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Friday, January 30, 2009

"केसरिया बालमा..", मांड एक - फनकार अनेक


राजस्थान के राजाओं की रूमानी कहानियों पर आधारित लोक गीत हैं जिन्हें मांड कहा जाता है. रेगिस्तान की मिटटी में रचे बसे इस राग पर जाने कितनी रचनाएँ बनी, जब भी किसी गायक/गायिका ने मांड को स्वर दिया सुनने वालों के जेहन में ऊंठों के गुजरते काफिलों पर गाते बंजारों की यायावरी जीवंत हो गई.

मांड ने हमेशा से संगीत प्रेमियों के के दिलों पर राज किया है. देशी- विदेशी सब पर इसने अपना जादू चलाया है. सही मायनों में मांड राजस्थानी लोक संस्कृति की सच्ची पहचान है. मांड के बारे में में संजय पटेल भाई ने हमें जानकारी दी कि पंडित अजय चक्रवर्ती के शोधों के अनुसार मांड के कई रंग होते है,और तक़रीबन सौ तरह की माँडें गाई बजाई जातीं रहीं हैं.

"केसरिया बालमा..." की धुन से हर संगीत प्रेमी परिचित है. ये लोक गीत मांड का एक शुद्धतम रूप है. बरसों बरस जाने कितने फनकारों ने इसे अपनी आवाज़ में तराशा. इसे गाने बजाने के मोह से शायद ही कोई बच पाया हो. यहाँ तक कि आज के पॉप गायक/ गायिकाएं भी इसके सम्मोहन में डूबे नज़र आए हैं. चलिए अब बातों को विराम देते हैं और आपको सुनवाते हैं मुक्तलिफ़ गायक /गायिकाओं की आवाज़ में "केसरिया" रंग रंगा राग मांड.

सबसे पहले सुनिए अल्लाह जिला बाई के कंठ स्वरों का नाद -


शुभा मुदगल के अंदाज़ का आनंद लें -


अकबर अली का निराला अंदाज़ -


ज़रीना बेगम -


लता मंगेशकर ने भी इसे गाया फ़िल्म "लेकिन" में -


पॉप/रॉक संगीत के अगुवा पलाश सेन भी पीछे नही रहे -


उम्मीद है कि "मिटटी के गीत" शृंखला की ये प्रस्तुति आपको पसंद आई होगी...जल्द ही मिलेंगें किसी अन्य प्रदेश के लोक संगीत का जायका लेकर.



Monday, December 22, 2008

सुनिए मुकेश के गाये दुर्लभ गैर फिल्मी ग़ज़लों का संकलन


महान गायक मुकेश के बारे में हम आवाज़ पर पहले भी कई बार बात कर चुके हैं. संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर जी का संस्मरण हमने प्रस्तुत किया था, साथ ही मशहूर संगीत विशेषज्ञ संजय पटेल जी ने उन पर एक विशेष प्रस्तुति दी थी, तो तपन शर्मा जी ने आप सब के लिए लेकर आ चुके हैं उनका जीवन परिचय और संगीत सफर की तमाम जानकारियाँ. हमारे कुछ श्रोताओं ने हमसे फरमाईश की, कि हम उन्हें मुकेश जी के गाये कुछ गैर फिल्मी गीतों और ग़ज़लों से भी रूबरू करवायें. तो आज हम अपने श्रोताओं के लिए लेकर आए हैं, मुकेश की गैर फिल्मी ग़ज़लों का एक नायाब गुलदस्ता...

सुनिए और आनंद लीजिये -

Saturday, October 11, 2008

अँधेरी रात का सूरज - राकेश खंडेलवाल के बहुप्रतीक्षित काव्य संग्रह का ऑनलाइन विमोचन

कौन हूँ मैं, ये मैं भी नहीं जानता, आईने का कोई अक्स बतलायेगा असलियत क्या मेरी, मैं नहीं मानता..."

अपने ब्लॉग गीत कलश पर ये परिचय लिखने वाले राकेश खंडेलवाल जी ख़ुद को जाने या न जाने पर समस्त ब्लॉग्गिंग जगत उन्हें उनकी उत्कृष्ट कविताओं के माध्यम से जानता भी है और पहचानता भी है. आज उनकी प्रतीक्षित पुस्तक "अँधेरी रात का सूरज" का लोकार्पण है. चूँकि राकेश जी का प्रवास अमेरिका में है तो औपचारिक विमोचन आज राजधानी मंदिर औडीटोरियम में, वर्जीनिया और वाशिंगटन हिन्दी समिति द्वारा शाम ६.३० बजे डा० सत्यपाल आनंद (उर्दू,हिन्दी,पंजाबी और अंग्रेजी के विश्व प्रसिद्ध लेखक व कवि ), कनाडा से समीर लाल, न्यू जर्सी से अनूप एवं रजनी भार्गव, राले (नार्थ केरोलाइना) से डा० सुधा ढींगरा, न्यू जर्सी से ही सुरेन्द्र तिवारी, फिलाडेल्फिया से घनश्याम गुप्ता की उपस्थिति में होना है, जहाँ स्थानीय कवि एवं साहित्यकारों में श्री गुलशन मधुर ( भारत में विविध भारती के उद्घोषक रहे हैं ) मधु माहेश्वरी, डा० विशाखा ठाकर, बीना टोडी, रेखा मैत्र, डा० सुमन वरदान, डा० नरेन्द्र टंडन भी उपस्तिथ रहेंगे ऐसी सम्भावना है.

उधर सीहोर में पुस्तक के प्रकाशक, शिवना प्रकाशन ने जो आयोजन रखा है उसमें अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों की जानी मानी कवियित्री मोनिका हठीला के हाथों विमोचन होगा । वहीं हिंदी की मनीषी विद्वान तथा प्रोफेसर डॉ श्रीमती पुष्पा दुबे "अंधेरी रात का सूरज" पर अपनी विशेष टिप्‍पणी करेंगीं । इस आयोजन में शहर के सभी कवि साहित्यकार तथा पत्रकार उपस्थित रहेंगें.

अब अगर आप वॉशिंगटन नही जा सकते और सीहोर पहुँचाना भी आपके लिए मुश्किल हो तो क्या करें ? घबराईये नही, हिंद युग्म आवाज़ आज अपने इस अनूठे प्रयास के माध्यम से न सिर्फ़ आपको इस आयोजन से जोड़े रखेगा बल्कि आज आप इस पुस्तक की पहली झलक पाने वाले पहले पाठक/श्रोता होंगे. हमारा मानना है कि आवाज़ पर पधारने वाला हर अतिथि हमारे लिए विशेष है, इसीलिए हम चाहेंगे कि यह पुस्तक जो कि पाठकों के लिए बनी है, ख़ुद पाठकों के हाथों से इसका विमोचन हो.

तो दोस्तों बस एक क्लिक से करें राकेश जी के काव्य संग्रह का विमोचन -



स्वागत करें श्री राकेश खंडेलवाल जी का, कि वो कहें कुछ 'अपनी बात' -

कभी कभी अपनी बात कहना बहुत मुश्किल हो जाता है। समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू किया जाये। ऐसा ही कुछ मुझे लग रहा है । क्या बात करूँ और कहां से प्रारंभ करूँ ?

लिखने की आदत जो भारत में रहते हुए निरन्तर प्रगति करती रही थी, अमेरिका आने के पश्चात व्यस्त जीवन में मंद गति से चलती रही। वाशिंगटन क्षेत्र में हिन्दी साहित्य प्रेमियों के बढ़ते हुए समूह ने इसे थोड़ा विस्तार दिया। एक घटना जिसने मुझे इस दिशा में तीव्र गति से बढ़ने को प्रेरित किया वह था मेरा श्री अनूप भार्गव से परिचय। फिलाडेल्फिया में रहने वाले माननीय घनश्याम गुप्ता जी एक अच्छे कवि और मित्र हैं। उनके बुलावे पर सन 1998 में फिलाडेल्फिया के कवि सम्मेलन में अनूपजी से हुआ परिचय प्रगाढ़ मित्रता में परिवर्तित हो गया । उनके तकनीकी ज्ञान ने जून 2003 में ईकविता समूह की रूपरेखा बनाई और प्रारंभ से ही मुझे इससे जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और कलम फिर प्रवाहित होती चली गई।

उन्हीं के सहयोग से सन 2005 में अपना ब्लाग गीतकलश शुरू किया । इस यात्रा के दौरान कई कवि मित्रों और साहित्यकारों का सान्निध्य प्राप्त हुआ जिनके उल्लेख के बिना मेरी बात अधूरी रह जायेगी। टोरांटो में रहने वाल समीर लाल जी से परिचय तो ब्लाग और फोन के माध्यम से था पर व्यक्तिगत तौर पर पहली बार उनसे मुलाकात बंफेलो (न्यूयार्क) में सितम्बर 2006 के कवि सम्मेलन में हुई। उनके विशेष प्रेम ने गीतकलश का रूप निखारा। पंकज सुबीर जी की सह्रदयता और निश्छलता उनके अतुलित ज्ञान को सम्मानित करती है और उनकी बातें निरन्तर लेखन की प्रेरणा होती हैं।

कई नाम ऐसे हैं जिनका उल्लेख इसलिये आवश्यक है कि उनके सहयोग के बिना यह रचनायें पुस्तक का रूप नहीं ले पातीं। सियेटल में रह रहे लोकप्रिय कवि अभिनव शुक्ल, विवेचनात्मक कवि श्री रिपुदमन पचौरी, श्री घनश्याम गुप्ता, परम आदरणीय श्री कुँअर बेचैनजी, महाकवि आदरणीय श्री गुलाब खंडेलवाल जी और माँ शारदा की वीणा को रंगों की तूलिका में परिवर्तित करने वाले कुशल चितेरे श्री विजेन्द्र विज इन सभी मित्रों एवं स्नेही जनों का अनुग्रह मेरा प्रेरणा स्रोत रहा है ।

मेरी कलम से जो भी लिखा गया, मैं इसे अपना योगदान नहीं मानता । मैंने सदैव कहा है-

काव्य का व्याकरण मैंने जाना नहीं
शब्द कांगा पे ही उतरते गये
भावनाओं की गंगा उमड़ती रही
छंद के शिल्प खुद ही सँवरते गये।

आपके हाथों में यह शब्द समन्वय है,आपको कितना पसन्द आया, यह जानने की आकाँक्षा रहेगी।

-राकेश खण्डेलवाल

पुस्तक की प्रस्तावना लिखते हुए कवि कुंवर बैचैन कहते हैं कि कविवर राकेश खण्डेलवाल के गीत सुसंस्कृत भाषा और संस्कृति के संवाहक हैं -

शब्द कोश के एक पृष्ठ पर अनेक शब्द यूँ ही उदास पड़े हुए थे । उन्हीं में एक शब्द कुछ ज्यादा ही उदास था ।इन शब्दों की उदासी से होती हुई जब एक कवि की नार इस अमुक शब्द पर पड़ी, वह जो अधिक उदास था, तो वह वहीं ठहरी रही ।
कवि ने उस शब्द से पूछा- ''भाई, तुम तो गीत हो, फिर इतने उदास क्यों हो ?''
शब्द कोश के पन्ने पर बैठे हुए ही गीत ने भरे मन से कहा- ''कविवर अगर मैं दुखी न होऊँ तो फिर क्या करूँ ? आज के कवि मेरी ओर ध्यान ही नहीं देते । कुछों को छोड़कर, जो ध्यान देते भी हैं, वो मुझे मेरे व्यक्तित्व के अनुसार लोक-जीवन के मंच पर नहीं लाते । मेरे जो मान-दण्ड हैं, जो मानक हैं उनकी उपेक्षा करते हैं और कुछ भी कहने लग जाते हैं ।''
''नहीं यह तो सच नहीं है । तुम्हें तो प्रत्येक युग में कवियों ने अपना कंठहार बनाया है । लोक जीवन से लेकर साहित्यिक मंचों तक तुम्हारा ही बोलबाला रहा है । तुम लोक में लोक गीत बनकर छाये रहे हो । सजी हुई दुल्हनों और बालिकाओं की ढोलक की थाप पर तुम खूब थिरके हो । खेतों में धान बोती सुकुमारियों और फस्लों को काटती मजदूरिनों को भी तुम रिझाते रहे हो । यहीं नहीं, तुम तो बड़े बड़े शिष्ट-विशिष्ट साहित्यकारों की लेखनी को भी अपना आशीष देते रहे हो । चाहे संस्कृत के कवि जयदेव हों, चाहे मैथिल कोकिल विद्यापति, चाहे ब्रज भाषा-शिरोमणि सूर हों या अवधि सम्राट तुलसी सभी को तुम्हारा स्नेह मिला है और उन्होंने तुम्हारा आदर किया है । ...फिर तुम इतने दुखी क्यों हो ?'' कवि ने कहा ।
''ये तो तुम ठीक ही कहते हो कविवर, किन्तु क्या तुमने लोगों से यह कहते हुए नहीं सुना कि गीत तो मर गया है'' गीत ने प्रश्न किया ।
''हाँ, सुना तो है, किन्तु क्या गीत कभी मर सकता है, कभी मरा है, वह तो अमर है । निराला, प्रसाद, महादेवी, बच्चन से लेकर आज तक क्या तुम जीवित नहीं हो । यह कहने वाले कि गीत मर गया है, अब कहने लगे हैं कि गीत तो अमर है ।''
कवि ने प्रतिप्रश्न करते हुए गीत से पूछा- ''क्या तुमने राकेश खण्डेलवाल का नाम सुना है ?''
''सुना तो है, लेकिन वे तो सात समुन्दर पार के देश अमेरिका में रहते हैं ?''
''हाँ, वे रहते भले ही अमेरिका में हों, किन्तु उनकी भाव-भूमि भारतीय ही है । उनमें भारत की मिट्टी की ही सुगंध है जो उनके गीतों के शब्द-पुष्पों में भीतर तक समाई हुई है । सुगंध ही नहीं वरन् इन शब्द-पुष्पों का रूप रंग भी भारतीय ही है । उनमें जो रस है वह भी कन्हैया द्वारा रचाई जाने वाली रास का प्रेम रस है, जिसमें शृँगार है, तन्मयता है, नशा है, उमंग है, लय है, नाद है, उन्मुक्तता है, निश्चिंतता है, योग है और सहयोग भी ।''
इस पर गीत कवि से सम्मोहित होते हुए बोला- ''कविवर फिर राकेश खण्डेलवाल के गीतों पर कोई चर्चा करो न ।''
कवि प्रसन्न हुआ और इस प्रकार व्याख्या करनी प्रारम्भ की । आइये आप भी कवि द्वारा बताई गईं उन विशेषताओं का आनंद लीजिये जो कविवर राकेश खण्डेलवाल के गीतों में सहज रूप में मिल जाती हैं.....

