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Friday, April 18, 2014

दुल्हन को मैचिंग दूल्हा लाये हैं शंकर एहसान लॉय 'हुलारे' में

ताज़ा सुर ताल  -2014-17

करन जौहर और साजिद नाडियाडवाला लाये हैं चेतन भगत की कहानी पर आधारित 2 States. अलिया भट्ट और अर्जुन कपूर अभिनीत ये फिल्म आज यानी १८ अप्रैल को प्रदर्शन आरंभ कर रही है. फिल्म कैसी है ये आप लोग देख कर हमें बताएगें. फिलहाल हम इस फिल्म का एक और गीत आज सुनने जा रहे है, जो है पूरी तरह मस्ती से भरा और कदम थिरकाने वाला. 

फिल्म की संगीत जोड़ी है अमिताभ भट्टाचार्य और शंकर एहसान लोय की तिकड़ी का. शादी के माहौल का ये गीत एक बार फिर 'सेल' तिकड़ी की मशहूर छाप लिए हुए है. ढोल का सुन्दर प्रयोग है. पार्श्व गायन है खुद शंकर के साथ सिद्धार्थ महादेवन और रसिका शेखर का. तो लीजिये झूमने को कमर कस लें इस गीत के साथ. 

  

Friday, April 11, 2014

खूबसूरत शब्दों से बुना एक गीत

ताज़ा सुर ताल -२०१४-१५

तुझ बिन सूरज में आग नहीं रे, तुझ बिन कोयल में राग नहीं रे, चंदनिया तो बरसे , फिर क्यों मेरे हाथ अँधेरे लग ले ने ....अमिताभ भट्टाचार्य के लिखे इस खूबसूरत मगर दर्द भरे गीत में एक अलग सी मिठास है. शंकर एहसान लॉय के जाने पहचाने अंदाज़ का है ये गीत, जिसे उतनी ही दिलकश आवाज़ में गाया निभाया है मोहन ने. मोहन, शंकर एहसान लॉय के बेहद चहेते गायक हैं, और हो भी क्यों न....मोहन की आवाज़ और अदायगी में गजब की रवानगी है. वैसे ये गीत एक युगल है जहाँ मोहन को साथ मिला है यशिता शर्मा ने. इस गीत में सबसे बड़ा कमाल रहा है गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य का, जो शायद इस संगीतकार तिकड़ी के साथ पहली बार जुड़े हैं इस फिल्म में, जिसका नाम है २ स्टेस्ट्स . 

२ स्टेट्स  चेतन भगत के इसी नाम के मशहूर उपन्यास पर आधारित है, जहाँ दक्षिण की नायिका को पंजाब के नायक से प्यार हो जाता है. ये बिलकुल उसके उलट है जैसा कि दर्शक सुपर हिट एक दूजे के लिए  में देख चुके हैं. अगर आपने चेतान का उपन्यास पढ़ा है तो आप जानते होंगें कि कहानी में बहुत से दिलचस्प मौके हैं जो बड़े परदे पर भी आपको भायेगें. थ्री इडियट्स , और काई पो छे  के बाद चेतन की लिखी कहानी पर आधारित ये तीसरी फिल्म है. वैसे वन नाईट अट काल सेण्टर  पर आधारित सुपर फ्लॉप हेल्लो  को भी जोड़ दिया जाए तो ये संख्या ४ हो जाएगी. फिल्म के लिए पहली पसंद थे शाहरुख़ खान और आसीन पर बात नहीं बनी तो निर्माता ने रणबीर कपूर और सैफ अली खान तक बात पहुंचाई. अंततः अर्जुन कपूर पर आकर बात जम गयी, और अलिया भट्ट को चुना गया दक्षिण की नायिका के रोल के लिए. फिल्म में अमृता सिंह और रेवती की महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं. तो चलिए, फिर आप भी आनंद लें इस दमदार गीत का.   

                 

Thursday, April 7, 2011

संगीत समीक्षा - जोक्कोमोन - बच्चों के लिए कुछ गीत लेकर आई शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी जावेद साहब के शब्दों में

Taaza Sur Taal (TST) - 07/2011 - ZOKKOMON

नये फ़िल्म संगीत में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों का मैं, सुजॉय चटर्जी, 'ताज़ा सुर ताल' के आज के अंक में स्वागत करता हूँ। पिछली बार इस स्तंभ में जब आपकी और हमारी मुलाक़ात हुई थी, उस अंक में हमनें बच्चों पर केन्द्रित फ़िल्म 'सतरंगी पैराशूट' की चर्चा की थी। उसी अंक में हमनें कहा था कि आजकल बच्चों की फ़िल्में न के बराबर हो गई हैं। लेकिन लगता है कि हालात फिर से बदलने वाले हैं और बच्चों की फ़िल्में एक बार फिर सर चढ़ के बोलने वाली हैं। आइए आज के अंक में एक और आनेवाली बाल-फ़िल्म के संगीत की समीक्षा करें। यह है सत्यजीत भाटकल निर्देशित 'ज़ोक्कोमोन'। ज़ोक्कोमोन भारत का पहला बाल-सुपरहीरो, जिसे पर्दे पर निभाया है 'तारे ज़मीन पर' से रातों रात चर्चा में आने वाले दर्शील सफ़ारी। साथ में हैं अनुपम खेर (डबल रोल में), मंजरी फ़ादनिस और अखिल मिश्रा। 'तारे ज़मीन पर' और 'ज़ोक्कोमोन' में कई समानताएँ हैं। बाल-फ़िल्म और दर्शील सफ़ारी के अलावा गीतकार और संगीतकार भी दोनों फ़िल्मों में एक ही हैं, यानी कि जावेद अख़्तर साहब और शंकर-अहसान-लॉय की तिकड़ी। बच्चों की फ़िल्म में गीत-संगीत का पक्ष संभालना आसान काम नहीं है, क्योंकि इस फ़िल्मों में कहानी के मूड, चरित्र और ऒडिएन्स अन्य आम फ़िल्मों से अलग होते हैं। देखना यह है कि क्या शंकर-अहसान-लॉय 'तारे ज़मीन पर' की तरह इस फ़िल्म में भी वह कमाल दिखा पाते हैं या नहीं!

ऐल्बम का पहला गेत है यश्मिता शर्मा का गाया हुआ "ईना मीना मायना मो, हँसते रहना जो भी हो"। एक आशावादी गीत जिस भाव पर अनेकों गीत दशकों से बनते चले आ रहे हैं। लेकिन इस गीत की खासियत है इसका प्रयोग-धर्मी संगीत। हालाँकि इस संगीतकार तिकड़ी की छाया गीत में महसूस की जा सकती है, लेकिन कुछ नयापन भी ज़रूर है। एक तरह का फ़्युज़न है जैज़-क्लासिकल का। गीत के दूसरे हिस्से में ढोलक के ठेके भी दाले गये हैं, और इंटरनेट पर उपलब्ध एक समीक्षा से पता चला कि इस गीत का जो शास्त्रीय हिस्सा है, वह आधारित है राग दरबारी पर। अब क्योंकि फ़िल्म बच्चों का है, तो बच्चों पर ही छोड़ना होगा कि गीत उनको पसंद आया कि नहीं! इस गीत की गायिका यश्मिता के बारे में पता नहीं आपको याद होगा या नहीं, यश्मिता ज़ी टीवी के 'सा रे गा मा पा" के फ़ाइनलिस्ट रह चुकी हैं, और फ़िल्म-प्लेबैक में यह उनका पदार्पण है। एक सुनहरे भविष्य के लिए हम उन्हें शुभकामना देते हैं।

'ज़ोक्कोमोन' का दूसरा गाना है सूरज जगन का गाया हुआ रॉक शैली का "सुनो ब्रदर"। 'तारे ज़मीन पर' के साथ अगर तुलना करें तो उसमें भी SEL नें "भेजा कम" में कुछ इसी तरह की शैली अपनाई थी। गीत में बहुत ख़ास कुछ नहीं है, एक साधारण रॉक आधारित गीत, और सूरज तो ऐसे गीत ही गाते हैं, इसलिए इस पर भी ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। इस गीत में कोरस में कई गायकों नें अपनी आवाज़ें दी हैं, जैसे कि क्लिण्टन सेरेजो, डॉमिनिक सेरेजो, नोमान पिण्टो और विविएन पोचा। ये सभी गायक शंकर-अहसान-लॉय की टीम से जुड़े हुए हैं।

और अब फ़िल्म का शीर्षक गीत। इस गीत के दो वर्ज़न हैं, पहला वर्ज़न एक फ़ास्ट-ट्रैक नंबर है जिसमें एक हल्का सा आध्यात्मिक अंग भी है, जिसमें मंत्रोच्चारण जैसे बोल सुनाई पड़ते हैं। मुख्य गायक हैं शंकर महादेवन और साथ में हैं अलीसा मेन्डोन्सा। रैप के लिए लिया गया है अर्ल की आवाज़, तथा कोरस मेम शामिल हैं राहुल सक्सेना, कौशिक देशपाण्डे, ओम्कार देशपाण्डे और मणि महादेवन। दूसरा वर्ज़न पहले से कर्णप्रिय है जिसमें रीदम और परकशन तौफ़ीक़ क़ुरेशी का है। कोरस में आवाज़ें हैं राहुल सक्सेना, कौशिक देशपाण्डे, दिव्य कुमार, रमण महादेवन, अमिताभ भट्टाचार्य और मणि महादेवन के। गीत के बोल और संगीत संयोजन से लग रहा है कि इस गीत का इस्तेमाल पूरे फ़िल्म में बतौर बैकग्राउण्ड म्युज़िक होने वाला है। यह कोई ऐसा गीत नहीं जो आपने होठों की शान बन सके, लेकिन फ़िल्म के कथानक और शीर्षक के साथ इसका महत्व फ़िल्म देखते हुए महसूस किया जा सकेगा। पार्श्व-संगीत के लिहाज़ से अच्छा कम्पोज़िशन है।

शंकर महादेवन के बाद अब बारी कैलाश खेर की। यह गीत है "झुनझुनमकदस्त्रमा"। जी नहीं, टंकन में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। वैसे इस गीत को सुनते हुए आपको कम से कम दो गीतों की याद ज़रूर आ सकती है। एक तो है "जजंताराम-ममंताराम" का शीर्षक गीत, और दूसरा है 'बण्टी और बब्ली' का "धड़क धड़क"। कैलाश की आवाज़ में यह गीत कर्णप्रिय तो है ही, साथ ही वरद कथापुरकर द्वारा बजाये बांसुरी के पीसेस जैसे सोने पे सुहागा है इस गीत के लिए। कोरस में आवाज़ें शामिल हैं अरुण इंगले, ज्योत्सना हार्डिकर, जया मणि महादेवन और स्वाति चक्रवर्ती भाटकल की। युं तो कैलाश खेर की आवाज़ सूफ़ियाना गीतों के लिए ज़्यादा सटीक है, इस बाल-गीत में को भी उन्होंने अच्छा निभाया है, और बच्चों के गीतों में दिलचस्पी रखने वालों को तो यह गीत यकीनन पसंद आयेगी।

और अब इस ऐल्बम का अंतिम गीत। अब की बार गयक शान की आवाज़। दोस्तों, मैं पिछले दिनों २०११ में प्रदर्शित फ़िल्मों के साउण्डट्रैक पर नज़र डाल रहा था और मैंने पाया कि बहुत से फ़िल्मों में एक एक गीत शान की आवाज़ में है। सोनू निगम जहाँ आजकल कम ही सुनाई दे रहे हैं, शान अब भी पूरे शान से छाये हुए हैं। "तुम बिन ये दिल घबराये" एक सॉफ़्ट नंबर है, बिल्कुल शान और सोनू निगम जौनर का। वैसे शंकर ख़ुद भी इस तरह के गीत बख़ूबी निभा लेते हैं। शान, दर्शील सफ़ारी और SEL; कुछ याद आया आपको? जी हाँ "बम बम बोले मस्ती में डोले"। लेकिन आप यह न सोचें कि इन दोनों गीतों में कोई समानता है। "तुम बिन" एक ग़मज़दा गीत है जिसका बच्चों के दिलों में उतर पाना कुछ मुश्किल सा लगता है। लेकिन बेशक़ यह एक अच्छा गीत है, फ़िल्म में इसकी सार्थकता पर तो हम फ़िल्म को देख कर ही टिप्पणी कर सकते हैं।

हाँ तो दोस्तों, संक्षिप्त में हम यही कह सकते हैं कि 'ज़ोक्कोमोन' शंकर-अहसान-लॉय की तरफ़ से अच्छा प्रयास है बच्चों के जौनर के फ़िल्म में, लेकिन साल २०११ अभी इस तिकड़ी का सर्वश्रेष्ठ ऐल्बम आना बाक़ी है। 'ज़ोक्कोमोन' अगर सुपरहीरो के रूप में बच्चों में लोकप्रिय हुई, तो इसका शीर्षक गीत भी बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर होगा, और एक माँ अपने बच्चे को ज़ोक्कोमोन की कहानी सुना कर खाना खिलाने में सफल होंगी। आजकल फ़िल्मी ऐल्बमों के कवर पर जो नई बात नज़र आ रही है, वह यह कि कोरस के कलाकारों के नाम भी दिए जा रहे हैं, साथ ही प्रॉमिनेण्ट वाद्यों के साज़िंदों के नाम भी उल्लेख किए जा रहे हैं, जो बहुत अच्छी बात है। 'ज़ोक्कोमोन' ऐल्बम में तो कुछ गीतों के साथ उनके प्रोड्युसर के नाम भी दिये गये हैं, जैसे कि "ईना मीना", "सुनो ब्रदर" और "ज़ोक्कोमोन-१" को टब्बी और प्रतीक नें प्रोड्युस किया है। ये वही टब्बी-प्रतीक हैं जिन्होंने हॉरर फ़िल्म '13B' का पार्श्वसंगीत तैयार किया था। देखना है कि क्या आगे चलकर यह जोड़ी फ़िल्म संगीत की मुख्य धारा में सम्मिलित हो पाती है या नहीं।

तो दोस्तों यह था 'ज़ोक्कोमोन' फ़िल्म की संगीत-समीक्षा, हमारी तरफ़ से इस ऐल्बम का पिक है "ईना मीना मायना मो", और इस पूरे ऐल्बम को हमारी तरफ़ से ७.५ की रेटिंग। आप भी फ़िल्म के गीतों को सुनिए और अपनी टिप्पणी नीचे पोस्ट कीजिए। अब इस प्रस्तुति को समाप्त करने की मुझे दीजिए इजाज़त, शाम को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर दोबारा मुलाक़ात होगी, नमस्कार!



