे हैं कभी तो नींद तोड़ेंगे, हमारे दिल की दस्तक को, भला कैसे वो मोड़ेंगे।" हाँ तो तीन कड़ियों के बाद अंकों का गणित कुछ इस तरह है: शरद जी: १० अंक, दिशा जी: ८ अंक और कुलदीप जी: १ अंक। अब आज के सवालों की ओर रूख करते हैं। २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) "मेरी दादी अनवरी बेगम पारो, दादा रफ़ीक़ गज़नवी, अम्मी ज़रिना और खुद मेरा फ़िल्मों से गहरा नाता रहा है और मेरे लिए खुशी की बात है कि मेरी बेटी ज़रीना भी इसी क्षेत्र में अपना भविष्य आजमाने जा रही है।" -ये बोल जिन फ़नकारा के हैं उन्होंने अपनी संगीत यात्रा की शुरूआत "ए बी ए" ज़ौनर के गानों से की थी।
२) १९७८ में मुजफ़्फ़र अली की एक फ़िल्म के लिए जयदेव के संगीत निर्देशन में इन्होंने अपना पहला गाना गाया। लेकिन इन्हें सही प्रसिद्धि १८ साल बाद मिली, जब मुंबई के एक फ़नकार के साथ इनके फ़्युजन एलबम को लोगों ने काफ़ी पसंद किया।


चूँकि आजकल बराबरी का दौर है, इसलिए हमने भी सोचा कि क्यों ना संगीत में भी बराबरी को प्रोत्साहन दें और इसलिए ताबड़तोड़ गायिकाओं पर आधारित अंक पेश करने लगें। यह लगातार चौथा अंक है, जिसमें किसी फ़नकारा की बात की जा रही है। इससे पहले "मल्लिका पुखराज","फ़रीदा खानुम" और "रूना लैला" की गलाकारी का हमने आनंद लिया है। अरे नहीं, हम मज़ाक कर रहे थे। दर-असल इन सारी हस्तियों की बात हीं कुछ ऐसी है, कि बिना किसी तैयारी या बिना किसी पक्षपात के हम हर बार किसी न किसी फ़नकारा की गज़ल या नज़्म को हीं चुने जा रहे हैं। अब अगर आज की फ़नकारा की बात करें तो यकीनन ये भी बाकी सब जितना हीं रूतबा और इल्म रखती हैं, लेकिन न जाने कैसे इनका इतना नाम न हुआ, जितना बाकियों का है। लोग बस "रिफ़्युजी कैम्प्स" की बातें करते हैं या फिर अपने को औरों से अलहदा साबित करने के लिए दर्शाते हैं कि वो भी कभी "रिफ़्युजी कैम्प" में रहे हैं,लेकिन इन फ़नकारा की किस्मत देखिए कि इनकी संगीत-यात्रा को आकाश उन्हीं कैम्प्स में मिला। उन कैम्प्स में ना तो बिजली थी और ना हीं पानी, लेकिन इनके परिवार वालों के पास इनकी आवाज़ थी, जिसके बदौलत ये लोग अपनी ज़िंदगी को जीने का बहाना दिए जा रहे थे। यह बात तब की है, जब पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश में तब्दील हो रहा था और कई लोगों को खुद को बचाने के लिए पाकिस्तान की ओर जाना पड़ा था। यह बात १९७१ की है। वैसे इनके साथ यह पहली मर्तबा नहीं हो रहा था। इससे पहले हिन्दुस्तान के बँटवारे के वक्त इन्हें पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से पूर्वी पाकिस्तान की ओर रूख करना पड़ा था। तो इस तरह इन्हें बँटवारे का दर्द दो बार सहना पड़ा। तो हाँ, बांग्लादेश से पाकिस्तान आई "नादिरा" को उर्दू की तनिक भी जानकारी नहीं थी, लेकिन गाने का शौक़ था(अजी शौक क्या, इन्होंने ख़्वाजा गुलाम मुस्तफ़ा वरसी से बाक़ायदा मौशिकी की तालीम ली है) इसलिए नई जुबां तो सीखनी हीं थी। नई जुबां सीखने के दरम्यान इन्होंने महसूस किया कि अगर उर्दू के आसान अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किए जाएँ और वैसे हीं गज़ल गाए जाएँ,जिन्हें समझना आसान हो तो सुनने वालों के दिलों में पैठ बनाने में वक्त नहीं लगेगा.... और यही हुआ। १९७६ में इनका जब पहला गज़लों का एलबम रीलिज़ हुआ तो सारे रिकार्ड़्स हाथों-हाथ बिक गए। अपनी रोयाल्टी लेने ये जब रिकार्ड कंपनी के आफ़िस गईं तो "चेक़" पर लिखी रक़म ने इन्हें सकते में डाल दिया। ७००० रूपये की रकम देख इन्हें खुद पर यकीन नहीं हुआ। लेकिन जब इन्हें कहा गया कि यह ७००० नहीं बल्कि सत्तर हज़ार है तो इनके तो होश हीं उड़ गए। उस दौर में जिन्हें सत्तर हज़ार की रोयाल्टी मिले ,उनके स्तर को उनकी काबिलियत को आसानी से समझा और जाना जा सकता है। वैसे अपने चाहने वालों के बीच ये "नादिरा" नाम से नहीं जानी जाती, बल्कि इन्हें "मुन्नी बेग़म" कहलाना ज्यादा पसंद है। यह नाम सुनकर तो आप इन्हें पहचान हीं गए होंगे। २३ मार्च २००८ को पाकिस्तान सरकार ने इन्हें "प्राईड आफ़ परफ़ार्मेंश" से नवाज़ा थां। १९७६ से आज तक ४२ एलबम रीलिज कर चुकीं इन फ़नकारा को आवाज़ परिवार का सलाम!

चलिए अब फ़नकारा से आगे बढते हैं और आज के शायर की ओर रुख करते हैं। आज की गज़ल उस शायर की मक़बूलियत का सबूत भी है और सबब भी। हमने पिछली किसी कड़ी में यह कहा था कि "कुछ शायर ऐसे होते हैं, जो अपनी किसी खास गज़ल के कारण अमर हो जाते हैं, फिर वह गज़ल उनकी परछाई बन जाती है और वो उस गज़ल की।" ऐसा हीं कुछ मुद्दा यहाँ भी है। "मन आँगन में शहर बसा है", "चलो उन मंज़रों के साथ चलते हैं", "उसे कहना कभी मिलने चला आए", "तुम हीं अच्छे थे", "पहले पहल तो ख़्वाबों का दम भरने लगती हैं", "इस बार दिल ने तुझसे ना मिलने की ठानी है", "तुम ने सच बोलने की जुर्रत की", "ये लोग अब जि़स से इनकार करना चाहते हैं", "ये और बात कि खुद को बहुत तबाह किया", "कहीं तुम अपनी किस्मत का लिखा तब्दील कर लेते" - ये सारी कुछ गज़लें हैं, जो उनके नाम पर दर्ज हैं, लेकिन जिस गज़ल ने उन्हें अर्श तक पहुँचाया वो थी- "मैं ख़्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है।" आप हैरत में पड़ गए ना, पहले पहल मैं भी हैरत में पड़ गया था क्योकि इन्हीं अल्फ़ाज़ों से सजा एक नज़्म "तू प्यार है किसी और की, तुझे चाहता कोई और है", हमारे यहाँ गूँजा करता है। क्या कीजिएगा....हमारी नकल करने की आदत गई नहीं है। दिन में दस बार क्यों न हम पाकिस्तान को भला-बुरा कहें,लेकिन गाने चुराने के लिए उसी की ओर हाथ पसारकर खड़े हो जाते हैं। हाँ तो जहाँ तक इस गज़ल की बात है, इसे न सिर्फ़ "मुन्नी बेग़म" ने गाया है, बल्कि कई सारे फ़नकारों ने इस पर अपना गला साफ़ किया है, यहाँ तक कि उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान साहब की भी आवाज़ इस गज़ल को नसीब हुई है। लीजिए इतनी बात हो गई,लेकिन अब तक हमने उस शायर की शिनाख्त नहीं की। तो भाईयो, जनाब "सलीम कौसर" साहब हीं वो खुशकिस्मत शायर है। इससे पहले कि हम आज की गज़ल का लुत्फ़ उठायें,क्यों न इन साहब का हीं लिखा एक शेर देख लिया जाए:

जाने तब क्यों सूरज की ख्वाहिश करते हैं लोग,
जब बारिश में सब दीवारें गिरने लगती हैं।


लगे हाथों पेश है,आज की गज़ल। जहां-भर का दु:ख-दर्द भुलाकर इस गज़ल की रूमानियत और रूहानियत का आनंद लें:

मैं ख़्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है,
सरे-आईना मेरा अक्स है, पशे-आईना कोई और है।

मैं किसी की दस्ते-तलब में हूँ तो किसी की हर्फ़े-दुआ में हूँ,
मैं नसीब हूँ किसी और का, मुझे माँगता कोई और है।

अजब ऐतबार-ओ-बेऐतबारी के दरम्यान है ज़िंदगी,
मैं क़रीब हूँ किसी और के, मुझे जानता कोई और है।

तेरी रोशनी मेरे खद्दो-खाल से मुख्तलिफ़ तो नहीं मगर,
तू क़रीब आ तुझे देख लूँ, तू वही है या कोई और है।

तुझे दुश्मनों की खबर न थी, मुझे दोस्तों का पता नहीं,
तेरी दास्तां कोई और थी, मेरा वाक्या कोई और है।

वही मुंसिफ़ों की रवायतें, वहीं फैसलों की इबारतें,
मेरा जुर्म तो कोई और था,पर मेरी सजा कोई और है।

कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं, देखना उन्हें गौर से,
जिन्हें रास्ते में खबर हुईं,कि ये रास्ता कोई और है।

जो मेरी रियाज़त-ए-नीम-शब को ’सलीम’ सुबह न मिल सकी,
तो फिर इसके मानी तो ये हुए कि यहाँ खुदा कोई और है।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए ___ का शहर है, ज़रा फासले से मिला कीजिये...