यों राकेश जी ने आधुनिक यथार्थ को भी अपनी कविता का विषय बनाया है और उसे बड़ी ही बारींकी से चित्रित भी किया है किन्तु राकेश जी मूलत: प्रेम के कवि हैं । उनके गीतों का प्राण यदि है तो वह प्रेम ही है । प्रेम का आत्मालाप-अभिव्यक्ति, आशा-निराशा, संयोग-वियोग, प्रशंसा-उपालम्भ, दुख-सुख, रूठना-मनाना, पूजा-अर्चन और सौन्दर्य-वर्णन सभी का चित्रण पूरे मनोयोग और सहजता के साथ कवि ने किया है ।

प्रेम में प्रेम का उपासक अपने प्रिय को रिझाने के लिये क्या नहीं करता । उसका भरसक प्रयास यही रहता है कि वह सब कुछ ऐसा करे जो प्रिय उसकी ओर ध्यान दे । ध्यान देना ही कांफी नहीं है, वरन् उस पर रीझ भी जाए । किन्तु प्रिय है कि उसका पाषाण हृदय पिघलता ही नहीं । प्रिय को रिझाने के लिये उसने क्या नहीं किया । सैकड़ों गीतों की रचना करके उसकी आराधना की, मगर प्रिय है कि उसकी ओर उसका ध्यान ही नहीं देता । ऐसी निष्ठुरता ऐसा पाहनपन भी कैसा-

आह न बोले, वाह न बोले
मन में है कुछ चाह न बोले
जिस पग पर चलते मेरे पग
कैसी है वह राह न बोले
फिर भी आराध्य, हृदय के पाषाणी, इतना बतला दो
कितने गीत और लिखने हैं ?
कितने गीत और लिखने हैं, लिखे सुबह से शाम हो गई ।
थकी लेखनी लिखते लिखते, स्याही सभी तमाम हो गई ॥


यह वह प्रेमी है जिसने अपने गीतों के शब्दों में गुलाब, गुलमोहर और चंदन की सुगंध भरी, नदिया-ताल-सरोवर के जल का कलकल नाद लिया, कोयल की कुहुक को समोया, अंधियारी रात में भी प्रिय के लिये चांदनी के चित्र बनाये, अर्चना की थाली में साधारण दीप नहीं, वरन् सितारों के दीप सजाए, एक एक पल प्रिय के नाम का जाप करने में लगा दिया और वह भी इस विश्वास के साथ कि कवि के गीतों को अपने प्रिय से ही स्वर मिलते हैं, आवारा भावों को शब्दों का अनुशासन मिलता है, छंदबध्दता मिलती है । प्रिय को आराध्य और स्वयं को आराधक मान कर हर तरह से उसकी उपासना की, किन्तु जैसे उपासक का व्रत खंडित हो गया हो या निष्ठा निष्काम हो गई हो ऐसा प्रतीत हुआ-

किन्तु उपासक के खंडित व्रत जैसा तप रह गया अधूरा
और अस्मिता दीपक की लौ में जलकर गुमनाम हो गई
बन आराधक मैंने अपनी निष्ठा भागीरथी बनाई
लगा तुम्हारे मंदिर की देहरी पर वह निष्काम हो गई


लेकिन प्रेम कभी थकता नहीं । यदि वह सच्चा है तो कभी निराश भी नहीं होता । प्रेम करना ही प्रेम को पाना है । प्रेम के प्रस्थान बिन्दु पर विश्वास ही प्रेम के चरमोत्कर्ष पर पहुँचना है । प्रिय का अनुग्रह, उसकी अनुकम्पा पान ही प्रेमी का लक्ष्य है । प्रिय यदि एक प्रकार से खुश नहीं होता तो दूसरी कोई युक्ति निकालता है किन्तु अंतत: प्रिय की अनुकम्पा पा ही लेता है-

अनुभूति को अहसासों को, बार बार पिंजरे में डाला
एक अर्थ से भरा नहीं मन, अर्थ दूसरा और निकाला ,
आदि-अंत में, धूप-छांव में, केवल किया तुम्हें ही वर्णित
अपने सार संकल्पों में मीत तुम्हें ही सदा सँभाला
मिली तुम्हारे अनुग्रह की अनुकम्पा शायद इसीलिये तो
सावन की काली मावस्या, दोपहरी की घाम हो गई ।....


यह बात सच है कि अब प्रेमी को अपने प्रिय की कृपा प्राप्त हो गई है किन्तु ऐसा भी समय आया था जब प्रेम के आराधक ने पत्थरों को भी सिंदूर में रंग दिया था, बरगदों के नीचे बैठकर मन्नतें मांगी थीं, शाम को घी के दीपक जलाए थे, घंटियां बजाईं थीं, शंख से जल चढ़ाया था, शास्त्रों में लिखे मंत्रों का उच्चारण किया था, एकादशी का उपवास रखा था, पूर्णिमा को नारायणी का पाठ किया था, रामायण-भागवत-गीता सभी को पढ़ा, वेद-श्रुतियाँ-ऋचाओं और उपनिषदों में भी उलझा रहा, किन्तु धुंध के बादल छंटे ही नहीं थे, और न भाग्य की रेखा ही बदली थी, किन्तु आंखिरकार प्रिय के ंकदमों को प्रेमी की ओर मुडना ही पड़ा । ..और जैसे ही प्रिय के पग इधर को उठे वैसे ही-

यों लगा मुस्कुराने लगी हर दिशा
छंद की पालकी में विचरने लगे
भाव मन की उमड़ती हुई आस के ।


इतना ही नहीं, वरन् प्रिय के स्वागत में प्रिय के पाँवों को चूमने के लिये डालियों से फूल स्वयं ही झरने लगे, डालियाँ प्रिय के साथ झूलने को आतुर हो उठीं, पुरवाई के झौंके उँगली थाम कर चल पड़े, हरी दूब पंजों पर उचक उचक कर उसे देखने लगी, उपवन में कलियाँ खिल उठीं, पत्तों पर रंग आने लगा, भंवरे उल्लास के गीत गाने लगे, सोया हुआ बसंत जाग गया, धूप प्रिय की राह में अल्पना सजाने लगी, कोंपलें अपनी पलकें मलने लगीं, ताल में शतदल कमल खिल उठे, गुलमोहर अपने नयनों में नवीन सपने सजाने लगा। यही नहीं वरन् बड़े-बड़े संन्यासियों ने भी अपने पारम्परिक गेरुए परिधान को त्याग दिया और वे भी प्रिय के रंग में रंग गए-

भूलकर अपने पारम्परिक वेश को
आपके रंग में सब रंगे रह गए
जिन पे दूजा न चढ़ पाया कोई कभी
सारे परिधान थे जो भी संन्यास के


गीत के प्रधान गुणों में आत्मभिव्यक्ति और आत्म निवेदन का विशेष महत्व है । गीत एक प्रकार से प्रेमी द्वारा प्रिय को लिखे प्रेम पत्र होते हैं जिनमें हृदय के समस्त संवेगों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है । यह बात अलगी रही कि होठों पर लगे संकोच के ताले बहुत दिनों बाद खुलते हैं और गाहे-ब-गाहे मौन रह जाना पड़ता है-

एक तुम्हारा प्रश् अधूरा
दूजे उत्तर जटिल बहुत था
तीजे रुंधे कंठ की वाणी
इसीलिये मैं मौन रह गया


गीत अनुभूतियों का आईना है । तरह तरह की अनुभूतियाँ होती रहती हैं, गीतकार उन्हीं को शब्द देता है । ...और अनुभूतियाँ अनन्त हैं, असीम हैं । गीतकार की इच्छा होती है कि वह कुछ ऐसा लिखे जो अद्वितीय हो । उससे पहले वैसा और नयी शैली में न कहा गया हो प्रेम के उस रूप को गीत का विषय बनाए जो बिल्कुल नया नवेला हो । ऐसी प्रीत जिसका जिक्र इतिहास में अब तक न हुआ हो । राकेश जी कहते हैं-

बहुत दिनों से सोच रहा हूं कोई गीत लिखूं
इतिहासों में मिले न जैसी ऐसी प्रीत लिखूं


कवि की चाहत है कि वह ऐसी प्रीत के बारे में कुछ कहे जिसमें भुजपाशों की सिहरन का कोई अर्थ न हो, थरथराते हुए अधर ही सारी कहानी को कह दें, प्रीति करने की वह रीति हो जिसके अनगिन और नये आयाम हों । उसकी कामना है वह चातक और पपीहे का मनमीत बनकर गीत लिखे । वैसे भी गीत और प्रीत का अमर संबंध है ।

-डॉ. कुँअर बेचैन

पुस्तक का कवर design किया है देश के ख्‍यात चित्रकार श्री विजेंद्र विज जी का जिन्‍होंने गहरे हरे रंग पर अपनी पेंटिंग से वो जादू रचा विजेंद्र विज जी ने जो चित्र आवरण के लिये चयन किया वो पुस्‍तक के शीर्षक को पूरी तरह से व्‍यक्‍त करता है । तिस पर ये कि उन्‍होंने जा रंग संयोजन किया है वो भी अद्भुत है । ऐसा लगता है कि अभी रंग बोल उठेंगें और राकेश जी के गीतों को गुनगुनाने लगेंगें.

अब आते हैं कविताओं पर. यूँ तो बहुत मुश्किल है हमारे लिए कि हम इस अदभुत कविता संग्रह में से मात्र कुछ कवितायें चुनें, पर फ़िर भी हमने पंकज सुबीर जी जिनका कि आज जन्मदिन भी है, की मदद से कुछ रचनाएँ चुनीं और साथ माँगा गजब के संगीत प्रेमी और सर से लेकर पांव तक कला में डूबे श्री संजय पटेल भाई का. संजय भाई आवाज़ के श्रोताओं के लिए और हिन्दी चिट्टाजगत के लिए एक जाना माना नाम है, यूँ तो सालों से बतौर उद्घोषक उन्होंने बहुत नाम कमाया है, पर बहुत कम लोगों ने उनकी जादू भरी आवाज़ सुनी होगी क्योंकि वो एक ऐसे शख्स हैं जो औरों की तारीफों में अपनी तारीफ करना भूल जाते हैं...आज आवाज़ की टीम गर्व के साथ उनकी आवाज़ को पहली बार इन्टरनेट पर प्रस्तुत कर रही है, राकेश जी की कविताओं को उन्होंने जिस अंदाज़ में पेश किया है वो साबित करता है कि वो कितने अच्छे काव्य मर्मज्ञ भी हैं... सुनें और आनंद लें -


चरखे का तकवा....



हम गीतों के गलियारों में ...



एक दीपक वही....



साँझा बाती के दीपक की...



मोनिका हठीला अखिल भारतीय कवियित्री हैं ‍कच्छ भुज की रहने वाली हैं । किसी कवि सम्‍मेलन से रायपूर से लौट रहीं थीं सीहोर में अपने मायके में रुकीं तो पंकज जी उनका अधिकार पूर्वक समय लिया । पेश है उनकी मधुर आवाज़ में राकेश जी के कुछ मुक्तक और कवितायें.



इन्टरनेट पर पहली बार मुखरित हो रही है पंकज सुबीर जी की आवाज़ भी आज इस शुभ अवसर पर साथ में हैं श्री रमेश हठीला जिन्होंने एक कविता गाई है वे मंच के स्थापित कवि रहे हैं पर अभी संन्यास ले चुके हैं । इनकी आवाजों में कुछ मुक्‍तक और गीत राकेश जी के हैं ।



हमारी ये प्रस्तुति आपको कैसी लगी, हमें अवश्य बतायें....पुस्तक की प्रति पाने के लिए संपर्क करें-

अँधेरी रात का सूरज : (काव्य-संग्रह)

राकेश खण्डेलवाल

1713 Wilcox Lane, Silver Spring

MD 20906-5945, USA

+2028777919

rakeshkhandelwal1k@gmail.com,

http://geetkalash.blogspot.com

मूल्य : मात्र 350 रुपये, 25$ US

प्रथम संस्करण : अक्टूबर 2008

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन

Shivna Prakashan, P.C.Lab, Shop 3,4,5 Samrat Complex Basement,

Opp. New Bus Stand, Sehore, M.P. 466001, India +91-9977855399

www.subeer.com/prakashan.html

ग्राफिक एफ्फेक्ट्स - प्रशेन

Thursday, October 9, 2008

श्रोता भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है महफ़िल की सफ़लता का.