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Wednesday, December 8, 2010

है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में, खुदा वही है.. कविता सेठ ने सूफ़ियाना कलाम की रंगत हीं बदल दी है

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०५

ससे पहले कि हम आज की महफ़िल की शुरूआत करें, मैं अश्विनी जी (अश्विनी कुमार रॉय) का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा। आपने हमें पूरी की पूरी नज़्म समझा दी। नज़्म समझकर हीं यह पता चला कि "और" कितना दर्द छुपा है "छल्ला" में जो हम भाषा न जानने के कारण महसूस नहीं कर पा रहे थे। आभार प्रकट करने के साथ-साथ हम आपसे दरख्वास्त करना चाहेंगे कि महफ़िल को अपना समझें और नियमित हो जाएँ यानि कि ग़ज़ल और शेर लेकर महफ़िल की शामों (एवं सुबहों) को रौशन करने आ जाएँ। आपसे हमें और भी बहुत कुछ सीखना है, जानना है, इसलिए उम्मीद है कि आप हमारी अपील पर गौर करेंगे। धन्यवाद!

आज हम अपनी महफ़िल को उस गायिका की नज़र करने वाले हैं, जो यूँ तो अपनी सूफ़ियाना गायकी के लिए मक़बूल है, लेकिन लोगों ने उन्हें तब जाना, तब पहचाना जब उनका "इकतारा" सिद्दार्थ (सिड) को जगाने के लिए फिल्मी गानों के गलियारे में गूंज उठा। एकबारगी "इकतारा" क्या बजा, फिल्मी गानों और "पुरस्कारों" का रूख हीं मुड़ गया इनकी ओर। २००९ का ऐसा कौन-सा पुरस्कार है, ऐसा कौन-सा सम्मान है, जो इन्हें न मिला हो!

इन्हें सुनकर एक अलग तरह की अनुभूति होती है.. ऐसा लगता है मानो आप खुद "ट्रांस" में चले गए हों और आपके आस-पास की दुनिया स्वर-विहीन हो गई हो.. शांति का वातावरण-सा बुन गया हो कोई... ।

आत्मा में कलम डुबोकर लिखी गई किसी कविता की तरह हीं हैं ये, जिनका नाम है "कविता सेठ"। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बरेली में हुआ, वहीं इनका पालन-पोषण हुआ और वहीं पर स्नातक तक की शिक्षा इन्होंने ग्रहण की। शादी के बाद ये दिल्ली चली आई और फिर ऑल इंडिया रेडिया एवं दूरदर्शन के लिए गाना शुरू कर दिया। इसी दौरान इन्होंने दिल्ली के हीं "गंधर्व महाविद्याल" से "संगीत अलंकार" (संगीत के क्षेत्र में स्नातकोत्तर) की उपाधि प्राप्त की .. साथ हीं साथ दिल्ली विश्वविद्यालय से "हिन्दी साहित्य" में परा-स्नातक की डिग्री भी ग्रहण की। इन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्वालियर घराने के "एन डी शर्मा", गंधर्व महाविद्यालय के विनोद एवं दिल्ली घराने के उस्ताद इक़बाल अहमद खान से प्राप्त की है।

इन्होंने बरेली के "खान-कहे नियाज़िया दरगाह" से अपनी हुनर का प्रदर्शन प्रारंभ किया, फिर आगे चलकर ये पब्लिक शोज़ एवं म्युज़िकल कंसर्ट्स में गाने लगीं। कविता मुख्यत: सूफ़ी गाने गाती हैं, अगरचे गीत, ग़ज़ल एवं लोकगीतों में भी महारत हासिल है। इन्होंने देश-विदेश में कई सारी जगहों पर शोज़ किए हैं। ऐसे हीं एक बार मुज़फ़्फ़र अली के अंतरराष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव इंटरनेशल सूफ़ी फ़ेस्टिवल) में इनके प्रदर्शन को देखकर/सुनकर सतीश कौशिक ने इन्हें अपनी फिल्म "वादा" में "ज़िंदगी को मौला" गाने का न्यौता दिया था। आगे चलकर जब ये मुंबई आ गईं तो इन्हें २००६ में अनुराग बसु की फिल्म "गैंगस्टर" में "मुझे मत रोको" गाने का मौका मिला। इस गाने में इनकी गायकी को काफी सराहा गया, लेकिन अभी भी इनका फिल्मों में सही से आना नहीं हुआ था। ये अपने आप को प्राइवेट एलबम्स तक हीं सीमित रखी हुई थीं। इन्होंने "वो एक लम्हा" और "दिल-ए-नादान" नाम के दो सूफ़ी एलबम रीलिज किए। फिर आगे चलकर एक इंडी-पॉप एलबम "हाँ यही प्यार है" और दो सूफ़ी अलबम्स "सूफ़ियाना (२००८)" (जिससे हमने आज की नज़्म ली है) एवं "हज़रत" भी इनकी नाम के साथ जुड़ गए। "सूफ़ियाना" सूफ़ी कवि "रूमी" की रूबाईयों और कलामों पर आधारित है.. कविता ने इन्हें लखनऊ के ८०० साल पुराने "खमन पीर के दरगाह" पर रीलिज किया था।


कुछ महिनों पहले हीं कविता "कारवां" नाम के सूफ़ी बैंड का हिस्सा बनीं हैं, जब एक अंतर्राष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव में इनका ईरान और राजस्थान के सूफ़ी संगीतकारों से मिलना हुआ था। तब से यह समूह सूफ़ी संगीत के प्रचार-प्रसार में पुरज़ोर तरीके से लगा हुआ है। आजकल ये अपने बेटे को भी संगीत की दुनिया में ले आई हैं।

कविता से जब उनके पसंदीदा गायक, संगीतकार, गीतकार के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब कुछ यूँ था: (साभार: प्लैनेट बॉलीवुड)

पसंदीदा गायक: एल्टन जॉन, ए आर रहमान, सुखविंदर, शंकर महादेवन, आबिदा परवीन
पसंदीदा संगीतकार: ए आर रहमान, अमित त्रिवेदी, शंकर-एहसान-लॉय
पसंदीदा गीतकार/शायर: वसीम बरेलवी, ज़िया अल्वी, जावेद अख़्तर, गुलज़ार साहब
पसंदीदा वाद्य-यंत्र: रबाब, डफ़्फ़, बांसुरी, ईरानी डफ़्फ़
पसंदीदा सूफ़ी कवि: कबीरदास, मौलाना रूमी, हज़रत अमिर खुसरो, बाबा बुल्लेशाह
पसंदीदा गीत: ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा (जोधा-अकबर)

उनसे जब यह पूछा गया कि नए गायकों को "रियालिटी शोज़" में हिस्सा लेना चाहिए या नहीं, तो उनका जवाब था: "रियालिटी शोज़ के बारे में कभी न सोचें, बल्कि यह सोचें कि "रियालिटी" में उनकी गायकी कितनी अच्छी है। जितना हो सके शास्त्रीय संगीत सीखने की कोशिश करें। कहा भी गया है कि - नगमों से जब फूल खिलेंगे, चुनने वाले चुन लेंगे, सुनने वाले सुन लेंगे, तू अपनी धुन में गाए जा।" वाह! क्या खूब कहा है आपने!

चलिए तो अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। कविता को यह नज़्म बेहद पसंद है और उन्हें इस बात का दु:ख भी है कि यह नज़्म बहुत हीं कम लोगों ने सुनी है, लेकिन इस बात की खुशी है कि जिसने भी सुनी है, वह अपने आँसूओं को रोक नहीं पाया है। आखिर नज़्म है हीं कुछ ऐसी! आप यह तो मानेंगे हीं कि सूफ़ियाना कलामों में ख़ुदा को जिस नज़रिये से देखा जाता है, वह नज़रिया बाकी कलामों में शायद हीं नज़र आता है। कविता इसी नज़रिये को अपनी इस नज़्म के माध्यम से हम सबके बीच लेकर आई हैं। "शब को सहर" मे बदलने वाला वह ख़ुदा आखिरकार कैसा लगता है, आप खुद सुनिए:

बदल रहा है जो शब सहर में,
ख़ुदा वही है..

है जिसका जलवा नज़र-नज़र में,
ख़ुदा वही है..

जो फूल खुशबू गुलाब में है,
ज़मीं, ______, आफ़ताब में है,
है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में,
खुदा वही है..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सांवला" और शेर कुछ यूँ था-

हो छल्ला पाया ये गहने, दुख ज़िंदरी ने सहने,
छल्ला मापे ने रहने, गल सुन सांवला
ढोला,
ओए सार के कित्ते कोला

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

मेरा हर लफ़्ज़ लकीर, अहसास स्याही है "आजाद"
चेहरा एक सांवला-सा ग़ज़ल में दिख रहा होगा. -आजाद

सांवले की आमद से हर चीज़ खिल गयी है.
मौसम हुआ है खुशनुमा दुनिया बदल गयी है. -अवध लाल जी

सांवला सभी को मेरा लगे है सजन
मगर मुझे ऐसा लागे जैसे किशन । - शरद तैलंग जी

कोई सांवला यहाँ कोई सफेद है
कोई खुश तो किसी को खेद है
एक खुदा ने बनाया हम सबको
फिर सबके रंगों में क्यों भेद है? - शन्नो जी (जबरदस्त....... )

सांवला सा मन और उजली सी धूप,
बस इसके सिवा कुछ नहीं,कैसा भी हो रूप - नीलम जी

चितचोर सांवला सजन , करता है नित शोर .
नदी पर करे इशारा , आजा मेरी ओर . - मंजु जी

मन के वीरान कोने मैं एक सांवला सा गम
मन के अँधेरे मैं कुछ घुल मिल सा गया है !!
सिसकियों की स्याह गोद मैं
सहमी सहमी सी यादों के
शूल भरे फूलों से कुछ छिल सा गया है !! - अवनींद्र जी

पिछली महफ़िल की शुरूआत हुई सजीव जी के प्रोत्साहन के साथ। आपके बाद शन्नो जी की आमद हुई। अपने बहुचर्चित मज़ाकिया लहजे में शन्नो जी ने फिर से हमें डाँट की खुराक पिलाई, लेकिन हमारे आग्रह करने के बाद उन्होंने गीत को फिर से सुना और अंतत: गायब शब्द की शिनाख्त करने में सफ़ल हुईं। तो इस तरह से कुछ कोशिशों के बाद महफ़िल का गायब शब्द सब के सामने प्रस्तुत हुआ। शन्नो जी, आपने शब्द तो पहचान लिया, लेकिन आपसे एक गलती हो गई। अगर आप उस शब्द पर कोई शेर कह देतीं तो हम "शान-ए-महफ़िल" के खिताब से आप हीं को नवाज़ते। अब चूँकि "साँवला" शब्द पर शेर लेकर पूजा जी सबसे पहले हाज़िर हुईं, इसलिए हम उन्हें हीं "शान-ए-महफ़िल" घोषित करते हैं। पूजा जी के बाद अवध जी, शरद जी , नीलम जी, मंजु जी एवं अवनींद्र जी का महफ़िल में आना हुआ। आप सभी के स्वरचित शेर एवं नज़्म कमाल के हैं। बधाई स्वीकारें! इन सबके बाद शन्नो जी फिर से महफ़िल में आईं, लेकिन इस बार वो खाली हाथ न थीं.. आपकी झोली में तीन-तीन रूबाईयाँ थीं और तीनों एक से बढकर एक। हमारी पिछली महफ़िल की सबसे बड़ी उपलब्धि रही अश्विनी जी का महफ़िल में आना। यूँ तो आपका शुक्रिया हम शुरूआत में हीं कर चुके हैं, लेकिन आपका जितना भी आभार प्रकट किया जाए कम होगा। उम्मीद करता हूँ कि हमारे बाकी मित्र भी भविष्य में इसी तरह हमारी सहायता करेंगे।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, August 24, 2010

दिल खोल के लेट्स रॉक....करण जौहर लाये हैं एक बार फिर "फैमिली" में शंकर एहसान लॉय के संगीत का तड़का

ताज़ा सुर ताल ३२/२०१०

सुजॊय - नमस्कार! आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनएँ और विश्व दीपक जी, आपको भी।

विश्व दीपक - सभी श्रोताओं व पाठकों और सुजॉय, तुम्हे भी मेरी ओर से ढेरों शुभकमानाएँ! सुजॉय, रक्षाबंधन भाई बहन के प्यार का पर्व है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधते हुए उसके सुरक्षा की कामना करती है और भाई भी अपनी बहन को ख़ुश रखने और उसकी रक्षा करने का प्रण लेता है। कुल मिलाकर पारिवारिक सौहार्द का यह त्योहार है।

सुजॉय - जी हाँ, यह एक पारिवारिक त्योहार है और आपने परिवार, यानी फ़ैमिली का ज़िक्र छेड़ा तो मुझे याद आया कि पिछले हफ़्ते हमने वादा किया था कि इस हफ़्ते हम 'टी.एस.टी' में 'वी आर फ़ैमिली' के गानें सुनवाएँगे। तो लीजिए, रक्षाबंधन पर आप सभी अपने फ़मिली के साथ आनंद लीजिए इसी फ़िल्म के गानों का। आज छुट्टी का दिन है, आप सब के फ़ैमिली मेम्बर्स घर पर ही मौजूद होंगे, तो राखी पर्व की ख़ुशियाँ मनाइए 'वी आर फैमिली' के गीतों को सुनते हुए।

विश्व दीपक - इससे पहले की फ़िल्म का पहला गाना सुनें, मैं यह बता दूँ कि यह धर्मा प्रोडक्शन्स यानी कि करण जोहर की निर्मित फ़िल्म है, जिसका निर्देशन किया है सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने। फ़िल्म में संगीत भी करण जोहर के पसंदीदा संगीतकार तिकड़ी शंकर-अहसान-लॉय ने दिया है तथा गानें इसमें लिखे हैं इरशाद कामिल और अन्विता दत्तगुप्तन ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं काजोल, करीना कपूर, अर्जुन रामपाल, आँचल मुन्जल, नोमिनाथ जिन्स्बर्ग और दीया सोनेचा। आइए सुनते हैं फ़िल्म का पहला गीत राहत फ़तेह अली ख़ान, श्रेया घोषाल और शंकर महादेवन की आवाज़ों में।

गीत - आँखों में नींदें


सुजॉय - सुरीला गाना है, शंकर-अहसान-लॉय का स्टाइल साफ़ झलकता है, बीट्स भी उनके पिछले करण जोहर की फ़िल्मों के गीतों की तरह है। श्रेया और राहत साहब के जो शास्त्रीय शैली में आलाप गाए हैं, उससे गीत को एक अलग मुकाम मिला है। श्रेया और राहत साहब के गाए "तेरी ओर" गीत की तरह यह गीत भी बहुत सुरीला है और इसे भी ख़ूब सुना जाएगा ऐसा मेरा विश्वास है।

विश्व दीपक - और गीतकार की बात करें तो इरशाद कामिल ने प्रीतम के साथ ही सब से ज़्यादा काम किया है। पहली बार शंकर-अहसान-लॉय के लिए उन्होंने गीत लिखा है इस फ़िल्म में। आपने बीट्स की बात की तो मुझे भी फ़ील हुआ कि इस तिकड़ी ने यही बीट्स 'कल हो ना हो' फ़िल्म के "कुछ तो हुआ है"। चलिए अब आगे बढ़ा जाए, और सुना जाए इस फ़िल्म का शायद सब से चर्चित गीत जिसे फ़िल्म के प्रोमोज़ में ख़ूब दिखाया और बजाया गया है। एल्विस प्रेस्ली के मशहूर रॉक सॉन्ग "जेल-हाउस रॉक" से इन्स्पायर्ड यह गीत है "दिल खोल के लेट्स रॉक", सुनते हैं...

