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Saturday, May 27, 2017

चित्रकथा - 20: रीमा लागू की शुरुआती फ़िल्मी भूमिकाएँ

अंक - 20

रीमा लागू को श्रद्धांजलि

रीमा लागू की शुरुआती फ़िल्मी भूमिकाएँ 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


18 मई 2017 को सुप्रसिद्ध अभिनेत्री रीमा लागू का मात्र 59 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इतनी जल्दी उनके दुनिया-ए-फ़ानी से चले जाने से अभिनय जगत को जो क्षति पहुँची है उसकी भरपाई हो पाना असंभव है। 35 सालों से उपर के अभिनय सफ़र में रीमा जी ने दर्शकों के दिलों पर राज किया; कभी गुदगुदाया, कभी रुलाया, और कभी अपने अभिनय से हमें भाव-विभोर कर दिया। आइए आज ’चित्रकथा’ में नज़र डालें उनके शुरुआती सालों की फ़िल्मों पर। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीया रीमा लागू की पुण्य स्मृति को!



रीमा लागू (21 जून 1958 - 18 मई 2017)


ऑन-स्क्रीन माँ के किरदार में फ़िल्म इतिहास में बहुत सी अभिनेत्रियों ने बुलंदी हासिल किए हैं जिनमें वो नाम जो सबसे पहले याद आते हैं, वो हैं निरुपा रॉय, कामिनी कौशल, सुलोचना, दुर्गा खोटे, अचला सचदेव, और बाद के वर्षों में नज़र आने वाली अभिनेत्रियों में एक प्रमुख नाम रीमा लागू का है। ’क़यामत से क़यामत तक’, ’मैंने प्यार किया’, ’आशिक़ी’, ’हिना’, ’साजन’, ’हम आपके हैं कौन’, ’जुड़वा’, ’येस बॉस’, ’कुछ कुछ होता है’, ’हम साथ-साथ हैं’, ’वास्तव’, ’मैं प्रेम की दीवानी हूँ’, ’कल हो न हो’, ’रंगीला’ जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों में माँ की सफल भूमिका निभा कर रीमा लागू दर्शकों के दिलों में एक अपना अलग ही मुकाम बना चुकी थीं। उनके परदे पर आते ही जैसे एक रौनक सी छा जाती। उन्होंने फ़िल्मी माँ के किरदार को एक दुखियारी औरत से बाहर निकाल कर एक ग्लैमरस महिला में परिवर्तित किया। लेकिन आज भले उन्हें हम उनकी माँ की भूमिका वाली फ़िल्मों के लिए याद करते हैं, हक़ीकत यह है कि 1988 में ’क़यामत से क़यामत तक’ के आने से पहले उन्होंने कई फ़िल्मों में कई तरह के चरित्र निभाए जिनकी तरफ़ हमारा ध्यान यकायक नहीं जाता।

21 जून 1958 को जन्मीं रीमा लागू का असली नाम नयन भडभडे था। उनकी माँ मन्दाकिनी भडभडे मराठी स्टेज ऐक्ट्रेस थीं और उन्हीं से शायद अभिनय की बीज नयन में भी अंकुरित हुई। उनके अभिनय क्षमता से उनका स्कूल वाक़िफ़ था। माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी करते ही वो पेशेवर तौर पर अभिनय करना शुरु किया। विवेक लागू से विवाह के पश्चात् नयन भडभडे बन गईं रीमा लागू। 1979 से लेकर 1988 तक वो यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी भी की और साथ ही साथ टेलीविज़न और फ़िल्मों में अभिनय भी जारी रखा। 1988 के बाद उनका फ़िल्मी सफ़र तेज़ हो जाने की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इन्हीं दस वर्षों यानी कि 1979 से 1988 के बीच उन्होंने कई फ़िल्मों में तरह तरह के किरदार निभाए। रीमा लागू का फ़िल्मी सफ़र शुरु हुआ 1979 की मराठी फ़िल्म ’सिंहासन’ से जिसमें नीलू फुले, श्रीराम लागू, नाना पाटेकर, और मोहन अगाशे जैसे दिग्गज कलाकार थे। हिन्दी फ़िल्मों में रीमा लागू प्रथम नज़र आईं 1980 की फ़िल्म ’आक्रोश’ में। इस फ़िल्म में उन्होंने एक नौटंकी नर्तकी का किरदार निभाया था। गोविंद निहलानी निर्देशित इस कलात्मक फ़िल्म को उस वर्ष के बहुत से फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिले। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल और अमरीश पुरी जैसे दिग्गज कलाकारों की इस फ़िल्म में नवोदित रीमा लागू का छोटा सा लावणी डान्सर का किरदार सराहनीय था। फ़िल्म में केवल तीन गीत थे जिनमें एक गीत रीमा लागू पर फ़िल्माया गया। "तू ऐसा कैसा मर्द" एक लावणी गीत है जिस पर रीमा लागू ने लावणी नृत्य किया और माधुरी पुरंदरे की गायी इस लावणी पर लिप-सिंक किया। अक्सर इस तरह के लावणी में थोड़ा बहुत अश्लीलता आ ही जाती है, पर रीमा लागू इस गीत में इतनी ग्रेसफ़ुल और सुन्दर लगती हैं कि उन्हें इस रूप में देखने का मज़ा ही कुछ अलग है। गोविन्द निहलानी जैसे फ़िल्मकार ने अगर उन्हें इस किरदार के लिए चुना था तो ज़रूर उनकी अभिनय प्रतिभा को देख कर ही चुना होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। 

1980 की एक और फ़िल्म में रीमा लागू नज़र आईं। गोविन्द निहलानी के बाद अब बारी थी श्याम बेनेगल की। शशि कपूर निर्मित फ़िल्म ’कलयुग’ में शशि कपूर के अलावा रेखा, राज बब्बर, विक्टर बनर्जी, सुषमा सेठ, कुलभूषण खरबन्दा और अनन्त नाग जैसे मंझे हुए अभिनेता थे। श्याम बेनेगल की फ़िल्म में रीमा लागू जैसी नई अभिनेत्री को अभिनय का मौका मिलना बहुत बड़ी बात थी। साथ ही इतने बड़े बड़े अभिनेताओं के साथ एक ही सीन में अभिनय करना और अपनी एक पहचान बना पाना आसान काम नहीं था। महाभारत की कहानी का आधुनिक रूप था ’कलयुग’ की कहानी। इसमें कुलभूषण खरबन्दा की पत्नी का किरदार रीमा ने निभाया। दो परिवारों के बीच के द्वन्द की कहानी है ’कलयुग’ जिसमें रीमा लागू के बेटे का ऐक्सिडेन्ट में मृत्यु हो जाती है। अपने बेटे का शव देख कर एक माँ की क्या हालत होती है, रीमा लागू के अभिनय से सजी इस सीन को देख कर अपनी आँसू रोक पाना मुमकिन नहीं। हालाँकि किरण के इस किरदार में रीमा लागू को कुलभूषण खरबन्दा के साथ कुछ इन्टिमेट सीन्स भी करने पड़े हैं, लेकिन बेटे की मृत्यु का वह सीन दिलो-दिमाग़ पर छाया रहता है। रीमा लागू ने संतान के जाने के दर्द को यूं उभारा है कि मन से यह दुआ निकलती है कि भगवान कभी किसी दुश्मन से भी उसका संतान न छीने! ’कलयुग’ के बाद 1983 में फ़िल्म ’चटपटी’ में एक छोटा किरदार निभाया रीमा लागू ने। देवेन वर्मा निर्मित इस फ़िल्म में स्मिता पाटिल शीर्षक भूमिका में थीं और साथ में थे राज किरण, श्रीराम लागू और सुधीर दलवी। फ़िल्म बुरी तरह फ़्लॉप होने की वजह से यह फ़िल्म भुला दी गई।

फिर 1985 में फ़िल्म आई ’नासूर’ जिसमें फिर एक बार रीमा लागू को समानान्तर सिनेमा के कुछ दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। अशोक चोपड़ा निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में थे ओम पुरी, प्रिया तेन्दुलकर, सदाशिव अमरापुरकर, अच्युत पोद्दार, के. के. रैना और अरुण बक्शी। रीमा लागू ने इस फ़िल्म में सदाशिव अमरापुरकर की पुत्रवधु का चरित्र निभाया। हालाँकि रीमा लागू का रोल लम्बा नहीं है, लेकिन छोटी सी भूमिका में भी वो अपना छाप छोड़ जाती हैं। जिस अस्पताल में डॉ. सुनिल गुप्ता (ओम पुरी) गाइनोकोलोजिस्ट हैं, उसी में मंत्री रावसाहेब (सदाशिव) की गर्भवती पुत्रवधु मंजुला (रीमा लागू) का दाख़िला होता है डेलिवरी के लिए। लेकिन ऑपरेशन टेबल पर डॉ. गुप्ता को पता चलता है कि माँ और बच्चे में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है और वो ख़ुद निर्णय लेते हुए माँ को बचाते हैं। अपने बच्चे को खोने का दर्द फिर एक बार रीमा लागू के अभिनय में फूट पड़ती है। संयोग की बात देखिए कि कुछ कुछ इसी तरह का दृश्य पिछली फ़िल्म ’कलयुग’ में भी रीमा लागू ने अदा की थी। 

1986 और 87 में रीमा लागू की कोई फ़िल्म नहीं आई, पर 1988 का वर्ष उनके करीअर का टर्निंग् पॉइन्ट सिद्ध हुआ। अरुणा राजे लिखित, निर्मित और निर्देशित विवादास्पद फ़िल्म ’रिहाई’ में कई दिग्गज कलाकारों के साथ स्क्रीन शेयर किया रीमा लागू ने। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि गुजरात के एक दूर दराज़ के गाँव से सारे जवान मर्द रोज़ी रोटी के लिए शहर चले गए हैं और गाँव में केवल औरतें, बच्चें और वृद्ध-वृद्धा रह गए हैं। गाँव की महिलाएँ दिन भर खेतों खलिहानों में अटूट परिश्रम करती हैं, बच्चे पालती हैं, और रात में तन्हाइयाँ ओढ़ कर सो जाती हैं। गाँव की इन महिलाओं की भूमिकाओं में जिन अभिनेत्रियों ने अभिनय किया, वो हैं हेमा मालिनी, नीना गुप्ता, इला अरुण और रीमा लागू। तभी गाँव में मनसुख (नसीरुद्दीन शाह) की वापसी होती है जो दुबई में सालों काम कर अपने गाँव लौटा है। कुछ औरतें मनसुख के तरफ़ आकर्षित होती हैं, ख़ास तौर से नीना गुप्ता और रीमा लागू द्वारा निभाये किरदार, और दोनों ही उसके साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं। दो बच्चों की माँ रीमा लागू ने इस विवादास्पद चरित्र को बहुत ही स्वाभाविक तरीके से निभाया है। यह एक ऐसी औरत का किरदार है जो मुंहफट है, जो कुछ भी कहने से पहले सोचती नहीं, जिसकी बातों में निडरता के साथ-साथ थोड़ी अश्लीलता भी है। हेमा मालिनी जैसी सुपरस्टार अभिनेत्री के साथ सीन शेअर किया रीमा लागू ने और कुछ संवाद भी दोनों के बीच में हैं। इतना ही नहीं एक गीत में आशा भोसले ने हेमा मालिनी का पार्श्वगायन किया है तो अनुपमा देशपांडे ने रीमा लागू का। पहली फ़िल्म ’आक्रोश’ में रीमा लागू पर गीत फ़िल्माया गया था और उनका डान्स भी था, ’रिहाई’ के उस गीत में भी रीमा लागू नृत्य करती नज़र आती हैं। ’रिहाई’ में हेमा मालिनी के अलावा इला अरुण और नीना गुप्ता के चरित्रों को रीमा लागू के चरित्र से ज़्यादा प्रॉमिनेन्स दिया गया है, लेकिन रीमा लागू का स्क्रीन प्रेसेन्स भी कमाल का रहा। उनकी अच्छी बात यह रही कि जो भी रोल उन्हें दिया गया, चाहे छोटा या बड़ा, उन्होंने हर एक में जान फूंक दी।