आवाज पर आने वाले नियमित पाठक/श्रोता संजय पटेल की क़लमनिगारी से वाक़िफ़ है.
संजय भाई अपने अलहदा अंदाज़ से हमेशा कोई नई बात कहते हैं.मंच और लेखन की दुनिया में सतत काम करने वाला यह शख्स निराभिमानी ही नहीं संगीत में आकंठ डूबा एक ज़िन्दादिल इंसान है. अभी हाल ही में संजय पटेल ने अपने ब्लॉग
जोगलिखी संजय पटेल की पर श्रोताओं के हवाले से एक बहुत सुन्दर आलेख पोस्ट किया था. हमें लगा कि आवाज़ पर इस लेख का जारी होना बहुत ज़रूरी है. संजय भाई ने हमेशा की तरह सह्र्दयता से इजाज़त दी इसके लिये. एक सच्चे संगीतप्रेमी के लिये ये लेख एक दस्तावेज़ है और गाइड लाइन भी. कैसे एक श्रोता एक रसपूर्ण कार्यक्रम या कंसर्ट को बिगाड़ सकता है आइये देखते हैं.


बात थोड़ी लम्बी कह गया हूँ ; यदि दस से पन्द्रह मिनट का समय दे सकते हैं तो ही इसे पढ़ें.हाँ इस पोस्ट में व्यक्त किये गए दर्द को समझने के लिये एक संगीतप्रेमी का दिल होना ख़ास क्वॉलिफ़िकेशन है.

बीते तीस बरसों से तो मंच पर बतौर एक एंकर पर्सन काम कर ही रहा हूँ और उसके पहले भी संगीत की महफ़िलों में जाने का जुनून रहा ही है. सौभाग्याशाली हूँ कि पिता और दादा की बदौलत संगीत का भरापूरा माहौल घर-आँगन में ही मिलता रहा.अब जब से मैं ख़ुद एंकर या सांस्कतिक पत्रकार के रूप में सक्रिय हुआ तब से भाँति भाँति के कलाकारों और उससे भी ज़्यादा सुनने वालों से मिलने,बतियाने और विभिन्न कलाकारों और गायन/वादन की कला के बारे में समझने का अवसर मिल रहा है.संगीत विषय पर पढ़ता भी रहता हूँ सो अच्छा ख़ासा समय संगीत के इर्द-गिर्द चला जाता है या यूँ कहना बेहतर होगा कि मेरे इर्द-गिर्द संगीत होता है.मंच से परे भी कार्य-स्थल और निवास पर भी तक़रीबन पूरे दिन संगीत का संगसाथ बना रहता है.देश के कई कलाकारों से भी लगातार संपर्क में रहता हूँ सो तब भी संगीत की ही चर्चा होती रहती है. यहाँ तक जो बात मैने कही है उसे पढ़कर आपको लग रहा होगा कि मैं आत्ममुग्ध हो अपने को ही महिमामंडित कर रहा है.जी नहीं हुज़ूर नाचीज़ को इस तरह की कोई ग़लतफ़हमी नहीं है कि मैं कोई बड़ा कारनामा कर रहा हूँ ;मामला इतना भर है संगीत मुझे ऑक्सीजन देता है और मुझे इंसान बनाए रखता है. दर असल में कहना कुछ और चाहता हूँ

बहुतेरे अवसरों पर जिन संगीतप्रेमियों से मुलाक़ात होती है उनमें कुछ विशिष्ट प्रजाति के होते हैं.हाँ यह साफ़ करता चलूँ और स्वीकार कर लूँ कि संगीत बहुत सब्जेक्टिव टर्म है यानी तरह –तरह के लोग और तरह तरह् की पसंद.लेकिन अपनी पसंद से भी जो लोग किसी महफ़िल में आते हैं तो वहाँ भी एक विशिष्ट क़िस्म की अतृप्तता महसूस करते हैं.कहने को म्युज़िक सर्कल्स में ये लोग अपने आप को सुर-सुजान कहलवाना पसंद करते हैं लेकिन तबियत में विशिष्ट खसलत लिये हुए होते हैं.उदाहरण के लिये एक सज्जन हैं जो चाहे शायरी की महफ़िल में हों या संगीत की;हमेशा अपनी फ़रमाइश लेकर खड़े हो जाते हैं....एक आयटम ख़त्म हुई; कहेंगे...गिरिजाजी (विदूषी गिरिजा देवी)आज भैरवी ठुमरी के पहले एक चैती ज़रूर होना चाहिये ! ग़ज़ल की महफ़िल है तो जगजीतजी (जगजीत सिंह) आविष्कार फ़िल्म का आपका और चित्राजी वाला बाबुल मोरा सुना दीजिये न प्लीज़....प्रहलादसिंह टिपानिया ने अच्छा-भला माहौल बना रखा है कबीरपंथी गीतों का और आप श्रीमान खड़े हो गए...पेलाद दादा हलके गाड़ी हाँको रे रामगाड़ीवाला सुना दीजिये न ! कलापिनी कोमकली गा रही है जैजैवंती से समाँ बंध गया है और उन्होनें तानपूरे के तार भैरवी के लिये मिलाना शुरू किया ही है और आप जनाब नमूदार हुए हैं महफ़िल में और कहेंगे ...मैडम ! कुमारजी का झीनी झीनी झीनी रे चदरिया तो हुआ ही नहीं......कई बार तो कलाकार सहज होकर उनकी बात सुन लेता है लेकिन कई बार कार्यक्रम ऐसा बेमज़ा होता है कि फ़िर उसके सुरीले होने की आस बाक़ी ही नहीं रहती. तो ये तो हुए मुफ़्त के फ़रमाइशीलाल.जैसे कलाकार सिर्फ़ और सिर्फ़ इन्हें ही अपनी रचनाएँ सुनाने यहाँ आया है.

अब एक दूसरी ब्रीड ऐसी है जो थोड़ी सी सुरीली खसलत वाली है. इनका मामला कुछ यूँ है कि ये श्रीमान गाते हैं...ठीक ठाक ही गाते हैं लेकिन किसी और का गाया पसंद नहीं करते.जैसे पुराने गीतों के किसी कार्यक्रम में बैठे हैं;समझ लीजिये मुकेश या रफ़ी साहब की याद में कोई कार्यक्रम चल रहा है तो ये सभागार में ही अच्छा भला गा रहे गायक की मज़म्मत कर देंगे.यार ! खोया खोया चाँद में रफ़ी साहब वाला फ़ील नहीं आ रहा,नहीं नहीं; मुकेशजी ने सारंगा तेरी याद में ... ऐसे नहीं गाया है अब साहब बताइये रफ़ी और मुकेश वाला ही फ़ील कहाँ से आयेगा,वह तो इन दो महान कलाकारों के साथ ही चला गया न .बात यहीं ख़त्म हो जाती तो ठीक , श्रीमान सभागार में ही पास वाली सीट पर बैठी अपनी श्रीमती को खोया खोया चाँद गाकर सुना रहे हैं;गोया याद दिलाना चाहते हों कि ऐसा था रफ़ी/मुकेश की गायकी का फ़ील (?)पास वाले भी झेल रहे हैं इस (बे)सुरीलेपन को.

एक और ज़ात है इन सुर-सुजानों की , हमेशा किसी आर्टिस्ट को किसी दूसरे से कम्पेयर करेंगे यानी उसकी दूसरे से तुलना करेंगे. जैसे अभी पं.जसराज मेरे शहर में आए थे , लाइव शो था और सुनने वाले थे तक़रीबन दस हज़ार.जैसे ही पहली रचना ख़त्म की श्रीमान मेरे पास आ गए ; यार तुम कैसे झेल पा रहे हो इस शोर शराबे में पंडितजी का गायन (जनाब को मेरी तासीर मालूम नहीं कि मैं तो पण्डितजी जैसे महान कलाकार को सुनने नहीं; देखने के लिये भी भरे बाज़ार में चला जाऊँ) मैंने कहा क्यों ? क्या हुआ ? नहीं यार अपने यहाँ दस साल पहले शरद पूर्णिमा पर भीमसेन जी आए थे; याद है ? मैने कहाँ हाँ ! आहा हा हा...क्या रंग जमा था भिया (मेरे शहर में भैया को भिया कहते हैं) वह बात नहीं बना पाए हैं जसराज आज . क्या लचर गा रहे हैं . मैने उनसे बहस करना ठीक नहीं समझा और मशवरा दिया कि ये तो आजकल ऐसा ही गा रहे हैं,शहर में विख्यात गायक शान का लाइव शो भी चल रहा है , सुना है वहाँ काफ़ी रंग जम रहा है. भाई साहब बोले क्या बात कर रहे हो..जगह मिल जाएगी, मैने कहा हाँ शायद मिल ही जाए,आप एक बार ट्राय तो कीजिये....सुर सुजान चलते बने और मैने राहत की साँस ली.अब आप बताइये कितना ग़लत है किसी कलाकार की गायकी की किसी और से तुलना करना.सबका अपना अपना रंग है,घराना है,गुरूजन अलग अलग हैं,परम्पराएँ भी अलग. पर नहीं उनको तो जसराज जी में भीमसेन जी का रंग चाहिये.मज़ा ये है कि भीमसेन जी से पूछिये तो वे जसराजजी की तारीफ़ करेंगे और जसराज जी के सामने भीमसेनजी की चर्चा चलाइये तो वे कहेंगे भीमसेनजी की क्या बात है.

इसी स्टाइल में एक और गौत्र वाले साह्ब भी हैं . वे क्या करते हैं कि जैसे आज प्रभा अत्रे को सुन रहे हैं तो कहेंगे भाई साहब पिछले साल पुणे के सवाई गंधर्व में जो इन्होंने बागेश्री सुनाई थी वह बात आज सुनाई नहीं दे रही है.मैं सोचता हूँ कि ये ऐसी बेवकूफ़ी की बात क्यों कर रहे हैं .हर दिन अलग होता है, मूड अलग होता है , आख़िर कलाकार भी तो इंसान है.याद आ गई उस्ताद बिसमिल्ला ख़ाँ साहब से बरसों पहले स्पिक मैके की वह महफ़िल जब ख़ाँ साहब बोले थे राग, रसोई , पागड़ी(पगड़ी) कभी-कभी बन जाए. बाद में समझ में आया कि श्रीमान आपको बताना चाहते हैं कि पिछले साल भी ये भी सवाई गंधर्व समारोह सुनने पुणे गए थे.


आज ये आलेख लिखते लिखते मुझे मेहंदी हसन साहब की याद आ गई. बरसों पहले वे एक शो के लिये मेरे शहर में तशरीफ़ लाए थे .शो का समय था रात आठ बजे का. ख़ाँ साहब साढ़े छह बजे आ गए,साज़ मिलवा लिये यानी ट्यून करवा लिये,साउंड का बेलेंसिंग कर लिया और फ़ारिग़ हो गए तक़रीबन सात बजे.फ़िर मुझसे कहा कोई कमरा है ग्रीन रूम के पास ऐसा जो ख़ाली हो,मैने पूछा क्या थोड़ा आराम करेंगे ? बोले नहीं शो शुरू होने के पहले जब तक मुमकिन होगा ख़ामोश रहना चाहता हूँ.मैं उन्हें एक कमरे में ले गया.वहाँ दरवाज़ा भीतर से बंद कर बैठा ही था तो बाहर से किसी ने खटखट की.दरवाज़ा खोला तो सामने आयोजन से जुड़े एक शख़्स खड़े थे , बोले कमिश्नर साहब आए हैं मिलना चाहते हैं मेहंदी हसन साहब से.मैने कहा वे अब शो प्रारंभ होने तक बोलेंगे नहीं , आप उन्हें शो के बाद मिलवाने ले आइये मैं ज़िम्मेदारी लेता हूँ कि ख़ाँ साहब से मिलवा दूँगा.जनाब कहने लगे आप समझते नहीं हैं साहब उखड़ जाएंगे,मैने कहा कहाँ हैं साहब और कमिश्नर से मिलने चला. मैने उन्हें हक़ीक़त बताई; वे एक संजीदा इंसान थे,बोले नहीं मैं नहीं मिलना चाह रहा, मेरी बेटी को ऑटोग्राफ़ चाहिये था.मैने उनकी बेटी की ऑटोग्राफ़ बुक ली और आश्वस्त किया कि उनका काम हो जाएगा.वे तसल्ली से श्रोताओं में जाकर बैठ गये.कमरे में लौटा तो देखा उस्तादजी जैसे ध्यान मुद्रा में बैठे थे. आँखों से अश्रु बह रहे थे. ख़ाँ साहब की टाइमिंग देखिये ठीक पौने आठ बजे उन्होंने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देख कर मुस्कुराए; कहने लगे चलें जनाब दुकान सजाएँ.मैंने कहा हाँ चलते हैं लेकिन ख़ाँ साहब ये पैतालिस मिनट की ये ख़ामोशी क्या थी. बोले भाई मेरे आज जो जो ग़ज़ले गाने का मन बनाया है उनके मुखड़ों से दुआ-सलाम कर रहा था.फ़िर मैने पूछा कि इस दौरान आँखें क्यों भींज गईं थी आपकी ?ख़ाँ साहब बोले हाँ भाई उस वक़्त ख़ुदा का शुक्रिया अदा कर रहा था कि परवरदिगार तू कितना रहमदिल है कि मुझ नाचीज़ से मौसीक़ी के ज़रिये अपनी ख़िदमत करवा रहा है.सोचिये मेहंदी हसन साहब जैसा बड़ा आर्टिस्ट भी अपने आप से गुफ़्तगू के रूप में थोड़ा सा होमवर्क करना चाहता है.ऐसे में कोई सिरफ़िरा श्रोता एक महान कलाकार का ये नाज़ुक वक़्त चुरा कर कितना बड़ा पाप कर सकता है.कहने की ज़रूरत नहीं कि वह रात मेहंदी हसन साहब की गायकी की एक आलातरीन रात थी.ऐसी जो कभी कभी गाई जाती है बड़े नसीब से सुनने को मिलती है.