गीत -दिल खोल के लेट्स रॉक


सुजॉय - सुनने में आया है कि एल्विस प्रेस्ली की इस धुन का इस्तेमाल करने से पहले इसकी अनुमति ली गई है। फ़िल्म में यह गीत काजोल, करीना और अर्जुन पर फ़िल्माया गया है और आवाज़ें हैं अनुष्का मनचन्दा, आकृति कक्कर और सूरज जगन की। शंकर-अहसान-लॉय ने एल्विस के कॉम्पोज़िशन और अरेंजमेण्ट के साथ भी छेड़-छाड़ नहीं किया है और ्जैसा कि हमने बताया कि इसकी अनुमति ली गई है, तो एक तरह से इसे एल्विस के गीत का official adaptation भी कह सकते हैं।

विश्व दीपक - इस गीत को लिखा है अन्विता दत्तगुप्तन ने जो आज के दौर की सक्रीय गीतकार बनती जा रही हैं। उन्होंने बस यही गीत इस फ़िल्म में लिखा है। "मुझे नहीं पता मैं क्या गाउँगी, उल्टे सीधे लफ़्ज़ों से बनाउँगी", "मैं तो भूल गई फिर क्या वर्डिंग्स थे" जै्सी लाइनों की कल्पना शायद दस साल पहले भी फ़िल्मी गीतों में नहीं की जा सकती थी। इसमें कोई शक़ नहीं धीरे धीरे फ़िल्मों की कहानियाँ और गानें हक़ीक़त की ज़िंदगी के ज़्यादा करीब आती जा रही हैं।

सुजॉय - वैसे तो जैसा कि आपने कहा कि एल्विस का ही अरेंजमेण्ट बरकरार है, बस दूसरे इंटरल्युड में कुछ देसी ठेकों का भी मज़ा लिया जा सकता है। कुल मिलाकर सिचुएशनल गीत है, लेकिन इसे अलग सुनते हुए भी ख़ूब मज़ा आता है। यह गीत भी मेरे ख़याल से लम्बे समय तक पसंद किया जाएगा। और अब फ़िल्म का तीसरा गीत जो पिछले गीत के मुकाबले बिलकुल ही अलग हट कर है, आइए पहले सुन लेते हैं।
गीत - रहम-ओ-करम


विश्व दीपक - "रहम-ओ-करम" शंकर महादेवन और विशाल दादलानी की आवाज़ों में था और इसे सुनते हुए 'माइ नेम इज़ ख़ान' के "नूर-ए-ख़ुदा" की याद आ ही जाती है जिसे शंकर महादेवन के साथ अदनान सामी और श्रेया घोषाल ने गाया था। "रहम-ओ-करम" दरसल एक फ़्युज़न है, एक तरफ़ सूफ़ी रंग भी है और संगीत में सॉफ्ट रॉक अपील भी। शंकर और विशाल ने एक प्रार्थना की तरह इस गीत को गाया है और कोरस का इस्तेमाल भी सुंदर तरीके से किया गया है।

सुजॉय - जब कोरस "रहम-ओ-करम" गाते हैं, तो ज़रा सी "तेरी है ज़मीं तेरा आसमाँ" की भी शायद एक हल्की सी झलक मिल जाती है। शायद वजह है चर्च में कॊयर की जो गायन शैली होती है, उस तरह की गायकी इन दोनों में प्रयोग हुआ है। ईलेक्ट्रिक गीटार और परक्युशन्स का इस्तेमाल इस गीत के अरेंजमेण्ट की विशेषताएँ हैं। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ा जाए, सोनू निगम और श्रेया घोषाल की आवाज़ें इस हफ़्ते भी जारी है, एक और नर्मो-नाज़ुक रोमांटिक डुएट। सुनिए...

गीत - हमेशा ऐण्ड फ़ॉरेवर दिल में तू


विश्व दीपक - सुजॉय, आपने अभी कुछ देर पहले चर्च-कॉयर की बात की थी, तो इस गीत में भी कोरल का जिस तरह से इस्तेमाल किया गया है, वह भी उसी अंदाज़ का है। पियानो का बड़ा ही सुरीला इस्तेमाल पूरे गीत में होता है। यह भी एक सॊफ़्ट रॊक नंबर है और सोनू और श्रेया की आवाज़ों ने गीत के साथ पूरा पूरा न्याय किया है। यह गीत भले चार्ट-बस्टर ना साबित हो, लेकिन इस तरह के गानों के क़द्रदानों की भी कोई कमी नहीं है, और अच्छे संगीत के क़द्रदान इस गीत को हाथों-हाथ ग्रहण करेंगे, ऐसी उम्मीद हम रखते हैं।

सुजॉय - "हमेशा ऐण्ड फ़ॉरएवर" की धुन को ही जारी रखते हुए शंकर-अहसान-लॉय ने बनाया है एक और ऐसा ही सॉफ़्ट नंबर "सुन ले दुआ ये आसमान", जिसे बेला शेण्डे ने गाया है। यह पिछले गीत से भी ज़्यादा धीमा है, और जो शायद करण जोहर स्टाइल के जज़्बाती थीम म्युज़िक की श्रेणी में स्थान रखता है। चलिए यह गीत भी सुन लिया जाए और फिर उसके बाद हम इस पूरे ऐल्बम के बारे में अपनी राय बताएँगे।

गीत - सुन ले दुआ ये आसमान


सुजॉय - तो फ़िल्म के सभी ५ गानें हमने सुनें। हर गीत को अलग अलग सुना जाए तो सभी गानें अच्छे हैम इसमें कोई शक़ नहीं, लेकिन जो गानें मुझे ख़ास पसंद आए, वो हैं "आँखों में नींदें" और "रहम-ओ-करम"। 'वी आर फ़ैमिली' ऐल्बम को 'अबव ऐवरेज' ही माना जाना चाहिए, सभी गानें सिचुएशनल है या थीम बेस्ड हैं, और फ़िल्म की कामयाबी पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। फ़िल्म चल पड़ी तो इन गीतों भी बढ़ावा मिलेगा। तो मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३.५ की रेटिंग, और आप सभी को यही कहेंगे कि आज इस ख़ुशी के अवसर पर, यानी रक्षाबंधन पर दिल खोल के लेट्स रॉक!!!

विश्व दीपक - वैसे कोई भी गीत ऐसा नहीं है जिसके बारे में कहा जा सके कि धूम मचा देंगें, पर सभी गीत सुरीले और सोलफुल अवश्य हैं. फिल्म में काजोल है तो एक जबरदस्त अभिनय की उनसे उम्मीद रहेगी. आपने सही कहा गारा फिल्म दर्शकों के मन छू पाए तो इसके संगीत भी चल निकलेगा....

आवाज़ रेटिंग्स: वी आर फैमिली: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९४- अन्विता दत्तगुप्तन का लिखा वव कौन सा गीत है जिसे गा कर शिल्पा राव को पुरस्कार मिला था?

TST ट्रिविया # ९५- एल्विस प्रेस्ली के "जेल-हाउस रॉक" गीत को Rolling Stone's List of The 500 Greatest Songs of All Time में कौन सा स्थान मिला है?

TST ट्रिविया # ९६- करण-जोहर और शंकर-अहसान-लॉय के अलावा 'कल हो ना हो' और 'वी आर फ़मिली' के संगीत में और क्या समानता आप ढूँढ़ सकते हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. ज़ी सा रे गा मा
२. "छोटी छोटी रातें लम्बी हो जाती हैं" (तुम बिन)
३. दोनों में राहत फ़तेह अली ख़ान - श्रेया घोषाल तथा सोनू निगम - श्रेया घोषाल के गाए युगल गीत हैं।

एक बार फिर सीमा जी २ सही जवाबों के साथ हाज़िर हुई, बधाई

Tuesday, May 11, 2010

प्रीतम लाए हैं बदमाश कम्पनी वाली अय्याशी तो शंकर एहसान लॊय के साथ है धन्नो की हाउसफुल महफ़िल

ताज़ा सुर ताल १८/२०१०

सुजॊय - विश्व दीपक जी, साल २०१० के चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि वह एक गीत अभी तक नहीं आ सका है जिसे इस साल का 'सॊंग ऒफ़ दि ईयर' कहा जा सकता हो। मेरे हिसाब से तो इस साल का संगीत कुछ ठंडा ठंडा सा चल रहा है। आपके क्या विचार हैं?

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं आपकी बात से एक हद तक सहमत हूँ। फिर भी मुझे न जाने क्यों "रावण" के "रांझा-रांझा" से ढेर सारी उम्मीदें हैं। अभी तक जितने भी गाने इस साल आए हैं, यह गाना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। आगे क्या होगा, यह कहा तो नहीं जा सकता, लेकिन बस चार महीने में 'सॊंग ऒफ़ दि ईयर' का निर्णय कर देना तो जल्दीबाजी हीं होगी। इसलिए धैर्य रखिए.... मुझे पूरा विश्वास है कि बाकी के आठ महीनों में कुछ न कुछ कमाल तो ज़रूर हीं होगा, नहीं तो रावण है हीं। खैर ये बताईये कि आज हम किस फिल्म या फिर किन फ़िल्मों के गानों की चर्चा करने जा रहे हैं।

सुजॊय - आज हमने इस स्तंभ के लिए दो ऐसी फ़िल्मों के तीन-तीन गीत चुने हैं जो फ़िल्में हाल ही में प्रदर्शित हो चुकी हैं। ये दो फ़िल्में हैं 'बदमाश कंपनी' और 'हाउसफ़ुल'। हमने जब रावण के संगीत की समीक्षा की थी, तब हीं इन दो फिल्मों का ज़िक्र आया था, लेकिन ’रहमान’ के नाम के कारण रावण को तवज्जो देनी पड़ी। आज दो हफ़्तों के बाद हमें फिर से इन पर नज़र दौराने का मौका मिला है। तो हम इस समीक्षा की शुरूआत 'बदमाश कंपनी' के गीतों से करते हैं। इस फिल्म के रिव्यूज तो कुछ अच्छे नहीं सुनाई दे रहे। कहानी में भी ज़्यादा दम नहीं है, वही चार दोस्तों की शॊर्ट-कट वाले रस्ते में चलकर अमीर बनने की कहानी।

विश्व दीपक - शाहिद कपूर, अनुश्का, वीर दास और मेयांग चैंग इस फ़िल्म के चार मुख्य किरदार हैं। ध्यान देने वाली बात है कि मेयांग चैंग, जो कि पिछले साल 'इंडियन आइडल' के अच्छे गायकों में से एक रहे हैं, इस फ़िल्म में उनकी आवाज़ में कोई भी गीत नहीं है। मुझे यह बात थोड़ी खली ज़रूर। लेकिन क्या कर सकते हैं। निर्णय तो संगीतकार और निर्देशक का हीं होता है। वैसे आपको बता दें कि फ़िल्म में संगीत प्रीतम का है और शाहिद कपूर के साथ उनके गानें ख़ूब कामयाब रहे हैं जैसे कि 'जब वी मेट', 'किस्मत कनेक्शन', 'दिल बोले हड़िप्पा' आदि।

सुजॊय - शाहिद कपूर को अगर इस दौर का जम्पिंग जैक जीतेन्द्र कहा जाए तो गलत न होगा। और प्रीतम के थिरकन भरे गानों को वो अपनी दमदार डान्स से सार्थक बनाते भी हैं। 'बदमाश कंपनी' में भी तेज़ रीदम के कई गीत हैं। जैसे कि पहला गीत जो हम सुनवाने जा रहे हैं "चस्का चस्का लगा है"। सुनते हैं कृष्णा और साथियों की आवाज़ में यह गीत। इस गीत के बारे में यही कह सकते हैं कि विशाल भारद्वाज ने 'कमीने' के "ढैन ट नैन" में जिस तरह के जीवन शैली जीने वाले युवाओं को दर्शाया है, "चस्का" में वही कोशिश सुनाई देती है लेकिन यह गीत ख़ास असर नहीं करती, और एक बहुत ही एवरेज गीत है मेरे ख़याल में।

विश्व दीपक - गीत के अरैंजमेण्ट में ज़्यादा ध्यान दिया गया है और तेज़ रीदम के बीच कृष्णा की आवाज़ बैकग्राउंड में जैसे सुनाई देती है और ड्रम बीट्स ही फ़ोरग्राउंड पर पूरे गीत में छाए हुए हैं। फ़िल्म की गीतकारा अन्विता दत्त गुप्तन ने कोशिश तो अच्छी की है गुलज़ार साहब की तरह वही "ढैन ट नैन" वाला अंदाज़ लाने की, लेकिन वो उसमें कितनी सफल हुईं हैं, यह आप ख़ुद ही गीत को सुन कर निर्णय लीजिए। वैसे अगर आप मुझसे पूछें तो मुझे "ताजी/भाजी करारी है, भून के उतारी है, किस्मत गरमा-गरम" जैसे प्रयोग बेहद पसंद आते हैं। और इस लिहाज से मुझे इस गाने के बोल जबरदस्त तो नहीं कहूँगा लेकिन हाँ अच्छे जरूर लगे। चलिए तो सुनते हैं "चस्का"।