हिन्दी फ़िल्म जगत में नायक-नायिका की जोड़ियाँ ख़ूब जमी हैं। लेकिन माँ और पिता की जोड़ियों की अगर बात करें तो सबसे पहले जो जोड़ी याद आती है, वह है रीमा लागू और आलोक नाथ की। फ़िल्म ’मैंने प्यार किया’ से इस जोड़ी की शुरुआत ज़रूर हुई थी, पर जिस फ़िल्म में रीमा लागू और आलोक नाथ एक साथ पहली बार नज़र आए थे, वह फ़िल्म थी 1988 की ’हमारा ख़ानदान’। इस फ़िल्म में एक गाइनोकोलोजिस्ट की भूमिका में नज़र आईं रीमा लागू। डॉ. जुली के किरदार में अमरीश पुरी और आशा पारेख के साथ उन्होंने स्क्रीन शेअर किया। किसी बच्चे के लिंग निर्धारण में माँ की नहीं बल्कि पिता के क्रोमोज़ोम की भूमिका होती है, यह संदेश इस फ़िल्म में रीमा लागू के चरित्र के माध्यम से दी गई। अब तक उनके निभाए किरदारों में यह किरदार सबसे दीर्घ रही। फिर इस वर्ष के आख़िर में प्रदर्शित हुई ’मैंने प्यार किया’ जिसमें सूरज बरजात्या ने रीमा लागू को एक ऐसे अवतार में उतारा कि बाकी इतिहास है। एक ग्लैमरस पर घरेलु माँ का इमेज इस फ़िल्म से उनकी बनी जो बेहद हिट सिद्ध हुई और इस फ़िल्म के बाद एक के बाद एक फ़िल्मों में उन्हें हमने इसी अवतार में देखा। इस दौर के समस्त सुपरस्टार हीरो-हीरोइन्स की माँ बन चुकी हैं रीमा लागू और आज की पीढ़े उन्हें इसी रूप में याद करती रहेंगी। लेकिन ’मैंने प्यार किया’ से पहले उनके द्वारा निभाए गए किरदारों में उनके अभिनय की विविधता महसूस की जा सकती है। चाहे ’आक्रोश’ के लावणी डान्सर का किरदार हो या ’कलयुग’ के बिज़नेसमैन घराने की बहू का चरित्र, ’नासूर’ में गर्भवती औरत जिसका बच्चा डेलिवरी के समय मर जाता है, ’हमारा ख़ानदान’ में गाइनोकोलोजिस्ट की दमदार अदायगी या फिर ’रिहाई’ में एक अनपढ़, कामुक, दो बच्चों की माँ की वह विवादास्पद रोल, हर चरित्र में रीमा लागू ढल गईं और इन फ़िल्मों को अपने अभिनय से सजाया, सँवारा, उनमें अपनी सहज स्वाभाविक अदायगी से जान डाली। रीमा लागू आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हिन्दी व मराठी सिनेमा, थिएटर और टेलीविज़न पर उनकी अमिट छाप सदा बनी रहेगी। सहज, सरल अभिनय और हर तरह के चरित्र में बड़ी आसानी से ढल जाना ही रीमा लागू की सबसे बड़ी ख़ासियत थी और इसी बात की पुष्टि उनके द्वारा निभाए गए शुरुआती फ़िल्मों के किरदारों से होती है। रीमा लागू की प्रतिभा और योगदान को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ करती है शत शत नमन!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, May 13, 2017

चित्रकथा - 18: उस्ताद रईस ख़ाँ के सितार का फ़िल्म संगीत में योगदान


अंक - 18

उस्ताद रईस ख़ाँ के सितार का फ़िल्म संगीत में योगदान

"मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है.." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


6 मई को सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के निधन हो जाने से सितार जगत का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। शास्त्रीय संगीत जगत में उनका जितना योगदान रहा है, वैसा ही योगदान उन्होंने सिने संगीत जगत में भी दिया है। उनके सितार के टुकड़ों से सजे हिन्दी फ़िल्मी गीत जैसे खिल उठते थे। आइए आज ’चित्रकथा’ में उस्ताद रईस ख़ाँ साहब को याद करते हुए उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों की बातें करें जिनमें उन्होंने अपने सितार और उंगलियों के जादू चलाए थे। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है उस्ताद रईस ख़ाँ साहब की पुण्य स्मृति को।




उस्ताद रईस ख़ाँ
(25 नवंबर 1939 - 6 मई 2017)

2017 का वर्ष सितार जगत के लिए अब तक एक दुर्भाग्यपूर्ण वर्ष रहा है। 4 जनवरी को उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ, 12 अप्रैल को पंडित जयराम आचार्य, और अब 6 मई को उस्ताद रईस ख़ाँ साहब। सितार जगत के तीन तीन उज्वल नक्षत्र अस्त हो गए एक के बाद एक, और पैदा हो गया एक महाशून्य शास्त्रीय संगीत जगत में। हलीम जाफ़र ख़ाँ और जयराम आचार्य ही की तरह रईस ख़ाँ साहब का भी फ़िल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा। हालाँकि संगीतकार मदन मोहन के साथ ख़ाँ साहब ने सबसे उम्दा काम किया, और क्यों ना करते, दोनों जिगरी दोस्त जो थे, लेकिन अन्य संगीतकारों के लिए भी ख़ाँ साहब ने सितार बजाया और गीतों के अन्तराल संगीत को ऐसा सुरीला अंजाम दिया कि इन तमाम गीतों की इन सितार की ध्वनियों के बग़ैर कल्पना भी नहीं की जा सकती। सितार के इन स्वर्गिक ध्वनियों को अगर इन गीतों से निकाल दिया जाए तो शायद इन गीतों की आत्माएँ ही चली जाएँगी। 1964 की फ़िल्म ’ग़ज़ल’ की ग़ज़ल "नग़मा-ओ-शेर की सौग़ात किसे पेश करूँ" में साहिर के बोल, मदन मोहन की तर्ज़, और लता मंगेशकर की आवाज़ के साथ-साथ उस्ताद रईस ख़ान के सितार के टुकड़ों ने इस ग़ज़ल को अमर बना दिया। इसके इन्टरल्युड्स में सारंगी और वायलिन तो थे ही, पर सबसे ज़्यादा प्रॉमिनेन्स ख़ाँ साहब के सितार को ही मिला। 1966 की फ़िल्म ’मेरा साया’ में तो जैसे ख़ाँ साहब का सितार अपने पूरे शबाब पर था। "नैनों में बदरा छाये" का शुरुआती संगीत से भला कौन अंजान है! राजस्थान के किसी जलमहल का दृश्य है, सुनिल दत्त महल के छत पर धूप में लेटे हैं, छत से चारों तरफ़ झील के नज़ारे हैं। ऐसे में संतूर की ध्वनियाँ बजने लगती हैं और जल्द ही संतूर पर सितार के चमत्कारी तानें हावी हो जाते हैं। और फिर सितार पर शुरुआती धुन बजने के बाद गीत शुरु होता है "नैनों में बदरा छाए, बिजली सी चमके हाए"। इस गीत को सुनते हुए अगर यह शुरुआती संगीत ही न सुन पाए तो जैसे यह सुनना अधूरा ही रह गया। इन्टरल्युड्स में भी क्या ख़ूब संतूर और सितार की जुगलबन्दी है, जैसे कोई स्वर्गिक अनुभूति हो रही हो! जानकारी के लिए बता दें कि इस गीत में संतूर पंडित शिव कुमार शर्मा ने बजाया था। 1967 की फ़िल्म ’दुल्हन एक रात की’ के गीत "मैंने रंग ली आज चुनरिया सजना तोरे रंग में" में ख़ाँ साहब के सितार का जादू सुनाई देता है। नायिका को प्रेम हो गया है, इस सिचुएशन में यह गीत शुरु होता है सितार के एक पीस से। ख़ाँ साहब ने इस पीस के ज़रिए नायिका के मन के भाव को ऐसे उजागर किया है कि पीस सुनते ही जैसे नायिका का दिल हमें दिखाई देने लगता है। इस गीत के इन्टरल्युड्स और गीत के अन्त में भी सितार के पीसेस हैं, और अन्त में तो गीत के मुखड़े की धुन ही सितार पर बजती है। इसी फ़िल्म का अन्य गीत है "सपनों में अगर तुम मेरे आओ तो सो जाऊँ"। लता जी की आवाज़ में इस लोरी की शुरुआत ख़ाँ साहब के सितार से होती है। अन्तराल संगीत में सितार के साथ-साथ अन्य वाद्यों का भी प्रयोग हुआ है, पर सितार के टुकड़ों को सुनते हुए यकीन हो जाता है कि ज़रूर किसी उस्ताद की उंगलियाँ चली होंगी।

उस्ताद रईस ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और पहली बार सन 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में सितार बजाया था। विविध भारती के लोकप्रिय कार्यक्रम 'उजाले उनकी यादों के' के शीर्षक संगीत में इसी गीत के शुरुआती संगीत का अंश सुनाई देता है जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था। "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है..." की कहानी। गाना रेकॉर्ड हो चुका था और मदन मोहन इस गाने से बहुत ख़ुश भी थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करने का फ़ैसला ले लिया? इस गीत में छोटे-छोटे इन्टरल्यूड्स रईस ख़ान ने बजाए। पर मुख्य रूप से पंडित शिव कुमार शर्मा के सन्तूर को बहुत प्रॉमिनेन्टली इस्तमाल किया गया। रेकॉर्डिंग् हो गई, सबकुछ सही हो गया। अब हुआ यूं कि एक दिन मदन मोहन ने यह गाना रईस ख़ान को दोबारा सुनवाया। गाने का टेप बज रहा था, तभी रईस ख़ान ने अपना सितार उठाया, और गाने के साथ सितार छेड़ने लगे। इस बार नए नए इन्टरल्यूड्स बजने लगे। नई सुर, नई तरकीबें। रईस ख़ान के सितार से इस तरह के सुर सुन कर मदन मोहन का दिल हो गया बाग़-बाग़। उन्होंने फ़ौरन AVM Productions को फ़ोन लगाया और कहा कि वो इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करना चाहते हैं। मदन मोहन रईस ख़ान के बजाए सितार के पीसेस से इतना मुतासिर हो गए कि जिस गाने को रेकॉर्ड करके मुतमाइन थे, उस गाने को एक बार फिर से रेकॉर्ड करने की ठान ली।

लता और मदन मोहन की ग़ज़लों को ख़ाँ साहब ने ख़ूबसूरत जामा तो पहनाया ही, कुछ रफ़ी साहब और मदन जी के नग़मों को भी उन्होंने सँवारा। 1967 की फ़िल्म ’नौनिहाल’ की ग़ज़ल "तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये में शाम कर लूँगा" के इन्टरल्युड्स में क्रम से वायलीन, सारंगी और सितार के पीसेस सुनाई पड़ते हैं, जिनमें सितार वाला हिस्सा सबसे लम्बा। मदन मोहन का यह सितार से इश्क़ और ख़ाँ साहब के हुनर पे ऐतबार का ही नतीजा था। 1969 की फ़िल्म ’चिराग़’ में "छायी बरखा बहार पड़े अंगना फुहार" एक दीर्घ गीत है जिसकी अवधि 7 मिनट से उपर है। इस गीत के दीर्घ शुरुआती संगीत में सितार नहीं है, पर पहले अन्तराल संगीत में ख़ाँ साहब तशरीफ़ लाते हैं और क्या ख़ूब लाते हैं! इसी तरह से 1970 की फ़िल्म ’हीर रांझा’ के ग़मज़दा नग़मे "दो दिल टूटे दो दिल हारे" में भी ख़ाँ साहब के सुन्दर सितार का प्रयोग हुआ है। 1970 में ’दस्तक’ फ़िल्म की ग़ज़ल "हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह" एक और कालजयी रचना है। वीणा और सितार की क्या ख़ूबसूरत समावेश है इस ग़ज़ल में। ख़ाँ साहब के सितार के इन्टरल्युड़्स ऐसे प्रॉमिनेन्टली उभर कर सामने आते हैं कि ग़ज़ल के बोल और गायकी को सीधा सीधा टक्कर देते हैं। इससे पहले जितनी रचनाओं की हमने बात की, उन सब में सारंगी, संतूर और वायलीन भी शामिल थे, पर ’दस्तक’ की यह ग़ज़ल पूर्णत: सितार पर आधारित है, हाँ, पार्श्व में वीणा का आधार ज़रूर है। इसी फ़िल्म की शास्त्रीय रचना "बैयाँ ना धरो हो बलमा" भी एक कालजयी गीत है और फ़िल्म-संगीत के शास्त्रीय आधारित गीतों में इसका शुमार शीर्ष के गीतों में होता है। और इस गीत में भी ख़ाँ साहब का सितार कूट कूट कर भरा हुआ है। सितार और तबला, बस! कितनी सीधी, कितनी सरल रचना है, वाद्यों का कुंभ नहीं, गायकी में कोई दिखावा नहीं, सुन्दर काव्यात्मक बोल, और क्या चाहिए एक सुरीले गीत में। 1973 में ’हँसते ज़ख़्म’ फ़िल्म की ग़ज़ल "आज सोचा तो आँसू भर आए" शुरु होती है उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के सितार के एक उदासी भरे तान से। ग़मज़दा इस ग़ज़ल के इन्टरल्युड़्स में मूड को बरकरार रखते हुए एक ऐसा दर्द भरा सुर छेड़ा जो बिल्कुल जैसे कलेजा चीर कर रख देता है। एक और ख़ास बात यह कि इस ग़ज़ल के तीन इन्टरल्युड्स में उन्होंने अलग अलग धु्ने बजाई है। एक और उल्लेखनीय लता - मदन मोहन गीत है जो किसी फ़िल्म में तो नहीं जा सका लेकिन 2009 में जारी ’तेरे बग़ैर’ ऐल्बम में इसे शामिल किया गया। राजेन्द्र कृष्ण का लिखा यह गीत है "खिले कमल सी काया तेरी"। इस गीत में ख़ाँ साहब ने सितार ने उतनी ही शहद घोली जितनी लता जी की आवाज़ ने। सुरीली आवाज़ और सुरीले साज़ का इससे बेहतर जुगलबन्दी कुछ और नहीं हो सकती।