मुझे लगता है कि श्रोता हर तरह से अपनी पसंद/नापसंद तय करने का अधिकार रखता है . बल्कि ये उसका हक़ है लेकिन सच्चा और खरा श्रोता सजग,संवेदनशील और सह्रदय होता है..वह जानता है न जाने कितने तप और रियाज़ के बाद कोई कलाकार अपनी प्रस्तुति को लेकर पूरी उम्मीद के साथ आपसे रूबरू होता है. आपकी थोड़ी सी भी नासमझी कलाकार के पूरे मूड को बिगाड़ सकती है. अब बताइये साहब कि संगीत की महफ़िल में कोई बड़बोला , फ़रमाइशीलाल अपनी कोई फ़रमाइश लेकर कलाकार को डिस्टर्ब कर दे तो क्या हो.या कोई फ़ैन ऑटोग्राफ़ लेने के लिये गायक को परेशान करे ये तो ठीक नहीं.ईमानदार श्रोता वह है जो रहमदिल होकर कलाकार की तपस्या का मान करे और सह्र्दय होकर उसकी कला को दाद देकर उसे नवाज़े; उसका हौसला बढ़ाए.

कभी ठंडे दिल से सोचियेगा कि क्या मै ठीक कह रहा हूँ.

संजय भाई के इस आलेख से प्रेरित होकर हमारे स्तंभकार दिलीप कवठेकर ने भी अपने ब्लॉग पर जो लिखा वह आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

Monday, September 29, 2008

लता संगीत पर्व- महीने भर चला संगीत प्रेमियों का उत्सव

आवाज़ पर आयोजित लता संगीत उत्सव पर एक विशेष रिपोर्ट और सुनें लता जी के चुने हुए २० गीत एक साथ.

जब हमने लता संगीत उत्सव की शुरुवात की थी इस माह के पहले सप्ताह में, तब दो उद्देश्य थे, एक भारत रत्न और संगीत के कोहिनूर लता मंगेशकर पर हिन्दी भाषा में कुछ सहेजनीये आलेखों का संग्रह बने और दूसरा लता दी के चाहने वाले इंटरनेटिया श्रोताओं को हम प्रेरित करें की वो लता जी के बारे में हिन्दी भाषा में लिखें. जहाँ तक दूसरे उद्देश्य का सवाल है, हमें बहुत अधिक कमियाबी नही मिल पायी है. कुछ लिखते लिखते रह गए तो कुछ जब तक लिखना सीख पाते समय सीमा खत्म हो चली. प्रतियोगिता की दृष्टि से मात्र एक ही प्रवष्टि हमें मिली जिसे हम आवाज़ पर स्थान दे पाते. नागपुर के २२ वर्षीय अनूप मनचलवार ने अपनी मुक्कम्मल प्रस्तुति से सब का मन मोह लिया, सुंदर तस्वीरें और slide शो से अपने आलेख को और सुंदर बना दिया. हमारे माननीय निर्णायक श्री पंकज सुबीर जी ने अनूप जी को चुना है लता संगीत पर्व के प्रथम और एक मात्र विजेता के रूप में, अनूप जी को मिलेंगीं ५०० रुपए मूल्य की पुस्तकें और "पहला सुर" एल्बम की एक प्रति. अनूप जी का आलेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं. अनूप मनचलवार जी को बधाई देते हुए हम आगे बढ़ते हैं, अगर हम अपने पहले उद्देश्य की बात करें तो हम इस आयोजन को एक बहुत बड़ी सफलता कहेंगे. पेश है इस सफर की कुछ झलकियाँ-



किसी भी सफल आयोजन के लिए जरूरी है एक सफल शुरुवात. और ये शुरुवात हमें मिली जब आयोजन के कर्णधार और हमारे प्रिये पंकज सुबीर भाई ने लता जी की आवाज़ में रूह की वादियों में बह रही दिलरुबा नदी से मिलवाया. लता जी की मुंहबोली बहन और स्वर्गीय कवि/गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री लावण्या शाह ने जब लता जी के साथ बीते उनके व्यक्तिगत जीवन के कुछ मधुर क्षणों को याद किया तो पाठकों की आँखें सजल हो उठीं.

फ़िर आमद हुई इस आयोजन में संजय पटेल भाई की, जो लाये साथ में लता जी का सुगम संगीत. कुछ ऐसी ग़ज़लें और नगमें जिन्हें सिर्फ़ सुनना काफ़ी नही उन्हें समझना भी जरूरी है, लता जी के गायन की उंचाईयों की झलक पाने के लिए. संजय भाई ने जिस खूबी से इसे अपने पहले और दूसरे आलेख में प्रस्तुत किया उसे पढ़ कर और सुनकर हमरे श्रोताओं ने हमें ढेरों बधाईयाँ भेजीं, जिसे हम सादर संजय भाई को प्रेषित कर रहे हैं. फ़िर लौटे पंकज भाई अपनी शीग्र प्रकाशनीये कहानी में लता जी का जिक्र लेकर. हिंद युग्मी तपन शर्मा ने जानकारीपूर्ण आलेख दिया सुर की देवी के नाम, वहीँ लता जी के जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर संजय भाई ने पेश की माया गोविन्द की एक अद्भुत कविता,स्वर कोकिला को समर्पित. और कल यानी जब लता जी ने अपने परिवार के साथ अपना ७९ वां जन्मदिन मना रही थी, तब यहाँ हिंद युग्म पर संजय भाई ने एलान किया कि प्रलय के बाद भी बचा रहेगा लता मंगेशकर का पावन स्वर. इससे बेहतर भेंट हम संगीत प्रेमी क्या दे सकते थे साक्षात् माँ सरस्वती का रूप लेकर धरती पर आयी इस आवाज़ को, जिसका नाम है लता मंगेशकर. इस सफल आयोजन के लिए हिंद युग्म आवाज़ परिवार आप सब का एक बार फ़िर आभार व्यक्त करता है. चलते चलते संजय भाई ने जो कहा लता जी के लिए उसे दोहरा दें क्योंकि यही हम सब के मन की दुआ है -

आइये भगवान से प्रार्थना करें लताजी दीर्घायु हों और उनकी पाक़ आवाज़ से पूरी क़ायनात सुरीली होती रहे...बरसों बरस.

सुनिए आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए २० नायाब गीत लता जी के, एक साथ. हमने कोशिश की है कि लता जी के हर अंदाज़ की एक झलक इन गीतों में आपको मिले, आनंद लें -

Sunday, September 28, 2008

प्रलय के बाद भी बचा रहेगा लता मंगेशकर का पावन स्वर !

लता मंगेशकर का जन्मदिन हर संगीतप्रेमी के लिये उल्लास का प्रसंग है. फ़िर हमारे प्रिय चिट्ठाकार संजय पटेल के लिये तो विशेष इसलिये है कि वे उसी शहर इन्दौर के बाशिंदे हैं जहाँ दुनिया की सबसे सुरीली आवाज़ का जन्म हुआ था. लताजी और उनका संगीत संजय भाई के लिये इबादत जैसा है. वे लताजी के गायन पर लगातार लिखते और अपनी अनूठी एंकरिंग के ज़रिये बोलते रहे हैं.आज आवाज़ के लिये लता मंगेशकर पर उनका यह भावपूर्ण लेख लता –मुरीदों के लिये एक विशिष्ट उपहार के रूप में पेश है.

आइये भगवान से प्रार्थना करें लताजी दीर्घायु हों और उनकी पाक़ आवाज़ से पूरी क़ायनात सुरीली होती रहे...बरसों बरस.



आप शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत या चित्रपट या सुगम संगीत के पूरे विश्व इतिहास पर दृष्टि डाल लीजिये, किंतु आप निराश ही होंगे यह जानकर कि एक भी नाम ऐसा नहीं है जो अमरता का वरदान लेकर इस सृष्टि में आया हो; एक अपवाद छोड़कर और वह नाम है स्वर-साम्राज्ञी भारतरत्न लता मंगेशकर। लताजी के जन्मोत्सव की बेला में मन-मयूर जैसे बावला-सा हो गया है। दिमाग पर ज़ोर डालें तो याद आता है कि लताजी अस्सी के अनक़रीब आ गईं.श्रोताओं की चार पीढ़ियों से राब्ता रखने वाली लता मंगेशकर के वजूद को अवाम अपने से अलग ही नहीं कर सकता। यही वजह है कि जीवन की अस्सी वीं पायदान पर आ रही स्वर-कोकिला देखकर वक्त की बेरहमी पर गुस्सा-सा आता है कि कमबख़्त तू इतना तेज़ी से क्यों चलता है ?

बहरहाल २८ सितम्बर संगीतप्रेमियों की पूरी जमात के जश्न मनाने का दिन होता है. कुदरत के इस नायाब हीरे पर कौन फ़ख्र नहीं करेगा। दुनिया के दिग्गज देश अपनी इकॉनामी, प्राकृतिक सुंदरता, सकल उत्पादन और उच्च शिक्षा पर नाज़ करते हैं। डींगें मारते हैं बड़ी-बड़ी कि हमारे पास फलॉं चीज़ है, दुनिया में किसी और के पास नहीं। किबला! मैं आपसे पूछता हूँ- क्या आपके पास लता मंगेशकर हैं ? हिन्दुस्तान के ख़ज़ाने का ऐसा कोहिनूर जिसकी कीमत अनमोल है, जिसकी चमक बेमिसाल है।



लता मंगेशकर से सिर्फ़ अज़ीम मौसिक़ारों का संगीत, गीतकारों के शब्द ही रोशन नहीं; उनकी आवाज़ से अमीर का महल और किसी फटेहाल गरीब का झोपड़ा दोनों ही आबाद हैं। लताजी सिर्फ़ होटल ताज, संसद भवन, षणमुखानंद या अल्बर्ट हॉल तक महदूद नहीं, वे गॉंव की पगडंडियों, गाड़ी-गडारों और पनघट पर किलकती तितली हैं। वे शास्त्र का महिमागान नहीं; आम आदमी के होठों पर थिरकता एक प्यारा-सा मुखड़ा हैं, जिसमें ज़िंदगी के सारे ग़म और तमाम ख़ुशियॉं आकर एक निरापद आनंद पा जाती हैं। लताजी का स्वर है तो ज़िंदगी का सारा संघर्ष बेमानी है और सारी कामयाबियॉं द्विगुणित। लता की आवाज़ से मोहब्बत करने के लिए आई.आई.एम से एम.बी.ए. करने की ज़रूरत नहीं, आप अनपढ़ ही भले। आपके तमाम हीनभावों और अशिक्षा को धता बताकर लता की आवाज़ आपको इस बात का गौरव प्रदान कर सकती है कि आप लता के संगीत के दीवाने हैं और आपका यही दीवानापन आपकी बड़ी काबिलियत है।

लता की आवाज़ में जीवन के सारे रस और प्रकृति की सारी गंध सम्मिलित है। आदमी की हैसियत, उसका रुतबा, उसका सामर्थ्य माने नहीं रखता; माने यह बात रखती है कि क्या उसने लता मंगेशकर के गीत सुने हैं; गुनगुनाया है कभी उनको, यदि हॉं तो मूँगफली खाता एक गरीब लता का गीत गुनगुनाते हुए अपने आपको रायबहादुर समझने का हक रखता है। आप हिन्दुस्तान के किसी भी प्रदेश में चले जाइए; आपको लता मंगेशकर एक परिचित नाम मिलेगा। "ब्रांडनेम' की होड़ के ज़माने में लता मंगेशकर भारत का एक निर्विवाद ब्रांड है पचास बरसों से। ऐसा ब्रांड जिस पर भारत की मोनोपाली है और जिसका मार्केट-शेयर शत-प्रतिशत है। इस ब्रांड का जलवा ऐसा है कि संगीतप्रेमियों के शेयर बाज़ार में इसका सेंसेक्स सबसे ऊपर रहता है कभी वह नीचे गिरा ही नहीं।

अपने आपको ताज़िंदगी विद्यार्थी समझने वाली लता मंगेशकर का संघर्ष, तप और समर्पण विलक्षण है। उनका करियर ऐसी ख़ूबियों से पटा पड़ा है, जिस पर रचनाकारों और संगीत सिरजने वालों को फ़ख्र है। जीते जी लता मंगेशकर ऐसी किंवदंती बन गई हैं कि उनकी आवाज़ को पाकर शब्द अमर हो जाते हैं; धुन निहाल हो जाती है; नायिकाएं सुरीली हो जाती हैं और श्रोता बिना धेला दिए मालामाल। यहोँ अनायास इस मालवी-जीव को दादा बालकवि बैरागी रचित फ़िल्म "रेशमा और शेरा' का गीत तू चंदा मैं चॉंदनी' याद हो आता है। संगीतकार जयदेव और बैरागीजी को इस गीत ने जो माइलेज दिया है वह बेमिसाल है। बैरागीजी की क़लम की ताब और लताजी के सुरों की आब इस गीत के विभिन्न शेड्स आपके मन को बावरा बनाकर रेगिस्तान में नीम के दरख्त की छॉंह मिल जाए वैसी अनुभूति देते हैं।

( ख़ुद ही अनुभव करें )



आज परिवारों में आपको ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे जहॉं परदादा ने, दादा, पिता और पुत्र ने लता के गायनामृत का रसपान किया होगा। लताजी के गाए गीत पूरे मुल्क की अमानत हैं। इसलिए यह कहने में गर्व है कि हमें इस बात से क्या लेना-देना कि हमारे राष्ट्रीय कोष में कितने ख़रबों रुपए हैं; हमें इस बात का अभिमान है कि हज़ारों गीतों ने लता के स्वर का आचमन किया है। सदियॉं गुज़र जाएँगी, आदमी ख़ूब आगे बढ़ जाएगा, दुनिया विशालतम होती जाएगी लेकिन लता के स्वरों का जादू कभी फीका नहीं पड़ेगा। सृष्टि के पंचभूतों में छठा तत्व है "लता', जो अजर-अमर है। संगीत के सात सुरों का आठवॉं सुर है लता मंगेशकर। मैं कम्प्यूटर युग में प्रगति का ढोल बजा रही पीढ़ी से गुज़ारिश करना चाहूँगा; दोस्तों ! गफ़लत छोड़ो और इस बात का मद पालो कि तुम उस भारत में पैदा हुए हो जहॉं लता मंगेशकर ने संगीत साधना की; अपने स्वरों से इस पूरी कायनात का अभिषेक किया; इंसान के मन-मंडप में अपने संगीत के तोरण बॉंधे। ज़िंदगी के रोने तो चलते ही रहेंगे, जश्न मनाओ कि लता हमारे बीच हैं. कहते हैं प्रलय के बाद मनुष्य नहीं बचेगा, लेकिन यदि कुछ बचेगा तो सिर्फ़ लता मंगेशकर की आवाज़ क्योंकि उसने संगीत को दिया है अमरता का अमृत।


लता carricature - कुलदीप दिमांग

Saturday, September 27, 2008

स्वर कोकिला लता मंगेशकर के लिये एक अदभुत कविता-तुम स्वर हो,स्वर का स्वर हो

माया गोविंद देश की जानी मानी काव्य हस्ताक्षर हैं.हिन्दी गीत परम्परा को मंच पर स्थापित करने में मायाजी ने करिश्माई रचनाएँ सिरजीं हैं.आवाज़ पर भाई संजय पटेल के माध्यम से हमेशा नई – नई सामग्री मिलती रही है.लता दीदी के जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले आवाज़ पर प्रस्तुत है समर्थ कवयित्री माया गोविंद की यह भावपूर्ण रचना.