गीत: चस्का चस्का


सुजॊय - जब फ़िल्म की कहानी ही ऐसी है कि चार युवा जो ग़लत राह इख़्तियार कर अमीर बनने की कोशिश में लगे हैं एक आलीशान ज़िंदगी पाने की चाहत में, तो ऐसे में अगर फ़िल्म के किसी गीत का मुखड़ा हो "सर चढ़ी है ये अय्याशी", तो इसमें गीतकार को दोष देना ग़लत होगा। जी हाँ, इस फ़िल्म के एल्बम का पहला गीत ही है "अय्याशी"। के. के और साथियों का गाया हुआ गीत है। के. के ने अपनी रॊक शैली वाले अंदाज़ में इस गीत को बखूबी निभाया है। पहले भी मैंने कहा था, आज दोहरा रहा हूँ कि के.के एक ऐसे गायक हैं जिनकी चर्चा बहुत कम होती है, लेकिन वो अपने हर गीत में अपना १००% देते हैं। आजकल वैसे उनकी आवाज़ में 'काइट्स' का गीत "ज़िंदगी दो पल की" गली गली गूँज रहा है।

विश्व दीपक - जहाँ तक "अय्याशी" का सवाल है, प्रीतम की टेक्नो ईलेक्ट्रॊनिक धुनें गीत के बोलों पर हावी होते सुनाई देती हैं। हिप हॊप और 'डेथ रॊक मेटल' का मिला जुला संगम है इस गीत का संगीत। इस गीत का भाव फ़िल्म के कहानी के साथ जाता है और प्रोमोज़ भी इसी गीत के ज़रिए किया गया है कई दिनों तक। बहुत ज़्यादा इम्प्रेसिव तो नहीं कहेंगे, लेकिन कहानी के हिसाब से ठीक ठाक है।

गीत: अय्याशी


विश्व दीपक - और अब सूफ़ी रंग। आज के दौर का यह चलन बन चुका है कि हर फ़िल्मकार अपनी फ़िल्म में कम से कम एक सूफ़ियाना अंदाज़ का गीत डालने की कोशिश कर रहा है। 'बदमाश कंपनी' में भी प्रीतम ने राहत फ़तेह अली ख़ान से एक ऐसा ही गीत गवाया है, लेकिन पाश्चात्य संगीत के साथ सूफ़ी का ऐसा फ़्युज़न किया है कि गीत कुछ अलग ही शक्ल में सामने आता है। "फ़कीरा" को हम एक 'सूफ़ी-रॊक' गीत कह सकते हैं।

सुजॊय - इससे पहले प्रीतम के संगीत में फ़िल्म 'दे दना दन' में "रिश्ते नाते हंस के तोड़ दूँ" गीत गाया था राहत साहब ने, जिसमें एक सुकून एक मिठास थी। लेकिन इस गीत पर इतना ज़्यादा रॊक का रंग चढ़ा दिया गया है कि गीत की आत्मा कहीं खो सी गई है। यह भी मेरे ख़याल से एक ऐवरेज गीत है और राहत साहब जैसे गायक के होते हुए भी गाना दिल को ज़्यादा छू नहीं पाया। आगे आप सुनिए और बताइए कि आपको इस गीत के बारे में क्या कहना है।

गीत: फ़कीरा


विश्व दीपक - और अब आज की दूसरी फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' के तीन गीतों की बारी। अक्षय कुमार, अर्जुन रामपाल, रितेश देशमुख, दीपिका पादुकोन, लारा दत्ता, जिया ख़ान, चंकी पाण्डेय जैसे मल्टी स्टार कास्ट वाली यह हास्य फ़िल्म लोगों को पसंद आ रही है ऐसा सुनने में आया है। फ़िल्म में संगीत शंकर अहसान लॊय का है।

सुजॊय - यह फ़िल्म भले ही अपनी कॊमेडी की वजह से लोगों को आकर्षित कर रही है, लेकिन गीत संगीत में उतना दम नहीं है। यह इसलिए भी हो सकता है क्योंकि इस फिल्म में ऐसे गानों की हीं ज़रूरत है जो लोगों को थिरकाएँ। लोग इन गानों को भविष्य में याद रखते हैं या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। आपको याद होगा कि "हे बेबी" में भी इस तिकड़ी ने ऐसे हीं गाने दिए थे। तो इन गानों में से पहला गीत जो हम सुनने जा रहे हैं वह है "ओ गर्ल, यू आर माइन"। तरुण सागर, अलीसा मेनडॊन्सा और लॊय ने इस गीत को गाया है। गाने का रीदम कैची है, शुरुआती संगीत में जो हारमोनिका सुनाई देता है, वह भी पहली बार सुनने वाले को आकर्षित करता है। आजकल यही गीत हर टीवी चैनल और रेडियो चैनल पर सुनाई दे रहा है। और चलिए यहाँ भी इस गीत को सुना जाए शुरु से लेकर आख़िर तक।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, गाना तो हम सुन हीं लेंगे लेकिन क्या आपने ध्यान दिया कि "तरूण सागर" का नाम बेहद अनजाना तो कुछ-कुछ जाना-पहचाना-सा है। दर-असल तरूण पिछली साल के "सारेगामापा" में एक प्रतिभागी थे, विजयी तो नहीं हुए, लेकिन शंकर महादेवन की नज़रों में आ गए और फिर देखिए किस्मत उन्हें कहाँ से कहाँ ले गई। पहली हीं फिल्म में शंकर के लिए गाना कोई छोटी बात नहीं है। "ओ गर्ल" के बाद हम जो गाना सुनेंगे, उसमें भी एक नई गायिका हैं "रीतु पाठक"। तरूण जहाँ सारेगामापा के प्रतिभागी थे तो रीतु "इंडियन आईडल" की। शंकर-एहसान-लॊय ने इन दोनों गलाकारों को एक बहुत हीं मज़बूत मंच दिया है। मैं तो यही दुआ करता हूँ कि ये दोनों संगीत की दुनिया में बहुत आगे जाएँ और ऐसे हीं एक से बढकर एक गाने गाते रहें। हाँ तो अब सुनते हैं वो गीत:

गीत: ओ गर्ल यू आर माइन


सुजॊय - आजकल फ़िल्मी गीतों में बोलों के लिहाज़ से भी उतने ही प्रयोग हो रहे हैं जितने की संगीत में हो रहे हैं। आज से दस साल पहले तक शायद हीं किसी ने यह सोचा होगा कि "पप्पु काण्ट डान्स साला" जैसे मुखड़े भी कभी आ सकते हैं तो फिर अगर 'हाउसफ़ुल' में गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य लिखते हैं कि "वॊल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा" तो इसमें बहुत ज़्यादा हैरान होनेवाली बात नहीं है।

विश्व दीपक - इस गीत को गाया है रीतु पाठक(जिनका ज़िक्र हमने पहले हीं कर दिया है), नीरज श्रीधर और अलीसा मेन्डोन्सा(लॊय की सुपुत्री) ने। पिछले गीत की तरह यह भी एक पेप्पी नंबर है। हल्के फुल्के गीत शैली में ये दोनों गानें ही कैची हैं। 'बदमाश कंपनी' के गानों ने पेप्पी होते हुए भी जो असर नहीं किया था, शायद 'हाउसफ़ुल' के गीत उस मापदंड पर कुछ हद तक खरे उतर जाएँ।

सुजॊय - मुझे भी ऐसा लगा कि ये दोनों गीतों ने अपनी रीदम के बल पे कुछ हद तक आज के युवाओं को वश में किया है। आइए यह गीत भी सुन लेते हैं।

गीत: वॊल्युम कम कर पप्पा जाग जाएगा


विश्व दीपक - ’हाउसफ़ुल' एल्बम का मुख्य आकर्षण है अमिताभ बच्चन की 'लावारिस' फ़िल्म के मशहूर गीत "अपनी तो जैसे तैसे" का रिमिक्स वर्ज़न। गीत का शीर्षक रखा गया है "आपका क्या होगा (धन्नो रिमिक्स)"। लगता है अब यह नया स्टाइल भी चल पड़ेगा कि हर फ़िल्म में किसी पुराने गीत का रिमिक्स डाल दिया जाएगा। आपका क्या ख़याल है सुजॊय?

सुजॊय - हो सकता है। पिछले कुछ समय से रिमिक्स गानें बनाने की होड़ कुछ ख़त्म सी हो गई थी, अब हो सकता है कि इसके बाद फिर से एक बार रिमिक्स बनाने का सिलसिला शुरु हो जाए। इस विवाद पर न जाते हुए आपको यह बता दें कि किशोर दा के इस ऒरिजनल गीत को आवाज़ दी है मिका ने और साथ में हैं सुनिधि चौहान और साजिद ख़ान।

विश्व दीपक - विवाद का आपने ज़िक्र किया तो मैं कम से कम इतना बता दूँ कि विवाद वैसे भी शुरु हो गया है इस गीत को लेकर, ऐसा कहा जा रहा है कि निर्माता ने ऒरिजिनल गीत के कॊपीराइट्स उचित तरीके से हासिल नहीं किए हैं।

सुजॊय - "अपनी तो जैसे तैसे" गीत को लिखा था अंजान साहब ने। और अब इस गीत का रिकिक्स्ड वर्ज़न को लिखा है उन्ही के सुपुत्र गीतकर समीर ने। एक तरह से अपने पिता को श्रद्धांजलि ही हुई उनकी तरफ़ से। आइए सुनते हैं यह गीत और आज के 'ताज़ा सुर ताल' की चर्चा यहीं संपन्न करते हैं।

गीत: आपका क्या होगा (धन्नो)


"बदमाश कंपनी" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
बदमाश कंपनी से प्रीतम और अन्विता दत्त गुप्तन पहली बार एक साथ आए हैं। प्रीतम के साथ इरशाद कामिल की जो जोड़ी है, वह कमाल करती है और हमें इस फिल्म में उसी जोड़ी की कमी खल गई। वैसे कोई बात नही, अगली फिल्म "राजनीति" में यह जोड़ी वापस आ रही है।

"हाउसफुल" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२
इस फिल्म के हमने तीन हीं गाने चुने हैं लेकिन हम यहाँ पर एक और गाने का ज़िक्र करना चाहेंगे। गाने के बोल हैं "आई डोंट नो व्हाट टू डू".. बोल कुछ अजीब से लगते हैं, लेकिन इस गाने में सुनिधि चौहान और शब्बीर कुमार (हाँ आपने सही सुना, ८० के दशक के सुपरहिट शब्बीर कुमार की आवाज़ है इस गाने में) ने सेन्सुअस और छेड़-छाड़ वाले गानों को एक नया अर्थ दिया है। इस गाने के कारण हीं हम इस एलबम को एक्स्ट्रा आधी रेटिंग दे रहे हैं। हमें खेद है कि हम ये गाना आपको सुनवा नहीं पाए, लेकिन आप इसे किसी भी तरह से सुनिएगा ज़रूर।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५२- जिस साल मेयांग चैंग 'ईंडियन आइडल' में भाग लिया था, उस साल इंडियन आइडल का ख़िताब किसने जीता था?

TST ट्रिविया # ५३- गीतकार अंजान ने फ़िल्म 'लावारिस' के लिए लिखा था "अपनी तो जैसे तैसे"। बताइए कि इस फ़िल्म में उनके अलावा और किन गीतकार ने गीत लिखे थे।

TST ट्रिविया # ५४- आज के 'ताज़ा सुर ताल' में में रितेश देशमुख, प्रीतम और मिका का अलग अलग ज़िक्र आया है। क्या आप कोई ऐसा गीत बता सकते हैं जिसमें इन तीनों का योगदान रहा हो?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. 'फ़िल्मफ़ेयर आर.डी. बर्मन अवार्ड' तथा सर्वश्रेष्ठ पार्श्व संगीत (बेस्ट बैकग्राउंड म्युज़िक) - ये दोनों पुरस्कार फ़िल्म 'देव-डी' के लिए।
२. फ़िल्म 'रंग दे बसंती' में "लुका छुपी बहुत हुई सामने आ जाना"।
३. फ़िल्म 'वेक अप सिड' और गायिका कविता सेठ।

सीमा जी, आपके तीनों जवाब सहीं हैं। बधाई स्वीकारें!

Tuesday, February 2, 2010

अमन का सन्देश भी है "खान" के सूफियाना संगीत में...

ताज़ा सुर ताल 05/ 2010

सजीव - सुजॊय, वेल्कम बैक! उम्मीद है छुट्टियों का तुमने भरपूर आनंद उठाया होगा!

सुजॊय - बिल्कुल! और सब से पहले तो मैं विश्व दीपक तन्हा जी का शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होने मेरी अनुपस्थिति में 'ताज़ा सुर ताल' की परंपरा को बरक़रार रखने में हमारा सहयोग किया।

सजीव - निस्सन्देह! अच्छा सुजॊय, आज फरवरी का दूसरा दिन है, यानी कि साल २०१० का एक महीना पूरा हो चुका है, लेकिन अब तक एक भी फ़िल्म इस साल की बॊक्स ऒफ़िस पर अपना सिक्का नहीं जमा पाया है। पिछले हफ़्ते 'वीर' रिलीज़ हुई थी, और इस शुक्रवार को 'रण' और 'इश्क़िया' एक साथ प्रदर्शित हुई हैं। 'वीर' ने अभी तक रफ़्तार नहीं पकड़ी है, देखते हैं 'रण' और 'इश्क़िया' का क्या हश्र होता है। 'चांस पे डांस', 'प्यार इम्पॊसिबल', और 'दुल्हा मिल गया' भी पिट चुकी है।

सुजॊय - मैंने सुना है कि 'इश्क़िया' के संवदों में बहुत ज़्यादा अश्लीलता है। विशाल भारद्वाज ने 'ओम्कारा' की तरह इस फ़िल्म के संवादों में भी काफ़ी गाली गलोच और अश्लील शब्द डाले हैं। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि फ़ैमिली ऒडियन्स को यह फ़िल्म थियटरों में खींच पाएगी। देखते हैं! और आपने ठीक ही कहा है कि इस साल अभी तक कोई फ़िल्म हिट नहीं हुई है। और '३ इडियट्स' अब भी सिनेमाघरों में हाउसफ़ुल चल रही है।

सजीव - लेकिन लगता है बहुत जल्द ही आमिर ख़ान को टक्कर देनेवाले हैं शाहरुख़ ख़ान, क्योंकि अगले हफ़्ते रिलीज़ हो रही है 'माइ नेम इज़ ख़ान', जिसका लोग बहुत दिनों से बड़े ही बेसबरी से इंतज़ार कर रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या 'माइ नेम...' '३ इडियट्स' को बॊक्स ऒफ़िस पर मात दे सकेगी या नहीं।