आपके विकल्प हैं -
a) शौक, b) शऊर, c) सलीके, d) मिजाज़

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था -"शोला" और शेर कुछ यूं था -

रूह बेचैन है एक दिल की अजीयत क्या है,
दिल ही शोला है तो ये सोज़े मोहब्बत क्या है...

कैफी साहब के इस शेर को सही पहचाना सबसे पहले शरद जी ने...बधाई जनाब....आपका शेर कुछ यूं था -

शोला था जल बुझा हूँ हवाएं मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूँ सदाएं मुझे न दो

कुलदीप अंजुम जी, रंजिश ही सही भी किसी दिन अवश्य सुनेंगें हम इस महफ़िल में रुना की आवाज़ में. आपने तो शेरों की झडी ही लगा दी...वाह कुछ शेर यहाँ पेश है -

ज़िन्दगी एक सुलगती सी चिता है "साहिल"
शोला बनती हैं ना यह बुझ के धुंआ होती हैं

ऐ हुस्ने बेपरवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँ
फूलों में भी शोखी तो है किसको मगर तुझसा कहूँ

और ...
कभी गुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह
लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह...

कतील शिफाई और इफ्तिखार आरिफ की खूब याद दिलाई आपने....शुक्रिया. मनु जी क्या खूब बात याद दिलाई आपने -

जंग रहमत है के लानत ये सवाल अब न उठा
जो सर पे आ गयी है जंग तो रहमत होगी
गौर से देखना जलते हुये शोलों का जलाल
इसी दोज़ख के किसी कोने में जन्नत होगी..

और

देख के आहंगर की दुकां में
तुंद हैं शोले, सुर्ख है आहन
खुलने लगे कुफलों के दहाने
फैला हर इक ज़ंजीर का दामन

वाह, दिशा जी, पूजा जी, सुमित जी, अदा जी आप सब ने भी महफिल में खूब हाजिरी दी और बढ़िया रंग जमाया. विदा लेने से पहले रचना जी का ये शेर मुलहाज़ा फरमायें -

भूख के शोले जब पेट जलाते हैं
हम बच्चों को उम्मीद खिलाते हैं...

रचना जी सही कहा आपने, हम सब को मिलकर आने वाली पीढी के लिए इन हालातों को बदलना होगा...ऐसा हम कर पायेंगें इसी उम्मीद के साथ अगली महफिल तक के लिए दीजिये इजाज़त.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, July 7, 2009

इश्क ने ऐसा नचाया कि घुंघरू टूट गए........"लैला" की महफ़िल में "क़तील"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२७

धीरे-धीरे महफ़िल में निखार आने लगा है। भले हीं पिछली कड़ी में टिप्पणियाँ कम थीं,लेकिन इस बात की खुशी है कि इस बार बस "शरद" जी ने हीं भाग नहीं लिया, बल्कि "दिशा" जी ने भी इस मुहिम में हिस्सा लेकर हमारे इस प्रयास को एक नई दिशा देने की कोशिश की। "दिशा" जी ने न केवल अपनी सहभागिता दिखाई, बल्कि "शरद" जी से भी पहले उन्होंने दोनों सवालों का जवाब दिया और सटीक जवाब दिया, यानी कि वे ४ अंकों की हक़दार हो गईं। "शरद" जी को उनके सही जवाबों के लिए ३ अंक मिलते हैं। इस तरह "शरद" जी के हुए ७ अंक और दिशा जी के ४ अंक। "शरद" जी, आपने "इक़बाल बानो" की जिस गज़ल की बात की है, अगर संभव हुआ तो आने वाले दिनों में वह गज़ल हम आपको जरूर सुनवाएँगे। चूँकि किसी तीसरे इंसान ने अपने दिमागी नसों पर जोर नहीं दिया, इसलिए २ अंकों वाले स्थान खाली हीं रह गए। चलिए कोई बात नहीं, एक एपिसोड में हम ४ अंक से ३ अंक तक पहुँच गए तो अगले एपिसोड यानी कि आज के एपिसोड में हमें २ अंक पाने वाले लोग भी मिल हीं जाएंगे। वैसे "मज़रूह सुल्तानपुरी" साहब का एक शेर भी हैं कि "मैं अकेला हीं चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।" अब जब इस मुहिम की शुरूआत हो गई है तो एक न एक दिन सफ़लता मिलेगी हीं। इसी दृढ विश्वास के साथ आज की पहेलियों का दौर आरंभ करते हैं। उससे पहले- हमेशा की तरह इस अनोखी प्रतियोगिता का परिचय : २५ वें से २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) महज़ "नौ" साल की उम्र में "महाराज हरि सिंह" के दरबार की शोभा बनने वाली एक फ़नकारा जो "अठारह" साल की उम्र में चुपके से महल से इस कारण भाग आई ताकि वह महाराज के "हरम" का एक हिस्सा न बन जाए।
२) एक फ़नकार जिन्हें जनरल "अयूब खान" ने "तमगा-ए-इम्तियाज", जनरल "ज़िया-उल-हक़" ने "प्राइड औफ़ परफारमेंश" और जनरल "परवेज मु्शर्रफ़" ने "हिलाल-ए-इम्तियाज" से नवाजा। इस फ़नकार की नेपाल के राजदरबार से जुड़ी एक बड़ी हीं रोचक कहानी हमने आपको सुनाई थी।


सवालों का पुलिंदा पेश करने के बाद महफ़िल की और लौटने में जो मज़ा है, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। वैसे आज की महफ़िल की बात हीं कुछ अलग है। न जाने क्यों कई दिनों से ये शायर साहब मेरे अचेतन मस्तिष्क में जड़ जमाए बैठे थे। यहाँ तक कि पिछली महफ़िल में हमने जो शेर डाला था, वो भी इनका हीं था। शायद यह एक संयोग है कि शेर डालने के अगले हीं दिन हमें उनकी पूरी की पूरी नज़्म सुनने को नसीब हो रही है। दुनिया में कई तरह के तखल्लुस देखे गए हैं, और उनमें से ज्यादातर तखल्लुस औरों पर अपना वर्चस्व साबित करने के लिए गढे गए मालूम होते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी शायर हुए हैं, जो अपने तखल्लुस के बहाने अपने अंदर बसे दर्द की पेशगी करते हैं। ऐसे हीं शायरों में से एक शायर हैं जनाब "क़तील शिफ़ाई"। क़तील का अर्थ होता है,वह इंसान जिसका क़त्ल हुआ हो। अब इस नाम से हीं इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायर साहब अपनी ज़िंदगी का कौन-सा हिस्सा दुनिया के सामने प्रस्तुत करना चाहते हैं।२४ दिसम्बर १९१९ को पाकिस्तान के "हरिपुर" में जन्मे "औरंगजेब खान" क़तील हुए अपनी शायरी के कारण तो "शिफ़ाई" हुए अपने गुरू "हक़ीम मोहम्मद शिफ़ा" के बदौलत। बचपन में पिता की मौत के कारण इन्हें असमय हीं अपनी शिक्षा का त्याग करना पड़ा। रावलपिंडी आ गए ताकि किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट पाल सकें। ६० रूपये के मेहनताने पर एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में नौकरी कर ली। १९४६ में लाहौर के "अदब-ए-लतिफ़" से जब असिसटेंट एडिटर के पद के लिए न्यौता आया तो खुद को रोक न सके , आखिर बचपन से हीं साहित्य और शायरी में रूचि जो थी। इनकी पहली गज़ल "क़मर जलालाबादी" द्वारा संपादित साप्ताहिक पत्रिका "स्टार" में छपी। इसके बाद तो इनका फिल्मों के लिए रास्ता खुल गया। इन्होंने अपना सबसे पहला गाना जनवरी १९४७ में रीलिज हुई फिल्म "तेरी याद" के लिए लिखा। १९९९ में रीलिज हुई "बड़े दिलवाला" और "ये है मुंबई मेरी जान" तक इनके गानों का दौर चलता रहा। "क़तील" साहब की कई सारी नज़्में और गज़लें आज भी मुशायरों में गुनगुनाई जाती हैं , मसलन "अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको", "उल्फ़त की नई मंज़िल को चला तू", "जब भी चाहे एक नई सूरत बना लेते हैं लोग", "तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं" और "वो दिल हीं क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे"। क़तील साहब से जुड़ी और भी बातें हैं,लेकिन सब कुछ एकबारगी खत्म कर देना अच्छा न होगा, इसलिए बाकी बातें कभी बाद में करेंगे, अभी आज की फ़नकारा की ओर रूख करते हैं।