तुम स्वर हो, तुम स्वर का स्वर हो
सरल-सहज हो, पर दुष्कर हो।
हो प्रभात की सरस "भैरवी'
तुम "बिहाग' का निर्झर हो।

चरण तुम्हारे "मंद्र सप्तकी'
"मध्य सप्तकी' उर तेरा।
मस्तक "तार-स्वरों' में झंकृत
गौरवान्वित देश मेरा।
तुमसे जीवन, जीवन पाए
तुम्हीं सत्य-शिव-सुंदर हो।
हो प्रभात की...

"मेघ मल्हार' केश में बॉंधे
भृकुटी ज्यों "केदार' "सारंग'।
नयन फागुनी "काफ़ी' डोले
अधर "बसंत-बहार' सुसंग।
कंठ शारदा की "वीणा' सा
सप्त स्वरों का सागर हो।
हो प्रभात की...

सोलह कला पूर्ण गांधर्वी
लगती हो "त्रिताल' जैसी।
दोनों कर जैसे "दो ताली'
"सम' जैसा है भाल सखी।
माथे की बिंदिया "ख़ाली' सी
"द्रुत लय" हो, गति मंथर हो।
हो प्रभात की...

"राग' मित्र, "रागिनियॉं'सखियॉं
"ध्रुपद-धमार' तेरे संबंधी।
"ख़याल-तराने' तेरे सहोदर
"तान' तेरी बहनें बहुरंगी।
"भजन' पिता, जननी "गीतांजलि'
बस स्वर ही तेरा वर हो।
हो प्रभात की...

ये संसार वृक्ष "श्रुतियों' का
तुम सरगम की "लता' सरीखी।
"कोमल' "शुद्ध' "तीव्र' पुष्पों की
छंद डोर में स्वर माला सी।
तेरे गान वंदना जैसे

Thursday, September 25, 2008

जितनी सुरीली हैं ग़ालिब की ग़ज़लें; गाने में दोगुना तप मांगती हैं

आज एक बार फ़िर आवाज़ पर हमारे प्रिय संगीत समीक्षक और जानेमाने चिट्ठाकार संजय पटेल तशरीफ़ लाए हैं और बता रहे हैं लता मंगेशकर की गायकी की कुछ अदभुत ख़ासियतें.हमें उम्मीद है कि इस पोस्ट को पढ़कर संगीत विषय से जुड़े विद्यार्थी,गायक,संगीतकार बहुत लाभान्वित होंगे.आशा है आवाज़ पर जारी सुगम समारोह में सुनी और सराही जा रही ग़ालिब की ग़ज़लों का आनंद बढ़ाने वाली होगी संजय भाई की ये समीक्षा.मुलाहिज़ा फ़रमाएँ......



एक बात को तो साफ़ कर ही लेना चाहिये कि लता मंगेशकर अपने समय की सबसे समर्थ गायिका हैं.मीरा के भजन,डोगरी,मराठी,गुजराती,और दीगर कई भाषाओं के लोकगीत,भावगीत,भक्तिगीत और सुगम संगीत गाती इस जीवित किंवदंती से रूबरू होना यानी अपने आपको एक ऐसे सुखद संसार में ले जाना है जहाँ सुरों की नियामते हैं और संगीत से उपजने वाले कुछ दिव्य मंत्र हैं जो हमारे मानस रोगों और कलुष को धो डालने के लिये इस सृष्टि में प्रकट हुआ हैं.

लता मंगेशकर के बारे में गुलज़ार कहते हैं कि लताजी के बारे में कोई क्या कह सकता है.उनके बारे में कोई बात करने की ज़रूरत ही नहीं है बल्कि उनको एकाग्र होकर सुनने की ज़रूरत है. उनके गायन के बारे में कोई अपनी राय नहीं दे सकता,सिर्फ़ अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है. ख़ाकसार की प्रतिक्रिया है कि लता मंगेशकर दुनिया की सबसे बेहतरीन गायिका तो हैं ही, सबसे अव्वल विद्यार्थी भी हैं. उन्होंने जिस तरह से अपने संगीतकारों को सुना,गुना और गाया है वह कितना सहज और सरल है ; ऐसा कह देना बेहद आसान है लेकिन ज़रा अपने कानों को इन बंदिशों की सैर तो करवाइये,आप जान जाएंगे किस बला का नाम लता है.

ग़ालिब को गाते वक़्त लता मंगेशकर पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर की विद्यार्थी हैं.सुन रहीं है,किस किस लफ़्ज़ पर वज़न देना है,कहाँ कितनी हरकतें है और कहाँ आवाज़ को हौले से साधना है और कहाँ देनी है परवाज़.ज़रा यह भी समझते चलें कि शास्त्रीय संगीत और लोक-संगीत में हर बार आप नया रच सकते हैं.जैसे बागेश्री गा रहे हैं तो इस बार तानों को थोड़ा छोटा कर लें,विलम्बित को ज़रा जल्द ख़त्म कर द्रुत पर आ जाएं,सरगम लें ही नहीं सिर्फ़ तानों से सजा लें पूरा राग. लोक-संगीत की रचनाओं को किसी सुर विशेष में बांधने की ज़रूरत नहीं,लय-घटाएँ,बढ़ाएँ;चलेगा.लेकिन हुज़ूर ये जो सुगम संगीत नाम की विधा है और ख़ास कर रेकॉर्डिंग का मामला हो तो सुगम से विकट कोई दूसरी आफ़त नहीं है. समय है कि बांध दिया गया है....तीन मिनट में ही कीजिये पूरी ये ग़ज़ल या भजन या गीत.आभूषण सारे चाहिये गायन के प्रस्तुति में.और बंदिश है संगीतकार या कम्पोज़र की कि ऐसा ही घुमाव चाहिये. सबसे बढ़कर यह कि गायकी की श्रेष्ठता के साथ संगीतकार या गीतकार/शायर चाहता है कि जो शब्द लिखे गए हैं उनकी अदायगी स्पष्ट हो,उच्चारण एकदम ख़ालिस हों और गायकी के वैभव के साथ ग़ज़ल या गीत का भाव जैसा लिखा गया है उसे दूगुना करने वाला हो.ये सारी भूमिका मैने इसलिये बांध दी है कि लता मंगेशकर की गायकी पर बहस करना बहुत आसान है ; उन प्रेशर्स को महसूस करना बहुत मुश्किल जो ग़ालिब या दीगर एलबम्स को रेकॉर्ड करते वक़्त लताजी ने जिये हैं.

लता मंगेशकर ने कहा है कि संगीतकार सज्जाद और ह्र्दयनाथ मंगेशकर के कम्पोज़िशन्स गाते हुए वे विशेष रूप से सतर्क हो जाती हैं,बात सही भी है. इन दोनो संगीतकारों ने अपने समय से अलग हटकर संगीत रचा है. आज जो बात मैंने लता मंगेशकर के बारे में कही है वह संभवत: पहली बार आवाज़ के ज़रिये ही कह पाया हूँ और उम्मीद करता हूँ कि ग़ालिब जैसा क्लिष्ट और लीक के हट कर रचा गया एलबम सुनते वक़्त आप मेरी बातों का स्मरण बनाए रखेंगे. तो सुनिए जनाब...लता+हृदयनाथ जुगलबंदी का करिश्मा.......ग़ालिब.

कभी नेकी भी उसके जी में गर....(ये ग़ज़ल आशा ने भी गई बाद में, जो आपको फ़िर कभी सुनवायेंगे)



नक्श फरियादी है...



हजारों ख्वाहिशें ऐसी...



बाज़ीच-ऐ-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे...



फ़िर मुझे दीदा-ऐ-दर याद आया...



रोने से और इश्क में बेबाक हो गए... (इस ग़ज़ल की धुन को हृदयनाथ मंगेशकर ने बरसों बाद फ़िल्म लेकिन में भी इस्तेमाल किया)


एक दुर्लभ चित्र स्मृति :आज आवाज़ पर नज़र आ रहे चित्र में -एक रेकॉर्डिंग के दौरान बतियाते हुए लताजी और उनके संगीतकार अनुज ह्र्दयनाथजी

Sunday, September 21, 2008

ग़ालिब का कलाम और लता का अंदाज़ - क़यामत

लता संगीत उत्सव की एक और पेशकश - लता सुगम समारोह, पढ़ें और सुनें संजय पटेल की कलम का और लता की आवाज़ का जादू 28 सितम्बर तक लता मंगेशकर की ग़ैर-फ़िल्मी रचनाओं के इस सुगम समारोह में.




लता मंगेशकर इस बरस पूरे ८० बरस की हो जाएंगी.सुरों की इस जीती-जागती किंवदंती का हमारे बीच होना हम पर क़ुदरत का एक अहसान है.आवाज़ के आग्रह पर हमारे चिर-परिचित संगीत समीक्षक श्री संजय पटेल ने हमारे लिये लताजी की कुछ ग़ैर-फ़िल्मी रचनाएँ,जिनमें ज़्यादातर उर्दू महाकवि ग़ालिब की ग़ज़लें शुमार हैं पर विशेष समीक्षाएँ की हैं .लताजी की इन रचनाओं पर संजय भाई २८ सितम्बर तक नियमित लिखेंगे.

लता मंगेशकर द्वारा स्वरबध्द और पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर द्वारा संगीतबध्द ग़ालिब की रचनाओं को सुनना एक चमत्कारिक अनुभव है. आज संगीत में जिस तरह का शोर बढ़ता जा रहा है उस समय में इन क्लासिकी ग़ज़लों को सुनना किसी रूहानी अहसास से गुज़रना है. चूँकि यह प्रस्तुतियाँ सुगम संगीत की अनमोल अमानत हैं; हमने इसे लता सुगम समारोह नाम दिया है...... आइये आज से प्रारंभ करते हैं लता सुगम समारोह.
उम्मीद है आवाज़ की ये सुरीली पेशकश आपको पंसद आएगी.


दुर्लभ रचनाओं को सिलसिला : लता सुगम समारोह : पहली कड़ी:


ग़ालिब,लता मंगेशकर और पं.ह्रदयनाथ मंगेशकर यानी सारा मामला ही कुछ अदभुत है.आवाज़ के भाई सजीव सारथी ने जब इस पेशकश पर अपनी बात कहने का इसरार किया तो मन रोमांचित हो उठा.सर्वकालिक महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी के प्रभावशाली रचनाकार थे.उन्हें फ़ारसी शायरी पर बहुत फ़ख्र था किंतु उन्हें लोकप्रियता मिली उर्दू शायरी की बदौलत.वे न केवल एक बेजोड़ शायर थे लेकिन एक ज़िन्दादिल इंसान भी.उनके कई शेर ख़ुद अपने आप पर व्यंग्य करते हैं जिनमें वे तत्कालीन शायरी परिदृश्य को भी फ़टकार लगाते नज़र आते हैं.बहादुर शाह ज़फ़र(1854) ग़ालिब से इतने प्रभावित थे कि ज़िन्दगी भर उनको अपना उस्ताद मानते रहे.प्रेम ग़ालिब की शायरी का स्थायी भाव था लेकिन साथ ही तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति और निजी ज़िन्दगी की तल्ख़ियों को भी उन्होनें अपने लेखन में ख़ूबसूरती से शुमार किया.