सुजॊय - जहाँ तक गीत संगीत का सवाल है, जहाँ एक तरफ़ अब भी "ऒल इज़ वेल" काउण्ट डाउन शोज़ में नंबर-१ पर चल रही है, वहीं यह भी देखना है कि 'माइ नेम...' का "सजदा" कामयाबी के कितने पायदान चढ़ता है। चलिए आज हम समीक्षा करें 'माइ नेम इस ख़ान' के गीत संगीत का।

सजीव - जब तुमने "सजदा" का ज़िक्र छेड़ ही दिया है तो चलो जल्दी से यह गीत सुन लेते हैं, उसके बाद इस फ़िल्म की बातों को आगे बढ़ाएँगे।

गीत - सजदा....sajda (MNIK)


सुजॊय - राहत फ़तेह अली ख़ान, शंकर महादेवन और रीचा शर्मा के गाए इस गीत को फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ गीत माना जा रहा है। इस फ़िल्म के लगभग सभी गानें सुफ़ीयाना अंदाज़ के हैं।

सजीव - आजकल एक ट्रेंड सी जैसे चल पड़ी है सुफ़ी संगीत को फ़िल्मों में इस्तेमाल करने की। और क्योंकि यह फ़िल्म का पार्श्व अमेरीका में बसे एक मुस्लिम परिवार से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस तरह का संगीत इस फ़िल्म में सार्थक बन पड़ा है। कुछ कुछ क़व्वाली के अंदाज़ में यह गीत सुनने के बाद देर तक ज़हन में बसा रहता है। तबला और ढोलक के ठेकों का बहुत ही ख़ूबसूरत इस्तेमाल इस गीत में सुनने को मिलता है।

सुजॊय - और राहत फ़तेह अली ख़ान और रीचा शर्मा के सुफ़ीयाना अंदाज़ से तो श्रोता बहुत दिनों से ही परिचित हैं, इस गीत में भी इन दोनों ने अपना बेस्ट दिया है। और संगीतकार तिकड़ी शंकर अहसान लॊय ने फिर एक बार साबित किया कि उन्हे सिर्फ़ रॊक में नहीं बल्कि हर प्रकार के संगीत में महारथ हासिल है।

सजीव - तो कुल मिलाकर हम यह कहें कि हमें इस गीत का सजदा करना चाहिए?

सुजॊय - बेशक़!

सजीव - अच्छा, अब जो दूसरा गाना हम सुनेंगे उसे भी तीन गायकों ने गाया है। ये हैं अदनान सामी, शंकर महादेवन और श्रेया घोषाल, और गीत है "नूर-ए-ख़ुदा"। यह एक नर्मोनाजुक गीत है, जिसमें अदनान और शंकर की आवाज़ें ही ज़्यादा सुनाई देती है। श्रेया की एन्ट्री अंत के तरफ़ होती है, लेकिन उतनी ही मिठास के साथ।

सुजॊय - गीत के ऒर्केस्ट्रेशन में गीटार का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है। चलिए शोर्ताओं को भी इस गीत को सुनने का मौका देते हैं।

गीत - नूर-ए-ख़ुदा...NOOR-E-KHUDA (MNIK)


सजीव - आप सभी को मालूम ही होगा कि 'माइ नेम इज़ ख़ान' करण जोहर की फ़िल्म है, जिसमें शाहरुख़ ख़ान के अलावा काजोल, शीतल मेनन, जिम्मी शेरगिल, ज़रीना वहाब हैं, और ढेर सारे अमरीकी कलाकार भी आपको इस फ़िल्म में नज़र आएँगे। करण ने ही फ़िल्म का निर्देशन भी किया है। कहानी लिखी है शिवानी बथिजा ने। संवाद शिवानी के साथ साथ नीरंजन अय्यंगर ने लिखे हैं।

सुजॊय - अच्छा, नीरंजन अय्यंगर ने इस फ़िल्म के गानें भी लिखे हैं ना?

सजीव - हाँ, वैसे तो नीरंजन एक संवाद लेखक ही हैं, जिन्होने 'जिस्म', 'कल हो ना हो', 'पाप', 'रोग', 'कभी अल्विदा ना कहना', 'आइ सी यू', 'क्या लव स्टोरी है', 'फ़ैशन', 'वेक अप सिड' और 'कुरबान' जैसी फ़िल्मों में संवाद लिख चुके हैं।

सुजॊय - और कुछ फ़िल्मों में गानें भी लिखे हैं। अभी हाल ही में फ़िल्म 'क़ुर्बान' का हिट गीत "शुक्रान अल्लाह" भी तो उन्ही का लिखा हुया है।

सजीव - हाँ, और 'माइ नेम...' में तो सभी गानें उन्ही के लिखे हुए हैं। लगता है इस फ़िल्म से वो फ़िल्मी गीतकारों की मुख्य धारा में शामिल हो जाएँगे। जिस तरह से जावेद अख़्तर एक संवाद लेखक से गीतकार बन गए थे, हो सकता है कि नीरंजन भी वही रास्ता इख़्तियार करे।

सुजॊय - और उस राह पर नीरंजन ने मज़बूत क़दम रख ही दिया है 'माइ नेम...' के गीतों के ज़रिए।

सजीव - बिल्कुल! तो अब कौन सा गीत सुनवाओगे?

सुजॊय - तीसरा गाना है शफ़ाक़त अमानत अली का गाया हुआ, "तेरे नैना"। शंकर अहसान लॊय ने जिनसे 'कभी अल्विदा ना कहना' में सुपरहिट गीत "मितवा" गवाया था। इस गीत में भी वही सुफ़ीयाना अंदाज़ इस तिक़ई ने बरक़रार रखा है, लेकिन "मितवा" जैसा असर शायद नहीं कर सका है यह गीत। लेकिन अपने आप में गीत बहुत अच्छा है।

सजीव - गीत का मुख्य आकर्षण यह है कि गीत के बीचों बीच इस गीत में क़व्वाली का रंग आ जाता है। नीरंजन अय्यंगर के बोल स्तरीय हैं।

गीत - तेरे नैना...TERE NAINA (MNIK)


सुजॊय - 'माइ नेम इज़ ख़ान' में कुल ६ ऒरिजिनल गीत हैं, जिनमें से ५ गानें हम यहाँ पर आपको सुनवा रहे हैं। तीन गानें आप सुन चुके हैं, इससे पहले कि हम चौथा गाना बजाएँ, सजीव, क्या आप इस फ़िल्म की थोड़ी सी भूमिका अपने पाठकों को बताना चाहेंगे?

सजीव - ज़रूर! वैसे यह फ़िल्म इतनी चर्चा में है कि लगभग सभी को फ़िल्म के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी तो ज़रूर होगी, फिर भी हम बता रहे हैं। रिज़्वान ख़ान (शाहरुख़ ख़ान) मुंबई के बोरीवली का रहनेवाला एक मुस्लिम लड़का जो पीड़ित है Asperger syndrome नामक बिमारी से, जिसके चलते लोगों के साथ बातचीत करने में, यानी कि सोशियलाइज़ करने में उसे दिक्कत आती है। युवा रिज़्वान अमेरीका के सैन फ़्रान्सिस्को में एक हिंदु तलाक़शुदा महीला मंदिरा (काजोल) शादी करता है। ९/११ के आतंकी हमलों के बाद रिज़्वान को अमरीकी पुलिस अपने गिरफ़्त में ले लेती है और उसके विकलांगता को वो संदेह की नज़र से देखते हैं। रिज़्वान के गिरफ़्तारी के बाद उसकी मुलाक़ात राधा (शीतल मेनन) से होती है जो एक थेरपिस्ट हैं, जो उसकी मदद करती है। उसके बाद रिज़्वान अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा से मिलने की यात्रा शुरु करता है उसके नाम पर लगे धब्बे को मिटाने के लिए। फ़िल्म में ओबामा का किरदार निभाया है क्रिस्टोफ़र बी. डंकन ने।

सुजॊय - सजीव, अभी कुछ महीने पहले शाहरुख़ ख़ान को अमरीका के एयरपोर्ट में कई घंटों तक सिर्फ़ इसलिए रोका गया था क्योंकि उनकी पदवी ख़ान है, और एक ऐसी हवा पश्चिम में चल रही है कि जिसके चलते हर मुसलमान को शक़ की निगाह से देखा जा रहा है। तो हो ना हो इस फ़िल्म की प्रेरणा शाहरुख़ और करण को उसी हादसे से मिली होगी!

सजीव - हो सकता है! अच्छा बातें तो बहुत हो गई, अब एक और गीत की बारी। अगला गीत भी सूफ़ी अंदाज़ का, लेकिन अब की बार एक धार्मिक रचना, एक प्रार्थना, "अल्लाह ही रहम"। राशिद अली और साथियों की आवाज़ों में इस गीत को सुनते हुए आप आध्यात्मिक जगत में पहुँच जाएँगे। इस गीत के बारे में ज़्यादा कहने की आवश्यक्ता नहीं है, बस सुनिए और महसूस कीजिए एक पाक़ शक्ति को!

गीत - अल्लाह ही रहम...ALLAH HI RAHAM (MNIK)


सुजॊय - सजीव, शंकर अहसान लॊय ने इस फ़िल्म में कम से कम एक गीत तो रॊक शैली में ज़रूर बनाया है। इन सूफ़ी गीतों के बाद अब एक रॊक अंदाज़ का गाना जिसे शंकर महादेवन और सूरज जगन ने गाया है। "रंग दे" एक ऐसा गीत है जिसमें संदेश है अमन का, ख़ुशी का, जोश का।

सजीव - हाँ, एक रिफ़्रेशिंग् गीत जिसे हम कह सकते हैं। सुनते हैं यह गीत, लेकिन सुजॊय एक बात बताओ, तुमने अभी थोड़ी देर पहले कहा था कि इस फ़िल्म में ६ गानें हैं, छ्ठा गीत कौन सा है?

सुजॊय - नहीं, दरअसल छठा गीत एक इन्स्ट्रुमेन्टल पीस है जिसे 'स्ट्रिंग्स' बैण्ड ने बजाया है, और जिसका शीर्षक रखा गया है 'ख़ान थीम'।

सजीव - अच्छा, तो चलो अब अमन और शांति का संदेश हम भी फैलाएँ और सुनें आज के 'ताज़ा सुर ताल' का अंतिम गीत। श्रोताओ और पाठकों से हमारा सविनय निवेदन है कि इस फ़िल्म के गीत संगीत की समीक्षा यहाँ टिप्पणी पर ज़रूर करें। कौन सा गीत आपको सब से ज़्यादा अच्छा लगा, किस चीज़ की कमी लगी, आप के नज़र में इस फ़िल्म के संगीत की क्या जगह है आप के दिल में। ज़रूर बताएँ।

गीत - रंग दे...RANG DE (MNIK)


"माई नेम इस खान" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
शंकर एहसान लॉय तिकड़ी से हमेशा ही अच्छे संगीत की उम्मीद की जाती है, और अमूमन ये निराश भी नहीं करते, और ये भी मानना पड़ेगा कि करण जौहर के पास संगीत की ऐसी श्रोतामई समझ है जो एक सफल फिल्मकार में होनी चाहिए. सजदा और तेरे नैना फिल्म के बहतरीन गीत हैं...नूरे खुदा फिल्म रीलिस होने के बाद बेहद मशहूर होने वाला है, और रंग दे जो फिल्म के थीम को सही तरह से सामने लाता है वो भी खूब गुनगुनाया जायेगा ऐसी उम्मीद है...कुल मिलाकर एल्बम एक अच्छी खरीदारी साबित होगी संगीत प्रेमियों के लिए...हाँ संगीत में "क्लासी" टच ज्यादा है, जिस कारण आम लोगों में ये गीत उतने कामियाब शायद नहीं होंगें पर ये कहना गलत नहीं होगा कि इस संगीतकार तिकड़ी इस साल एक बेहतर शुरूआत की है इस अल्बम से

अब पेश है आज के तीन सवाल-

TST ट्रिविया # १३ एक बेहद मशहूर गीत के अंतरे के बोल हैं "पल्कों पे झिलमिल तारे हैं, आना भरी बरसातों में"। इस गीत की 'माइ नेम इज़ ख़ान' के किसी गीत के साथ समानता बताइए।

TST ट्रिविया # १४ बतौर संगीतकार शंकर अहसान लॊय की पहली फ़िल्म जो थी वो फ़िल्म रिलीज़ नहीं हुई थी, लेकिन उसका संगीत ज़रूर रिलीज़ हुआ था। बताइए उस फ़िल्म का नाम।

TST ट्रिविया # १५ करण जोहर की किस फ़िल्म में अभिषेक बच्चन एक नर्स की भूमिका में नज़र आए थे?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछली पहेली में पहला सवाल अनुत्तरित रह गया था, रामू ने नाना पाटेकर से इंस्पेक्टर कुरैशी का किरदार करवाया था फिल्म भूत में, बहरहाल अन्य दो जवाब तो सीमा जी सही दिए हैं बधाई

Monday, October 19, 2009

जो तुझे जगाये, नींदें तेरी उडाये, ख्वाब है सच्चा वही....सच्चे ख़्वाबों को पहचानिये...प्रसून की सलाह मानिये

ताजा सुर ताल TST (31)

दोस्तों, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर के एपिसोडों से लगभग अगले 20 एपिसोडों तक, जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में सीमा जी ने बढ़त बनाये रखी है, ३ में से २ सही जवाब और कुल अंक उनके हुए १६. तनहा जी दूसरे स्थान पर हैं ६ अंकों के साथ. तनहा जी ने भी एक सवाल का सही जवाब दिया. दिशा जी जरा देरी से आई और भी कुछ प्रतिभागी सामने आये तो और मज़ा आये. चलिए अब बढ़ते हैं आज के अंक की तरह...शुभकामनाएँ.

सुजॉय - सजीव, 'ताज़ा सुर ताल' में आज किस फ़िल्म के गीत से हम शुरुआत करने जा रहे हैं?