1973 की फ़िल्म ’दिल की राहें’ की ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्‍फत को निभाएं तो निभाएं कैसे में रईस खां साहब का सितार फिर एक बार अपने पूरे शबाब पर है। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी टीमिंग्‍ कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लत फ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया हमेशा के लिए। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात्‍ 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। नक्श साहब की ख़ुशक़िस्मती थी कि 1973 में 'दिल की राहें' बन गई और उनकी इस अमर ग़ज़ल को रईस ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगाये। "रस्म-ए-उल्फ़त" के अलग अलग अन्तरों  के इन्टरल्युड्स में सितार के अलग अलग तरह के टुकड़ों ने जैसे इस ग़ज़ल को ज़ेवर पहना दिए हों। जब ये टुकड़े बजते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई कॉनसर्ट सुन रहे हों! इस ग़ज़ल के आख़िर में जिस तेज़ रफ़्तार में ख़ाँ साहब की उंगलियाँ सितार पर चलती हैं, क्या समा बंध जाता है, क्या कलाकारी है, क्या हुनर है, वाह! हाल ही में मदन मोहन की पुत्री संगीता जी से पता चला कि बाद में मदन मोहन जी ने उस्ताद शमिम अहमद ख़ाँ से सितार सीखा और अपनी आख़िर की कुछ फ़िल्मों में अहमद साहब से बजवाया। लेकिन ऐसा क्या हुआ था कि उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के साथ मदन जी की बरसों की जोड़ी, बरसों की दोस्ती टूट गई? हुआ यूं कि एक मोड़ पर मदन मोहन को यह लगने लगा कि उनकी महफ़िलों में रईस ख़ान का सिर्फ़ दोस्ती की ख़ातिर सितार बजाना ठीक नहीं है। रईस ख़ान को वो इस तरह बुला कर, सितर बजवा कर दोस्ती का ग़लत फ़ायदा उठा रहे हैं। इसलिए उन्होंने रईस ख़ान को उनका वाजिब मेहनताना देने की सोची। मगर परेशानी यह थी कि अपने दोस्त से पैसों की बात कैसे करे? सो उन्होंने 1973 की एक महफ़िल के बाद अपने मैनेजर से कहा कि वो ख़ान साहब से उनकी फ़ीस के बारे में पूछेंगे। मैनेजर ने रईस ख़ान से पूछा। रईस ख़ान ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, मगर उन्हें यह बात बहुत चुभ गई और उन्होंने इसे अपना अपमान मान लिया। अपने दोस्त मदन मोहन से वो इस तरह की उम्मीद नहीं कर रहे थे। रईस ख़ान जितने बेहतरीन कलाकार थे उतने ही तुनक मिज़ाज भी थे। वो चुपचाप बैठने वाले नहीं थे। बात चुभ गई थी। उन्होंने कुछ दिन बाद मदन मोहन को फ़ोन किया और कहा कि उनके एक दोस्त के घर में एक शादी है और शादी के जलसे में गाने के लिए आपको बुलाया है। "तो मदन भाई, आप कितने पैसे लेंगे?" अब चौंकने की बारी मदन मोहन की थी। बहुत अजीब लगा मदन मोहन को कि रईस ख़ान ने उन जैसे कलाकार को शादी में गाने के लिए कह कर उनकी तौहीन कर रहा है। यह तौहीन अब मदन मोह बर्दाश्त नहीं कर सके। बस यहीं से दोनो के मन में ऐसी खटास पड़ी कि इन दोनों अज़ीम फ़नकारों का साथ सदा के लिए ख़त्म हो गया।

ऐसा नहीं कि उस्ताद रईस ख़ाँ साहब ने केवल मदन मोहन की रचनाओं में ही सितार का अमूल्य योगदान दिया हो। 1961 की फ़िल्म ’गंगा जमुना’ में नौशाद साहब का संगीत था। लता जी की आवाज़ में "ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे साजना मोरे कान का बाला" बेहद लोकप्रिय रहा। गीत के शुरुआती संगीत में ख़ाँ साहब का सितार गीत का मूड तैयार कर देता है। अन्तराल संगीत में बांसुरी के साथ सितार का संगम भी बेहद दिलकश बन पड़ा है इस गीत में। 1972 में जब ’पाक़ीज़ा’ में ग़ुलाम मोहम्मद साहब के इन्तकाल के बाद नौशाद साहब फ़िल्म का संगीत पूरा कर रहे थे, तब पार्श्व-संगीत और शीर्षक-संगीत के लिए ख़ाँ साहब को ही चुना। क़रीब क़रीब चार मिनट का शीर्षक संगीत घुंघरू और तबले से शुरु ज़रूर होती है, लेकिन जल्दी ही ख़ाँ साहब का सितार हर अन्य वाद्य पर हावी हो जाता है। क्या फिरी हैं उनकी उंगलियाँ सितार पर, वाह! सारंगी, संतूर, घुंघरू और तबले के साथ सितार की यह महफ़िल फ़िल्म के नग़मों और ग़ज़लों से कम दिलकश नहीं है। और फिर सोने पे सुहागा, इस शीर्षक संगीत के मध्य भाग से लता जी की आवाज़ में आलाप और ताल गायन है जो इस पूरे आयोजन पे चार चाँद लगा देती है।

ओ. पी. नय्यर एक ऐसे संगीत रहे जिनके गीतों में आधुनिक शैली के होते हुए भी आत्मा हिन्दुस्तानी संगीत की ही रही और उन्होंने पाश्चात्य साज़ों के साथ-साथ भारतीय वाद्यों का भी बहुतायत में प्रयोग किया। 1962 की फ़िल्म ’एक मुसाफ़िर एक हसीना’ का गीत "आप यूंही अगर हमसे मिलते रहे, देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा" रफ़ी-आशा का एक यादगार डुएट है। इस गीत में सबसे उल्लेखनीय वाद्य हैं सारंगी और सितार, जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था।  "कैसी जादूगरी की अरे जादूगर" इस गीत की एक पंक्ति है; इस पंक्ति को सुनते हुए मन में यह ख़याल आता है कि यह शायद ख़ाँ साहब को ही कहा गया है। गीत के एक अन्तराल संगीत में पंख फैला कर एक मोर को नाचते हुए दिखाया जाता है जिसके पार्श्व में ख़ाँ साहब का सितार बज रहा है। मोर के साथ-साथ जैसे सितार की ध्वनियाँ भी झूम रही हैं। 1964 की फ़िल्म ’कशमीर की कली’ में एक बार फिर नय्यर साहब ने ख़ाँ साहब के सितार से सजाया "इशारों इशारों में दिल लेने वाले" गीत को। अन्तरालों में सितार और घुंघरू का एक साथ प्रयोग हुआ है। ये सभी टुकड़े जैसे इन गीतों की पहचान हैं। और नय्यर साहब के गीतों की यह ख़ासियत भी है कि उनके गीतों में हर साज़ और हर टुकड़ा बहुत ही प्रॉमिनेन्ट सुनाई देता है। इसी तरह से 1965 की फ़िल्म ’मेरे सनम’ का आशा भोसले का गाया सदाबहार गीत "जाइए आप कहाँ जाएंगी" में भी ख़ाँ साहब का सितार है। शुरुआती धुन में संतूर है, लेकिन अन्तराल संगीत में सितार के वो टुकड़े हैं जो इस गीत की पहचान भी हैं। 

1966 के वर्ष में रईस ख़ाँ साहब के सितार से सजे बहुत से गीत बने जिनमें से मदन मोहन की रचनाओं का ज़िक्र हम कर चुके हैं। इस वर्ष संगीतकार ख़य्याम के संगीत से सजी फ़िल्म आई ’आख़िरी ख़त’। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था "बहारों मेरा जीवन भी सँवारो"। पूरे गीत में सितार छाया हुआ है। मुखड़े में "बहारों" और "मेरा" शब्दों के बीच में सितार के छोटे टुकड़े का क्या सुन्दर प्रयोग हुआ है। अन्तराल संगीत में सितार और बांसुरी का सुन्दर संगम है। शंकर-जयकिशन के संगीत में पौराणिक विषय पर बनी फ़िल्म ’आम्रपाली’ को अपने गीत-संगीत के लिए याद किया जाता है। "तुम्हें याद करते करते जाएगी रैन सारी" गीत की जितनी तारीफ़ें की जाए कम होगी। क्या बोल, क्या धुन, क्या गायकी, क्या जज़्बात, सब लाजवाब; और उस पर उस्ताद ख़ाँ साहब के सितार का नशा जो अन्तरालों को एक अलग ही मुकाम तक लेकर गया है। यह संगीत जैसे स्वर्ग में रचा गया हो! ख़ाँ साहब के सितार ने हर जज़्बात को साकार किया है। कभी झूमते हुए मोर का उत्साह, कभी नए नए प्यार होने की ख़ुशी, और कभी बिरहा का दर्द, हर मौके के गीत में ख़ाँ साहब के सितार ने इतिहास रचा है। इसी वर्ष शंकर-जयकिशन के ही संगीत वाले एक और फ़िल्म ’तीसरी क़सम’ के एक गीत में ख़ाँ साहब का सितार सुनाई पड़ा। "सजनवा बैरी हो गए हमार" में मुकेश की आवाज़ ने जो दर्द पैदा की थी, उससे टक्कर लेकर ख़ाँ साहब के सितार ने भी दर्द भरे ऐसे तान छेड़े कि जिसने गीत के भाव, गीत के बोलों और गायकी को कॉम्प्लिमेण्ट किया।

संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनन्दजी ने भी ख़ाँ साहब के सितार को अपने गीतों में जगह दी। 1968 की कालजयी फ़िल्म ’सरस्वती चन्द्र’ के यादगार गीत "चंदन सा बदन चंचल चितवन" के शुरुआती संगीत में सितार का पीस इस गीत के पहचान और विशेषता है। इस गीत के दो संस्करण हैं और दोनों में उन्होंने दोनो में अलग अलग तरीक़े से सितार के सुरों को पिरोया है। संगीतकार जयदेव के सुरीले संगीत में 1977 की फ़िल्म ’आंदोलन’ में मीराबाई की लिखी एक सुन्दर रचना थी "पिया को मिलन कैसे होए री मैं जानु नाही"। नीतू सिंह पर फ़िल्माया यह ख़ूबसूरत गीत और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत बन पड़ा ख़ाँ साहब के दीर्घ सितार के टुकड़ों से। जयदेव के गीतों में हमें अनर्थक साज़ों की भीड़ नहीं मिलती, एक या दो साज़ों को लेकर उनकी सीधी सरल रचनाएँ सुनने वालों के दिलों में घर कर लेती है। आशा भोसले की आवाज़ में यह रचना भी उन्हीं गीतों में से एक है। मूलत: सितार पर आधारित यह रचना दर्द भरा होते हुए भी बेहद आकर्षक और सुरीला है। 

70 के दशक में धूम मचाने वाले संगीतकारों में एक नाम लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का है। 1971 की फ़िल्म ’महबूब की मेहन्दी’ आज केवल इसके गीतों के लिए याद की जाती है। फ़िल्म के लगभग सभी गीत मक़बूल हुए, जिनमें लता-रफ़ी के डुएट "इतना तो याद है मुझे कि उनसे मुलाक़ात हुई" को एल.पी के श्रेष्ठ लता-रफ़ी डुएट्स में गिना जाता है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि इस लोकप्रिय गीत में भी उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के सितार के टुकड़े थे। ख़ास कर गीत के दूसरे अन्तराल संगीत में लीना चन्दावरकर जब नृत्य कर रही है तब नृत्य-संगीत के रूप में ख़ाँ साहब का सितार ही बज रहा होता है। ख़ाँ साहब का पेशा भले सितार रहा है, लेकिन कई बार उन्होंने अपने सितार वादन के लिए निर्माता से अपनी पारिश्रमिक नहीं ली। ऐसा ही एक क़िस्सा जुड़ा है ’सत्यम शिवम् सुन्दरम्’ फ़िल्म के साथ। बात यह हुई कि एक सीन के लिए लक्ष्मी-प्यारे को उचित पार्श्व-संगीत नहीं सूझ रहा था। सीन शायद आपको याद हो, जब ज़ीनत अमान सुबह सुबह जलप्रपात के नीचे चल कर जाती हैं शशि कपूर से मिलने। उस समय वहाँ ख़ाँ साहब मौजूद थे जिन्होंने सितार पर एक पीस बजा कर सुनाया जिसे सुन कर राज कपूर सहित सभी लोग वाह वाह कर उठे। ’सत्यम शिवम सुन्दरम’ फ़िल्म के तमाम गीतों में भी ख़ाँ साहब के सुमधुर सितार की ध्वनियाँ शहद घोलती हुई सी लगती है। यह 1978 की फ़िल्म थी और इसी वर्ष लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत से सजी एक और फ़िल्म आई थी ’बदलते रिश्ते’। इसमें लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर का गाया एक शास्त्रीय संगीत आधारित रचना थी "मेरी साँसों को जो महका रही है"। गीत के पहले अन्तराल संगीत में अगर संतूर है तो दूसरे अन्तराल में मुख्यत: वायलिन है, लेकिन तीसरे अन्तराल में ख़ाँ साहब के सितार की लहरियाँ जैसे गीत का रुख़ ही मोड़ देती हैं। 

70 के दशक में ख़ाँ साहब ने शास्त्रीय संगीत के कॉनसर्ट्स में बजाना कुछ कम कर दिया था। लेकिन 80 के दशक के आते ही वो फिर एक बार उस तरफ़ सक्रीय हो उठे जब उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब ने उन्हें अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में बजाने के लिए आमन्त्रित किया। रईस ख़ाँ साहब हिन्दी फ़िल्मों से धीरे धीरे सन्यास ले लिए। 1979 में उन्होंने चौथी शादी की पाक़िस्तानी गायिका बिलक़ीस ख़ानुम से और 1986 वो उनके साथ पाक़िस्तान जा कर बस गए। आज ख़ाँ साहब हमारे बीच नहीं हैं। उनके बजाए सितार के तमाम कॉन्सर्ट्स की रेकॉर्डिंग्स और स्टुडियो रेकॉर्डिंग्स तो हमारे पास हैं ही, इनके साथ-साथ वो तमाम फ़िल्मी गीत भी हैं जिन्हें उनके सितार ने चार चाँद लगाए। उस्ताद रईस ख़ाँ की पुण्य स्मृति को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ का नमन!