"मल्लिका पुखराज" और "फ़रीदा खानुम" के बाद आज हम जिन फ़नकारा को लेकर आज हाज़िर हुए हैं, गज़ल और नज़्म-गायकी में उनका भी अपना एक अलग रूतबा है। यूँ तो हैं वे बांग्लादेश की, लेकिन पाकिस्तान और हिंदुस्तान में भी उनके उतने हीं अनुपात में प्रशंसक हैं,जितने अनुपात में बांग्लादेश में हैं। अनुपात की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि हिंदुस्तान की जनसंख्या पाकिस्तान और बांग्लादेश से कहीं ज्यादा है, इसलिए प्रशंसकों की संख्या की तुलना बेमानी होगी। ७० के दशक में जब उन्होंने "दमादम मस्त कलंदर" गाया तो हिंदुस्तानी फिल्मी संगीत के चाहने वालों के दिलों में एक हलचल-सी मच गई। १९७४ में रीलिज हुई "एक से बढकर एक" के टाईटल ट्रैक को गाकर तो वे रातों-रात स्टार बन गईं। कई लोगों को यह भी लगने लगा था कि अगर वे बालीवुड में रूक गई तो मंगेशकर बहनों (लता मंगेशकर और आशा भोंसले) के एकाधिकार पर कहीं ग्रहण न लग जाए। लेकिन ऐसा न हुआ, कुछ हीं फ़िल्मों में गाने के बाद उन्होंने बंबई को छोड़ दिया और पाकिस्तान जा बसीं। वैसे बप्पी दा के साथ उनकी जोड़ी खासी चर्चित रही। "ई एम आई म्युजिक" के लिए इन दोनों ने "सुपर-रूना" नाम की एक एलबम तैयार की, जिसे गोल्ड और प्लैटिनम डिस्कों से नवाज़ा गया। पाकिस्तान के जानेमाने संगीत निर्देशक "नैयर" के साथ उनकी एलबम "लव्स आफ़ रूना लैला" को एक साथ दो-दो प्लैटिनम डिस्क मिले। अब तक तो आप समझ हीं गए होंगे कि हम किन फ़नकारा की बात कर रहे हैं। जी हाँ, हम "रूना लैला" की हीं बात कर रहे हैं, जिन्होंने आज तक लगभग सत्रह भाषाओं में गाने गाए हैं और जिन्हें १५० से भी ज्यादा पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। "रूना लैला" संगीत के क्षेत्र में कैसे उतरीं, इसकी बड़ी हीं मज़ेदार दास्तां है। "रूना" के लिए संगीत बस इनकी बड़ी बहन "दिना" की गायकी तक हीं सीमित था। हुआ यूँ कि जिस दिन "दिना" का परफ़ार्मेंस था,उसी दिन उनकी आवाज़ बैठ गई। आयोजन विफ़ल न हो जाए, इससे बचने के लिए "रूना" को उनकी जगह उतार दिया गया। उस समय "रूना" इतनी छोटी थीं कि सही से "तानपुरा" पकड़ा भी नही जा रहा था। किसी तरह जमीन का सहारा देकर उन्होंने "तानपुरा" पर राग छेड़ा और एक "ख्याल" पेश किया। एक छोटी बच्ची को "ख्याल" पेश करते देख "दर्शक" मंत्रमुग्ध रह गए। बस एक शुरूआत की देर थी ,फिर उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। आज वैसा हीं कुछ मनमोहक अंदाज लेकर हमारे सामने आ रही हैं "रूना लैला"। उस नज़्म को सुनने से पहले क्यों न हम आज के शायर "क़तील शिफ़ाई" का एक प्यारा-सा शेर देख लें:

तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है
इक दिया है जो अँधेरों में जला रखा है


चलिए अब थोड़ा भी देर किए बिना आज की नज़्म से रूबरू होते हैं। इस नज़्म को संगीत से सजाया है "साबरी ब्रदर्स" नाम से प्रसिद्ध भाईयों की जोड़ी में से एक "मक़बूल साबरी" ने। "मक़बूल" साहब और "साबरी ब्रदर्स" की बातें किसी अगली कड़ी में। अभी तो बस ऐसा रक्श कि घुंघरू टूट पड़े:

वाइज़ के टोकने पे मैं क्यों रक्श रोक दूँ,
उनका ये हुक्म है कि अभी नाचती रहूँ।

मोहे आई न जग से लाज,
मैं इतनी जोर से नाची आज,
कि घुंघरू टूट गए।

कुछ मुझपे नया जोबन भी था,
कुछ प्यार का पागलपन भी था,
एक पलक पलक बनी तीर मेरी,
एक जुल्फ़ बनी जंजीर मेरी,
लिया दिल साजन का जीत,
वो छेडे पायलिया ने गीत
कि घुंघरू टूट गए।

मैं बसी थी जिसके सपनों में,
वो गिनेगा मुझको अपनों में,
कहती है मेरी हर अंगड़ाई,
मैं पिया की नींद चुरा लाई,
मैं बनके गई थी चोर,
कि मेरी पायल थी कमजोर
कि घुंघरू टूट गए।

धरती पर न मेरे पैर लगे,
बिन पिया मुझे सब गैर लगे,
मुझे अंग मिले परवानों के,
मुझे पंख मिले अरमानों के,
जब मिला पिया का गाँव,
तो ऐसा लचका मेरा पाँव
कि घुंघरू टूट गए।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

रूह बेचैन है एक दिल की अजीयत क्या है,
दिल ही __ है तो ये सोज़े मोहब्बत क्या है...

आपके विकल्प हैं -
a) शोला, b) दरिया, c) शबनम, d) पत्थर

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था -"समुन्दर" और शेर कुछ यूं था-

मैं समुन्दर भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको...

दिशा जी ने यहाँ भी बाज़ी मारी. बहुत बहुत बधाई सही जवाब के लिए, आपका शेर भी खूब रहा -

इश्क का समंदर इतना गहरा है
जो डूबा इसमे समझो तैरा है...

वाह....

शरद जी ने भी अपने शेर से खूब रंग जमाया -

अपनी बातों में असर पैदा कर
तू समन्दर सा जिगर पैदा कर
बात इक तरफा न बनती है कभी
जो इधर है वो उधर पैदा कर ।

रचना जी ने फरमाया -

समंदर न सही समंदर सा हौसला तो दे
ज़िन्दगी से रिश्ता हम को निभाना तो है

तू लिखता चल किनारे पर नाम उनका
समंदर की मौजों को उनसे टकराना तो है

तो सुमित जी ने कुछ त्रुटी के साथ ही सही एक बढ़िया शेर याद दिलाया -

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे, जो समंदर मेरी तलाश में है....

मनु जी पधारे इस शेर के साथ -

समंदर आज भी लज्ज़त को उसके याद करता है
कभी इक बूँद छूट कर आ गिरी थी, दोशे -बादल से...

वाह...कुलदीप अंजुम जी ने तो समां ही बांध दिया ऐसे नायाब शेर सुनकर -

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ मैं मूझे डूब कर मार जाने दो

गुडियों से खेलती हुयी बच्ची की आंख में
आंसू भी आ गया तो समंदर लगा हमें

और

बड़े लोगो से मिलने में हमेशा फासला रखना
मिले दरिया समंदर में कभी दरिया नहीं रहता....

पर दोस्तों आप हमसे मिलने में कभी कोई फासला मत रखियेगा.....जो भी दिल में हो खुलकर कहियेगा....इसी इल्तिजा के साथ अगली महफिल तक अलविदा....

अहा! आपसे विदा लेने से पहले पूजा जी की टिप्पणी पर टिप्पणी करना भी तो लाज़िमी है। पिछली बार की उलाहनाओं के बाद पूजा जी ने शेर तो फरमाया, लेकिन यह क्या शब्द हीं गलत चुन लिया । सही शब्द पूजा जी अब तक जान हीं चुकी होंगी।

यह देखिए, पूजा जी ने मनु जी की खबर ली तो मनु जी एक नए शेर के साथ फिर से हाज़िर हो गए, शायद इसी को लाईन हाज़िर होना कहते हैं :) । वैसे मुझे लगता है कि मनु जी को भूलने की बीमारी लग गई है, हर बार अगला शेर डालने समय वे पिछले शेर को भूल चुके होते हैं और हर बार हीं उनका कहना होता है कि "ये भी नहीं के ये शे'र मैंने कब सुनाये हैं"...मनु जी सुधर जाईये........या फिर पता कीजिए कि आपके नाम से शेर कौन डाल जाता है।

चलिए अब बहुत बातें हो गईं। अगली कड़ी तक के लिए "खुदा हाफ़िज़"..
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, July 3, 2009

वो इश्क जो हमसे रूठ गया........महफ़िल-ए-जाविदा और "फ़रीदा"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२६

ब कुछ आपकी उम्मीद के जैसा हो, लेकिन ज्यादा कुछ आपकी उम्मीद से परे, तो किंकर्तव्यविमुढ होना लाज़िमी है। ऐसा हीं कुछ हमारे साथ हो रहा है। इस बात का हमें फ़ख्र है कि हम महफ़िल-ए-गज़ल में उन फ़नकारों की बातें करते हैं,जिनका मक़बूल होना उनका और हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और यही कारण है कि हमें अपने पाठकों और श्रोताओं से ढेर सारी उम्मीदें थीं और अभी भी हैं। और इन्हीं उम्मीदों के दम पर महफ़िल-ए-गज़ल की यह रौनक है। हमने सवालों का दौर यह सोचकर शुरू किया था कि पढने वालों की याददाश्त मांजने में हम सफल हो पाएँगे। पिछली कड़ी से शुरू की गई इस मुहिम का रंग-रूप देखकर कुछ खुशी हो रही है तो थोड़ा बुरा भी लग रहा है। खुशी का सबसे बड़ा सबब हैं "शरद जी" । जब तक उन्हें "एपिसोड" वाली कहानी समझ नहीं आई, तब तक उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हर बार जवाबों का पिटारा लेकर हीं हाज़िर हुए। हमें यह बात बताने में बड़ी खुशी हो रही है कि शरद जी ने पहली बार में हीं सही जवाब दे दिया और ४ अंकों के हक़दार हुए। चूँकि इनके अलावा कोई भी शख्स मैदान में नहीं उतरा इसलिए ३ अंक और २ अंकों वाले स्थान खाली हीं रहे। और यही बात है जो थोड़ी विचारणीय है। आखिर क्या कारण है कि हमारे पाठक फूर्ति नहीं दिखा रहे। भाई! कम से कम गज़लों को सुनने के बहाने हीं पिछली कड़ियों का एक चक्कर लगा लिया करें। कुछ भूली-बिसरी जानकारियाँ मिल जाएँगी और आपको इन सवालों का जवाब भी मिल जाएगा। इसी उम्मीद के साथ कि इस बार ज़्यादा लोग रूचि दिखाएँगे, आज की प्रक्रिया शुरू करते हैं। २५ वें से २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) गुलज़ार के प्रिय एक फ़नकार जिन्होंने पंचम दा के लिए "दम मारो दम" और "चुरा लिया है" में गिटार बजाकर अपनी संगीत-यात्रा की शुरूआत की।
२) गुमनाम, क़ातिल, सरफ़रोश जैसी पाकिस्तानी फ़िल्मों में अपनी गायकी का हुनर दिखाने वाली इस फ़नकारा ने ज़नरल ज़िया उल हक़ के शासन के दौरान "फ़ैज़" के कई सारे क्रांतिकारी कलाम गाए।