सजीव - राजकुमार संतोषी की नई कॊमेडी फ़िल्म आ रही है 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी', आज हम इसी फ़िल्म का एक जोशीला ट्रैक सुनेंगे सब से पहले।

सुजॉय - सजीव, आप ने कहा कॊमेडी फ़िल्म, इससे मुझे याद आया राजकुमार संतोषी ने इससे पहले एक फ़िल्म बनाई थी 'अंदाज़ अपना अपना', जो अपनी कॊमेडी की वजह से बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुई थी। आमिर ख़ान और सलमान ख़ान की जोड़ी ने उस फ़िल्म में लोगों को ख़ूब हँसाया था।

सजीव - हाँ, और १९९४ के इस फ़िल्म में परेश रावल, महमूद, देवेन वर्मा, जगदीप, हरीश पटेल, टिकू तल्सानिया जैसे नामचीन हास्य कलाकारों ने भी ख़ूब गुदगुदाया था।

सुजॉय - और अब 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी' में नज़र आयेंगे रनबीर कपूर और कटरीना कैफ़। इस फ़िल्म में रणबीर का नाम 'प्रेम' है। आप जानते ही होंगे कि शुरु शुरु में हर फ़िल्म में सलमान ख़ान का नाम 'प्रेम' हुआ करता था, और 'अंदाज़ अपना अपना' में भी उनका नाम 'प्रेम भोपाली' था। तो इस तरह से राजकुमार संतोषी के अलावा 'अजब प्रेम की...' और 'अंदाज़ अपना अपना' में यह एक और कॉमन चीज़ है।

सजीव - जहाँ तक गीत संगीत का सवाल है, 'अंदाज़ अपना अपना' में तुषार भाटिया और विजु शाह का संगीत था, और वो संगीत कुछ कुछ पुराने ज़माने के ओ. पी. नय्यर के संगीत से मिलता जुलता था। जैसे कि "एलो एलो, एलो जी सनम हम आ गये आज फिर दिल लेने" तो बिल्कुल नय्यर साहब का कम्पोजीशन लगता है। आशा और एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम का गाया "ये रात और ये दूरी" भी काफ़ी हिट हुआ था। और अब 'अजब प्रेम की...' का संगीत उससे बिल्कुल अलग है। और क्यों ना हो, इन दो फ़िल्मों के बीच १५ साल का फ़ासला भी तो है।

सुजॉय - जी बिल्कुल! प्रीतम आज के दौर के संगीतकार हैं। और जैसा कि हमने पहले भी कहा है कि प्रीतम एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिनका संगीत बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हो जाता है आज की पीढ़ी में, फिर चाहे भले फ़िल्म चले या ना चले। प्रीतम को समालोचकों के वार भी सहने पड़ते हैं लेकिन वह कहते हैं ना कि जो हिट है वही फ़िट है, इसलिए हर वार का मुक़ाबला करते हुए प्रीतम निरंतर हिट पे हिट दिए जा रहे हैं। फ़िल्म के गीतकार हैं इरशाद कामिल और आशिष पंडित ने।

सजीव - ठीक कहा तुमने सुजॉय। बप्पी लाहिरी के साथ भी यही हुआ था जब वो नए नए आए थे डिस्को लेकर। लेकिन आज देखिए, उनके वही पुराने गानें जिनकी उस ज़माने में काफ़ी समालोचना हुई थी, जब वे आज बजते हैं तो लोग उसकी तारीफ़ कर रहे हैं। ख़ैर, आज 'अजब प्रेम की...' का जो गीत हम बजा रहे हैं वह है के.के, सुनिधि चौहान और हार्ड कौर का गाया हुआ एक थिरकता नग़मा।

सुजॉय - यह गीत इस फ़िल्म के ऐल्बम का पहला गाना है, जिसके बोल हैं "मैं तेरा धड़कन तेरी ये दिन तेरा रातें तेरी अब बचा क्या"। बहुत ही उर्जा है इस गीत में। के.के इस तरह के जोशीले गानों को बहुत ही अच्छी तरह से निभाते हैं। सुनिधि की आवाज़ में भी वो दम है कि के.के की आवाज़ से टक्कर ले सके। और हार्ड कौर अपने रैप के साथ बीच बीच में आती रहती हैं। हिप-हॊप के साथ साथ एक टिपिकल बॊलीवुड पॊप नंबर की मिसाल है यह गीत। डी. जे सुकेतू ने इसी गीत का एक ज़बरदस्त रीमिक्स वर्ज़न भी बनाया है।

सजीव - यानी कि कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि यह गीत जवाँ दिलों पर राज करने का पूरा माद्दा रखता है। तो चलिए सुनते हैं यह गीत।

अब बचा क्या (अजब प्रेम की गजब कहानी)
आवाज़ रेटिंग - ***1/2



TST ट्रिविया # 13-इस फिल्म "अजब प्रेम की गजब कहानी" में एक प्रमुख किरदार निभा रहे ऐक्टर ने उदिता गोस्वामी के साथ एक रीमिक्स गीत के विडियो में काम कर शुरुआत की थी, उस एक्टर का नाम और उस रीमिक्स गीत का नाम भी बताएं?

सुजॉय - रवानी भरा, जवानी भरा यह गीत हमने सुना। अब कौन सा गीत हम सुनेंगे सजीव?

सजीव - अब एक बहुत ही अलग तरह का गीत सुनवाएँगे हम फ़िल्म 'लंदन ड्रीम्स‍' से। इस फ़िल्म से "जश्न है जीत का", "खानाबदोश" और "मन को अति भावे स‍इयाँ" हम इस शृंखला में सुनवा चुके हैं। क्योंकि इस फ़िल्म के सभी गानें बहुत ही मेलडियस हैं और नए नए प्रयोग और फ़्युज़न सुनने को मिलते हैं, तो क्यों ना इस फ़िल्म की संगीत यात्रा को जारी रखें 'ताज़ा सुर ताल' में।

सुजॉय- बिल्कुल जारी रखेंगे। तो बताइए आज इस फ़िल्म का कौन सा गीत आप सुनवाएँगे और क्या ख़ास बात है इस गीत में।

सजीव - गीत है "जो तुझे जगाए, नींदे तेरी उड़ाए, ख़्वाब है सच्चा वही, नींदों में जो आए, जिसे तू भूल जाए, ख़्वाब वो सच्चा नहीं"।

सुजॉय - बहुत सही बात कही है गीतकार प्रसून जोशी ने। मुझे याद आ रहा है भूतपूर्व राष्ट्रपति डॊ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का कहा हुआ एक विचार कि "Dream is not something that you see while sleeping; dream is something that does not allow you to sleep". है ना वही भाव इस गीत का?

सजीव - वाह! बहुत ख़ूब! श्रोताओं को यह बता दें कि इस गीत को दो बहुत ही प्रतिभा सम्पन्न कलाकारों ने गाया है, एक हैं राहत फ़तेह अली ख़ान और दूसरे शंकर महादेवन। ये दोनों ही शास्त्रीय संगीत में पारंगत हैं और यह गीत का आधार शास्त्रीय होते हुए भी इसमें एक आज के संगीत का अंग है, जिसे हम सॉफ्ट रॉक भी कह सकते हैं।

सुजॉय - शंकर अहसान लॊय का हस्ताक्षर साफ़ सुनई देता है इस गीत में। तो सुनते हैं इस बेहद बेहतरीन, बेहद शानदार गीत को।

ख्वाब (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग - ****1/2



TST ट्रिविया # 14- फिल्म लन्दन ड्रीम्स का वो कौन सा गीत है जो लन्दन के एक मशहूर सगीत हॉल (जहाँ परफोर्म करना हर संगीत प्रेमी का सपना होता है) में फिल्माया गया है?

सुजॉय - वाह! बहुत ही कर्णप्रिय गीत था। और अब आज का तीसरा और आ़ख़िरी नग़मा कौन सा है?

सजीव - सुजॉय, यह जो आज का तीसरा गीत है न, इस गीत के तीन अलग अलग वर्ज़न हैं और तीनों अलग अलग गायकं के गाए हुए हैं। यह है फ़िल्म 'तुम मिले' का शीर्षक गीत "तुम मिले तो जादू छा गया"।

सुजॉय - अच्छा? किन किन गायकों ने गाए हैं इस गीत को?

सजीव - नीरज श्रीधर, जावेद अली, और शफ़क़त अमानत अली ने गाए हैं अलग अलग अंदाज़ों में। नीरज और प्रीतम की जोड़ी ने कई हिट गानें हमें दिए हैं जैसे कि "हरे राम हरे राम", "आहुं आहुं", "चोर बाज़ारी" वगेरह। लेकिन 'तुम मिले' का यह गीत उन सभी गीतों से बिल्कुल अलग हट के है। बहुत ही नर्मोनाज़ुक अंदाज़ का गीत है।

सुजॉय - और बाक़ी के जो दो वर्ज़न हैं उनकी क्या ख़ूबी है?

सजीव - हालाँकि नीरज वाला गीत ही फिल्म का प्रमुख वर्ज़न है, लेकिन जावेद अली और शफ़क़त अमानत अली वाले संस्करण भी कमाल के हैं। जावेद अली के वर्ज़न का टाइटल रखा गया है 'लव रिप्राइज़ वर्ज़न' और अमानत साहब के वर्ज़न का टाइटल है 'रॉक वर्ज़न'। याद है ना इनकी आवाज़ में फ़िल्म 'कभी अलविदा ना कहना' का "मितवा" गीत?

सुजॉय - क्यों नहीं! बिल्कुल याद है। पाक़िस्तान के इस गायक की आवाज़ का असर एक लम्बे समय तक ज़हन में रहता है जिस तरह से 'मितवा' गीत को लोगों ने बहुत बहुत सुना, 'तुम मिले' का यह गीत भी जैसे जैसे हम सुनते जाते हैं, हमारे ज़हन में बसते चले जाते हैं। और इसकी धुन जैसे दिमाग़ पर हावी सी होती जाती है। चलिए सुनते हैं इस गीत को, इसे लिखा है सईद क़ादरी ने, जो भट्ट कैम्प के अब स्थायी गीतकार बन चुके हैं और संगीतकार का नाम तो हम बता ही चुके हैं, प्रीतम। फ़िल्म की तमाम अन्य जानकारियाँ हम फिर किसी दिन देंगे जब हम इस फ़िल्म का कोई दूसरा गाना सुनेंगे। आइए सुनते हैं।

तुम मिले (शीर्षक)
आवाज़ रेटिंग -***



TST ट्रिविया # 15- हाल ही में फिल्म "तुम मिले" का निर्माण कर रही कम्पनी विशेष फिल्म्स के लिए महेश भट्ट ने एक बयान में कहा है कि "फलां" गीतकार को कोई भी उस राशि का १० प्रतिशत नहीं देगा, जिस राशि पर जावेद अख्तर काम करते हैं...यहाँ महेश किस गीतकार के लिए ये कह रहे हैं ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, October 5, 2009

आ ज़माने आ, आजमाले आ...गायक मोहन की आवाज़ में है सपनों को सच करने का हौंसला

ताजा सुर ताल TST (27)

दोस्तों, आज से ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. आज से TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें १ की जगह तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी आज से अगले २० एपिसोडस तक, जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के ६० गीतों में से पहली १० पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

तो चलिए आज के इस नए एपिसोड की शुरुआत करें, दोस्तों सुजॉय अभी भी छुट्टियों से नहीं लौटे हैं, तो उनकी अनुपस्तिथि में मैं सजीव सारथी एक बार फिर आपका स्वागत करता हूँ. इस वर्ष लगभग ४ महीनों तक सिनेमा घरों के मालिकों और फिल्म निर्माताओं के बीच ठनी रही और ढेरों फिल्मों का प्रदर्शन टल गया. यही वजह है कि आजकल एक के बाद एक फिल्में आती जा रही हैं और रोज ही किसी नयी फिल्म का संगीत भी बाज़ार में आ रहा है. "लन्दन ड्रीम्स" एक ऐसी फिल्म है जिसका सिनेमाप्रेमियों को बेसब्री से इंतज़ार होगा. इसकी एक वजह इस फिल्म का संगीत भी है, शंकर एहसान और लॉय की तिकडी ने बहुत दिनों बाद ऐसा जलवा बिखेरा है. ढेरों नए गायकों को भी इस फिल्म में उन्होंने मौका दिया है. अभिजित घोषाल से तो हम आपको मिलवा ही चुके हैं इस कार्यक्रम में. आज सुनिए एक और नए गायक मोहन और साथियों का गाया एक और जबरदस्त गीत -"खानाबदोश". इस गीत में एक बहुत ख़ास रेट्रो फील है. शुरुआत में चुटकी और कोरस का ऐसा सुन्दर इस्तेमाल बहुत दिनों बाद किसी गीत में सुनने को मिला है, मोहन की आवाज़ में जबरदस्त संभावनाएं हैं, बहुत कोशिशों के बावजूद भी मैं उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं ढूंढ पाया. 'आ ज़माने आ..." से गीत कुछ ऐसे उठता है जिसके बाद आप उसके सम्मोहन में ऐसे बंध जाते हैं कि स्वाभाविक रूप से ही आप गीत को दुबारा सुनना चाहेंगे. मेरी नज़र में तो ये इस साल के श्रेष्ठतम गीतों में से एक है, संगीत संयोजन भी एक दम नापा तुला, और प्रसून के बोल भी कुछ कम नहीं...इससे बेहतर कि मैं कुछ और कहूं आप खुद ही सुनकर देखिये, हो सकता है पहली झलक में आपको इतना न भाए पर धीरे धीरे इसका नशा आप भी भी चढ़ जायेगा ये तय है

खानाबदोश (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग - ****१/२.



TST ट्रिविया # ०१ - शंकर महादेवन ने शिवमणि और लुईस बैंकस के साथ मिलकर एक संगीत टीम बनायीं थी, क्या आप जानते हैं उस ग्रुप का नाम ?

चलिए आगे बढ़ते हैं. अगला गीत है एक ऑफ बीट फिल्म का. मशहूर साहित्यकार उदय प्रकाश की कहानी पर आधारित "मोहनदास" को शहरों के मल्टीप्लेक्स में काफी सराहना मिली है. संगीतकार हैं विवेक प्रियदर्शन और गीतकार हैं यश मालविय. सीमित प्रचार के बावजूद फिल्म को अच्छे सिनेमा के कद्रदानों ने पसंद किया है, जो कि ख़ुशी की बात है, फिल्म में सभी गीत पार्श्व में हैं....और ये गीत बहुत ही मधुर है, मेलोडी लौटी है विवेक के इस गीत में, शब्द भी अच्छे हैं सुनिए, और आनंद लीजिये -

नदी में ये चंदा (मोहनदास)
आवाज़ रेटिंग - ****



TST ट्रिविया # ०२ - फिल्म मोहनदास के निर्देशक मजहर कामरान ने एक मशहूर निर्देशक की फिल्म के लिए बतौर सिनेमेटोग्राफर भी काम किया है, क्या आप जानते हैं कौन है वो निर्देशक ?