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले दो अंकों में हमने गीतकार नक़्श ल्यालपुरी के लिखे मुजरों पर लेख प्रकाशित की थी जिस पर हमें हमारे पाठकों की प्रतिक्रिया प्राप्त हुई हैं। आदियोग जी ने इस लेख को "शानदार" कह कर टिप्पणी की है तो रमेश शर्मा जी लिखते हैं - "बेहतरीन... नायाब मोतियों का संग्रह... हार्दिक बधाई स्वीकारिए!" संज्ञा टंडन जी लिखती हैं - "ग़ज़ब का शोध सुजॉय जी। धन्यवाद इस शानदार जानकारी के लिए।" और सर्वोपरि नक़्श साहब के सुपुत्रा राजन ल्यालपुरी जी ने इस लेख पर कहा है - "मैंने पहला भाग पढ़ा है, बहुत अच्छा है और सही जानकारी है।"


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, May 6, 2017

चित्रकथा - 17: नक़्श ल्यालपुरी के लिखे 60 मुजरे (भाग-2)


अंक - 17

नक़्श ल्यालपुरी के लिखे 60 मुजरे - भाग 2

"क़दर तूने ना जानी, बीती जाए जवानी..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



एक बार ’विविध भारती’ के एक साक्षात्कार में गीतकार नक़्श ल्यालपुरी साहब ने फ़रमाया था कि उन्होंने क़रीब 60 मुजरे लिखे हैं जो कि अलग-अलग रंग, अलग-अलग मिज़ाज के हैं। उन्होंने श्रोताओं से इन्हें सुनने का भी सुझाव दिया था। यह बात मेरे अवचेतन मन में बरसों से चली आ रही थी। हाल ही में नक़्श साहब की मृत्यु के बाद यह बात फिर से मुझे याद आ गई और मैंने यह निर्णय लिया कि उनके सुझाये इन 60 मुजरों को खोज निकालना ज़रूरी है। जुट गया शोध पर। और इसी शोध का नतीजा है आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक। पिछले सप्ताह इस लेख का पहला भाग आपने पढ़ा था; आज प्रस्तुत है इस लेख का दूसरा व अन्तिम भाग।




1977 में एक फ़िल्म आई थी ’महाबदमाश’। इस फ़िल्म में विनोद खन्ना और नीतू सिंह मुख्य भूमिकाओं में थे। रवीन्द्र जैन के संगीत में इस फ़िल्म में नक़्श ल्यालपुरी ने गीत लिखे। सिचुएशन के मुताबिक एक पार्टी में नीतू सिंह विनोद खन्ना को शराब का सहारा लेकर अपनी तरफ़ आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। पारम्परिक मुजरा शैली का गीत ना होते हुए भी सिचुएशन और भाव गीत के बोलों को मुजरा जैसा बना दिया है। मुखड़ा है - "अभी ज़रा सी देर में ये रात गुनगुनाएगी, ये धड़कनों की लय कोई हसीं धुन सुनाएगी, न तुझको नींद आएगी, न मुझको नींद आएगी, मेरे क़रीब आके पी, ये फ़ासला मिटा के पी"। एक अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं "जो तू कहे तो झूमके महकती ज़ुल्फ़ खोल दूँ, सनम तेरी शराब में लबों का रंग घोल दूँ, तेरी नज़र नज़र पे मैं ये दिल का फूल तोड़ दूँ, मेरे क़रीब आके पी..."। अब तक जितने भी मुजरों की हमने बातें की, हर एक मुजरा दूसरे मुजरे से अलग है। यहाँ तक कि शब्दों का दोहराव भी दिखाई नहीं दिया किसी में। इसी साल एक फ़िल्म आई थी ’वोही बात’, इसमें एक ग़ज़ल नक़्श साहब ने लिखी है, लेकिन शायद इसे एक मुजरे की तरह फ़िल्माया नहीं गया है, हालाँकि इसमें दर्द एक मुजरे वाली का ज़रूर छुपा हुआ है। ग़ज़ल के तीन शेर अर्ज़ है - "ज़हर देता है मुझे कोई दवा देता है, जो भी मिलता है मेरे ग़म को बढ़ा देता है।" "क्यों सुलगती है मेरे दिल में पुरानी यादें,कौन बूझती हुई शोलों को हवा देता है।" "हाल हँस-हँस के बुलाता है कभी बाहों में, कभी माज़ी मुझे रो रो सदा देता है।"

’नूरी’ 1979 की एक उल्लेखनीय फ़िल्म रही। फ़िल्म का शीर्षक गीत और "चोरी चोरी कोई आए" गीत ख़ूब चले। इसी फ़िल्म में नक़्श साहब ने बस एक मुजरा लिखा था "क़दर तूने ना जानी, बीती जाए जवानी"। ख़य्याम साहब के संगीत में सारंगी, घुंघरू और तबले की झंकारों से सुसज्जित आशा भोसली का गाया यह मुजरा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी मुजरों में से एक है। पारम्परिक मुजरा शैली में निबद्ध इस मुजरे में नक़्श साहब को उम्दा काम करने का मौक़ा मिला। इस ख़ुशमिज़ाज मुजरे के तीन अन्तरे हैं, सभी में मुखड़े की पुष्टि की गई है। मुजरे वाली नायक को अपनी ओर आकृष्ट कर रही है पर नायक है कि उसे कोई क़द्र ही नहीं। "प्यासे हैं ज़ुल्फ़ों के साये, कब तक दिल में आग छुपायें, जागे रात सुहानी, क़दर तूने ना जानी..."। नायक को पत्थर-दिल कह कर संबोधित करती हुई आगे गाती है, "तोहे मन का मीत बनाया, पत्थर से शीशा टकराया, मैंने की नादानी, क़दर तूने ना जानी..."। और तीसरे अन्तरे में फिर वही घुंघरू टूटने की बात जो नक़्श साहब ने 1972 की ’बाज़ीगर’ फ़िल्म के मुजरे में की थी। "यूं नाची के घुंघरू तोड़े, मेहन्दी वाले हाथ भी जोड़े, तूने एक ना मानी, क़दर तूने ना जानी..."। 1980 में ’पूजा और पायल’ में संगीतकार कमलकान्त के संगीत में नक़्श ल्यालपुरी ने कुछ गीत लिखे थे जिनमें एक मुजरा था आशा भोसले का गाया हुआ। इस मुजरे का स्ट्रक्चर नक़्श साहब ने बिल्कुल अलग रखा है। मुजरा शुरु होता है शुरुआती बोलों से - "रंग हूँ नूर हूँ निखार हूँ मैं, यानी कुदरत का शाहकार हूँ मैं, मेरी चाहत में लुट गई दुनिया, तेरी चाहत में बेक़रार हूँ मैं"। और फिर बदलते रीदम के साथ मुखड़ा शुरु होता है "चमेली बन जाऊँगी गुलाब बन जाऊँगी, बोतला छुपा ले वे शराब बन जाऊँगी"। इसके बाद दो अन्तरे हैं इस मुजरे के। पहला अन्तरा है - "दे दे प्यार निशानी मेरे दिलबरजानी, तेरे पहलू में जागे मेरी चंचल जवानी, ये दिल तेरा ये जाँ तेरी, एक बार सुनूँ जो हाँ तेरी, मैं शोख़ी बन जाऊँगी हिजाब बन जाऊँगी"। और दूसरे अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं - "मेरा रूप सजा दे मेरे सपने जगा दे, मुझे बाहों में लेके मेरा तन महका दे, ये तन्हाई ये रात कहाँ, फिर होठों पर ये बात कहाँ, ख़याल बन जाऊँगी, मैं ख़्वाब बन जाऊँगी..."। इन बोलों पर ग़ौर करने पर पता चलता है कि नक़्श साहब ने हर मुजरे में कुछ नया लिखने की इमानदार कोशिश की है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि हर मुजरा पिछले मुजरों से अलग सुनाई देती है।

1981 की एक ख़ूबसूरत फ़िल्म थी ’दर्द’। ख़ैय्याम और नक़्श ल्यालपुरी के गीत-संगीत की एक माइलस्टोन फ़िल्म थी यह। "न जाने क्या हुआ जो तूने छू लिया", "प्यार का दर्द है मीठा मीठा" और "अह्ल-ए-दिल यूं भी निभा लेते हैं" और "ऐसी हसीन चाँदनी पहले देखी नहीं" जैसे गीतों ने रसिकों के दिल को छू लिया। लेकिन इस फ़िल्म में एक मुजरा गीत भी था जिसकी तरफ़ लोगों का ध्यान नहीं गया। आशा भोसले की आवाज़ में इस मुजरे का संगीत संय़ोजन हमें ’उमरावजान’ के मुजरों की याद दिला जाती है। ख़ास तौर से इसके शुरुआती संगीत और अन्तराल संगीत में "दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए" की झलक साफ़ मिलती है। नक़्श साहब ने भी इसे एक ग़ज़ल की शक्ल में पेश किया है। मुखड़े का शेर है "क़ुबूल कीजिए पहले सलाम आँखों का, फिर आप चाहें तो हाज़िर है जाम आँखों का"। ग़ज़ल के बाकी के शेर हैं - "दिलों में शम्मा सी रोशन हुई मोहब्बत की, हुआ है आँखों से जब भी कलाम आँखों का"; "निगाहे नाज़ से बहला के लूट लेती है, ख़बर है आपको ये भी है आँखों का"; "मैं बेक़रार हूँ ले लीजिए मुझको बाहों में, खुली किताब है जाना पयाम आँखों का"। ऐसा प्रतीत होता है कि इस फ़िल्म के निर्माता ने ख़य्याम साहब और नक़्श साहब के सामने शर्त रख दी होगी कि उन्हें ’उमरावजान’ जैसी कोई मुजरा ग़ज़ल चाहिए। तभी इस एक ग़ज़ल में दोनों ने मिल कर "दिल चीज़ क्या है..." के संगीत और "इन आँखों की मस्ती के..." के बोलों को एकाकार कर दिया है। कुल मिला कर एक अच्छी ग़ज़ल है।

शंकर-जयकिशन के स्वरबद्ध गीतों में मुजरा शैली के गीत ज़्यादा सुनने को नहीं मिलते। जयकिशन की मृत्यु के बाद शंकर अकेले ही संगीत देते चले जा रहे थे ’शंकर-जयकिशन’ के ही नाम से। 1982 में उन्होंने ’ईंट का जवाब पत्थर’ फ़िल्म में संगीत दिया जिसके गीत नक़्श ल्यालपुरी ने लिखे। इस फ़िल्म में दो मुजरे थे आशा भोसले की आवाज़ में। पहला मुजरा था "सौ बार कहा दिल ने एक बार इधर देखो, तुम हमको मुहब्बत से बस एक नज़र देखो"। कोठे पर जो लड़कियाँ मुजरा करती हैं, वो भले अपने चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा पहनी रहती हों, पर हक़ीक़त कुछ और ही है। उनके दिल में भी किसी का सच्चा प्यार पाने की प्यास होती है। हर रोज़ उसे न जाने कितने ही नज़रें देखा करती हैं, पर सच्चा प्यार कोई नहीं करता। नक़्श साहब ने एक मुजरे वाली के इसी दर्द, इसी दिली ख़्वाहिश को इस मुजरे में बयाँ की है। "ज़ुल्फ़ों में बसी ख़ुशबू आँखों में हया आई, आईना जहाँ देखा कहने लगी अंगड़ाई, महबूब से मिलना है कुछ और सँवर देखो, सौ बार कहा दिल ने..."। नक़्श साहब के लिखे गीतों का असर महफ़िल को लहराने पर मजबूर करती है, ठीक वैसे ही जैसा कि उन्होंने ने ही इस मुजरे में लिखा है - "जादू सा जगाया है घुंघरू की सदाओं ने, मधोश किया है सब आँचल की हवाओं ने, लहराने लगी महफ़िल नग़मों का असर देखो, सौ बार कहा दिल ने..."। एक सच्चे प्रेमी पर वो अपना सब कुछ निसार कर सकती है, इस भावना को तीसरे अन्तरे में उजागर किया गया है - "इस दिल में तमन्ना है जाँ तुमपे लुटाने की, कीमत है बहुत अपनी नज़रों में ज़माने की, बेमोल ही बिक जायें तुम हँसके अगर देखो, सौ बार कहा दिल ने..."। इस फ़िल्म का दूसरा मुजरा है "हम दर्द-ए-मोहब्बत की दिल को न सज़ा देते, तुम इतनी सितमगर हो पहले ही बता देते"। प्यार में धोखा खाने के बाद टूटा हुआ दिल लेकर नायिका कोठे पर मुजरा करती है और अपने दिल का हाल बयाँ करती है। नक़्श साहब ने इसे ग़ज़ल के रूप में पेश किया है। शंकर-जयकिशन के आकर्षक संगीत में पिरोयी हुई यह ग़ज़ल दिल को छू जाती है। बाक़ी के शेर हैं - "जब जश्न की महफ़िल को रंगीन बनाना था, फूलों की जगह अपनी ज़ख़्मों को सजा देते"; "अच्छा ही किया तुमने ख़ुद तोड़ दिया रिश्ता, तुम हमको सिवा ग़म के देते भी तो क्या देते"; "शामिल न मगर होते हम तेरी गुनाहों में, परदा तेरे चेहरे से महफ़िल में उठा देते"।