इन सवालों के बाद अब आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की गज़ल और गज़ल से जुड़ी फ़नकारा मानो एक दूसरे के पूरक हैं। जहाँ भी इस गज़ल का ज़िक्र होता है, वहाँ अनकहे हीं इन फ़नकारा का नाम ज़ाहिर हो जाता है और जहाँ भी इन फ़नकारा का नाम लिया जाता है, वहाँ इनके नाम को मुकम्मल करने के लिए इस गज़ल की चर्चा लाज़िमी हो जाती है। यूँ तो इन फ़नकारा का सबसे मक़बूल कलाम है "आज जाने की ज़िद्द ना करो" ,लेकिन अगर गज़ल की बात करें तो आज की गज़ल इनकी गज़लों की फ़ेहरिश्त में सबसे ऊपर आएगी। "बुलबुल-ए-पंजाब" मुख्तार बेगम की छोटी बहन "फ़रीदा खानुम" को अगर "मल्लिका-ए-गज़ल" कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। और यकीं मानिए यह उपाधि कोई हमने यूँ हीं बातों-बातों में नहीं दे दी है, बल्कि हुनर-पसंद दुनिया इन्हें इसी नाम से जानती है। इनकी गज़ल-गायकी का अंदाज़ औरों से काफ़ी अलग है,इनकी आवाज़ में एक हल्का-सा भारीपन गज़लों के असर को कई गुना बढा देता है। यूँ तो गज़लें इनकी प्राथमिकता हैं, लेकिन गज़लों के अलावा भी इन्होंने कई सारे पंजाबी लोकगीत गाए हैं। कुछ गीत जो खासे चर्चित हुए,उनमें "बल्ले-बल्ले तोर पंजाबन दी" और "मैंने पाँव में पायल पहने हीं नहीं" ऊपर आते हैं। इन्होंने न सिर्फ़ उर्दू और पंजाबी में गज़लें गाई हैं, बल्कि "फारसी" और "पस्तो" भाषाओं पर भी इनका बराबर अधिकार रहा है। जहाँ तक पुरस्कारों की बात है तो हिन्दुस्तान में क्लासिकल और सेमि-क्लासिकल गानों वालों के लिए दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार "हाफ़िज़ अली खां अवार्ड" आज तक बस दो हीं पाकिस्तानियों के हिस्से में आया है। १९९६ में इस पुरस्कार से बाबा नुसरत फतेह अली खान को नवाज़ा गया था और सन् २००५ में "फ़रीदा खानुम" को इस पुरस्कार के लिए चुना गया , संयोग देखिए कि उसी साल जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के हाथों इन्हें "हिलाल-ए-इम्तियाज़" से नवाज़ा गया, जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा "सिविलियन" सम्मान है। "अमृतसर" में जन्मी, "कलकत्ता" में पली-बढी(कहीं-कहीं यह क्रम उल्टा भी दर्ज़ है, इसलिए यकीनन नहीं कह सकता) और बंटवारे के बाद "रावलपिंडी" में संगीत का नाम रौशन करने वाली इस मल्लिका ने विवाहोपरांत "लाहौर" को अपने घर के रूप में चुना और आज तक वहीं हैं। संगीत की साधना अभी भी जारी है। खुदा से यही दुआ है कि यह "रियाज़" कभी बंद न हो! आमीन!

यह तो हुई "फ़नकारा" की बात, अब ज़रा "शायर" से मुखातिब हुआ जाए। कभी-कभी कुछ ऐसे शायर हो जाते हैं(या फिर ज्यादातर ऐसे हीं होते हैं), जो भले हीं अपना नाम न कर पाए हों,लेकिन उनकी कोई न कोई गज़ल लोगों के जुबान पर जम हीं जाती है। आज के शायर की हक़ीक़त भी कुछ ऐसी हीं है। अंतर्जाल पर इनके बारे में ज्यादा सामग्री नहीं है और जो भी है वह बस इनके गज़लों की फ़ेहरिश्त मात्र है। "कभी साया है, कभी धूप मुकद्दर मेरा", "लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ", "सोचते और जागते साँसों का एक दरिया हूँ मैं", "इतने दिनों के बाद तू आया है आज" और "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" -बस इतनी हीं गज़लें हैं जो इनके नाम के साथ दर्ज़ हैं। आज हम इन्हीं गज़लों में से एक "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" सुनाने जा रहे हैं। इस गज़ल के गज़लगो हैं जनाब "अतर नफ़ीस"। मुझे नहीं मालूम कि पाकिस्तान में इनका कैसा रूतबा है, लेकिन इस बात का यकीन दिला सकता हूँ कि इनकी इस गज़ल की मक़बूलियत कमाल की है। ज़रा इस गज़ल के बोलों पर ध्यान देंगे -" वो इश्क जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या, कोई मेहर नहीं, कोई कहर नहीं , फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या।" इस मतले में "महबूब" से जो शिकायत की गई है, वह काबिल-ए-तारीफ़ है। जनाब इस बात का शोक मना रहे हैं कि उनका इश्क उनसे रूठ गया है और इसलिए हाल बताने लायक कुछ बचा नहीं। लेकिन जब उनसे कोई इस बात की दरख्वास्त करता है कि इसी बात पर कोई शेर सुना दिया जाए, तो वो कहते हैं कि "रूठने" की इस प्रकिया में ना कोई "दिल टूटने का दर्द" चस्पां है और ना हीं कोई "मज़ेदार किस्सा" तो फिर शेर बनाएँ तो कैसे और अगर शेर बना भी लिया तो उसमें "सच्चाई" तो होगी नहीं। इसे अगर दूसरी तरह से समझे तो माज़रा यह बनता है कि "महबूब के रूठने के बाद उनकी ज़िंदगी में ना कोई मेहर है और ना हीं कोई कहर यानि कि जीने लायक कोई ज़िंदगी हीं नहीं बची, इसलिए इस बेमतलब की ज़िंदगी के ऊपर कोई सच्चा शेर कैसे सुनाया जा सकता है।" दोनों हीं अर्थों में "महबूब" से हिज्र को बड़ी हीं खूबसूरती से दर्शाया गया है। इस गज़ल के बाकी शेरों में भी ऐसा हीं अनोखापन है। इस गज़ल की ओर बढने से पहले क्यों ना हम "अतर" साहब का एक शेर देख लें:

ऐ सरापा रंग-ओ-निखत तू बता,
किस धनक से तेरा पैराहन बुनूँ।


चलिए अब थोड़ा भी देर किए बिना आज की गज़ल से रूबरू होते हैं। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या,
कोई मेहर नहीं, कोई कहर नहीं, फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या।

एक हिज़्र जो हमको ला-हक है, ता-देर उसे दुहराएँ क्या,
वो जहर जो दिल में उतार लिया, फिर उसके नाज़ उठाएँ क्या।

एक आग ग़म-ए-तन्हाई की, जो सारे बदन में फैल गई,
जब जिस्म हीं सारा जलता हो, फिर दामने-दिल को बचाएँ क्या।

हम नगमा-सरा कुछ गज़लों कें, हम सूरत-गर कुछ ख्वाबों के,
ये जज्बा-ए-शौक सुनाएँ क्या, कोई ख्वाब न हों तो बताएँ क्या।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मैं ____ भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको

आपके विकल्प हैं -
a) दरिया, b) समंदर, c) साहिल, d) मांझी

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"शहर" और सही शेर कुछ यूं था -

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा...

इब्न-ए-इंशा के इस शेर को सबसे पहले सही पकडा एक बार फिर शरद जी ने, बधाई जनाब -

अब नए शहरों के जब नक्शे बनाए जाएंगे
हर गली बस्ती में कुछ मरघट दिखाए जाएंगे ।
गैर मुमकिन ये कि हम फुटपाथ पर भी चल सकें
क्योंकि हर फुटपाथ पर बिस्तर बिछाए जाएंगे ।

क्या बात है शरद जी, जहां के दर्द को बड़ी हीं खूबसूरती से दर्शाया है आपने।
दिशा जी महफ़िल में आईं तो ज़रूर, लेकिन गलत शब्द चुन लिया।
मिलिंद जी आपका स्वागत है महफ़िल-ए-गज़ल के इस मुहिम में। आपका शेर कुछ यूँ था:

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ानसा क्यों है ?
इस शहर में हर शक्स परेशानसा क्यों है?

अगली कोशिश में दिशा जी ने सही शब्द पकड़ा। कोई बात नहीं- देर आयद, दुरूस्त आयद:

इस शहर में हर कोइ अज़नबी लगता है
भीड़ में भी हर मंजर सूना दिखता है
कहूँ तो कहूँ किससे बात अपनी
मुझे हर शख्स यहाँ बहरा लगता है...

मन्जु जी, आपका भी स्वागत है..शब्द तो सही पकड़ा है आपने,लेकिन यही दरख्वास्त रहेगी कि देवनागरी में टंकण करें।
सुमित जी, आप तो हर बार कमाल कर जाते हैं। बस ये दो बार पोस्ट करने की अदा समझ नहीं आती :)

कोई दोस्त है न रकीब है ,
तेरा शहर कितना अजीब है

शुभान-अल्लाह!

मनु जी के तो हम फ़ैन हो गए हैं। वैसे भी हमारे वो बहुत काम आते हैं। मुख्यत: शब्दार्थ बताने के :)

वैसे उनके ये दो शेर भी काबिल-ए-तारीफ़ हैं:

हर मोड़ पे रुसवाइयों का दाम मिला है
पर शहर में तेरे बहुत आराम मिला है..