आज का अंतिम गीत हिन्दुस्तान की सबसे महँगी फिल्म का थीम है, अमूमन थीम संगीत में शब्द नहीं होते पर यहाँ बोल भी है और मज़े की बात ये है कि इस थीम के बोल फिल्म के अन्य गीतों के मुकाबले अधिक अच्छे भी हैं. संगीत है ऑस्कर विजेता ऐ आर रहमान का. रहमान साहब की सबसे बड़ी खासियत ये है कि उनका संगीत अपने आप में बहुत होता है एक पूरी कहानी के लिए, उनके वाध्य बोलते हुए से प्रतीत होते हैं, थीम संगीत की अगर बात की जाए तो इसकी परंपरा भी रहमान साहब ने ही डाली थी, फिल्म बॉम्बे का थीम संगीत आज भी रोंगटे खड़े कर देता है, सत्या में विशाल भारद्वाज का थीम संगीत फिल्म के गीतों से भी अधिक लोकप्रिय हुआ था. "ब्लू" का ये थीम संगीत भी जबरदस्त ऊर्जा से भरपूर है. संगीत प्रेमियों के लिए ट्रीट है ये. गायकों कि एक बड़ी फौज है इस थीम में. नेहा कक्कड़ की आवाज़ आपने सुनी होगी इंडियन आइडल में में, दिल्ली की इस गायिका की बड़ी बहन सोनू कक्कड़ भी बेहद मशहूर गायिका हैं दिल्ली की. दोनों बहनों की आवाजें हैं इस गीत में.साथ में हैं रकीब आलम, जसप्रीत, ब्लाज़ और दिलशाद भी. इस मस्त संगीत का आनंद लें -

ब्लू थीम (ब्लू)
आवाज़ रेटिंग -****



TST ट्रिविया # ०३ - ब्लू के इस थीम ट्रैक में बोल किसने लिखे हैं, क्या आप जानते हैं ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, September 28, 2009

जश्न है जीत का...सा रे गा मा चुनौती से नाबाद लौटे प्रोमिसिंग गायक अभिजीत घोषाल अपने "ड्रीम्स" लेकर अब पहुँच गए हैं "लन्दन"

ताजा सुर ताल (25)

ताजा सुर ताल में आज सुनिए उभरते हुए गायक अभिजीत घोषाल का "लन्दन ड्रीम्स"

सुजॉय- सजीव, क्या आपने एक बात पर ग़ौर किया है?

सजीव- कौन सी बात?

सुजॉय - यही कि आजकल जो भी फ़िल्में बन रही हैं, उनमें से ज़्यादातर के शीर्षक अंग्रेज़ी हैं। जैसे कि 'ब्लू', 'ऑल दि बेस्ट', 'वेक अप सिद', 'व्हट्स योर राशी?', 'वांटेड', 'थ्री', वगैरह वगैरह ।

सजीव- बात तो सही है तुम्हारी। तो क्या आज हम किसी ऐसी ही फ़िल्म का गीत सुनवाने जा रहे हैं जिसका शीर्षक अंग्रेज़ी में है?

सुजॉय - बिल्कुल ठीक समझे आप। आज हम चर्चा करेंगे 'लंदन ड्रीम्स‍' की और इस फ़िल्म का एक गीत भी बजाएँगे। इस फ़िल्म के निर्माता हैं आशिन शाह, निर्देशक हैं विपुल शाह, संगीत शंकर अहसान लोय का, गीतकार प्रसून जोशी, और इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं सलमान ख़ान, अजय देवगन, आसिन थोट्टुम्कल, रणविजय सिंह, बृंदा पारेस्ख, ओम पुरी, ख़ालिद आज़्मी और आदित्य रोय कपूर।

सजीव- यानी कि मल्टि-स्टारर फ़िल्म है यह। और ये जो रणविजय है, ये वही है ना MTV Roadies वाले?

सुजॉय- हाँ बिल्कुल वही है।

सजीव- पिछले साल 'रॉक ऑन' ने मास और क्लास दोनों से तारीफ़ें लूटी थी, और फ़रहान अख़्तर की भी काफ़ी सराहना हुई। तो इसी के मद्देनज़र विपुल शाह ने तय किया कि वो भी इसी फोर्मुले को अपनाएँगे।

सुजॉय - कौन सा फार्मूला सजीव?

सजीव- यही बैंड्स+ म्युज़िक + ड्रामा, और क्या!

सुजॉय - अच्छा! और इसीलिए 'रॉक ऑन' वाले संगीतकार तिकड़ी को ही लिया गया है।

सजीव- हो सकता है, लेकिन मैने तो सुना है कि क्योंकि इस फ़िल्म का एक अहम पक्ष संगीत का रहेगा, इसीलिए निर्माता चाहते थे कि ए. आर. रहमान इसका म्युज़िक करें, लेकिन बात बन नहीं पायी।

सुजॉय - अच्छा, खैर शंकर एहसान लॉय भी निराश करने वालों में से नहीं हैं, मैंने भी इस अल्बम के सभी गीत सुनें हैं और मेरे ख्याल से ये इस साल की बेहतरीन अल्बम्स में से एक है, जिसमें में लगभग सभी गीत एक से बढ़कर एक हैं, पर ताज्जुब इस बात का है कि फिल्म के कुल ८ गीतों में से किसी में भी फीमेल स्वर नहीं है....सोचता हूँ कि आखिर आसीन कर क्या रही है फिल्म में :), हाँ एक बात और, बहुत से नए गायकों ने इन गीतों को अपनी आवाज़ दी है, धुरंधर शंकर, रूप कुमार राठोड और राहत फतह अली खान आदि के साथ साथ...

सजीव - हाँ और उन्हीं नए गायकों में से एक आज तुम्हारे और मेरे साथ इस कांफ्रेंस में जुड़ने भी वाले हैं ...जानते हो कौन हैं वो ?

सुजॉय - कहीं ये अभिजीत घोषाल तो नहीं... मैं जानता हूँ कि आपको उनका गाया "जश्न है जीत का..." इन दिनों बहुत भा रहा है... । वाकई ...यह एक 'पावर पैक्ड नंबर' है। इस गीत में आप इलेक्ट्रॊनिक और रॊक के साथ साथ अरबी संगीत की भी झलक पाएँगे। सजीव ये अभिजीत घोषाल वही हैं जो ज़ी टीवी के सा रे गा मा चैलेंज में लगातार १२ बार विजेयता बने थे। मेरे ख्याल से ये रिकॉर्ड अभी तक कोई तोड़ नहीं पाया है

सजीव - बिलकुल सुजॉय.....लीजिये आ गए हैं अभिजित....स्वागत है आपका...

अभिजित -शुक्रिया सुजॉय और सजीव आपका....मैं हिंद युग्म का हिस्सा तो पहले ही बन चुका हूँ....आप के इस कार्यक्रम की बदौलत आज मेरे इस ताजा गीत पर भी कुछ चर्चा हो जायेगी...

सजीव- अभिजीत सबसे पहले तो इस बड़ी फिल्म में इतने महत्वपूर्ण गीत के लिए बधाई....सा रे गा मा से लन्दन ड्रीम तक पहुँचने में काफी लम्बा समय लगा आपको...इस दौरान हुए संघर्ष के बारे में कुछ बताएं...

अभिजित- सजीव मैं आज आपको कुछ ऐसा बताता हूँ जो कभी मैंने किसी को नहीं बताया...जिन दिनों मैं सा रे गा मा के चैलेन्ज राउंड में लगातार ११ बार जीतने के बाद स्वेच्छा से अपना नाम वापस ले चुका था, कई लोगों ने सोचा कि शायद चैनल वालों ने इन पर दबाब डाला होगा, पर ऐसा नहीं था. जब मैं अपनी ८ वीं चुनौती पार कर चुका था तब मेरी माँ की तबियत अचानक खराब हो गयी.....पर मुझे घरवालों ने यह बात मालूम नहीं होने दी, बाद में जब मुझे अपने दोस्त के माध्यम से उनकी नाज़ुक हालत की खबर मिली, तब मुझे तुंरत इलाहाबाद के लिए कूच करना पड़ा...आप शायद जानते होंगें कि मैं मूल रूप से इलाहाबाद का रहने वाला हूँ, बाद में हम लोग माँ के इलाज के लिए मुंबई आ गए.....आप यकीन नहीं करेंगें, मैं सुबह बिना किसी को बताये माँ को अस्पताल पहुंचा कर वहां उनके लिए पर्याप्त इंतजाम कर स्टूडियो पहुँचता था गाने के लिए, पर कभी किसी से मैंने इन सब का जिक्र नहीं किया....आप शायद यकीन नहीं करेंगें, सा रे गा मा के वो ११ एपिसोड जिसमें मैं जीता था उनमें से मैंने मात्र २ एपिसोडस का प्रसारण ही टी वी पर देख पाया, वो भी घर पर नहीं....एक एपिसोड तो मैंने लखनऊ के एक छोटे से ढाबे में रात का खाना खाते वक़्त देखा....वहां बैठे हुए लोग मेरी शक्ल देख कर कहने लगे - "अरे भाई साहब ये तो आपकी तरह लगता है", मैंने भी जवाब में बस इतना ही कहा -"हाँ मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा है...", उस छोटे से ढाबे में बैठकर आप इससे ज्यादा क्या कह सकते थे...

सुजॉय - और अब माँ...?

अभिजीत - अभी इसी साल मार्च में मैंने उन्हें सदा के लिए खो दिया. उस हादसे के बाद लगभग ५ साल वो जीवित रही...मैं कभी भी ५ दिन से अधिक घर से दूर नहीं रहा...यही वजह है कि मैंने कभी USA का टूर नहीं किया, क्योंकि वहां जाने के लिए मुझे कम से कम १० दिन तक दूर रहना पड़ता...आप समझ सकते हैं ..ये सब मेरे लिए कितना मुश्किल था ...घर का एक कमरा अस्पताल सरीखा था ...माँ को निरंतर देखबाल की आवश्यकता थी...

सजीव - बिलकुल अभिजीत हम लोग समझ सकते हैं, आप अपने दुःख में हमें भी शरीक मानें...ये शायद आपकी माँ का आशीर्वाद ही है जो आज आप इस बड़ी फिल्म का हिस्सा हैं..

अभिजीत - हाँ बिलकुल, माँ को हमेशा ये लगता था कि मैं उनकी वजह से पीछे रह गया हूँ, हालाँकि ऐसा नहीं था, क्योंकि लगतार मैं काम कर रहा था. लुईस बैंक के साथ ढेरों प्रोजेक्ट का मैं हिस्सा रहा हूँ, उस्ताद विलायत राम जी, शिव जी, जैसे गुरुओं का हमेशा ही आशीर्वाद मिला मुझे, और अब तो मुझे लगता है जैसे माँ ने स्वर्ग में जाकर मेरी तकदीर के बचे कुचे दोष भी दूर हटा दिए हैं, तभी तो पहले किसान में "झूमो रे" मिला और अब ये लन्दन ड्रीम्स, ख़ुशी हुई जानकार कि आप सब को ये गीत पसंद आया है, मैं आपको बता दूं भारत में ही नहीं विदेशों से भी अल्बम को काफी अच्छे रीव्यूस मिल रहे हैं...

सुजॉय- आपने बंगला सा रे गा मा प् होस्ट भी किया....सोनू निगम, शान जैसे बड़े गायकों ने भी होस्टिंग के काम को बेहद मुश्किल करार दिया....आपका अनुभव कैसा रहा....

अभिजीत- मेरा तो बहुत बढ़िया रहा सुजॉय... ये एक ऐसा काम था जिसे मैंने बहुत एन्जॉय किया, उसकी वजह एक ये भी है कि मैं बच्चों से बहुत जल्दी खुद को जोड़ लेता हूँ, और बच्चे भी मुझसे बहुत जल्दी घुल मिल जाते हैं, यहाँ तक कि जब मेरी पहली एल्बम जो की बांगला में थी, उसमें मैंने उस कार्यक्रम के दो सबसे प्रोमिसिंग बच्चों से ओरिजनल गाने गवाए थे...आज भी वो सब मुझसे जुड़े हुए हैं और अपनी हर बात मुझसे शेयर करते हैं...

सजीव - अभिजीत, आप इलाहाबाद से हैं और अभी हाल ही में इस शहर पर एक गाना भी बना है....इलाहाबाद में बीते अपने शुरूआती दिनों पर कुछ हमारे श्रोताओं को बताईये...

अभिजीत - सजीव स रे गा मा में आने से पहले मैं एक बैंकर था, acedamically भी मेरा background बहुत स्टोंग रहा, मेरा दायरा हमेशा से ही ज़रा बुद्दी संपन्न लोगों का रहा, आप देखिये मेरे यदि १०० दोस्त होंगे तो उनमें से कम से कम ९० जन आई ऐ अस अधिकारी होंगे....मैं भी उन्हीं में से एक होता....अब ये मेरी खुशकिस्मती है कि मैं आज वो काम कर पा रहा हूँ जिसमें मेरी खुद की रूचि है, अभी ३ साल पहले ही मैंने नौकरी छोड़ी है, मैं हालाँकि बहुत जिम्मेदारी से काम को अंजाम देने वाला अधिकारी रहा, जब तक भी नौकरी की पर आप जानते हैं रचनात्मक लोग बहुत दिनों तक ९ से ५ के ढाँचे में बंध कर नहीं रह सकते...

सुजॉय - शंकर एहसान लॉय तक कैसे पहुंचना हुआ ?

अभिजीत - शंकर से लुईस के माध्यम से ही मिलना हुआ था, लुईस शंकर और शिव मणि का एक ग्रुप हुआ करता था आपको याद होगा "सिल्क" नाम का...शंकर जब पहली बार मिले तो खुद ही बोले..."अरे अभिजित आप तो वही....अरे क्या गाते हो भाई....". वो बहुत बड़े कलाकार हैं. आप जानते हैं कि इंडस्ट्री में निर्माताओं को विश्वास दिलाना बहुत मुश्किल होता है. पर विपुल जी को जब शंकर ने मेरा गीत सुनाया तो भाग्यवश उन्हें भी पसंद आ गया...

सजीव - इस फिल्म में दो बड़े स्टार हैं आपका गीत इस पर फिल्माया गया है....

अभिजीत - सच कहूँ तो मुझे भी अभी तक पक्का नहीं पता, पर शायद ये गीत अजय देवगन पर होना चाहिए....फिल्म की कहानी के हिसाब से....

सुजॉय - जब गीत रिकॉर्ड हो रहा था, तब कैसा मौहौल था स्टूडियो में उस बारे में कुछ बताईये....शंकर ने क्या टिपण्णी की जब गीत ख़तम हुआ.....क्या गीतकार प्रसून भी वहां मौजूद थे..