सत्तर के दशक में पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर ने ग़ालिब एलबम रचा.बता दें कि ह्र्दयनाथ जी उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब के गंडाबंद शागिर्द रहे हैं और पूरे मंगेशकर कुटुम्ब के कलाकरों को संगीत का संस्कार अपने दिवंगत पिता पं.दीनानाथ मंगेशकर जी से मिला जो अपने समय के महान रंगकर्मी और गायक थे.जब यह एलबम रचा गया है तब सुगम संगीत की लोकप्रियता के लिये एकमात्र माध्यम आकाशवाणी और विविध भारती थे. संगीत को पत्रिकाओं और अख़बारों में कोई ख़ास जगह नहीं मिलती थी. समझ लीजिये संगीतप्रेमी अपने प्रयत्नों से इस तरह के एलबम्स को जुगाड़ते थे. ये ग़ज़ले विविध भारती के रंग-तरंग कार्यक्रम में ख़ूब बजी हैं और जन जन तक पहुँचीं है.ह्र्दयनाथजी बहुत परिश्रम से इस एलबम पर काम किया है. इनके कम्पोज़िशन्स को एक ख़ास मूड और टेम्परामेंट के हिसाब से रचा गया है जिसमें न केवल सांगीतिक उकृष्टता है बल्कि अठारहवीं शताब्दी के कालखंण्ड की प्रतिध्वनि भी है.राग-रागिनियों का आसरा लेकर ह्र्दयनाथजी ने लताजी से समय के पार का गायन करवा लिया है.सारंगी दरबार की शान हुआ करती थी इसलिये सुगम समारोह में ग़ालिब एलबम से जो भी ग़ज़लें हम सुनेंगे उनमें ये साज़ प्रधानता से बजा है,बल्कि ये भी कह सकते हैं कि लताजी के बाद सारंगी ही सबसे ज़्यादा मुखर हुई है. तबला भी एक ख़ास टोनल क्वालिटी के साथ बजा है और उसे ऊँचे स्वर(टीप) में मिला कर बजवाया गया है.किसी भी एलबम की सफलता में गायक और संगीतकार की आपसी ट्यूनिंग ही कमाल करती है, इस बात को ग़ालिब एलबम सुनकर सहज ही महसूस किया जा सकता है.यह एलबम संगीत की दुनिया का बेशक़ीमती दस्तावेज़ है.

लता मंगेशकर के बारे में अगली पोस्ट्स में तफ़सील से चर्चा करेंगे,लेकिन आज सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगा कि लता जी ने संख्या की दृष्टि से कितना गाया यह मह्त्वपूर्ण नहीं , क्या गाया है यह अधिक महत्वपूर्ण है. जो हरक़ते उनके गले से इस एलबम में निकलीं है वे बेमिसाल हैं.इस एलबम को यदि एक बैठक में सुन लिया जाए तो लता जी के आलोचक भी सिर्फ़ ग़ालिब गायन के लिये इस सर्वकालिक महान गायिका को भारतरत्न दे सकते हैं.सत्तर के दशक में लताजी की आवाज़ जैसे एक संपूर्ण गायक की आवाज़ थी.रचना के साथ स्वर का निबाह करना तो कोई लताजी से सीखे.वे इस एलबम को गाते गाते स्वयं ग़ालिब के दौर में पहुँच गईं हैं और अपने सुरों की घड़ावन से ऐसा अहसास दे रही हैं मानो इस एलबम की रेकॉर्डिंग दिल्ली दरबार में ही हुई हो.बिला शक यह कह सकता हूँ कि यदि ग़ालिब भी लता जी को सुन रहे होते तो उनके मुँह से वाह बेटी ;वाह ! सुभानअल्लाह निकल ही जाता ।

आग़ाज़ करते हैं ग़ालिब की इन दो ग़ज़लों से..........

दर्द मिन्नत कशे दवा ना हुआ...



हर एक बात पे कहते हो तुम...

Monday, September 8, 2008

वह कभी पीछे मुडकर नहीं देखती, इसीलिए वह आशा है

सजय पटेल ने दो बरस पहले ख्यात गायिका आशा भोंसले से उनके जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले बात की थी.उसी गुफ़्तगू की ज़ुगाली आज आवाज़ पर....

संघर्ष हर एक के जीवन में हमेशा ही रहता है, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर देखना नहीं सीखा और शायद इसीलिए वह सिर्फ़ नाम की आशा नहीं, ज़िंदगी का वो फ़लसफ़ा हैं जिसमें "निराशा' शब्द के लिए कोई जगह नहीं। वह वैसा फूल भी नहीं हैं जिसे कल मुरझाना है, वह ऐसी ख़ुशबू हैं जिसकी महक में उल्लास है, ख़ुशी है, ज़ज़्बा है।ये सारे शब्द उस आवाज़ के लिये यहाँ झरे हैं, जो साठ बरसों से मादकता, मदहोशी और मुस्कान का मीठा सिलसिला पेश करती आई हैं, आशा भोंसले।

दो बरस पहले टेलीफ़ोन पर उनसे जब चर्चा हुई थी तब आशाजी ने कहा- जीवन ताल और लय में होना ज़रूरी है। सुर उतरा तो चढ़ जाएगा, लेकिन ताल बिगड़ी तो समझिए संगीत का समॉं ही बिगड़ गया। मनुष्य के लिए "चाल-ढाल और गाने वालों के लिए ताल' बहुत ज़रूरी है। मैंने न जाने कितने संगीतकारों के साथ काम किया तो उसे अपना एक विनम्र कर्तव्य माना। कभी काम करके थकान नहीं महसूस की मैंने। मानकर चली कि संगीत का काम भी एक इबादत है, उसे तो करना ही है।

बातचीत में ज़ेहन में उनके सैकड़ों गीत उभरे लेकिन मैंने उनसे दो ख़ास प्रोजेक्ट की चर्चा की। एक उस्ताद अली अकबर ख़ॉं के साथ किए शास्त्रीय संगीत के एलबम की और दूसरे ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली द्वारा रचे गए ग़ज़लों के एलबम की। आशाजी ने बताया कि उस्ताद अली अकबर ख़ॉं साहब अपने एलबम के लिए क्लासिकल मौसिक़ी के कई बड़े नाम आज़मा चुके थे। लेकिन बात इसलिए नहीं बन रही थी कि वो जो चाहते वह बनता नहीं। गाने वाला अपना रंग उसमें उड़ेल देता। मैं ठहरी "प्लेबैक सिंगर' सो जैसा उन्होंने बताया, मैंने गाया। उनका सबसे बढ़िया कॉम्प्लीमेंट मेरे लिए यह था कि आशाबाई आपने बाबा के संगीत को पुनर्जीवित कर दिया। न जाने कौन-कौन से कैसे-कैसे क्लिष्टतम राग और बंदिशें थीं उसमें। लेकिन बस पन्द्रह दिन ख़ॉं साहब के साथ बैठी और रिकॉर्ड कर दिया। ग़ुलाम अली साहब के साथ भी पहले गाने में घबरा रही थी, पर मेरी बेटी वर्षा ने कहा - आप कीजिए। रात को एक कम्पोज़िशन गाकर सोई और सुबह दिमाग़ में धुन मुकम्मिल हो गई। बस बाकी तो आप संगीतप्रेमी जानते ही हैं कि वह एलबम लोगों को कितना पसंद आया।

जन्मदिन बिताने की तैयारी क्या है, पूछने पर उन्होंने कहा - अब जन्मदिन या जीवन की सारी ख़ुशियॉं मैं अपने नाती-पोतों में तलाशती हूँ। यह पूछने पर कि क्या यह कहना बेहतर होगा कि भारत में पॉप की साम्राज्ञी आप हैं, तो आशाजी ने ठहाके के साथ कहा कि मैंने अण्णा (संगीतकार सी.रामचंद्र) के साथ "इना मीना डीका' गाया था। वहॉं से पॉप को एक नई पहचान मिली। अब "रंग रंग रंगीला' तक सारा सिलसिला पॉप और मस्ती का ही तो है। उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में कहा- लोगों के जीवन में जैसे "पाप' है वैसे ही मेरे जीवन में "पॉप' है।आशा जी बोले जा रहीं थीं और मेरे दिलों-दिमाग़ में सुरों का समंदर उमड़ता आ रहा था. यक़ीन जाने लें मुझ जैसे कानसेन के लिये इस सुरगंध से बतियाना लगभग एक क़िस्म से हिप्नॉटाइज़ हो जाने जैसा था.



आशा जी ने बताया कि लता मंगेशकर की छोटी बहन होना हमेशा से फ़ख़्र का विषय रहा है और हमने हमेशा एक व्यावसायिक अनुशासन को क़ायम रखा है. वे (दीदी)हमेशा एक महान गुलूकारा रहीं है और न जाने कितने गायक-गायिकाओं ने उनसे प्रेरणा ली है तो मेरे लिये तो वे बड़ी बहन और एक प्यारी सखी रहीं हैं.आशाजी ठीक कहतीं हैं.और बुरा न मानें जब भी कोई इन दो स्वर-महारानियों में तुलता करता है तो मुझे बेहद अफ़सोस होता है. देखा जाए तो दोनों एक तरह एक ध्वनि-मुद्रिका दो साइड हैं.बताइये कैसे करें तुलना. एक तरफ़ कोई गीत अधिक अच्छा है , दूसरी तरफ़ कोई दूसरा अच्छा.

आशा भोंसले गायकी में विविधता का दूसरा नाम है. ज़रा ग़ौर फ़रमाइये इस छोटी सी फ़ेहरिस्त पर : अब के बरस भेज भैया को बाबुल,रंग,रंग,रंगीला,दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये,दम मारो दम,आगे भी जाने न तू,पीछे भी जाने तू, जो भी है बस वही एक पल है,चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया,सुन सुन दीदी तेरे लिये एक रिश्ता आया है;कितनी विविधता है इन गीतों के मूड में और यहीं आकर आशाजी अपवाद हो जातीं है.वे वैरायटी का सरमाया हैं.

आशा भोंसले अपनी निजी ज़िन्दगी में बहुत टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुज़रीं हैं,लेकिन अपने नाम की तरह उन्होंने अपने आप को साबित किया है.समय की अदला-बदली चलती रहेगी,तहज़ीब छुपा-छाई खेलती रहेगी,ज़ुबान के तेवर बदलेंगें लेकिन आशा भोंसले हर दौर में प्रासंगिक होंगी.इस सर्वकालिक महान गायिका को ज़िन्दगी की पिचहत्तरवीं पायदान पर हम सब संगीतपेमियों का प्रेमल सलाम !

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(चित्र में आशा जी एक कंसर्ट में गाती हुईं, संगीत दे रहे हैं, मरहूम संगीतकार और पति आर डी बर्मन साहब)
चित्र साभार - हमाराफोटोस

Monday, September 1, 2008

हिस्सा बनिए आवाज़ पर " लता संगीत पर्व " का और जीतिए इनाम

दोस्तो,

लता दी
इस माह की 28 तारीख को हम सब की प्रिय गायिका लता मंगेशकर यानी लता दी, अपना 79वां जन्मदिन मनायेंगी. चूँकि लता दी हिन्दी फ़िल्म संगीत जगत की इतनी बड़ी शख्सियत हैं कि मात्र एक दिन का समय काफ़ी नहीं होगा, उनके अपार गीतों के संग्रह का जिक्र करने के लिए, इसलिए आवाज़ की टीम ने तय किया है कि हम महीने भर का "लता संगीत पर्व" मनाएंगे. जिसमें लता दी के संगीत दीवानों के लिए एक नायाब प्रतियोगिता हम आयोजित करने जा रहे हैं. कोई भी व्यक्ति इस प्रतियोगिता में भाग ले सकता है, करना सिर्फ़ इतना है, कि लता दी का कोई एक गीत आपको चुनना होगा, और उस गीत से सम्बंधित तमाम जानकारियों पर 300 से 400 शब्दों का एक आलेख लिखना होगा. जिसमे उस गीत से जुड़ी हुई कोई अनूठी बात, उस गीत को कोई ख़ास विशेषता जिसके कारण वो गीत आपको इतना अधिक पसंद है, उस गीत से जुड़े अन्य कलाकारों के नाम और गीत के बोल आदि शामिल होंगे. सबसे बढ़िया तरीके से प्रस्तुत पहले 3 आलेखों को क्रमशः 500, 300 और 200 रुपए की पुस्तकें मसि कागद की तरफ़ से और 10 अन्य आलेखों को आवाज़ की तरफ़ से "पहला सुर" एल्बम की एक एक प्रति भेंट की जायेगी.


शर्तें -

1. आलेख हिन्दी में लिखा होना चाहिए, हिन्दी में लिखने के लिए आप इस लिंक का इस्तेमाल कर सकते हैं, किसी भी सहायता के लिए आप hindyugm@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

2. प्रवाष्ठियाँ podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें.

3. प्रवष्टि भेजनी की अन्तिम तारीख 15 सितम्बर 2008 है.

4. परिणामों की घोषणा 28 तारीख, लता दी के जन्मदिवस पर की जायेगी.

5. एक मेल खाते से एक ही प्रवष्टि भेजी जा सकती है.

6. आप यदि अपनी तस्वीर व अन्य कोई जानकारी अपने बारे में प्रकाशित करना चाहें तो साथ में संलग्न कर भेज सकते हैं.

तो देर किस बात की, लिख डालिए लता दी के अपने पसंदीदा गीत पर एक आलेख और इस लता संगीत पर्व में शामिल होकर उस महान गायिका तक पहुंचाइये अपने दिल की बात जिसके गीतों ने आपके जीवन को कई मधुर और सुरीले लम्हें दिए हैं.

हमारी कोशिश रहेगी की इस माह हम लता दी का एक्सक्लूसिव संदेश (आवाज़ के नाम) आप तक पहुंचायें, इसके आलावा पंकज सुबीर आपके लिए लायेंगे लता दी के कुछ अनमोल नगमें और बातें, और संजय पटेल अपने ख़ास अंदाज़ में बताएँगे लता दी की कुछ अनसुनी बातें.