घर पे आते ही मेरा साया मुझ से यूं लिपटा,
अलग शहर में था दिन भर, अलग-अलग सा रहा..

पूजा जी! आप भी यूँ हीं आती रहिए और महफ़िल का आनंद उठाती रहिए........बस एक गिला है, आप आती तो हैं लेकिन कोई शेर नहीं सुनाती। भला ऐसा क्यों? अगली बार से ऐसा नहीं चलेगा।
बाकी सभी मित्रों से भी अनुरोध है कि महफ़िल की शमा जलाए रखने में हमारे साथ बने रहें। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, June 30, 2009

न ग़म कशोद-ओ-बस्त का, न वादा-ए-अलस्त का..........अभी तो मैं जवान हूँ!!

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२५

ज़लों की यह महफ़िल अपने पहले पड़ाव तक पहुँच चुकी है। आज हम आपके सामने महफ़िल-ए-गज़ल का २५वाँ अंक लेकर हाज़िर हुए हैं। आगे बढने से पहले हम इस बात से मुतमईन होना चाहेंगे कि जिस तरह इस महफ़िल को आपके सामने लाने पर हमने फ़ख्र महसूस किया है, उसी तरह आपने भी बराबर चाव से इस महफ़िल की हर पेशकश को अपने सीने से लगाया है। ऐसा करने के पीछे हमारी यह मंशा नहीं है कि आपका इम्तिहान लिया जाए, बल्कि हम यह चाहते हैं कि अब तक जितने भी फ़नकारों को हमने इस महफ़िल के बहाने याद किया है, उनकी यादों का असर थोड़ा-सा भी कम न हो। वैसे भी बस आगे बढते रहने का नाम हीं ज़िंदगी नहीं है, राह में चलते-चलते कभी-कभी हमें पीछे छूट चुके अपने साथियों को भी याद कर लेना चाहिए। और इसी कारण आज से २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है।तो दोस्तों! कमर कस लीजिए इस अनोखी प्रतियोगिता का हिस्सा बनने के लिए । ये रहे आज के सवाल: -

१) "मक़दूम मोहिउद्दीन" की लिखी एक गज़ल "आपकी याद आती रही रात भर" गाकर इन्होंने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरूआत की थी।
२) २००५ में रीलिज हुई "सावन की रिमझिम में" में से ली गई एक नज़्म , जिसे कलमबद्ध किया था योगेश ने और संगीत से सजाया था श्याम शर्मा ने।


चलिए अब ,बाकी के दिनों की तरह हीं आज की गज़ल और उससे जुड़े फ़नकारों की बात करते हैं। आज हम जो गज़ल/गीत/नज़्म लेकर आपके सामने हाज़िर हुए हैं, उसकी खासियत यह है कि ना सिर्फ़ उसके शायर की मक़बूलियत का लोहा माना जाता है, बल्कि उसे गाने वाली फ़नकारा का भी कोई जवाब नहीं है और सबसे बढकर वह नज़्म खुद अपनी प्रसिद्धि की जीती-जागती एक मिसाल है। जहां में ऐसा कौन होगा जिसने "अभी तो मैं जवान हूँ" का कम से कम एकबार भी लुत्फ़ न लिया हो। यह शब्द-समूह, यह "मिसरा" सुनने में बड़ा हीं साधारण महसूस होता है,लेकिन मेरा दावा है कि अगर एक बार भी आपने पूरी नज़्म को सही से सुन लिया तो आप खुद को इसका मुरीद होने से नहीं रोक पाएँगे। "हसीन जलवारेज़ हो, अदाएं फ़ितनाख़ेज़ हो, हवाएं इत्रबेज़ हों, तो शौक़ क्यूँ न तेज़ हो?"- वल्लाह! शायर ने कितने आराम से इश्क और हुस्न की अदाओं का जिक्र किया है, पढो तो एक-एक हर्फ़ इत्र में डूबा नज़र आता है सुनो तो आवाज़ में एक शोखी-सी घुली लगती है। वैसे शायर के लफ़्ज़ों में ऐसा असर हो क्यूँ ना, जोकि शायर का नाम "हाफ़िज़ जालंधरी" हो। मुल्के-पाकिस्तान का क़ौमी तराना "पाक सरजमीं शद बद" लिखने वाले इस शायर के खाते में पाकिस्तान का सबसे बड़ा तमगा "हिलाल-ए-इम्तियाज़" और "प्राइड आफ़ परफ़ारमेंश" दर्ज़ है। इस शायर ने "फिरदौसी" के "शाहनामा" के तर्ज़ पर "शाहनामा-ए-इस्लाम" की रचना की है। "दीन-ए-इस्लाम" की इज्जत करने वाले इस शख्स की सोच का कमाल देखिए कि जो नज़्म एक तरफ़ किसी की अदाओं और शोखियों को बयान करती है, वहीं दूसरी तरफ़ बड़ी हीं खामोशी से "दर्शन" की भी बात करती है। जरा इस मिसरे पर गौर फ़रमाईयेगा: "न ग़म कशोद-ओ-बस्त का, बुलंद का न पस्त का, न बूद का न हस्त का न वादा-ए-अलस्त का। " अर्थात - "मुझे अपनी ज़िंदगी के न तो बंद किस्से का ग़म है और न हीं किसी खुली दास्तां का। मैं सफ़र में आई न किसी ऊँचाई की फ़िक्र करता हूँ और न हीं किसी गहराई की। मुझे न अपने होने की चिंता है और न हीं अपने रूतबे की। और न हीं मैं संसार की उत्पत्ति के समय किए गए किसी वादे से इत्तेफ़ाक रखता हूँ।"

जानकारी के लिए बता दूँ कि "अलस्त" का शाब्दिक अर्थ है "नहीं हूँ" ,लेकिन इसका भावार्थ बड़ा हीं व्यापक है। कहा जाता है कि जब खुदा ने इस कुदरत की तख्लीक की थी तो उस समय उन्होंने इसी शब्द का उच्चारण किया था। "अलस्त" कहकर उन्होंने अपने पहले बंदे से यह सवाल किया था कि "क्या मैं तुम्हारा खुदा नहीं हूँ?" और उस बंदे ने जवाब दिया था कि "हाँ, आप हीं मेरे खुदा हैं।" किसी के भी द्वारा उठाई गई संसार में यह सबसे पहली कसम है। और जब कोई इंसान इस कसम को झुठलाने को तैयार हो जाए तो या तो वह इश्क में डूबा है या फिर वह काफ़िर है। वैसे भी कहते हैं कि आशिक और दार्शनिक में फ़र्क नहीं होता। इसलिए यहाँ पर इंसान का इश्क हीं ज़ाहिर होता है। इस नज़्म में और भी ऐसी बातें हैं,जिसपर तहरीरें लिखी जा सकती हैं। लेकिन कुछ लिखने से अच्छा है कि उसे महसूस किया जाए। इसलिए हम यही चाहेंगे कि आप इस नज़्म का एक-एक हर्फ़ खुद में उतार लें, एक-एक हर्फ़ जियें, फिर देखिए..जवानी कहीं भी हो,आपके पास न आ जाए तो कहिएगा। इस नज़्म को जिन फ़नकारा ने अपनी आवाज़ के जादू से सराबोर किया है, उनकी बात किए बिना इस महफ़िल की शमा को बुझाना तो एक गुस्ताखी होगी। "मजज़ूब" बाबा मोती राम ने इन्हें "मल्लिका" कहा था तो इनकी चाची ने इन्हें खुशबू से भरा "पुखराज"। महज़ "नौ" साल की उम्र में "कश्मीर" के राजा "महाराज हरि सिंह" को इन्होंने अपनी आवाज़ का दीवाना बना दिया था। फिर तो ये उस दरबार की शान हो गईं। "अठारह" साल की उम्र तक इन्होंने वहीं गुजर किया, लेकिन जब इन्हें इस बात की भनक पड़ी कि राजा की नियत इन्हें अपने हरम में डालने की है तो ये वहाँ से भाग निकली। अपनी आवाज़ और अपने हुस्ने के लिए जानी जाने वाली इस मल्लिका ने "घुड़सवारी" का ऐसा नज़ारा पेश किया कि देखने और सुनने वाले दंग रह गए। "मल्लिका पुखराज" एक ऐसी शख्सियत थीं,जिन्हें एक आलेख में समेटा नहीं जा सकता। इसलिए इनके बारे में आगे कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। अभी आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

अभी तो मैं जवान हूँ!

हवा भी ख़ुशगवार है, गुलों पे भी निखार है
तरन्नुमें हज़ार हैं, बहार पुरबहार है
कहाँ चला है साक़िया, इधर तो लौट इधर तो आ
अरे, यह देखता है क्या? उठा सुबू, सुबू उठा
सुबू उठा, पियाला भर पियाला भर के दे इधर
चमन की सिम्त कर नज़र, समा तो देख बेख़बर
वो काली-काली बदलियाँ ,उफ़क़ पे हो गई अयां
वो इक हजूम-ए-मैकशां, है सू-ए-मैकदा रवां
ये क्या गुमां है बदगुमां, समझ न मुझको नातवां
ख़याल-ए-ज़ोह्द अभी कहाँ? अभी तो मैं जवान हूँ
अभी तो मैं जवान हूँ!

इबादतों का ज़िक्र है, निजात की भी फ़िक्र है
जुनून है सबाब का, ख़याल है अज़ाब का
मगर सुनो तो शेख़ जी, अजीब शय हैं आप भी
भला शबाब-ओ-आशिक़ी, अलग हुए भी हैं कभी
हसीन जलवारेज़ हो, अदाएं फ़ितनाख़ेज़ हो
हवाएं इत्र्बेज़ हों, तो शौक़ क्यूँ न तेज़ हो?
निगारहा-ए-फ़ितनागर , कोई इधर कोई उधर
उभारते हो ऐश पर, तो क्या करे कोई बशर
चलो जी क़िस्सा मुख़्तसर, तुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़र
दुरुस्त है तो हो मगर, अभी तो मैं जवान हूँ
अभी तो मैं जवान हूँ!