अभिजीत- नहीं प्रसून तो मौजूद नहीं थे....पर उनका लिखा हुआ मैंने पढ़ा...और बस करीब २० मिनट में गाना रिकॉर्ड हो गया...शंकर भाई ने रिकॉर्डिंग के बाद कहा कि अभिजीत तुमने बहुत ही अच्छा गाया.....मैंने भी उनसे कहा....कि गीत ये पंक्तियाँ देखिये.....

छाले कई, तलवों में चुभे
भाले कई, जलती हुई कहीं थी जमींन,
ताले कई, दर्द संभाले कई,
हौंसलों में नहीं थी कमी,
हम अभी अड़ गए, आँधियों से लड़ गए,
मैंने धकेल के अँधेरे, छीन के ले ली रोशिनी,
मेरे हिस्से के थे सवेरे, मेरे हिस्से की जिन्दगी....

बिलकुल मुझे अपने जीवन की कहानी लगी...गाते हुए भी, और मेरे ही क्या आपकी भी...मेरा मतलब जो जो हम जैसे संघर्षशील कलाकार हैं उन सब का है ये गीत....

सजीव - बिलकुल सही है अभिजीत...अच्छा...इस फिल्म में आपके अलावा भी कुछ नए गायकों ने अपनी आवाज़ मिलायी है, जैसे "खानाबदोश" मोहन की आवाज़ में बहुत खूब जमा है, पंजाबी गायक फिरोज़ खान का भी एक गीत. खुद शंकर ने गाया है गीत "ख्वाब" जिसकी कुछ पंक्तियाँ भी आपको बहुत पसंद है ....

अभिजीत - हाँ ये पंक्तियाँ इस फिल्म का भी सार है और कुछ कुछ मेरी अपनी सोच भी इनसे मिलती है. आप भी देखिये -

मंजिलों पे त्यौहार है,
लेकिन वो हार है, क्या ख़ुशी अपनों के बिन,
है अधूरी हर जीत भी सरगम संगीत भी
अधूरा है अपनों के बिन,
ख्वाबों के बादल छाने दो लेकिन,
रिश्तों की धूप बचा के बरसना,
कहती है हवाएं, चूम ले गगन को,
पंखों को खोल दो छोड़ दो गरजना.....


सुजॉय -वाह क्या बात है अभिजीत...और कौन कौन सी फिल्में हैं आने वाली जिसमें हमें आपकी आवाज़ सुनने को मिलेगी

अभिजित - प्रोजेक्ट तो बहुत से हैं पर जब तक मुक्कमल न हो जाएँ उनके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता....हाँ पर मैं आपको बता दूं की बहुत जल्दी यानी कि दिसम्बर जनवरी के आस पास मैं और आप एक बड़े प्रोजेक्ट पर यहाँ बैठे बात कर रहे होंगें.

सजीव - अभिजीत उन दिनों जब आप सा रे गा मा में परफोर्म करते थे तब हम भी उन श्रोताओं में से थे जो आपकी जीत के लिए SMS किया करते थे....आप आपको इस बड़ी फिल्म के लिए गाते हुए देखकर बहुत अधिक ख़ुशी हो रही है....आने वाला वक़्त हिंदी सिनेमा के शीर्ष गायकों की श्रेणी में आपका भी नाम जोड़े....स्वीकार करें मेरी सुजॉय और तमाम हिंद युग्म टीम की तरफ से ढेरों शुभकामनाएँ...

अभिजीत - शुक्रिया सजीव और सुजॉय....मेरी तरफ से भी हिंद युग्म परिवार के सभी सदस्यों को ढेर सारा प्यार

सुजॉय - तो दोस्तों सुनिए लन्दन ड्रीम्स से अभिजीत घोषाल का गाया ये शानदार गीत, "जश्न है जीत का", याद रखिये ये सिर्फ एक डेमो उद्देश्य से मात्र ३२ kbps की क्वालिटी पर आपके लिए बजाय जा रहा है, उच्च क्वालिटी में सुनने के लिए ओरिजनल एल्बम ही खरीदें.



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Thursday, September 3, 2009

"जी" पीढी का 'जागो मोहन प्यारे...' है "यो" पीढी में 'वेक अप सिद...'

ताजा सुर ताल (19)

ताजा सुर ताल में आज सुनिए शंकर एहसान लॉय और जावेद अख्तर का रचा ताज़ा तरीन गीत

सजीव- सुजॉय, जब भी हमें किसी नई फ़िल्म के लिए पता चलता है कि उसके संगीतकार शंकर एहसान लॉय होंगे, तो हम कम से कम इतना ज़रूर उम्मीद करते हैं कि उस संगीत में ज़रूर कुछ नया होगा, कोई नया प्रयोग सुनने को मिलेगा। तुम्हारे क्या विचार हैं इस बारे में?

सुजॉय - जी हाँ बिल्कुल, मैं आप से सहमत हूँ। पिछले दो चार सालों में उनकी हर फ़िल्म हिट रही है। और आजकल चर्चा में है 'वेक अप सिद' का म्युज़िक।

सजीव- मैं बस उसी पर आ रहा था कि तुमने मेरी मुँह की बात छीन ली। तो आज हम बात कर रहे हैं शंकर एहसान लॉय के तिकड़ी की और साथ ही उनकी नई फ़िल्म 'वेक अप सिद' की। लेकिन सुजॉय, मुझे इस फ़िल्म के गीतों को सुनकर ऐसा लगा कि इस फ़िल्म के गीतों में बहुत ज़्यादा नयापन ये लोग नहीं ला पाए हैं।

सुजॉय - सची बात है। पिछले साल 'रॊक ऒन' में जिस तरह का औफ़ बीट म्युज़िक इस तिकड़ी ने दिया था, इस फ़िल्म के गानें भी कुछ कुछ उसी अंदाज़ के हैं।

सजीव- हो सकता है कि इस फ़िल्म में नायक सिद के व्यक्तित्व को इसी तरह के गीतों की ज़रूरत हो! इस फ़िल्म का शीर्षक गीत, जिसे शंकर महादेवन ने गाया है, आज हम अपने श्रोताओं को सुनवा रहे हैं। इस गीत में जावेद अख़तर ने उस कश्मकश, युवावस्था की परेशानियाँ और 'आइडेन्टिटी क्राइसिस' को उभारने की कोशिश की है जिनसे हर युवक आज की दौर में गुज़रता है। पर न तो जावेद साहब ही यहाँ कोई करिश्मा कर पाए हैं न ही संगीतकार तिकडी ने ही कोई चमत्कारिक तत्व डाला है गीत में...

सुजॉय - इस शीर्षक गीत का एक रॉक वर्ज़न भी बनाया गया है जो गीत से ज़्यादा एक 'अलार्म' घड़ी ज़्यादा प्रतीत होती है। लेकिन अच्छी रीमिक्स का नमूना पेश किया है इस संगीतकार तिकड़ी ने। एक बार फिर 'रॉक ऑन' की याद दिलाता है यह गीत। सजीव, इस फ़िल्म के दूसरे गीतों के बारे में आपका क्या ख़याल है?

सजीव- शंकर का ही गाया एक और गीत है इस फ़िल्म में "आज कल ज़िंदगी", जो तुम्हे 'दिल चाहता है' के "कैसी है ये रुत के जिसमें फूल बन के दिल खिले" गीत की याद ज़रूर दिलाएगा।

सुजॉय - वाक़ई?

सजीव- हाँ, "लाइफ़ इज़ क्रेज़ी" गीत पेप्पी है जिसे शंकर ने उदय बेनेगल के साथ गाया है रॉक शैली में। कविता सेठ और अमिताभ भट्टाचार्य का गाया "इकतारा" भी कर्णप्रिय है। पर इस गीत को शंकर एहसान लॉय ने नहीं बल्कि अमित त्रिवेदी ने स्वरबद्ध किया है. मुझे लगता है ये इस फिल्म का एक और ऐसा गीत है जिसे इस शृंखला का हिस्सा बनना चाहिए

सुजॉय - ये वही अमित त्रिवेदी वही हैं न जिन्होने 'देव-डी' में संगीत देकर काफ़ी नाम कमाया था?

सजीव- बिल्कुल वही। एक और उल्लेखनीय गीत इस फ़िल्म का है क्लिन्टन सेरेजो का गाया हुआ "क्या करूँ"। क्लिन्टन की आवाज़ हम ने अक्सर पार्श्व में सुना है शंकर एहसान लॉय के गीतों में। यह भी एक पेप्पी गीत है, जिसके साथ सेरेजो ने पूरा न्याय किया है।

सुजॉय- सजीव, मुझे तो लगता है 'वेक अप सिद' की कहानी कुछ अलग हट के होगी क्योंकि इस फ़िल्म में रणबीर कपूर की नायिका बनी हैं कोनकोना सेन शर्मा, जो ज़्यादातर कलात्मक और पैरलेल सिनेमा के लिए जानी जाती है। मेरा ख़याल है निर्माता करण जोहर और नवोदित निर्देशक अयान मुखर्जी से कुछ नए और अच्छे की उम्मीद की जा सकती है।

सजीव - बिलकुल कोंकण मेरी सबसे पसंदीदा अभिनेत्रियों में हैं और वो इस फिल्म में तो मुझे इस फिल्म का बेसर्ब्री से इंतज़ार है. प्रोमोस देख कर बिलकुल लगता है कि फिल्म काफी युवा है. पर उस हिसाब से मुझे इस फिल्म का संगीत एक "लेट डाउन" ही लगा. और हाँ अयान मुखर्जी से याद आया कि इस उभरते निर्देशक ने इससे पहले बतौर सहायक निर्देशक आशुतोश गोवारिकर के साथ 'स्वदेस' में और करण जोहर के साथ 'कभी अलविदा ना कहना' में काम किया है। सुजॉय, शंकर- अहसान और लॉय के बारे में कुछ बताओ हमारे पाठकों को।

सुजॉय - सब से पहले तो यही कहूँगा कि एहसान का पूरा नाम है एहसान नूरानी और लॉय का पूरा नाम है लॉय मेन्डोन्सा; शंकर का पूरा नाम तो आप जानते ही हैं। आम तौर पर लोगों को लगता है कि शंकर-एहसान-लॉय ही फ़िल्म संगीत जगत की पहली संगीतकार तिकड़ी है।

सजीव- मैं भी तो यही मानता हूँ।

सुजॉय - नहीं, बहुत कम लोगों को यह पता है कि गुज़रे दौर में एक बहुत ही कमचर्चित संगीतकार तिकड़ी रही है लाला-असर-सत्तार। सुनने में लाला असर सत्तार एक ही आदमी का नाम प्रतीत होता है, लेकिन हक़ीक़त में ये तीन अलग अलग शख़्स थे।

सजीव- अच्छा हाँ नाम तो कुछ सुना हुआ सा लग रहा है, पर वाकई एक ही आदमी का नाम लगता है.

सुजॉय- शंकर अपने करीयर की शुरुआती दिनों में विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाया करते थे जब कि अहसान नूरानी की-बोर्ड वादक थे और लॉय संगीत संयोजक का काम किया करते थे। उन्ही विज्ञापनों के दिनों में इन तीनो की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि साथ साथ काम करने का निश्चय कर लिया।

सजीव- बतौर संगीतकार शकर अहसान लॊय की पहली फ़िल्म थी मुकुल एस. आनंद की फ़िल्म 'दस', जिसमें सलमान ख़ान और संजय दत्त थे। "सुनो ग़ौर से दुनियावालों बुरी नज़र ना हम पे डालो" गीत बेहद मशहूर हुआ था। लेकिन मुकुल एस. आनंद की असमय निधन से फ़िल्म पूरी ना हो सकी लेकिन म्युज़िक रिलीज़ कर दिया गया। उसके बाद 'मिशन कश्मीर', 'दिल चाहता है', 'कल हो ना हो', 'लक्ष्य', 'अरमान', 'क्यों हो गया ना!', 'फिर मिलेंगे', 'रुद्राक्ष', 'एक और एक ग्यारह', 'कभी अल्विदा ना कहना', 'झूम बराबर झूम', 'बण्टी और बबली', 'रॉक ऑन' जैसी फ़िल्मों ने इस तिकड़ी को बेहद लोकप्रिय संगीतकारों की कतार में शामिल कर लिया।

सुजॉय - तो सजीव, शकर एहसान और लॉय को 'वेक अप सिद' के संगीत की कामयाबी के लिए हम शुभकामनाएँ देते हैं और अपने श्रोताओं को सुनवाते हैं फ़िल्म 'वेक अप सिद' का टाइटल ट्रैक ख़ुद शंकर महादेवन की ही आवाज़ में।

सजीव- ज़रूर...आवाज़ की टीम ने इस गीत को दिए हैं २.५ अंक ५ में से....अब श्रोता फैसला करें कि उनकी नज़र में इस गीत को कितने अंक मिलने चाहिए....गीत के बोल इस तरह हैं -

सुनो तो ज़रा हमको है ये कहना,
वक़्त है क्या तुमको पता है न,
सो गयी रात जागे दिन है अब जागना,
आँखें मसलता है सारा ये समां,
आवाजें भी लेती है अंगडायियाँ....
वेक अप सिद....सारे पल कहें,
वेक अप सिद....चल कहीं चलें...
वेक अप सिद....सब दिशाओं से आ रही है सदा
सुन सको अगर सुनों...
वेक अप....

ये जो कहें वो जो कहें सुन लो,
अब जो सही दिल लगे चुन लो,
करना है क्या तुम्हें ये तुम्हीं करो फैसला,
ये सोच लो तुमको जाना है कहाँ,
तुम ही मुसाफिर तुम्हीं ही तो हो कारवां....
वेक अप सिद....

आज ये देखो कल जैसा ही न हो,
आज भी यूं न तुम सोते न रहो,
इतने क्यों सुस्त हो कुछ कहो कुछ सुनो,
कुछ न कुछ करो,
रो पडो या हंसो,
जिंदगी में कोई न कोई रंग भरो....
वेक अप सिद....


और अब सुनिए ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 2.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.आज के दौर का एक सफल संगीतकार/गायक जिसने शुरुआत एक धारावाहिक निर्माता के रूप में की थी. १९९८ में सलमान खान अभिनीत फिल्म में उन्होंने पहली बार संगीत निर्देशन किया था. पहचानिये इस फनकार को और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब एक बार दिया तनहा जी ने, बधाई जनाब...विनोद कुमार जी, शमिख फ़राज़ जी, मंजू गुप्ता जी, और रोहित जी आप सब ने अपनी राय रखी जिसके लिए आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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