आप यदि लता का कोई विशेष गीत सुनना चाह रहे हैं, जिसे आप काफ़ी अर्से से सुन नहीं पाये हैं, ऑनलाइन कहीं मिल नहीं पा रहा है तो कृपया कमेंट में आप अपना अनुरोध भेज दें, आवाज़ के पाठक, श्रोता और कर्ता-धर्ता अगले २४ घण्टों के भीतर आवाज़ पर उसे उपलब्ध कराने की कोशिश करेंगे।

लता दी का कोई गीत यदि आप बहुत बढ़िया गाती हैं, और आपको लगता है कि आपके गायकी में है ज़ादू तो उसे भी रिकॉर्ड कर हमें भेजिए, २८ सित्मबर को हम चुने हुए सर्वश्रेष्ठ गीत को प्रसारित करेंगे। इस सब के अलावा और भी बहुत कुछ होगा, जिससे रोशन होगा आवाज़ पर - लता संगीत पर्व.

Wednesday, August 27, 2008

दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश

आज सुबह आपने पढ़ा हृदयनाथ मंगेशकर का संस्मरण 'वो जाने वाले हो सके तो॰॰॰॰' आज हम पूरे दिन मुकेश को याद कर रहे हैं, उनके गाये गीत सुनवाकर, उनसी जुड़ी यादें बाँटकर॰॰॰॰आगे पढ़िए तपन शर्मा 'चिंतक' की प्रस्तुति 'मैं तो दीवाना, दीवाना, दीवाना'


मुकेश के साथ कल्याण जी
चित्र साभार- हमाराफोटोज
वे परिश्रम से कभी गुरेज़ नहीं करते थे. कितनी ही बार री-टेक करो,उन्हें नाराज़ी नहीं होती.कितनी ही बार रिहर्सल के लिये कॉल करो वे तैयार..बस अभी आया.उन्हें अपने परफ़ॉरमेंस से जल्द सेटिसफ़ेक्शन नहीं होता था. बता रहे थे ख्यात संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के स्व.कल्याणजी भाई. नब्बे के दशक में जब वे लता पुरस्कार लेने इन्दौर आए तो दो दिन का डेरा था मेरे शहर. आयोजन का एंकर होने की वजह से हमेशा से कलाकारों का संगसाथ आसानी से मिलता रहा है सो कल्याणजी भाई से लम्बी बात करने का मौक़ा भी मिल ही गया. एक दिन उनके संगीत सफ़र की चर्चा होती रही, दूसरे दिन गायक-गायिकाओं पर. जब मुकेशजी पर बात आई तो कल्याणजी भाई भावुक हो उठे. मुकेशजी के घर में गुजराती परिवेश भी रहा क्योंकि पत्नी सरल गुजराती थीं (अभी इसी साल सरलबेन का देहांत हुआ है) कल्याणजी भाई बोले हम गुजराती में ही बतियाते और ख़ूब ठहाके लगाते . बहुत हँसमुख थे मुकेश भाई लेकिन जब दर्द भरे गीत की पंक्तियाँ गाने लगते तो सारे आलम का दर्द अपने गायन में उड़ेल देते.

फ़िल्म हिमालय की गोद में का गीत था "मैं तो एक ख़्वाब हूँ..." की रिहर्सल लगभग पूर्णता की ओर आ गई थी. कल्याणजी भाई ने बताया हम लगभग संतुष्ट थे, लेकिन ये लगभग मुकेशजी मेरे और आनंदजी के चेहरे पर पढ़ लिया था. बोले कुछ कमी लग रही है क्या . हमने कहा हाँ गीत का स्टार्ट और बेहतर हो सकता था. मुकेशजी ने कहा तो भाई बताओ न क्या चाहते हो. कल्याणजी ने कहा आप ऐसा स्टार्ट लीजिये जैसे आप मोहम्मद रफ़ी हैं.मुकेशजी ने कहा ऐसा बोलो न .. रिकॉर्डिंग शुरू हुई और क्या लाजवाब गीत बना है याद कीजिये आप. बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती. गाना पूरा होने के बाद मुकेशजी ने रफ़ी साहब को फ़ोन किया रफ़ी भाई मैंने आपका कुछ चुरा लिया. रफ़ी साहब हैरान कहने लगे मैंने एक गीत में आपके स्टाइल में आमद ली है. रफ़ी साहब और मुकेशजी देर तब फ़ोन पर बतियाते रहे. बात बड़ी सादी है, लेकिन सादा तबियत और नेक इंसान मुकेशजी की महानता देखिये कि अपने समकालीन गायक का थोड़ा सा अंदाज़ भी फ़ॉलो किया तो उसे जताया,यहाँ आजकल पूरी की पूरी धुन चुराई जा रही है और फ़िर भी शर्म नहीं है किसी को.

शास्त्रीय संगीत के पेचोख़म से दूर रहने वाले गायक थे मुकेश. एक सुर पर लम्बा टिकना उनके लिये मुमकिन नहीं होता था क्योंकि हर वॉइस कल्चर की अपनी लिमिटेशन तो होती ही है लेकिन मुकेश अपनी इस मर्यादा से ख़ूब वाकिफ़ थे. उन्होनें बंधे हुए मीटर में रहते हुए भावप्रणवता और इमोशन्स पर अपना ध्यान रखा . जब नौशाद साहब के साथ मेला और अंदाज़ के गीत गाए तो आप महसूस करेंगे कि मुकेश जी ने अपने ऊपर चढ़ी सहगल अंदाज़ की केंचुली निकाल फ़ेंकी और पूरे फ़ार्म में आ गए.

मेरा मानना है कि मुकेश सर्वहारा के गायक थे.शर्तिया कह सकता हूँ कि आप-हमसब कम से कम मुकेशजी के गीत तो गुनगुनाते ही हैं. आप नोटिस लीजियेगा कि पारिवारिक अंताक्षरी में जब भी पुराने गीत गुनगुनाए जाते हैं, उसमें मुकेश का रंग गाढ़ा ही नज़र आता है. उनके गीतों की संख्या कम है लेकिन लोकप्रियता के लिहाज़ से मुकेश आज भी सर्वश्रेष्ठ कहे जा सकते हैं.

एक ख़ास बात मुकेश स्मृति-दिवस पर यह बात विशेष रूप से कहना चाहूँगा कि भारतीय रजत-पट के शो-मेन राजकपूर को जन-जन में पहुँचाने में मुकेश का गायन एक महत्वपूर्ण कड़ी है और इसके महत्व को कभी ख़ारिज न किया जा सकेगा.

इस बात का ज़िक्र बहुत कम होता है लेकिन यहाँ ज़रूर करूंगा. फ़िल्म संगीत के लिये जो कुछ मुकेशजी ने किया वह तो अदभुत है ही लेकिन फ़िल्मों से अलहदा श्री रामचरितमानस की पाँच घंटे की ध्वनि-मुद्रिका संचयन मुकेशजी का एक अनोखा कारनामा है भारतीय संस्कृति के लिये.

मुकेश जी की आवाज़ में कसक,दर्द,करूणा,हास्य,आशा-निराशा और श्रंगार रस की अभिव्यक्ति सहजता से उभरती थी लेकिन दर्द में तो वे बेमिसाल थे.वे इंसानियत के तक़ाज़ों की दृष्टि से भी विलक्षण थे.अभी पिछले दिनों उनके पुत्र नितिन से आत्मीय मुलाक़ात हुई तब उन्होने विनम्रता से बताया कि पापा अच्छाइयों का सूर्य थे .उनकी गायकी से मिली छाया से जितना कर पाया कम है लेकिन मैं संतुष्ट हूँ.क्या अगले जन्म में मुकेश बनना चाहेंगे आप, मैने नितिन भाई से पूछा था.तो भावुक होकर बोले मुकेशजी जैसे इंसान दुनिया में दोबारा नहीं आते.मैं अगले जन्म में भी उनका बेटा ही बनना चाहूँगा.

इसमें कोई शक नहीं कि नौशाद,शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनंदजी,सलिल चौधरी,सचिनदेव बर्मन,रोशन,ह्सरत जयपुरी,शैलेंद्र,साहिर और इंदीवर के गीतों और संगीत को निर्वेवाद रूप से अनमोल कहा जा सकता है लेकिन इन रचनाओं को अमरत्व प्रदान करने काम तो मुकेश ने ही किया यह भी अकाट्य सत्य है.

जीवन का आना-जाना चलता रहेगा. संसार की गति थमने का नाम नहीं लेगी.फूल-पत्तियाँ खिलते रहेंगे,आवाज़े आतीं रहेंगी और संगीत बजता रहेगा लेकिन मुकेश जैसे कोमल स्वर की कमी कभी पूरी न हो सकेगी. संगीतप्रेमी मन हमेशा कहता रहेगा...

ये घाट,तू ये बाट कभी भूल न जाना
ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना

सुनिए लोक-संगीत से रचा-बसा बम्बई का बाबू फिल्म का एक गीत 'चल री सजनी, अब क्या सोचे?'





पढ़िए हृदयनाथ मंगेशकर का संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰'

Sunday, August 10, 2008

लौट चलो पाँव पड़ूँ तोरे श्याम-रफ़ी साहब का एक नायाब ग़ैर फ़िल्मी गीत

विविध भारती द्वारा प्रसारित किया जाने वाला ग़ैर-फ़िल्मी यानी सुगम संगीत रचनाओं का कार्यक्रम रंग-तरंग सुगम संगीत की रचनाओं को प्रचारित करने में मील का पत्थर कहा जाना चाहिये. इस कार्यक्रम के ज़रिये कई ऐसी रचनाएं संगीतप्रेमियों को सुनने को मिलीं हैं जिनके कैसेट अस्सी के दशक में बड़ी मुश्किल से बाज़ार में उपलब्ध हो पाते थे. ख़ासकर फ़िल्म जगत की कुछ नायाब आवाज़ों मो.रफ़ी, लता मंगेशकर, आशा भोसले, गीता दत्त, सुमन कल्याणपुरकर, मन्ना डे, महेन्द्र कपूर, उषा मंगेशकर, मनहर, मुबारक बेगम आदि के स्वर में निबध्द कई रचनाएं रंग-तरंग कार्यक्रम के ज़रिये देश भर में पहुँचीं.

संगीतकार ख़ैयाम साहब ने फ़िल्मों में कम काम किया है लेकिन जितना भी किया है वह बेमिसाल है. उन्होंने हमेशा क्वॉलिटी को तवज्जो दी है. ख़ैयाम साहब ने बेगम अख़्तर, मीना कुमारी और मोहम्मद रफ़ी साहब को लेकर जो बेशक़ीमती रचनाएं संगीत जगत को दीं हैं उनमें ग़ज़लें और गीत दोनो हैं. सुगम संगीत एक बड़ी विलक्षण विधा है और हमारे देश का दुर्भाग्य है कि फ़िल्म संगीत के आलोक में सुगम संगीत की रचनाओं को एक अपेक्षित फ़लक़ नहीं मिल पाया है.

संगीतकार ख़ैयाम
ख़ैयाम साहब की संगीतबध्द और रफ़ी साहब के स्वर में रचा ये गीत (क्षमा करें! मैं इसे भजन नहीं कह सकता) गोपी भाव की पराकाष्ठा को व्यक्त कर रहा है. राजस्थानी जी ने कृष्ण के विरह को जो शब्द दिये हैं वह मन को छू जाते हैं, और कम्पोज़िशन देखिये , सारे स्वर ऐसे चुने हैं ख़ैयाम नें कि अपने आप ही कविता की सार्थकता समृध्द हो गई है. रफ़ी साहब शब्द को अपने कंठ से ख़ुद की आत्मा में उतार लेते हैं...गोया स्वयं गोपी बन गए हों और ब्रज की गलियों में अपने कान्ह कदंब के नीचे बैठ भीगी आँखों से टेर लगा रहे हों....पत्ती-पत्ती,फूल-फूल और कूल-कूल (ठंडा ठंडा नहीं, जमुना का किनारा) में कृष्ण को देखते रफ़ी ब्रज के कण कण से प्रार्थित हैं..... लौट चलो...पाँव पडूँ तोरे श्याम.

Thursday, July 31, 2008

जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे...

आवाज़ पर आज का दिन समर्पित रहा, अजीम फनकार मोहमद रफी साहब के नाम, संजय भाई ने सुबह वसंत देसाई की बात याद दिलाई थी, वे कहते थे " रफ़ी साहब कोई सामान्य इंसान नही थे...वह तो एक शापित गंधर्व था जो किसी मामूली सी ग़लती का पश्चाताप करने इस मृत्युलोक में आ गया." बात रूपक में कही गई है लेकिन रफ़ी साहब की शख़्सियत पर एकदम फ़बती है.( पूरा पढ़ें ...)

मोहम्मद रफी, ऐतिहासिक हिन्दी सिनेमा जगत का एक ऐसा स्तम्भ जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिल पर अमिट छाप बनाये है, जिनकी सुरीली अद्वितीय आवाज हर रोज हमें दीवाना करती है और जिन्होंने करीब पैंतीस सालों में अपनी अतुलनीय आवाज में मधुर गीतों का एक बड़ा अम्बार हमारे लिये छोड़ा । रफी जी की आवाज एक ऐसी आवाज, जिसने दुःख भरे नगमों से लेकर धूम-धड़ाके वाले मस्ती भरे गीतों सभी को एक बहतरीन गायकी के साथ निभाया, यूँ तो बहुत से नये गायक कलाकारों द्वारा रफी जी की आवाज को नकल करने की कोशिश की गयी और उनको सराहा भी गया परंतु कोई भी मोहम्मद रफी के उस जादू को नही ला सका; शायद कोई कर भी न सके । पुरजोर कोशिशों के बावजूद कोई भी ऐसा गायक रफी साहब की केवल एक-आध आवाज को नकल करने में सफल हो सकता है परंतु कोई भी रफी साहब की उस आवाज की विविधता को नही ला सकता जैसा वे करते थे.