ये ग़श्त कोहसार की, ये सैर जू-ए-वार की
ये बुलबुलों के चहचहे, ये गुलरुख़ों के क़हक़हे
किसी से मेल हो गया, तो रंज-ओ-फ़िक्र खो गया
कभी जो वक़्त सो गया, ये हँस गया वो रो गया
ये इश्क़ की कहानियाँ, ये रस भरी जवानियाँ
उधर से महरबानियाँ, इधर से लन्तरानियाँ
ये आस्मान ये ज़मीं, नज़्ज़राहा-ए-दिलनशीं
उन्हें हयात आफ़रीं, भला मैं छोड़ दूँ यहीं
है मौत इस क़दर बरीं, मुझे न आएगा यक़ीं
नहीं-नहीं अभी नहीं, नहीं-नहीं अभी नहीं
अभी तो मैं जवान हूँ!

न ग़म कशोद-ओ-बस्त का, बुलंद का न पस्त का
न बूद का न हस्त का न वादा-ए-अलस्त का
उम्मीद और यास गुम, हवास गुम क़यास गुम
नज़र से आस-पास गुम, हमन बजुज़ गिलास गुम
न मय में कुछ कमी रहे, कदा से हमदमी रहे
नशिस्त ये जमी रहे, यही हमा-हमी रहे
वो राग छेड़ मुतरिबा, तरवफ़िज़ा आलमरुबा
असर सदा-ए-साज़ का, जिग़र में आग दे लगा
हर इक लब पे हो सदा, न हाथ रोक साक़िया
पिलाए जा पिलाए जा, पिलाए जा पिलाए जा
अभी तो मैं जवान हूँ !




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

इस __ में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा|

आपके विकल्प हैं -
a) गली, b) बाज़ार, c) शहर, d) महफिल

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"फुर्सत" और सही शेर कुछ यूं था -

हंसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत,
रोने को यहाँ वैसे भी फुर्सत नहीं मिलती...

निदा फाजली के इस शेर को सबसे पहले सही पकडा एक बार फिर शरद जी ने, बधाई जनाब -

तुम्हें गैरों से कब फ़ुर्सत और हम ग़म से कब खाली
चलो अब हो चुका मिलना न तुम खाली न हम खाली

हा हा हा....वाह शरद जी, दिशा जी खूब रंग जमाया आपने भी महफिल में इन शेरों से -

वो कहते हैं कि दर्द झलकता है चेहरे पर मेरे
ग़मों ने फुर्सत ही कहाँ दी मुस्कराने की
ललक बची ही नहीं जीने की मेरे अंदर
वज़ह कहाँ से लाऊँ मुस्कराने की

कभी फु़र्सत मिले तो सोचें क्या मिला जिन्दगी से
अभी तो यूँ ही जिन्दगी जिये जाते हैं
वो दर्द बयाँ करें ना करें अपना उनकी मर्जी
चेहरे के भाव सारी दास्ताँ कह जाते हैं...

पूजा जी का ख्याल एकदम सही लगा, और शैलेश जी सही कहा आपने इंशा जी की वो ग़ज़ल वाकई नायाब है.

शबे फुरकत का जागा हूँ, फरिश्तों अब तो सोने दो
कभी फुर्सत मे कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

सुमित जी बहुत खूब....नीलम जी, शमिख जी, जरा आप भी रचना जी का ये शेर मुलाहजा फरमाएं -

दर्द मेरा था जो तेरे बहाने निकला
चन्द लम्हे फुर्सत के कमाने निकला
संघ हर शख्स ने उस पर बरसाए
जो दिल की दुनिया बसाने निकला

आशीष जी ने निदा साहब की याद किया इस शेर के साथ -

तुम्हारी कब्र में मैं दफन हूं तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना |

दिलीप जी आपका आना बहुत सुखद लगा. मंजू जी आपका शेर भी खूब रहा, और मनु साहब का ये शेर, जो हमें बहुत पसंद आया...वजह ??? बताते हैं, पहले शेर पढें -

रहने दो अपनी जल्दबाज नजर
मुझ को पढना है तो फुर्सत से पढो...

भई हम भी बस यही चाहते हैं की आप भी इस महफिल में ज़रा फुर्सत से बैठें और पढें /सुनें. यही तो चंद लम्हें हैं जिंदगी के सुकून से भरे.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, June 26, 2009

इंशा जी उठो अब कूच करो....एक गज़ल जिसके कारण तीन फ़नकार कूच कर गए

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२४

ज की गज़ल को क्या कहूँ, कुछ ऐसी कहानी हीं इससे जुड़ी है कि अगर कुछ न भी हो तो बहुत कुछ कहा जा सकता है,फिर भी दिल है कि एक शब्द कहने या लिखने से पहले सौ बार सोचने की सलाह दे रहा है। यूँ तो मेरे पास लगभग २० गज़लें थीं,जिनमें से किसी पर भी मैं लिख सकता था,लेकिन न जाने क्यों फ़ेहरिश्त की आठवीं गज़ल मेरे मन को भा गई,बाकियों को सुना भी नहीं,इसके बोल पढे और इसे हीं सुनने लगा और यह देखिए कि लगातार तीन-चार दिनों से इसी गज़ल को सुनता आ रहा हूँ। इस गज़ल से जुड़ी जो कहानियाँ हैं, दिमाग उन्हें फ़ितूर साबित करने पर तुला है,लेकिन दिल है कि कभी-कभार उन कहानियों पर यकीं कर बैठता है। अब दिल तो दिल है, उसकी भी तो सुननी होगी। इसलिए सोचता हूँ कि एक बार सही से बैठूँ और दिल-दिमाग के बीच समझौता करा दूँ। इसमें आप मेरा साथ देंगे ना? तो पहले उन कहानियों का हीं ज़िक्र करता हूँ, फिर निर्णय करेंगे कि इनमें कितनी सच्चाई है। इस गज़ल के शायर के बारे में यह कहा जाता है कि यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल थी, मतलब कि इसे लिखने के बाद वो कुछ भी न लिख पाएँ और कुछ दिनों या महीनों के बाद सुपूर्द-ए-खाक़ हो गए। इस गज़ल को मक़बूल करने में शायर के बाद जिन फ़नकार का हाथ था, मतलब कि जिन्होंने इसे गाया था, उनके बारे में यह कहा जाता है कि जिस दिन उन्होंने पी०टी०वी० के लिए इस गज़ल की रिकार्डिंग की, उसके अगले हीं सुबह दिल का दौरा पड़ने से उनका स्वर्गवास हो गया। इतना हीं नहीं, इस गज़ल के गायक की १९७४ में मौत के बाद उनके साहबजादे ने इसे गाना शुरू किया। चूँकि पिता की याद इस गज़ल से जुड़ी थी,इसलिए इसे गाने के दौरान हमेशा हीं वे भावुक हो जाया करते थे और आँसूओं का सैलाब उमड़ पड़ता था। यही कारण था कि इस गज़ल को हर बार हीं वे मुशायरे के अंत में गाते थे, ताकि रूँधे गले के कारण दूसरे गज़लों पर कोई असर न हो। नियति का खेल देखिए कि उनकी मौत भी दिल का दौरा पड़ने से हुई। ८ अप्रैल २००७ को लंदन में उन्होंने अंतिम साँस ली और उनके बारे में भी यही कहा जाता है कि यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल थी। शायर ने ५१ साल की उम्र में दम तोड़ा, गुलूकार को महज़ ४२ सावन हीं नसीब हुए तो गुलूकार के सुपूत्र की किस्मत में ५२ वसंत हीं लिखे थे। अब इसे इत्तेफ़ाक कहें या कुछ और?

दिल की इतनी दलीलों के बाद, जब भी मैं दिमाग की तरफ़ रूख करता हूँ तो इन कहानियों में कुछ अटपटा-सा महसूस होता है और वही अटपटापन है,जो मुझे डरने नहीं देता। जहाँ तक गुलूकार की बात है तो उनकी मौत से जुड़े कोई भी सुराग मेरे हाथ नहीं लगे इसलिए यह मानना पड़ेगा कि वे नितांत स्वस्थ थे और रिकार्डिंग के अगले दिन पड़ा दिल का दौरा हीं उनकी मौत का एकमात्र कारण था। लेकिन अगर हम शायर और दूसरे गुलूकार की तरफ़ देखें तो यह जान पड़ता है कि जहाँ पहले को "होज़किन्स लिम्फ़ोमा(एक प्रकार का कैंसर)" था तो वहीं दूसरे को "हाइपरट्रोपिक कार्डियोमायोपैथी(एक प्रकार की दिल की बीमारी" और ये बीमारियाँ हीं उनके मौत का सबब थीं। शायर के बारे में जो कहा गया है कि यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल थी, तो भाई अगर गुलूकार की मौत "१९७४" में हुई और शायर की "१९७८" में और यह भी मालूम है कि शायर ने बिस्तर-ए-मर्ग(मौत का बिछावन)से भी कई सारी रचनाएँ लिखीं थीं तो इस गज़ल का उनकी अंतिम गज़ल होने का सवाल हीं नहीं उठता है। अब अगर दूसरे गुलूकार की बात करें तो चूँकि हर मुशायरे के अंत में वे इसी गज़ल को गाते थे, तो लाजिमी है कि अंतिम मुशायरे के अंत में भी उन्होंने इसी को गाया होगा और इस तरह यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल हो गई। तो इस तरह मैं यह निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि भले हीं इन तीनों फ़नकारों की मौत बहुत हीं कम उम्र में हुई,लेकिन उन घटनाओं के पीछे इस गज़ल का कोई हाथ न था। वैसे इस गज़ल पर ऊँगली उठाए जाने का एक और कारण है और वह कारण बड़ा हीं पुख्ता है। अगर आप इस गज़ल के बोल पर ध्यान देंगे तो बोल से साफ़ ज़ाहिर है कि इसमें दुनिया से कूच करने की बात की जा रही है। "इंशा जी उठो अब कूच करो, इस शहर में जी को लगाना क्या"- जी हाँ हम इसी गज़ल की बात कर रहे थे, शायद आपने इसे पहले सुना हो और अगर सुना है तो फिर आपको इससे जुड़े उन तीनों फ़नकारों की जानकारी तो होगी हीं। नहीं है? कोई बात नहीं, हम किस दिन काम आएँगे।