1986 की फ़िल्म ’काला सूरज’ में बप्पी लाहिड़ी का संगीत था। अधिकांश गीत शैली शैलेन्द्र ने लिखे, एक गीत कुलवन्त जानी और एक गीत नक्श ल्यालपुरी ने लिखे। नक़्श साहब का लिखा गीत एक क़व्वाली है जिसे नरेन्द्र चंचल और साथियों ने गाया है। एक पुरुष क़व्वाली होते हुए भी इसका मुजरे से संबंध है क्योंकि क़व्वाली के सामने मध्यएशियाई शैली में दो नर्तकी नृत्य करती हुईं दिखाई दे रही हैं जो वहाँ मौजूद दर्शकों व श्रोताओं का मन मोह रही है, ठीक वैसे जैसे एक मुजरेवाली करती है। और क़व्वाली का भाव भी मुजरे वाले अंदाज़ का ही है। शुरुआती पंक्तियाँ हैं "मेरी इल्तेजा है साक़ी तू पिला नज़र मिला के, मेरी प्यास बढ़ गई है तेरी अंजुमन में आके, आँखों की सारी मस्तियाँ मय में मेरी निचोड़ दे", और फिर क़व्वाली का मुखड़ा है "दो घूंट पिला दे साक़िया, बाकी मेरे ते रोड़ दे"। पूरी क़व्वाली में शराब और शबाब की बातें जारी रहती है। 1987 की फ़िल्म ’जागो हुआ सवेरा’ में संगीतकार सोनिक-ओमी के निर्देशन में अनुराधा पौडवाल का गाया एक मुजरा था "देख पतली कमरिया मचल गयो सैंया, मैंने डाली नजरिया फ़िसल गयो सैंया"। 80 के ही दशक में नक़्श ल्यालपुरी ने संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के साथ एक फ़िल्म में काम किया था जिसका शीर्षक था ’माँग सजा दो मेरी’। फ़िल्म रिलीज़ भी हुई थी पर हैरत उर अफ़सोस की बात यह कि आज इस फ़िल्म के डिटेल्स न किसी डेटाबेस में मिलता है और ना ही इसके गानें यू-ट्युब पर उपलब्ध हैं। खोज बीन करने पर फ़िल्म के गीतों के मुखड़े तो पता चले पर कलाकारों के नामों का कुछ पता न चल सका। इसी फ़िल्म में नक़्श साहब ने एक मुजरा लिखा था जिसके बारे में उन्हीं की ज़बानी पढ़िए - "’माँग सजा दो मेरी’ में एक लाइन थी "सर-ए-अंजुमन मेरा हाथ थाम लेना, ज़रा सोच क्या कहेगा ज़माना", लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने कहा कि यह जो ’सर-ए-अंजुमन’ लफ़्ज़ है, यह बहुत भारी है और मुझे इसे किसी और लफ़्ज़ से रिप्लेस कर देना चाहिए। इसलिए मैंने दो तीन और शेर लिखे और रेकॉर्डिंग् के स्टुडियो में पहुचा। मैंने अपने लिखे नए शेर उनको सुनाए। तब उन लोगों ने कहा कि गाते गाते इस तरह रवाँ हो गया है कि वो ख़ुद ही इसे रिप्लेस करना नहीं चाहते।"

90 के दशक में नक़्श साहब का लिखा कोई फ़िल्मी मुजरा नहीं आया। पर 1998 में ’Asha & Khayyam' ऐल्बम के लिए उन्होंने एक ख़ूबसूरत मुजरा लिखा। ग़ज़ल का मुखड़ा "लोग मुझे पागल कहते हैं गलियों में बाज़ारों में, मैंने प्यार किया मुझको चुनवा दो दीवारों में"। इस मुजरे में नायिका जैसे निडर हो कर अपने प्यार का इज़हार कर रही है और आगे अपने मशहूर होने की बात करती है, "हर पनघट पर मेरे फ़साने चौबारों में ज़िक्रा मेरा, मेरी ही बातें होती हैं बस्ती में चौबारों में"। दुनिया से कहती है कि न जाने कितने शोलों पर चल कर अपने प्यार की वफ़ा को क़ायम रखा, इसका कुछ तो दाद मिले - "दुनिया वालों कुछ तो मुझको मेरी वफ़ा की दाद मिले, मैंने दिल के फूल खिलाए शोलों में अंगारों में"। आगे नक़्श साहब लिखते हैं - "गीत है या आहों का धुआँ है नग़मा है या दिल की तड़प, इतना दर्द कहाँ से आया साज़ों की झनकारों में"। 2002 में ’शहीद भगत सिंह’ फ़िल्म के लिए जयदेव कुमार के संगीत निर्देशन में उन्होंने फिर एक बार एक मुजरा लिखा। कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में यह मुजरा है "छुप-छुप के ज़माने से महफ़िल में मेरी आना, ये कैसी मोहब्बत है तू कैसा है दीवाना"। सारंगी, सितारे और तबले से एक सुन्दर समा बांधा है जयदेव कुमार ने। साथ ही नक़्श साहब का ग़ज़लनुमा अंदाज़-ए-बयाँ के क्या कहने। इस ग़ज़ल के तमाम शेर इस प्रकार हैं - "कुछ अपनी सुना मुझको कुछ सुन ले मेरे दिल की, तू इतना क़रीब आके क्यों मुझसे है बेगाना"; "सौ बार क़सम खायी सौ बार क़सम तोड़ी, फिर मुझसे कोई वादा करके ना मू कर जाना"; "दुश्मन है मोहब्बत के अपने भी पराये भी, हर बात इशारों में मुमकिन नहीं समझाना"।

साल 2005 में नौशाद के संगीत और नक़्श ल्यालपुरी और सैयद गुलरेज़ के गीतों से सजी फ़िल्म आई थी ’ताज महल’। इस फ़िल्म के लिए भी नक़्श साहब ने एक मुजरा लिखा "इश्क़ की दास्ताँ सारी महफ़िल सुने, इश्क़ दिल में छुपाना ज़रूरी नहीं"। इश्क़ का गुणगान किया गया है इस मुजरे में। कविता कृष्णमूर्ति और प्रीति उत्तम की गाई यह युगल-गीत बेहद ख़ूबसूरत बन पड़ा है। मुजरा, ग़ज़ल और क़व्वाली, तीनों रंग इस रचना में महसूस किए जा सकते हैं। नौशाद और नक़्श साहब ने बेहद ख़ूबसूरत तरीक़े से पूरे गीत को सजाया-सँवारा है। मुखड़े के शेर से पहले शुरुआती शेर है "दिल के अरमानों की शम्मा जलाए बैठे हैं, उनकी तसवीर को दिल में छुपाए बैठे हैं"। पुरानी मशहूर क़व्वाली "ये इश्क़ इश्क़ है" की तरह इसमें भी इश्क़ की ही बातें हैं। "इश्क़ अहसास है, दिल की आवाज़ है, सुन ले सारा ज़माना ज़रूरी नहीं। इश्क़ दिल में रहेगा तो घुट जाएगा, इश्क़ को यूं मिटाना ज़रूरी नहीं। इश्क़ मिटता नहीं है महकता है ये, इश्क़ शोला है दिल में दहकता है ये, सबका दामन जलाना ज़रूरी नहीं। इश्क़ ऐलान है इश्क़ तूफ़ान है, तौबा तौबा ना समझे वो नादान है, आग दिल में दबाना ज़रूरी नहीं। इश्क़ दिल के धड़कने की पहचान है, इश्क़ बेबाक हो जाए बदनाम है, हाल-ए-दिल यूं सुनाना ज़रूरी नहीं।" आख़िर में क़व्वाली के अन्त में जिस तरह से दो पक्षों में लड़ाई होती है, उसी अंदाज़ में जंग होती है - "इश्क़ कोई राज़ नहीं, इश्क़ आवाज़ नहीं, इश्क़ ख़ामोश ना हो, इश्क़ बदनाम ना हो, इश्क़ गुमनाम ना हो, इश्क़ बदनाम ना हो, इश्क़ दुनिया को दिखा ले, उनकी आँखों में छुपा ले, उनके दिल में भी वजह है, खुल के जीने में मज़ा है, अदा है नशा है..."। नक़्श ल्यालपुरी के लिखे इन तमाम मुजरों पे ग़ौर करने के बाद वाक़ई यह अहसास होता है कि जो बात उन्होंने ’विविध भारती’ के उस साक्षात्कार में कही थी, उसमें कितनी सच्चाई थी। आज नक़्श साहब हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके लिखे ये अलग-अलग रंगों के मुजरे नई पीढ़ी के गीतकारों को प्रोत्साहित करते रहेंगे हमेशा कुछ नया करने के लिए। एक ही विषय पर न जाने कितने अलग तरह के गीत लिखे जा सकते हैं यह नक़्श साहब ने हमें सिखाया है।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, May 4, 2017

अपने पडो़सी दिल से भीनी-भीनी भोर की माँग कर बैठे गोटेदार गुलज़ार साहब, आशा जी एवं राग तोड़ी वाले पंचम दा


महफ़िल ए कहकशाँ 22





पंचम, आशा ताई और गुलज़ार 

दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकला एक नगमा 'दिल पडोसी है' एल्बम से| 










मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी



Monday, May 1, 2017

चित्रकथा - 16: विनोद खन्ना की पहली फ़िल्म ’मन का मीत’ की बातें


अंक - 16

विनोद खन्ना की पहली फ़िल्म ’मन का मीत’ की बातें

"हीरो नहीं बन सकते, हाँ, विलेन बनने की कोशिश करना..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


विनोद खन्ना (6 अक्टुबर 1946 - 27 अप्रैल 2017)

27 अप्रैल को फ़िल्म जगत के जानेमाने अभिनेता विनोद खन्ना का 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। चला गया फ़िल्म जगत का एक सदाबहार हीरो और पीछे छोड़ गया न जाने कितनी यादगार फ़िल्में। आज भले हम विनोद खन्ना को नायक के रूप में ही याद करें, पर अपना फ़िल्मी सफ़र उन्होंने बतौर खलनायक शुरु किया था 1969 की फ़िल्म ’मन का मीत’ से। इसके बाद कई फ़िल्मों में वो समय समय पर खलनायक की भूमिका में नज़र आते रहे हैं। आइए आज ’चित्रकथा’ में बात करें उनकी पहली फ़िल्म ’मन का मीत’ की और ग़ौर करें इस फ़िल्म में उनकी बतौर खलनायक अदाकारी की। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है विनोद खन्ना की पुण्य स्मृति को।




1969 की फ़िल्म ’मन का मीत’ का निर्माण किया था अभिनेता सुनिल दत्त ने अपनी ’अजन्ता आर्ट्स’ के बैनर तले। इस फ़िल्म का निर्माण उन्होंने अपने छोटे भाई सोम दत्त को लौन्च करने के लिए किया था। और इसी फ़िल्म में उन्होंने विनोद खन्ना को भी उनका पहला ब्रेक दिया। नायक की भूमिका में सोम दत्त तो सफल नहीं रहे, पर खलनायक की भूमिका में नज़र आने वाले विनोद खन्ना आगे चल कर एक सफल नायक ज़रूर बन गए। ’मन का मीत’ के निर्देशक थे ए. सुब्बा राव, संगीतकार थे रवि और गीतकार थे राजेन्द्र कृष्ण (राजिन्दर कृषण)। सोम दत्त और विनोद खन्ना के अलावा फ़िल्म के अन्य मुख्य कलाकार थे लीना चन्दावरकर, ओम प्रकाश, राजेन्द्र नाथ और जीवन। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि यह लीना चन्दावरकर की भी पहली फ़िल्म थी बतौर नायिका। इस तरह से तीन तीन मुख्य कलाकारों का फ़िल्मी सफ़र इस फ़िल्म से शुरु हुआ। यह फ़िल्म ज़्यादा नहीं चली और ना ही इस फ़िल्म के नायक सोम दत्त का करीयर चल पाया। पर विनोद खन्ना और लीना चन्दावरकर की गाड़ी चल निकली। फ़िल्म की कहानी टी. एन. बाली ने लिखी। यह एक आकर्षक और मज़ेदार फ़िल्मी कहानी थी जो एक हिट फ़ॉरमुला फ़िल्म की कहानी थी। शूटिंग् भी दार्जिलिंग् की ख़ूबसूरत वादियों में की गई। फ़िल्म के निर्देशक ए. सुब्बा राव पिछले ही साल ’मिलन’ जैसी सफल फ़िल्म सुनिल दत्त को दे चुके थे, इसलिए इस फ़िल्म में भी उनसे उम्मीदें बहुत ज़्यादा थीं। लेकिन ’मन का मीत’ नहीं चली। रवि और राजेन्द्र कृष्ण भी गीत-संगीत में कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा सके जिसके बलबूते फ़िल्म चल पड़ती। आज यह फ़िल्म सिर्फ़ इस बात के लिए याद की जाती है कि यह विनोद खन्ना की पहली अभिनीत फ़िल्म थी।

फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी है कि लाला बलवन्त राय (ओम प्रकाश) कल्कत्ता स्थित एक बहुत बड़े व्यवसायी हैं जिनका दार्जिलिंग् में भी बहुत बड़ा कारोबार है जिसकी देख रेख उनकी भतीजी करती है। लाला जी की लाडली पोती आरती (लीना चन्दावरकर) दार्जिलिंग् की एक कॉलेज में पढ़ाई कर रही है। आरती के माँ-बाप इस दुनिया में नहीं हैं। इसलिए वो अपने नानाजी के बहुत क़रीब है। एक बार छुट्टियों में दार्जिलिंग् से कलकत्ता जाते समय वो अपनी सहेलियों के साथ रेल के लेडीज़ कम्पार्टमेण्ट में बैठ जाती है। ट्रेन जैसे ही चलने लगती है तभी उस लेडीज़ कम्पार्टमेण्ट में दार्जिलिंग् का एक देहाती किस्म का लड़का सोमू (सोम दत्त) ग़लती से चढ़ जाता है। आरती और उसकी सहेलियाँ सोमू को सीधा-सादा भोला-भाला देख कर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। बात आई-गई हो जाती है, आरती कलकत्ता पहुँचती है, अपनी सहेली सुषमा (संध्या रानी) को भी साथ ले आती है। स्टेशन से दोनों को पिक करके ले आते हैं फ़िल्म के खलनायक प्राण (विनोद खन्ना)। प्राण रिश्ते में लालाजी की बेटी का देवर है और इसलिए उनके घर उसका आना-जाना लगा रहता है। लाला जी को भी प्राण पसन्द है लेकिन प्राण के मन में आरती से शादी करके उसकी जायदाद को हड़पने का सपना है, इसलिए वो आरती को हर वक़्त इम्प्रेस करने की कोशिशें करता है, लेकिन आरती को वो बिल्कुल पसन्द नहीं। आरती हँसी मज़ाक में प्राण से दूर बच निकलती है। एक सीन में प्राण सिनेमा की तीन टिकटें ख़रीद लाता है ताकि वो आरती और सुषमा को अपने साथ सिनेमा दिखाने ले जा सके, पर आरती साफ़ मना कर देती है।

उधर लाला जी को आरती की शादी की चिन्ता सताने लगती है। वो उसके लिए दो लड़कों का रिश्ता लेकर आरती को उनमें से एक को चुनने की गुज़ारिश करते हैं। पर आरती बिना जाँच-पड़ताल किए किसी से भी शादी करने से साफ़ इनकार कर देती है। तब आरती अपने चचेरे भाई मुरली (राजेन्द्र नाथ), जो एक वकील है, की मदद से भेस बदलकर उन दो लड़कों की असलीयत का पता लगाती है और यह बात साबित हो जाती है कि वो दोनों लालची एवं चरित्रहीन हैं। जब यह ख़बर सुनाने आरती, सुषमा और मुरली घर वापस आते हैं तो पता चलता है कि लाला जी अपने मैनेजर के साथ दार्जिलिंग् चले गए हैं किसी ज़रूरी काम से। शाम को घर पर पार्टी चल रही है, प्राण आरती के साथ डान्स कर रहा है। नृत्य करते हुए यहाँ एक बड़ा मज़ेदार संवाद है दोनों के बीच में। 

प्राण - "आरती, शायद मैं तुम्हारा पार्टनर बनने के लिए ही पैदा हुआ था।"
आरती - "लेकिन न मुझे तुम्हारे पैदा होने की ख़ुशी है, ना मरने का ग़म होगा।"
प्राण - "बड़ी संगदिल हो, ऐसी भी मुझसे नफ़रत क्या!"
आरती - "लेकिन तुम में ऐसी कौन सी बात है जिससे मोहब्बत की जा सके?"
प्राण - "क्यों, क्या कमी है मुझमें? पढ़ा लिखा हूँ, नौजवान हूँ"
आरती - "जो कहते हो सच कहते हो, लेकिन उँ-हुँ, हीरो नहीं बन सकते। हाँ, विलेन बनने की कोशिश करना।"
प्राण - "वह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा!!"

उस समय भले यह संवाद फ़िल्म की कहानी के हिसाब से लिखी गई हो, पर संयोग की बात देखिए कि यह संवाद विनोद खन्ना के जीवन में किस क़दर सच साबित हुई। विलेन के रूप में इस फ़िल्म में क़दम रखने बाद वो आगे चल कर नायक बने, और एक सफल नायक बने। आने वाले वक़्त ने सचमुच यह बता दिया।

ख़ैर, फ़िल्म की कहानी पर वापस आते हैं। पार्टी चल ही रही थी कि दार्जिलिंग् से ट्रंक-कॉल आती है कि लाला जी को दिल का दौरा पड़ गया। आरती, सुषमा और प्राण अपने फ़ैमिली डॉक्टर को साथ में लेकर दार्जिलिंग् के लिए निकल पड़ते हैं। वहाँ पहुँचने के बाद लाला जी आरती को बताते हैं कि उनके रिश्तेदारों ने उन्हें धोखा दिया और पैसों और ज़मीन-जायदाद की हेरा-फेरी की है, उनकी सगी बेटी और भतीजी भी इसमें शामिल है। इन सब से उन्हें बेहद गहरा सदमा पहुँचा है। लाला जी को अब आरती की शादी की चिन्ता और ज़्यादा सताने लगती है। वो चाहते हैं कि इससे पहले उन्हें कुछ हो जाए, आरती के हाथ पीले हो जाने चाहिए। वो यह भी कहते हैं कि प्राण भी अच्छा लड़का है, वो उससे ही क्यों न शादी कर ले? आरती को प्राण से बचने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता देख वो यह झूठ बोल देती है कि उसे किसी दूसरे लड़के से प्यार है। यह सुन कर लाला जी राहत की साँस लेते हैं और आरती से उस लड़के को तुरन्त मिलवाने को कहते हैं। आरती और सुषमा "उस" लड़के की तलाश में निकल पड़ते हैं। क़िस्मत उनका साथ देती है और सड़क पर उन्हें वही सोमू मिल जाता है जिसकी उन लोगों ने ट्रेन में मज़ाक उड़ाया था। सोनू से मदद माँगने पर इस बार सोमू पहले तो मना कर देता है, लेकिन घर आकर जब अपनी माँ से सुनता है कि किसी झूठ से अगर किसी का भला हो रहा हो तो ऐसी झूठ में कोई ग़लती नहीं है, तब जा कर वो आरती की मदद करने को मान जाता है। आरती सोमू को सूट-बूट पहना कर एक अमीर घर का लड़के के रूप में लाला जी के सामने पेश करती है। उसके आचार-व्यवहार को देख कर लाला जी बहुत ख़ुश होते हैं और उसके साथ आरती की शादी के लिए हाँ कह देते हैं। 

उधर प्राण, जो ख़ुद आरती से शादी करना चाहता है, उसे सोमू पसन्द नहीं आता और एक दिन सोमू को दूर ले जाकर उसकी पिटाई शुरु कर देता है। सोमू भी उससे लड़ पड़ता है। काफ़ी देर तक मारपीट करने के बाद जब वहाँ आरती और सुषमा आ पहूँचते हैं, तब प्राण यह कह कर बच निकलता है कि वो सोमू की परीक्षा ले रहा था कि क्या वो आरती की रक्षा करने की ताक़त रखता भी है। उधर सोमू के इतने दिन अपने घर वापस ना लौटने से उसकी माँ को चिन्ता होती है और वो सोमू के दोस्त को लाला जी के घर भेजती है पता करने के लिए कि सोमू कब वापस आएगा। दरवाज़े पर प्राण उसे मिल जाता है और बातों ही बातों में प्राण को सोमू की असलियत का पता चल जाता है। प्राण उसे वापस भेज देता है यह कह कर कि सोमू अभी घर पर नहीं है। अगले दिन आरती और सोमू की सगाई की रस्म की पार्टी अरेंज होती है। वहाँ पर नाच-गाना चल ही रहा है कि सोमू की माँ उसे ढूंढ़ती हुई वहाँ आ पहुँचती है। आरती सोमू को बात को सम्भालने की गुज़ारिश करती है, और सबके सामने कह देती है कि वह एक पागल बुढ़िया है जो हर किसी को अपना बेटा समझ लेती है। सोमू भी उसे अपनी माँ कहने से इनकार कर देता है। सोमू की माँ को सदमा पहुँचता है और वो वहाँ से चली जाती है। पार्टी के बाद सोमू आरती से साफ़ कह देता है कि अब वो यह नाटक और नहीं क सकता, न जाने उसकी माँ के मन की क्या हालत हुई होगी। उधर प्राण भी सोमू की सारी असलियत लाला जी को बता देते हैं। लाला जी सोमू को बेइज़्ज़त कर घर से निकल जाने को कहते हैं और आरती पर भी गुस्सा करते हैं। सोमू भागता हुआ घर पहुँचता है तो पता चलता है कि उसकी माँ खेत में काम करने गई है। उसकी ग़ैर मौजूदगी में उसकी माँ को खेतों में कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। सोमू खेत में जा कर अपनी माँ को ज़मीन पर पड़ी देखता है। उसकी माँ गुज़र चुकी है।

आरती सोमू के पास जाकर उसकी माँ की मृत्यु पर शोक व्यक्त करती है और उससे माफ़ी माँगती है, पर सोमू उसे उसकी माँ का क़ातिल करार देकर वापस चले जाने को कहता है। घर लौटने पर लाला जी उस पर ग़ुस्सा करते हैं, आरती भी सोमू की माँ के मौत का ज़िम्मेदार ख़ुद को और लाला जी को ठहराती है। वहाँ पर मौजूद प्राण लाला जी की हौसला अफ़ज़ाई करता है। प्राण सोमू के घर जाता है और उसके हाथ में ढेर सारे रुपये देकर कहता है कि ये सब लाला जी ने भेजा है उसके लिए ताकि वो दूर कहीं जा कर एक नई ज़िन्दगी शुरु करे। सोमू वो रुपये प्राण के मुंह पर फेंक देता है। प्राण ग़ुस्सा नहीं होता और एक और चाल चलता है। सोमू को शराब पिला कर लाला जी और आरती के सामने पेश कर देता है। आरती भागती हुई सोमू को पीछे जाती है और एक ऐक्सिडेण्ट का शिकार हो जाती है। सोमू आरती को अस्पताल ले जाता है। लाला जी को ख़बर भेजी जाती है। लाला जी जैसे ही अस्पताल के केबिन में दाख़िल होने ही जाते हैं तो उन्हें सोमू और आरती के बीच हो रही बातचीत सुनाई देती है। लाला जी को पता चल जाता है कि सोमू वाकई एक अच्छा लड़का है। आरती के मन में भी सोमू के लिए प्यार उत्पन्न हो चुका है। लाला जी सोमू को आरती से शादी कर लेने की गुज़ारिश करते हैं। आरती सुन कर ख़ुश हो जाती है। पर सोमू शादी से इनकार कर देता है यह कहते हुए कि दोनों के बीच में अमीरी-ग़रीबी का एक बहुत बड़ा फ़ासला है। तब लाला जी यह ऐलान कर देते हैं कि वो अपनी पूरी जायदाद दान में किसी संस्था को दे देंगे और वो भी सोमू की तरह ग़रीब हो जाएँगे। 

उधर सारी जायदाद अपने हाथों से फ़िसलता देख प्राण सहित सारे रिश्तेदारों में खलबली मच जाती है और सारे मिल कर लाला जी को पागल सिद्ध करने की योजना बनाते हैं। यहाँ तक कि लाला जी के फ़ैमिली डॉक्टर को मार डालने की धमकी देकर उनसे वकील के सामने कहलवा देते हैं कि लाला जी का दिमाग़ी संतुलन ठीक नहीं है। लाला जी अपनी जायदाद का फ़ैसला नहीं ले पाते। वकील के जाने के बाद प्राण लाला जी को एक कमरे में ले जाता है और उन्हें कमरे में बन्द कर देता है। यह सब कुछ आरती और सोमू की ग़ैर-मौजूदगी में होता है। जब आरती और सोमू लौटते हैं, तब लाला जी को अजीब-ओ-ग़रीब हरकतें करते देखते हैं और उन्हें भी ऐसा लगने लगता है कि सच में लाला जी की दिमाग़ी हालत ठीक नहीं है। प्राण भी आरती को लाला जी के बारे में झूठी बातें बताता है जिससे आरती निश्चित हो जाती है कि लाला जी सच में पागल हो गए हैं। उधर प्राण लाला जी को जाकर कहता है कि आरती उससे शादी करने के लिए तैयार हो गई है और कल ही वो दोनों शादी कर रहे हैं। लाला जी को प्राण के मनसूबों का अहसास होता है और वो प्राण से कहते हैं कि वो अभी जा कर आरती को सब सच्चाई बता देंगे। प्राण अपना रीवॉल्वर निकालता है और लाला जी की तरफ़ निशाना साधता है। पर लाला जी चालाकी से रीवॉल्वर हथिया लेते हैं और प्राण पर गोली चला देते हैं। प्राण ज़मीन पर गिर पड़ता है। लाला जी को अपनी ग़लती का अहसास होता है और "मैं ख़ून कर डाला" चिल्लाते हुए आरती की तरफ़ भागते हैं। पुलिस को फ़ोन कर अपना जुर्म क़बूल कर लेते हैं। घर पर पुलिस आते हैं, लेकिन उन्हें वहाँ ना तो किसी की लाश दिखाई देती और ना ही कोई रीवॉल्वर। सब यही सोचते हैं कि लाला जी पागल हो चुके हैं। तभी प्राण वहाँ हाज़िर होता है तो सब चौंक पड़ते हैं। घरवालों के साथ-साथ पुलिस भी यह यकीन कर लेती है कि लाला जी पागल हो चुके हैं।