जानकारियों का दौर हम "गज़लगो" से हीं शुरू करते हैं। जन्म से "शेर मुहम्मद खान" और शायरी से "इब्ने-इंशा" की पैदाईश जालंधर के फ़िल्लौर में हुई थी। दूसरे फ़नकारों की तरह हीं इन्हें भी बँटवारे के वक्त पाकिस्तान जाना पड़ा। पाकिस्तान में ये बहुत सारे सरकारी सेवाओं से जुड़े थे, जिनमें रेडियो पाकिस्तान, संस्कृति मंत्रालय और राष्ट्रीय पुस्तक केंद्र प्रमुख हैं। "संयुक्त राष्ट्र" का एक हिस्सा होने के कारण इन्हें कई देशों का दौरा करना पड़ा और उसी दौरान इनकी लेखनी ने एक नया मोड़ लिया। एक जाना-माना उर्दू कवि, विदूषक(ह्युमरिस्ट) और कार्टूनिस्ट "यात्रा-वृतांत लेखक" हो गया। इनकी यात्रा-वृतांत से जुड़ी कई सारी पुस्तकें हैं, जैसे कि "आवारागर्द की डायरी", "दुनिया गोल है", "इब्न-ए-बतूता के ताक़ुब में","चलते हो तो चीन को चलिए", "नगरी-नगरी फ़िरा मुसाफ़िर"। हास्य से लिपटी "उर्दू की आखिरी किताब" इतनी ज्यादा चर्चित हुई कि १९७१ से अब तक ३३ से भी ज्यादा बार यह प्रकाशित हो चुकी है। "इब्न-ए-इंशा" जी का "गज़लों" के क्षेत्र में भी कोई सानी नहीं है। "गुलाम अली" साहब की सबसे प्रसिद्ध प्रस्तुति "कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा" को इन्होंने हीं कलमबद्ध किया था। इन्होंने गज़लों के साथ कई सारे प्रयोग भी किए हैं। आब आज की हीं गज़ल को देखिए। अमूमन लोग मक़ते में अपना तखल्लुस इस्तेमाल करते हैं, या फिर वहाँ भी नहीं करते। लेकिन इन्होंने तो गज़ल की शुरूआत हीं तखल्लुस से कर दी है- "इंशा जी उठो...." । चलिए अब उठकर शायर से गुलूकार की तरफ़ चलते है। गायकी की बेमिसाल जोड़ी "अमानत अली-फ़तेह अली" (हम यहाँ नुसरत साहब की बात नहीं कर रहे) में अमानत अली बड़े थे और ज़्यादा मकबूल भी। इनके दादा "अली बख्श खान" पटियाला घराने के सह-संस्थापक थे और इनके पिता "अख्तर हुसैन खान" ने पटियाला घराने की उसी धरोहर को अपने बेटों तक सकुशल पहुँचाया था। "अमानत अली-फ़तेह अली" की जोड़ी खबरों में तब आई, जब १९४९ में आयोजित "आल बंगाल म्युज़िकल कांफ़रेंस" में इन्होंने अपनी गायकी से समां बाँध दिया था। उस समय "अमानत अली" १७ साल के थे और "फ़तेह अली" १४ के। उसके बाद तो इन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पटियाला घराने में "खयाल" गाने वाले आगे चलकर दो खेमों में बँट गए। एक खेमे को इन दोनों भाईयों ने थामा था तो दूसरे खेमे की कमान संभाली थी बड़े गुलाम अली साहब,उनके भाई बरकत अली और खां साहब के बेटे मुनव्वर अली खान ने। अमानत अली खां साहब के गुजर जाने के बाद "असद अमानत अली खां" साहब मैदान में उतरे। यही वे तीसरे फ़नकार थे, जिनकी बात हमने शुरू में की थी। इनके बारे में कभी बाद में चर्चा करेंगे। वैसे आपको यह बता दें कि "अमानत अली खां" साहब के सबसे छोटे शाहबजादे "शफ़कत अमानत अली खान" ,जिन्हें लोग "रौक स्टार उस्ताद" भी कहते हैं, कभी पाकिस्तानी बैंड "फ़्युज़न" के मुख्य गायक हुआ करते थे और आजकल ये हिंदी फ़िल्मों के लिए गाते हैं। आपने "कभी अलविदा न कहना" का "मितवा" या फिर "डोर" का "ये हौसला" तो सुना हीं होगा। कभी इनके बारे में भी विस्तार से गुफ़्तगू करेंगे, अभी तो आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। उससे पहले:

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएं मगर,
जंगल तेरे पर्बत तेरे बस्ती तेरी सहरा तेरा|


तो हाँ, मेहरबान, कद्रदान, साहिबान अपना दिल थाम लें,क्योंकि हम आपको वह गज़ल सुनाने जा रहे हैं, जो हर मायने में अलहदा है। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

इंशा जी उठो अब कूच करो,इस शहर में जी को लगाना क्या!
वहशी का सुकूं से क्या मतलब,जोगी का नगर में ठिकाना क्या!!

इस दिल के दरिदा दामन में,देखो तो सही सोचो तो सही,
जिस झोली में सौ छेद हुए,उस झोली का फ़ैलाना क्या!

शब बीती चाँद भी डूब चला, जंजीर पड़ी दरवाजे पे,
क्यूँ देर गए घर आए हो, सजनी से करोगे बहाना क्या?

जब शहर के लोग ना रस्ता दें,क्यों बन में न जा बिसराम करें,
(क्यों वन में न जा विश्राम करें)
दीवानों की-सी ना बात करें, तो और करे दीवाना क्या!


वैसे तो "अमानत अली" साहब के गाए इस गज़ल में इतने हीं अशआर हैं,लेकिन हम आपको बाकी के दो अशआर भी सुनाए देते हैं:

उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें,
जिसे देख सकें पर छू न सकें,वो दौलत क्या,वो खज़ाना क्या!

उसको भी जला दुखते हुए मन,इक शोला लाल भभुका बन,
यूँ आँसू बन बह जाना क्या, यूँ माटी में मिल जाना क्या!




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

हंसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत,
रोने को यहाँ वैसे भी ___ नहीं मिलती...

आपके विकल्प हैं -
a) सोहबत, b) कीमत, c) फुर्सत, d) कुर्बत

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"चिराग" और शेर कुछ यूँ था -

वो फिराक हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो गुलाब बनके खिलेगा क्या, जो चिराग बनके जला न हो...

स्वप्न मंजूषा जी बधाई आपको. आपने फरमाया-

चिराग दिल का जलाओ बहुत अँधेरा है,
कहीं से लौट के आओ बहुत अँधेरा है...

दिशा जी स्वागत आपका, ये था आपका शेर -

वो चिराग ही तो है जो रोशन करे हर अँधेरे को
वरना जुगनू तो ना जाने कितने टिमटिमाते हैं

शरद जी भी आये इस शेर के साथ -

कहाँ तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

भाई वाह बहुत खूब...सुमित जी ने याद दिलाया ये मशहूर शेर -

चिरागों ने जब अंधेरो से दोस्ती की है
जला कर अपना घर हमने रौशनी की है

दोस्तों जोरदार तालियाँ पूजा जी के लिए जिन्होंने पिछली ग़ज़ल के बोलों के अर्थ इतने विस्तार से सबके सामने रखा....बहुत बहुत आभार पूजा जी.

मनु जी लौटे बहुत दिनों के बाद और फरमाया-

आ ही जायेंगे वो चिराग ढले,
और उनके कहाँ ठिकाने हैं...

जी हाँ दोस्तों यही है आपका ठिकाना, स्नेह बनाये रखें....अगली महफिल तक खुदा हाफिज़...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, June 23, 2009

वाह-वाह रम्ज़ सजन दी होर..... महफ़िल-ए-अथाह और "बाबा बुल्ले शाह"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२३

क शख्स जिसे उसकी लीक से हटकर धारणाओं और भावनाओं के कारण गैर-इस्लामिक करार दिया गया और जिसे कज़ा के बाद भी अपने समुदाय का कब्रिस्तान नसीब न हुआ,क्योंकि आसपास के मुल्लाओं को उसकी बातों में "काफ़िर" होने की बू आती थी, नियति का यह खेल देखिए कि आज उसे पूरी दुनिया में इबादत के शिखर पर स्थान दिया जाता है और उसके दर्शन और लेखन की तुलना "रूमि" और "शम्स-ए-तबरिज़" से की जाती है। जन्म से मुसलमान होने के बावजूद उसकी प्रसिद्धि सारे धर्मों में एक-सी है, दरवेश और बुद्धिजीवी उसे "दोनों दुनिया का शेख","खुदा का बंदा" कहकर संबोधित करते हैं और न सिर्फ़ पंजाब बल्कि पूरे मुल्क या कहिए पूरी दुनिया में "पराभौतिक/रहस्यवादी" कविता का जानकार उससे अच्छा नहीं मिलता। उसे "सूफी-साहित्य का शिखर-पुरूष" कहने वाले भी कम नहीं है। "क़सुर" में उसके कब्र के पास की ज़मीन आज भी इंसानियत का दम भरती है और आज भी उस जगह पर बड़े-छोटे का भेदभाव नहीं होता, वहाँ जो भी जाता है कुछ न कुछ हासिल करके हीं आता है। उसका जन्म कब हुआ, इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है, लेकिन ज्यादातर विद्वानों का यह मत है कि उसने १६८० से १७५८ तक इस दुनिया को अपने होने का अनुभव दिया था। जन्म से छ: महीने तक की अवधि उसने "बहावलपुर" के "उच" नामक जगह पर बिताई,जोकि अब पाकिस्तान में है और उसके बाद उसका परिवार "मलकवल" चला गया। पिता "शाह मोहम्मद दरवेश" गाँव की हीं मस्जिद में "ज़ाहिद" थे और "शिक्षक" भी। "मलकवल" में कुछ दिन बिताने के बाद उसे अपने परिवार के साथ "पंडोके" जाना पड़ा, जोकि "क़सुर" से ५० मील दक्षिण-पूर्व की ओर था । वैसे कुछ लोगों का यह भी मानना है कि उसका जन्म "पंडोके" में हीं हुआ था। हज़ार लोग,हज़ार बातें,इसलिए पक्के से यह कहा नहीं जा सकता कि सच्चाई किस में है, वैसे सच्चाई जो भी है,यह तो तय है कि "काफ़ी/कफ़ी"(पंजाबी साहित्य का एक रूप) का जानकार उस-सा दूसरा कोई न हुआ।