सारे रिश्तेदार आरती को समझाते हैं कि अगर वो प्राण से शादी कर ले तो लाला जी का पागलपन दूर हो जाएगा। आरती अपनी दादा जी के लिए यह क़ुर्बानी देने के लिए तैयार हो जाती है। सुषमा आरती को समझाने की कोशिश करती है पर आरती नहीं मानती। तब सुषमा मुरली के पास जाकर सब बातें बताती है। मुरली को शक़ होता है प्राण पर, और उसे लगता है कि दाल में कुछ काला है। उधर आरती सोमू की माँ की समाधि पर जाकर रोते हुए कहती है, "माँ जी, मैं आपकी गुनेहगार हूँ, आपकी जान मेरे कारन गई, आपके मासूम बेटे के दिल से मैंने खेला, यह तो भगवान ही जानता है कि आपका बेटा मेरे लिए क्या है, वो इस धरती पर मेरा भगवान है, मेरे जीवन का मालिक है, उसके बग़ैर यह दुनिया मेरे लिए नर्क है, लेकिन जीतेजी हम एक दूसरे के नहीं हो सकते क्योंकि मैं दोषी हूँ, उसी की यह सज़ा मुझे मिल रही है"। सोमू आरती को यह सब कहते सुन लेता है और उसे पहचान भी लेता है। वहाँ मुरली और सुषमा भी आ पहुँचते हैं और लाला जी की हालत के बारे में बताते हैं। मुरली आरती को हक़ीक़त समझाने की कोशिश करता है। दूसरी तरफ़ प्राण डॉक्टर को डरा कर कहते हैं कि वो लाला जी का ख़ून कर दे और इसे एक ख़ुद्कुशी का जामा पहना दे। डॉक्टर ऐसा करने से मना कर देते हैं तो प्राण डॉक्टर का ख़ून कर देता है। प्राण उनकी लाश को ठिकाने लगा ही रहा होता है कि वहाँ मुरली आ पहुँचता है और ज़मीन पर स्टेथोस्कोप और चश्मा पड़ा देखता है। लाला जी के बारे में पूछने पर प्राण बताता है कि वो पागलख़ाने में हैं। मुरली चला जाता है। रात को जब वो लोग डॉक्टर की लाश को कब्रिस्तान में ठिकाने लगाने आते हैं तब मुरली, आरती और सुषमा मिल कर उन्हें भूत बन कर डराते हैं। उधर सोमू लाला जी के कमरे में घुस कर उन्हें वहाँ से भगा ले जाने के लिए आता है, पर उसे वहाँ लाला जी नहीं बल्कि प्राण के गुंडे मिलते हैं। ख़ूब मारपीट होती है और जल्दी ही सोमू उन गुंडों को काबू में कर लेता है और लाला जी कहाँ यह यह उनसे बुलवाने पर मजबूर कर देता है। उधर कब्रिस्तान में लाला जी के सारे रिश्तेदार गड्ढ़ा खोद रहे होते हैं कि डॉक्टर की लाश के कॉफ़िन से धुआँ निकलने लगता है। कॉफ़िन का ढक्कन खोलते ही धुएँ के साथ-साथ भूत के भेस में मुरली निकलता है और "लाला जी कहाँ हैं, लाला जी कहाँ हैं" कह कर सबको डराता है और सभी को अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। दूसरी तरफ़ प्राण आरती को बन्दी बना कर वहाँ ले आता है जहाँ उसने लाला जी को क़ैद कर के रखा हुआ है। उसने वहाँ आरती से शादी करने की पूरी तैयारी कर रखी है। लाला जी इस शादी से इनकार कर देते हैं तो प्राण उन पर रीवॉल्वर दागता है। गोली चलाने ही वाला है कि सोमू वहाँ पहुँच कर प्राण पर टूट पड़ता है। दोनों में मारपीट होती है। लेकिन प्राण सोमू पर गोली चला देता है। तभी वहाँ पुलिस आती है और प्राण को गिरफ़्तार कर लेती है। आरती और लाला जी सोमू की लाश पर आँसू बहा रहे होते हैं कि तभी सोमू उठ कर खड़ा हो जाता है। मुरली प्राण के हाथ से रीवॉल्वर लेते हुए कहता है कि यह वही नकली रीवॉल्वर है जिससे उसने लाला जी के हाथों अपना क़त्ल करवाया था और दुनिया की आँखों में धूल झोंकी थी कि लाला जी पागल हो गए हैं। पुलिस प्राण और सारे रिश्तेदारों को ले जाती है। सोमू और आरती की शादी सम्पन्न होती है।

यहाँ आकर ’मन का मीत’ फ़िल्म पूरी होती है और फ़िल्म का एक सुखद अन्त होता है। फ़िल्म को देखते हुए यह विचार मन में उत्पन्न होता है कि फ़िल्म की कहानी, पटकथा और निर्देशन में कोई कमी नहीं थी, फिर फ़िल्म के ना चलने का क्या कारण था? सम्भवत: नायक की भूमिका में सोम दत्त उतने आकर्षक नहीं लगे और फ़िल्म का गीत-संगीत भी ठंडा था। अगर फ़िल्म में दो चार सुपरहिट गीत होते तो शायद वो फ़िल्म को डूबने से बचा लेते। ख़ैर, फ़िल्म में ओम प्रकाश, राजेन्द्र नाथ, लीना चन्दावरकर और विनोद खन्ना की अदाकारी ख़ूब रही, और इसमें कोई शक़ नहीं है कि फ़िल्म के नायक से ज़्यादा खलनायक आकर्षक लगे। निस्संदेह जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी, तभी लोग यह समझ गए होंगे कि विनोद खन्ना एक लम्बी पारी खेलने के लिए ही फ़िल्म जगत में आए हैं। विनोद खन्ना के इतने सारे हिट फ़िल्मों के होने के बावजूद हमने ’मन का मीत’ फ़िल्म की बातें की क्योंकि यही वह फ़िल्म थी जहाँ से विनोद खन्ना की शुरुआत हुई थी। आज विनोद खन्ना हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन यह फ़िल्म ’मन का मीत’ हमेशा उनकी पहली फ़िल्म के रूप में याद रखी जाएगी। उनके साथ-साथ यह फ़िल्म भी यादगार बन चुकी है।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, April 22, 2017

चित्रकथा - 15: नक़्श लायलपुरी के लिखे 60 मुजरे (भाग - 1)


अंक - 15

नक़्श लायलपुरी के लिखे 60 मुजरे - भाग 1

"भरोसा कर लिया जिस पर, उसी ने हमको लूटा है..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



एक बार ’विविध भारती’ के एक साक्षात्कार में गीतकार नक़्श लायलपुरी साहब ने फ़रमाया था कि उन्होंने क़रीब 60 मुजरे लिखे हैं जो कि अलग-अलग रंग, अलग-अलग मिज़ाज के हैं। उन्होंने श्रोताओं से इन्हें सुनने का भी सुझाव दिया था। यह बात मेरे अवचेतन मन में बरसों से चली आ रही थी। हाल ही में नक़्श साहब की मृत्यु के बाद यह बात फिर से मुझे याद आ गई और मैंने यह निर्णय लिया कि उनके सुझाये इन 60 मुजरों को खोज निकालना ज़रूरी है। जुट गया शोध पर। और इसी शोध का नतीजा है आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक। मेरी तरफ़ से यह नक़्श साहब को श्रद्धांजलि है। मैं इसमें कितना कामयाब हुआ हूँ, इसका फ़ैसला आप लेंगे। आज प्रस्तुत है इस लेख का पहला भाग।




ह आज से दस साल पहले, वर्ष 2006, की बात होगी जब ’विविध भारती’ के ’उजाले उनकी यादों के’ में नक़्श लायलपुरी साहब तशरीफ़ लाए थे। बातों बातों में उन्होंने कमल शर्मा जी से कहा था - "मैंने क़रीब 60 मुजरे लिखे हैं। अगर कभी हो सके तो पेशेन्स के साथ उन्हें सुनिएगा। आपको 60 अलग फ़्लेवर और 60 अलग रंग मिलेंगे उनमें।" उस दिन मेरे मन में यह ख़याल आया था कि काश नक़्श साहब के इस सुझाव पर अमल किया जा सकता! दिन निकलते चले गए, पर यह बात मेरे अवचेतन मन में दर्ज हो चुकी थी। कई बार सोचा कि मैं ख़ुद ही इस पर शोध करूँ और ढूंढ़ निकालूँ नक़्श साहब के लिखे सभी मुजरों को। पर किसी न किसी वजह से संभव नहीं हो सका। वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता। नक़्श साहब हाल ही में दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ चले गए अपने अख़िरी सफ़र पर। उनके जाने के बाद वह पुराना ख़याल फिर एक बार मेरे दिल में मचल उठा है। आइए ज़रा नज़दीक से नज़र डालें नक़्श लायलपुरी साहब के लिखे तमाम मुजरा शैली के गीतों पर।

नक़्श लायलपुरी ने फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा था 1952 में फ़िल्म ’जग्गु’ में केवल एक गीत लिख कर। ग़ौर तलब बात यह है कि यह एक गीत मुजरा शैली का ही गीत था। हंसराज बहल के संगीत में आशा भोसले का गाया यह गीत है "अगर तेरी आँखों से आँखें मिला दूँ, मैं क़िस्मत जगा दूँ, मुक़द्दर बना दूँ"। गीत के संगीत में पारम्परिक मुजरा संगीत की झलक ना होकर मध्यएशियाई संगीत की झलक मिलती है। "निगाहें बदल दूँ, निशाना बदल दूँ, जो चाहूँ तो सारा ज़माना बदल दूँ, मोहब्बत की राह पर चलना सिखा दूँ, मैं क़िस्मत जगा दूँ..." और "है जिनकी जवानी उन्हीं का ज़माना, जो चाहे अगर मेरी दुनिया में आना, ज़मीं तो ज़मीं आसमाँ पे बिठा दूँ, मैं क़िस्मत जगा दूँ..." जैसे बोल इसे मुजरा शैली का गीत बनाता है शब्द और भाव की दृष्टि से। नक़्श साहब की दूसरी फ़िल्म ’घमंड’ जो 1955 में आई थी, उसमें भी एक मुजरा गीत था। राजकुमारी की आवाज़ में गुल्शन सूफ़ी की यह रचना एक मुजरा गीत था जिसके बोल थे "जब से उलझे नैन मुझे दिन रैन नहीं है चैन, सजनवा नैनों की गली में आजा, ओ मोरे राजा"। पिछले गीत में जहाँ नायिका नायक को अपनी ओर आकर्षित करती हुई ख़ुद की बढ़ाई कर रही है, वहीं दूसरी तरफ़ ’घमंड’ फ़िल्म के इस मुजरे में नायिका अपने नायक को उसके पास आने की ग़ुज़ारिश कर रही है। इस तरह से ये दोनों गीत बिल्कुल अलग रंग के होते हुए भी एक ही अंजाम की तरफ़ बढ़ रहे हैं।

1958 में एक फ़िल्म आई थी ’अजी बस शुक्रिया’ जिसमें रोशन का संगीत था और गीत लिखे फ़ारुख़ क़ैसर ने। लेकिन नक़्श साहब के दो मुखड़े इस फ़िल्म के लिए लिए गए जिनमें से एक मुजरा था। क़िस्सा आख़िर क्या था, जानिए नक़्श साहब की ज़ुबानी - "मैं रोशन साहब के साथ सिर्फ़ एक ही फ़िल्म कर सका। एक और फ़िल्म थी जिसमें मेरे लिखे दो मुखड़े इस्तमाल किए गए। दरसल क्या हुआ कि मेरे दो मुखड़े रोशन साहब के पास पड़े हुए थे। वो उन्हें ’अजी बस शुक्रिया’ में इस्तमाल करना चाहते थे। लेकिन फ़िल्म के डिरेक्टर मोहम्मद हुसैन चाहते थे कि फ़ारुख़ क़ैसर फ़िल्म के गीत लिखे। रोशन और फ़ारुख़ क़ैसर कई बार सिटिंग् की पर फ़ारुख़ साहब जो कुछ लिख रहे थे वो सब रोशन साहब को पसन्द नहीं आ रही थी। एक दिन रोशन साहब मेरे पास आए और कहने लगे कि वो वह फ़िल्म छोड़ रहे हैं क्योंकि वो गीतों के बोलों से ख़ुश नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें मेरे लिखे दो मुखड़े पसन्द है और वो उनका इस्तमाल करना चाहते हैं। मैंने ख़ुशी ख़ुशी वो मुखड़े उन्हें दे दिए और फ़ारुख़ क़ैसर ने उनके अन्तरे लिखे। कुछ दिनों बाद मुझे दो वाउचर मिले 250 रुपये प्रति मुखड़ा। इन दो गीतों में एक मुजरा था "बेदर्दी नज़रें मिला के कहदे क्या है तेरी मर्ज़ी" और दूसरा गीत था "सारी सारी रात तेरी याद सताये"। मीनू मुमताज़ पर फ़िल्माया गया यह मुजरा काफ़ी हिट हुआ था पर इस मुजरे के गीतकार के रूप में फ़ारुख़ क़ैसर का नाम ही जुड़ा हुआ है जबकि पंच लाइन नक़्श साहब का दिया हुआ है।


इसके अगले ही साल 1959 में स्टण्ट फ़िल्म आई ’सर्कस क्वीन’। मोहम्मद शफ़ी के संगीत में नक़्श साहब का लिखा मुजरा गाया मुबारक बेगम ने। ’जग्गु’ फ़िल्म के गीत की तरह इसे भी एक आधुनिक मुजरा कह सकते हैं जो एक पार्टी में पेश की जा रही है। "ओहो दिल वाले, निगाहें मिला ले, दिल के दामन को रंगी बना ले"। इसकी धुन में भी मध्यएशियाई रंग शामिल है। इस गीत के तीन अन्तरे हैं - "नैन तीखे हैं क़ातिल निगाहें, मेरी फूलों सी नाज़ुक हैं बाहें, चाल बहकी हुई, ज़ुल्फ़ें महकी हुई, मेरे मुखड़े पे झूमे उजाले...", "आ हसीनों की महफ़िल में आके, देख ले दो घड़ी मुस्कुरा के, साज़ दिल का उठा गीत ख़ुशियों के गा, झूम कर ज़िन्दगी का मज़ा ले...", "ज़िन्दगी है सफ़र जीने वाले, हँसते-हँसते गुज़र जीने वाले, होके मस्ती में जी, है यही ज़िन्दगी, कर ना दिल को ग़मों के हवाले..." - पहले दो अन्तरों में नायिका नायक को अपनी तरफ़ आकर्षित कर रही हैं तो तीसरे अन्तरे में आकर्षण के साथ-साथ ज़िन्दगी का फ़ल्सफ़ा भी बता रही है। इस तरह से इस मुजरे में नक़्श साहब ने जीवन-दर्शन का भी समावेश कर दिया है।

एक अरसे के बाद 1968 में नक़्श साहब के लिखे गीतों से सजी फ़िल्म आई ’तेरी तलाश में’ जिसमें सपन-जगमोहन के स्वरबद्ध गीत काफ़ी सराहे गए। इस फ़िल्म में आशा भोसले का गाया एक मुजरा गीत था "राज़-ए-दिल हमसे कहो, हम तो कोई ग़ैर नहीं, यूं परेशाँ ना रहो हम तो कोई ग़ैर नहीं"। अब तक के नक़्श साहब के मुजरों में ख़ुशी का रंग था, पर इस ग़ज़ल में उन्होंने दर्द भर दिया है। ग़ज़ल के बाक़ी दो शेर हैं - "महकी महकी सी ये तन्हाई गिला करती है, ग़ैर तुम भी न रहो हम तो कोई ग़ैर नहीं", और "किसी हमदर्द को कुछ दर्द बटा लेने दो, दर्द तन्हा ना सको हम तो कोई ग़ैर नहीं"। 1972 की फ़िल्म ’बाज़ीगर’ में नक़्श साहब ने दो मुजरे लिखे। एक बार फिर सपन-जगमोहन का संगीत और आशा भोसले की आवाज़। "आज आया है तू मेरा महमान बनके, तुझको जाने ना दूँगी मैं"। गीत का सिचुएशन क़रीब क़रीब ’शोले’ फ़िल्म के "जब तक है जान, जाने-जहाँ मैं नाचूंगी" गीत जैसा ही है। या फिर ’मेरा गाँव मेरा देश’ फ़िल्म के "मार दिया जाए छोड़ दिया जाए" गीत जैसी। दुश्मन के डेरे पर नायिका नाचती हुई यह गीत गा रही है; एक अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं - "तेरे हाल पे रहम ना खाऊँगी, मैं तो खेल के होली तेरे ख़ून से, बरसों की आग बुझाऊंगी, यही है मेरी मर्ज़ी..."। यह गीत पारम्परिक मुजरा जैसा नहीं है, लेकिन इसी फ़िल्म का अन्य गीत "मेरी झूम के नाची जवानी तो घुंघरू टूट गए, मैंने छेड़ी जो दिल की कहानी घुंघरू टूट गए"। आशा भोसले ही की आवाज़ में इस मुजरे को सुनते हुए ख़याल आया कि 80 के दशक में क़तील शिफ़ई का लिखा मशहूर मुजरा "मोहे आई ना जग से लाज, मैं इतना ज़ोर से नाची आज कि घुंघरू टूट गए" में बोलों की समानता है।


1973 में फ़िल्म आई ’प्रभात’ जिसमें मदन मोहन का संगीत था। इसमें नक़्श ल्यालपुरी को गीत लिखने का मौक़ा मिला। नक़्श साहब ने उसी साक्षात्कार में बताया था कि इस फ़िल्म में उन्होंने दो मुजरे लिखे जिन पर बिहार की जनता ने सिनेमाघरों में स्क्रीन पर सिक्के उछाले। लता मंगेशकर की आवाज़ में पहला मुजरा है "भरोसा कर लिया जिस पर, उसी ने हमको लूटा है, कहाँ तक नाम गिनवाएँ सभी ने हमको लूटा है"। ग़ौर करने लायक बात है कि इस मुजरे में नक़्श साहब ने मुजरा करने वाली के दिल के दर्द को उजागर किया है कि उसे हर किसी ने बस लूटा ही है। ’तेरी तलाश में’ फ़िल्म के मुजरे में जिस दर्द की छाया हमने देखी थी वह नायक का दर्द था, जबकि इस मुजरे में नायिका का दर्द छुपा है। एक अन्तरे में नक़्श साहब कहते हैं, "जो लुटते मौत के हाथों तो कोई ग़म नहीं होता, सितम इस बात का है ज़िन्दगी ने हमको लूटा है"। इसी तरह का कुछ उन्होंने ’दिल की राहें’ की ग़ज़ल में भी कहा था, "बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते, ज़िन्दगी बोझ बनी हो तो उठायें कैसे"। ख़ैर, ’प्रभात’ फ़िल्म का एक और मुजरा है "साक़िया क़रीब आ, नज़र मिला"। लता जी की ही आवाज़ में शास्त्रीय संगीत आधारित इस मुजरे को मदन मोहन के अद्‍भुत संगीत ने जितना निखारा है, उतना ही न्याय नक़्श ल्यालपुरी के असरदार बोलों ने किया है। "प्यासी कहीं ना रह जाए मेरे शबाब की रातें, दिल को मेरे न बहला तू करके शराब की बातें, तुझको ख़ुदा का वास्ता शराब ना शराब ना, साक़िया क़रीब आ..." - पहले अन्तरे में नायिका शराब को ना कह रही है तो दूसरे अन्तरे में शराब पिलाने की बात होती है और तीसरे अन्तरे में तो नायिका ख़ुद शराब पीने की बात करती है। वो कहती है, "दिल भी जवाँ है पहलु में तू भी है पास जानेजाँ, ढलने लगी है शोलों में होठों की प्यास जानेजाँ, इतनी सी है इल्तिजा मुझे पीला पीला, साक़िया क़रीब आ..."।

70 के दशक के शुरुआती किसी साल में संगीतकार मदन मोहन के संगीत में नक़्श साहब ने दो मुजरे लिखे थे संभवत: ’रहनुमा’ फ़िल्म के लिए जो बन्द हो गई। लेकिन गाने आशा भोसले की आवाज़ में रेकॉर्ड हो चुके थे। 6 मिनट 38 सेकन्ड्स अवधि का पहला मुजरा था "हम होश लुटा कर महफ़िल में जब उनका नज़ारा कर बैठे, घबरा के उन्हें तन्हाई में मिलने का इशारा कर बैठे"। इस मुजरे में पूरी की पूरी एक कहानी छुपी हुई है। पहले अन्तरे में नक़्श साहब बताते हैं कि किस तरह से उस तवायफ़ को किसी ने अपना हाथ दिया और किस तरह से वो उसके प्यार में पड़ गई। "हाथों में जो उनका हाथ आया, आंखों में नशा सा छाने लगा, सौ बार झुकीं बोझल पलकें, माथे पे पसीना आने लगा, मिलते ही किसी बेगाने से हम वादा वफ़ा का कर बैठे।" दूसरे अन्तरे में दोनों के और ज़्यादा क़रीब आने की बात कही गई है, तन से तन का मेल हुआ, पर जल्द ही तवायफ़ का मोह भंग हुआ। "दिल से दिल की बातें भी हुईं, छुप छुप के मुलाक़ातें भी हुईं, कुछ फूल तमन्ना की महके, रंगीन कई रातें हुईं, इक रोज़ हमें मालूम हुआ हम ख़ून-ए-तमन्ना कर बैठे"। और अन्तिम अन्तरे में तवायफ़ के टूटे दिल के संभल जाने के प्रयास का चित्रण हुआ है। "उल्फ़त की मिली यह हमको सज़ा, हर ग़म को अकेले सहना पड़ा, शिकवे लबों पे आई मगर पत्थर की चुप रहना पड़ा, क्या जाने उन्हें हम क्या समझे जो उनपे भरोसा कर बैठे"। दूसरा मुजरा है "आज की शाम पहलू में तू, तेरा जाम ख़ाली है क्यों?"। संगीत संयोजन को सुन कर अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि यह मदन मोहन की रचना है। सुन कर लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत की याद आ जाती है। "ज़ुल्फ़ की घटा खुली बिखर गई, शाम और भी ज़रा निखर गई, दिल की धड़कनों में रंग आ गया, तू मिला तो ज़िन्दगी सँवर गई, कैसे कहूँ मेरे लिए लायी है क्या आज की शाम..."। 

संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के प्यारेलाल के भाई गणेश के संगीत निर्देशन में 1975 में एक फ़िल्म आई थी ’बदनाम’। इस फ़िल्म में नक़्श ल्यालपुरी ने एक मुजरा लिखा था जिसे आशा भोसले ने गाया - "महफ़िल मेरी रातें मेरी दुनिया करे बातें मेरी, शीशे की जवानी आके मेरे सोनिया, नशे दियाँ बोतलाँ"। पंजाबी शब्दों का सुन्दर इस्तमाल नक़्श साहब ने इस मुजरे में किया। गीत फ़िल्माया गया था लक्ष्मी छाया पर जिन पर "मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए" फ़िल्माया गया था। गणेश के संगीत में एल-पी की छाया मिलती है। फ़िल्म के ना चलने से यह गीत भी गुमनाम रह गया। संगीतकार सपन-जगमोहन के साथ नक़्श लायलपुरी ने बहुत अच्छा काम किया है। 1976 में नक़्श-सपन-जगमोहन की एक और फ़िल्म आई ’कागज़ की नाव’। इसमें आशा भोसले का गाया एक बेहद ख़ूबसूरत मुजरा था जो शास्त्रीय संगीत पर आधारित था। "ना जैयो रे सौतन घर सैंया, रुक जा मैं रो रो पड़ूँ तोरे पैंया" निस्सन्देह एक उच्चस्तरीय मुजरा गीत है। अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं - "जादू भी जाने टोना भी जाने, नजरिया से दिल को पिरोना भी जाने, हँस के मिले दूर होना भी जाने, तू ही ना माने ना माने, ना जैयो रे सौतन घर सैंया..."। गीत की ख़ास बात यह है कि गीत मुजरे वाली कोठे पे गा रही है, पर बोल पत्नी की ज़ुबाँ से निकलने वाले बोल हैं जो अपने पति को सौतन के घर जाने से रोक रही है। इस तरह से विरोधाभास का सुन्दार उदारहण है यह गीत। कितने सुन्दर शब्दों में नक़्श साहब दूसरा अन्तरा कहते हैं, "तन से लुभाये, अदाओं से लूटे, पल में वो माने तो पल में ही रूठे, बैरन की होती हैं सब रूप झूठे, तू ही ना जाने..."।

1977 में एक फ़िल्म आई थी ’महाबदमाश’। इस फ़िल्म में विनोद खन्ना और नीतू सिंह मुख्य भूमिकाओं में थे। रवीन्द्र जैन के संगीत में इस फ़िल्म में नक़्श लायलपुरी ने गीत लिखे। सिचुएशन के मुताबिक एक पार्टी में नीतू सिंह विनोद खन्ना को शराब का सहारा लेकर अपनी तरफ़ आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। पारम्परिक मुजरा शैली का गीत ना होते हुए भी सिचुएशन और भाव गीत के बोलों को मुजरा जैसा बना दिया है। मुखड़ा है - "अभी ज़रा सी देर में ये रात गुनगुनाएगी, ये धड़कनों की लय कोई हसीं धुन सुनाएगी, न तुझको नींद आएगी, न मुझको नींद आएगी, मेरे क़रीब आके पी, ये फ़ासला मिटा के पी"। एक अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं "जो तू कहे तो झूमके महकती ज़ुल्फ़ खोल दूँ, सनम तेरी शराब में लबों का रंग घोल दूँ, तेरी नज़र नज़र पे मैं ये दिल का फूल तोड़ दूँ, मेरे क़रीब आके पी..."। अब तक जितने भी मुजरों की हमने बातें की, हर एक मुजरा दूसरे मुजरे से अलग है। यहाँ तक कि शब्दों का दोहराव भी दिखाई नहीं दिया किसी में। इसी साल एक फ़िल्म आई थी ’वोही बात’, इसमें एक ग़ज़ल नक़्श साहब ने लिखी है, लेकिन शायद इसे एक मुजरे की तरह फ़िल्माया नहीं गया है, हालाँकि इसमें दर्द एक मुजरे वाली का ज़रूर छुपा हुआ है। ग़ज़ल के तीन शेर अर्ज़ है - "ज़हर देता है मुझे कोई दवा देता है, जो भी मिलता है मेरे ग़म को बढ़ा देता है।" "क्यों सुलगती है मेरे दिल में पुरानी यादें,कौन बूझती हुई शोलों को हवा देता है।" "हाल हँस-हँस के बुलाता है कभी बाहों में, कभी माज़ी मुझे रो रो सदा देता है।"


आज बस इतना ही, इस लेख का दूसरा व अन्तिम भाग आप पढ़ पाएंगे अगले सप्ताह।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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