"अब्दुल्लाह शाह" या फिर "मीर बुल्ले शाह क़ादिरी शतरी" के पिता अरबी, फ़ारसी और "पाक़ क़ुरान" के बहुत बड़े जानकार थे। उनका आध्यात्म की तरफ़ भी गहरा झुकाव था,इसी झुकाव और नेकदिली के कारण लोगों ने उन्हें दरवेश की उपाधि से नवाज़ा था। कहा जाता है कि पूरे परिवार में "बुल्ले शाह" की बहन उन्हें सबसे ज्यादा चाहती थी और उसने "बुल्ले शाह" की तरह हीं ता-ज़िंदगी शादी नहीं की। "पंडोके भटियाँ" में अब भी उनका (बुल्ले शाह के पिता का) मकबरा है, जहाँ हर साल "उर्स"(एक तरह का मेला) आयोजित किया जाता है और बड़े हीं जोश-औ-जुनूँ के साथ "बुल्ले शाह" के कफ़िये गाए जाते हैं। इस तरह एक हीं साथ पिता-पुत्र दोनों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। यह तो हुई बुल्ले शाह और उनके पिता की बात, लेकिन अगर हम इनकी पीढी में पीछे की ओर जाए तो यह पता चलता है कि "शाह मोहम्मद दरवेश" और "बुल्ले शाह" के होने से लगभग ३०० साल पहले इन्हीं के वंश के "सैयद जलालुद्दीन बुखारी" "सुरख-बुखारा" से "मुल्तान" आए थे। "मुल्तान" अब पाकिस्तान में है और "सुरख-बुखारा" "उजबेकिस्तान" में। यह भी कहा जाता है कि "हज़रत मोहम्मद" इन्हीं के पूर्वज थे। इस तरह एक तरफ़ "बुल्ले शाह" "सैय्यद" वंश के होने के कारण "हज़रत मोहम्मद" से जुड़े थे तो दूसरी तरफ़ "सूफ़ी विचारो" के कारण ये न सिर्फ़ खुदा को मानते थे, बल्कि हर ज़र्रे में "खुदा" के अंश की भी मंजूरी देते थे। वैसे भी "सूफ़ियों" के अनुसार "निर्वाण" पाने की चार शर्ते हैं:

१) शरियत: इस्लाम में कहे मुताबिक एक अनुशासित ज़िंदगी जीना
२) तरिक़त: मुर्शिद या गुरू की आज्ञा का पालन करना
३) हक़ीक़त: उस खुदा के नूर से दो-चार होना
४) मार्फ़त: सच से सामना होने के बाद उसी एक सच्चाई(उस एक खुदा) में खुद को डुबो देना

"बुल्ले शाह" ने अपनी ज़िंदगी का एक बहुमूल्य समय "मुर्शिद" यानी कि "गुरू" की खोज में बीता दिया। और अंत में जिस गुरू की शरण ली, वह न तो ओहदे में उनके स्तर का था और न हीं भेष-भूषा में किसी गुरू की तरह जान पड़ता था। यूँ तो "मिस्टिसिज़्म"(पराभौतिकवाद/रहस्यवाद) पर उस इंसान ने फ़ारसी में कई सारी किताबें लिखी थीं,जिनमें "दस्तूर-उल-अमल","इस्लाह-उल-अमल","लताइफ़-इ-ग़ैब्या", "इशरतुल तालिबिन" प्रमुख हैं, लेकिन पेशे से वह इंसान एक "माली" था और इसी कारण "बुल्ले शाह" के कई सारे शुभचिंतकों ने उनसे अपनी यह राय ज़ाहिर की थी कि "आप पैगम्बर मोहम्मद के वंशज हैं और आप कई सारी तिलिस्मी शक्तियों के मालिक हैं,फिर क्या यह आपको शोभा देता है कि आप एक नीच जाति के माली के शागिर्द बन जाएँ। क्या यह शर्मनाक नहीं है?" इतना सब कुछ होने के बावजूद "बुल्ले शाह" को अपने मुर्शिद "इनायत शाह क़ादरी" के प्रति बहुत हीं ज्यादा निष्ठा थी। उनका अपने गुरू के प्रति प्रेम के कई सारे किस्से मशहूर हैं। "प्रोफ़ेसर पुर्ण सिंह" एक ऐसी हीं घटना का हवाला देते हुए लिखते हैं: "एक बार बुल्ले शाह ने एक लड़की को अपने पति का इंतज़ार करते हुए देखा और पाया कि उसी इंतज़ार में वह सज-सँवर रही है,बालों में गाँठ और जुड़ा बाँध रही है। न जाने बुल्ले शाह को क्या सूझा और उन्होंने भी अपने गुरू से मिलने जाने से पहले एक लड़की की तरह का भेष बना लिया,बालों में उसी तरह के गांठ बाँध लिए और चल पड़े गुरू रहमत से मिलने। " तो इस तरह की थी बुल्ले शाह की भक्ति और जिसकी अपने गुरू के लिए इतनी भक्ति हो ,उसके दिल में खुदा के लिए कैसा अनुराग होगा, यह अनकहे हीं स्पष्ट है। "बुल्ले शाह" को लोग प्यार से "बाबा बुल्ले शाह" भी कहते हैं। "बाबा" के समकालीन कई सारे जानेमाने सूफ़ी और उर्दू कवि थे, जिनमें "वारिश शाह"(हीर-रांझा के रचयिता), सचल सरमस्त(वास्तविक नाम- अब्दुल वहद) और "मीर तकी मीर" के नाम सबसे ऊपर आते हैं। वैसे तो "बाबा" का लिखा सबकुछ संभाले जाने और गुनने योग्य है, लेकिन एक कलाम जो खासा प्रसिद्ध हुआ और जिसने हर किसी को अपने दिल में झांकने को मजबूर कर दिया,वो कुछ यूँ है:

बुल्ला कि जाणां मैं कौन?

न मैं अरबी न लाहौरी, न मैं हिंदी शहर नगौरी
न हिंदू न तुर्क पिशौरी, न मैं रहंदा विच नदौन।

इस कलाम को "रब्बी शेरगिल" ने एक अलग हीं चेहरा दे दिया है। वैसे आज हम इसकी बात नहीं कर रहे। आज हम "बेगम" आबिदा परवीन की आवाज़ में लयबद्ध "बाबा बुल्ले शाह" एलबम से "वाह-वाह रम्ज़ सजन दी होर" लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं। अब चूँकि रचना "पंजाबी" भाषा में है,इसलिए मुझे इसका अर्थ नहीं मालूम। मैं आप सबसे यह दरख्वास्त करूँगा कि जितना हो सके,उतना हीं "तर्ज़ुमा" हमारे लिए कर दें। तो लीजिए कलाम पेश है:

वाह-वाह रम्ज़ सजन दी होर!

कोठे चढकर देवान होका
इश्क़ विहाजो कोई ना लोकां
इस सा मूल ना खाना धोखा
जंगल बस्ती मिले ना ठौर।

दे दीदार होया जद राही
अच्नाचेत प्यी गल विच फ़ाही
अनहदी कीति बेपरवाही
मैनु मिल्या ठग लाहौर।

आशिक़ फिरदे छुप-छुपाते
जैसे मूरत साडा मदमाते
दामे ज़ुल्फ़ दे अंदर फ़ाते
ओथे चल्ले वश ना जोर।

बुल्या शाह नु कोई ना देखे
जो देखे सो किसे ना लेखे
उस दा रंग ना रूप ना रेखे
ओही होवे होके चोर।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

वो फिराक हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो गुलाब बनके खिलेगा क्या, जो ___ बनके जला न हो...

आपके विकल्प हैं -
a) चिराग, b) मशाल, c) आफ़ताब, d) माहताब

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"आवारा" और सही शेर कुछ यूँ था -

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं,
दुनिया वाले दिलवालों को और बहुत कुछ कहते हैं...

स्वप्न मंजूषा जी बधाई सही जवाब के लिए, आपने जो शेर फ़रमाया वो कुछ ऐसा था -

वो जो अभी इस राह गुजर से चाक गिरेबाँ गुजरा है,
उसी आवारा दीवाने को "जालिब जालिब" कहते हैं...

नीलम जी ने अर्ज किया -

आवारा हूँ गलियों में, मैं और मेरी तन्हाई,
जाये तो कहाँ जाएँ, हर मोड़ पर रुसवाई ...

रचना जी बहुत दिनों बाद लौटी इस शेर के साथ -

आवारा सा फिरता है वो
इश्क की धुन में रहता है वो...

इश्क की इस धुन में जीने का मज़ा ही कुछ और है....सभी रसिक श्रोताओं को बधाई.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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