रफी साहब, गीत-संगीत के आकाश में इस सितारे का उदय अमृतसर के निकट एक गांव कोटला सुल्तान सिंह में 24 दिसम्बर 1924 को हुआ । जब रफी जी अपने बचपन की सीढियां चढ रहे थे तब इनका परिवार लाहौर चला गया । रफी जी का गीत-संगीत के प्रति इतना लगाव था कि ये बचपन के दिनों में उस फकीर का पीछा करते थे जो प्रतिदिन उस जगह आता था और गीत गाता था जहाँ ये रहते थे । इनके बड़े भाई हामिद इनके संगीत के प्रति अटूट लगाव से परिचित थे और हमेशा प्रोत्साहित किया करते थे । लाहौर में ही उस्ताद वाहिद खान जी से रफी जी ने सगीत की शिक्षा प्राप्त करनी शुरू कर दी । रफी साहेब के शुरुवाती दिनों की कहानी आप को युनुस भाई बता ही चुके हैं ( यहाँ पढ़ें...)


रफ़ी साहब के संगीत सफर की बड़ी शुरूआत फिल्म "दुलारी(१९४९)" के सदाबहार गीत "सुहानी रात ढल चुकी" से हुई थी। इस गाने के बाद रफ़ी साहब ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सत्तर के दशक तक वे पार्श्व-गायन के बेताज बादशाह रहे। इस सफलता के बावजूद, रफी साहब में किसी तरह का गुरूर न था और वे हमेशा हीं एक शांत और सुलझे हुए व्यक्तित्व के रूप में जाने गए। उनके कई सारे प्रशंसक तो आज तक यह समझ नहीं पाए कि इतना शांत और अंतर्मुखी व्यक्ति अपने गानों में निरा जोशीला कैसे नज़र आता है।

उनके पुत्र शाहिद के शब्दों में -

"जब एक बार हमने उनसे पूछा कि क्या वास्तव में आपने हीं 'याहू' गाया है, तो अब्बाजान ने मुस्कुराकर हामीं भर दी। हम उनसे पूछते रहे कि 'आपने यह गाना गाया कैसे?', पर उन्होंने इस बारे में कुछ न कहा। हमारे लिए यह सोचना भी नामुमकिन था कि उनके जैसा सरल इंसान "याहू" जैसी हुड़दंग को अपनी आवाज दे सकता है।"

शायद यह रफ़ी साहब की नेकदिली और संगीत जानने व सीखने की चाहत हीं थी, जिसने उन्हें इतना महान पार्श्व-गायक बनाया था। उन्होंने किसी भी फनकार की अनदेखी नहीं की। उनकी नज़रों में हर संगीतकार चाहे वह अनुभवी हो या फिर कोई नया, एक समान था। रफ़ी साहब का मानना था कि जो उन्हे नया गीत गाने को दे रहा है, वह उन्हें कुछ नया सीखा रहा है, इसलिए वह उनका "उस्ताद" है। अगर गीत और संगीत बढिया हो तो वे मेहनताने की परवाह भी नहीं करते थे। अगर किसी के पास पैसा न हो, तब भी वे समान भाव से हीं उसके लिए गाते थे।

गौरतलब है कि रफ़ी साहब ने अपने समय के लगभग सभी संगीतकारों के साथ काम किया था, परंतु जिन संगीतकारों ने उनकी प्रतिभा को बखूबी पहचाना और उनकी कला का भरपूर उपयोग किया , उनमें नौशाद साहब का नाम सबसे ऊपर आता है। नौशाद साहब के लिए उन्होंने सबसे पहला गाना फिल्म "पहले आप" के लिए "हिन्दुस्तान के हम हैं , है हिन्दुस्तान हमारा" गाया था। दोनों ने एक साथ बहुत सारे हिट गाने दिए जिन में से "बैजू बावरा" , "मेरे महबूब" प्रमुख हैं। एस०डी० बर्मन साहब के साथ भी रफ़ी साहब की जोड़ी बेहद हिट हुई थी। "कागज़ के फूल", "गाईड", "तेरे घर के सामने", "प्यासा" जैसी फिल्में इस कामयाब जोड़ी के कुछ उदाहरण हैं।

सत्तर के दशक के प्रारंभ में रफ़ी साहब की गायकी कुछ कम हो गई और संगीत के फ़लक पर किशोर दा नाम का एक नया सितारा उभरने लगा। परंतु रफ़ी साहन ने नासिर हुसैन की संगीतमय फिल्म "हम किसी से कम नहीं(१९७७)" से जबर्दस्त वापसी की। उसी साल उन्हें "क्या हुआ तेरा वादा" के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया।

रफ़ी साहब के संगीत सफर का अंत "आस-पास" फिल्म के "तू कहीं आस-पास" गाने से हुआ। ३१ जुलाई, १९८० को उनका देहावसान हो गया। उनके शरीर की मृत्यु हो गई, परंतु उनकी आवाज आज हीं सारी फ़िज़ा में गूँजी हुई है। उनकी अमरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि , उनकी मृत्यु के लगभग तीन दशक बाद भी , उनकी लोकप्रियता आज भी चरम पर है। कितना सच कहा है रफी साहब ने अपने इस गीत में...."तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनाओगे...."

जानकारी सोत्र - इन्टरनेट , आवाज़ के लिए संकलन किया - विश्व दीपक 'तनहा' और भूपेंद्र राघव.

( ऊपर चित्र में रफी साहब, साथी लता और मुकेश के साथ )

हमें यकीं है कि आज पूरे दिन आपने रफी साहब के अमर गीतों को सुनकर उन्हें याद किया होगा, हम छोड़ जाते हैं आपको एक अनोखे गीत के साथ, जहाँ रफी साहब ने आवाज़ दी, किशोर कुमार की अदाकारी को, ये है दो महान कलाकारों के हुनर का संगम...देखिये और आनंद लीजिये.



रफी साहब के केवल दो ही साक्षात्कार उपलब्ध हैं, जिनमे से एक आप देख सकते हैं यहाँ.

Thursday, July 24, 2008

सीखिए गायकी के गुर

गाना आए या न आए,गाना चाहिए...जनाब बाथरूम सिंगिंग छोडिये, और महफिलों की जान बनिए, आवाज़ पर संजय पटेल लेकर आए हैं, नए गायकारों के लिए मशहूर संगीतकार कुलदीप सिंह के सुझाये कुछ नायाब टिप्स...

दोस्तो,
एक संगीत प्रतियोगिता के संचालन के दौरान, मैंने बतौर निर्णायक उपस्थित, जाने माने संगीतकार कुलदीप सिंह (फ़िल्म साथ-साथ और अंकुश से मशहूर), जिन पर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह को पहली बार पार्श्व गायन में उतारने का श्रेय भी है, से जानना चाहा कुछ ऐसे मशवरे, जो उभरते हुए नए गायकों, विशेषकर जो सुगम संगीत (गीत, ग़ज़ल,और भजन आदि ) गा रहे हैं या फ़िर इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं. कुलदीप जी ने जो बातें बतायीं वो आपके साथ बाँट रहा हूँ, एक बार फ़िर "आवाज़" के मध्यम से, तो गायक दोस्तो, नोट कर लीजिये कुछ अनमोल टिप्स :

- ज़्यादातर बाल कलाकार अपने गुरू का रटवाया हुआ गाते हैं.गुरूजनों का दायित्व है कि वे इस बात का ख़ास ख़याल रखें कि क्या जो बच्चे को सिखाया जा रहा है, वह उसकी उम्र पर फ़बता है.

- कविता/शायरी की समझ सबसे बड़ी चीज़ है.जब गा रहे हैं 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ’ तो ये जानना ज़रूरी है कि एहमद फ़राज़ ने इस ग़ज़ल में क्या कहा है. यदि कबीर गा रहे हैं तो जानें कि ’जो भजे हरि को सदा; वही परम-पद पाएगा', ये परम-पद क्या बला है. रचना का तत्व जानें बिना गायकी में भाव पैदा करना मुमकिन नहीं.

- वह गाइये जा आपकी आवाज़ को सूट हो , इसलिये कोई ग़ज़ल,गीत या भजन न गाएँ कि वह बहुत सुना जाता है. क्या आपकी आवाज़ से वह बात जाएगी जो कविता/शायरी में कही गई है.आपकी आवाज़ और रचना की जुगलबंदी अनिवार्य है.

- तलफ़्फ़ुज़...उच्चारण ...सुगम संगीत की जान हैं. भजन,ग़ज़ल और गीत ..ये सब शब्द प्रधान गायकी के हिस्से हैं . यदि शब्द ही साफ़ नहीं सुनाई दिया तो आपके गाने का मक़सद पूरा नहीं होगा.सुगम संगीत में रचना की पहली पंक्ति सुनते ही श्रोता तय कर लेता है कि उसे ये रचना या इस गायक को पूरा सुनना है या नहीं.संगीत गुरू यदि भाषा की सफ़ाई का जानकार न हो तो ऐसे किसे व्यक्ति से संपर्क बनाए रखना चाहिये जो उच्चारण की नज़ाकत को जानता हो.(इस मामले में मैं रफ़ी साहब और लता जी को उच्चारण का शब्दकोश मानता हूँ; नई आवाज़ों को चाहिये कि वे इन दो गायको के गाए गीतों के शब्दों को बहुत ध्यान से सुनें)

- सरल गाना ज़्यादा कठिन है. बड़े और नामचीन गायकों को सुनिये ज़रूर, लेकिन फ़िज़ूल में उनकी आवाज़ की हरक़तों की नक़ल न करें. बात को सीधे सीधे कहिये .ज़्यादा घुमाव फ़िराव से शब्द प्रदूषित हो जाता है. जगजीतसिंह को सुनिये...कितना सादा गाते हैं .वे क्लासिकल पृष्ठभूमि से आए हैं, लेकिन जानते हैं कि ग़ज़ल गायकी की क्या ख़ूबी है.वे अपनी आवाज़ को बहुत लाजवाब तरीक़े से घुमाना जानते हैं (यक़ीन न हो तो फ़िल्म आविष्कार में उनका और चित्रा सिंह का गाया 'बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जा' ...सुनिये)लेकिन वे शब्द और सिर्फ़ शब्द का दामन ही नहीं छोड़ते.

- शास्त्रीय संगीत आधार है...यदि गाने के क्षेत्र में वाक़ई गंभीरता से आना चाहते हैं तो शास्त्रीय संगीत सीखे बिना क़ामयाबी संभव नहीं.

- देहभाषा (बॉडी लैंग्वेज), सहज रखिये...गले या शरीर के दीगर भागों पर गाने का तनाव मत लाईये...तसल्ली गाने की सबसे बड़ी चीज़ है. देखिये तो कभी मेहंदी हसन साहब को गाते हुए...कितनी शांति से सुर छेड़ते हैं...बल्कि उससे खेलते हैं...उसमें रम जाते हैं....गाते वक़्त गाने वाला ख़ुद अपने भीतर बैठे कवि को प्रकट कर दे यानी किसी रचना को ऐसे गाए जैसे वह उसी की लिखी है और यहाँ फ़िर वही बात लागू हो जाती कि कविता/शायरी की समझ के बिना ये संभव नहीं.

- सुनना और सुनना ...नई आवाज़ों को अपने क्षेत्र की (जिस भी विधा आप गाते हैं)पूर्ववर्ती वरिष्ठ कलाकारों की रेकॉर्डिंग्स सुनिये.अपने पसंदीदा गुलूकार का कलेक्शन सहेजिये..समझिये कैसे गाते रहे हैं ये बड़े कलाकार..सुनिये...गुनिये...और फ़िर गाइये.
विभिन्न विधाओं में इन आवाज़ों ज़रूर सुनें:

- नक़ल बड़ी ख़तरनाक़ चीज़ है...मत पड़िये इस उलझन में ..जब जब भी आप किसी अन्य गायक को दोहराएंगे..वही कलाकार याद आएंगे (जिसको आप दोहरा रहे हैं या नक़ल कर रहे हैं) आप स्थापित नहीं हो पाएंगे. भगवान ने आपके गले में जो दिया है उसे निखारिये.

- अच्छा कलाकार बनने से पहले अच्छा इंसान बनिये,और शऊर पैदा कीजिये ज़िन्दगी की अच्छी बातों को अपनाने का. गाते हैं तो साहित्य पढ़ने में कविता/शायरी सुनने,चित्रकला में रूचि लेने,अभिनय में, यानी दूसरी विधाओं से राब्ता रखने से आप बेहतर कलाकार बन सकते हैं.

ये बातें नई आवाज़ों के लिये निश्चित ही काम की हैं .इन बातों में मैंने कुलदीप सिंह जी के अलावा अपनी थोड़ी बहुत अक़्ल का इस्तेमाल भी किया है.

उम्मीद है इन बातों में दी गई नसीहतें और मशवरे,भजन,गीत और ग़ज़ल गाने वाले नए कलाकारों के लिये बहुमूल्य साबित होंगीं, शुभकामनाओं सहित.

Monday, July 14, 2008

"नैना बरसे रिमझिम रिमझिम" - संजय पटेल ने ताज़ा किया एक मार्मिक संस्मरण, संगीत के महान फनकार मदन मोहन को आवाज़ की श्रद्दांजलि

Mangeshkar christened him 'The Emperor Of Ghazals'. She should know because it is in her voice that Madan Mohan created all those masterpieces that set an impossibly high standard for ghazals in films. The irony of the fact is that Madan Mohan couldn't combine class and mass appeal the way an S.D.Burman or Shanker-Jaikishan could. He composed the only way he knew to - with great respect for each of his tunes.

दोस्तो, आज मदन मोहन जी की ३३ वीं पुन्यतिथि है, इस अवसर पर उन्हें याद कर रहे हैं आवाज़ के पारखी संजय पटेल, जानिए उन्हीं की जुबानी ये मार्मिक संस्मरण, जो जुडा है एक अमर गीत " नैना बरसे " से....

मदन मोहन के गीत नैना बरसे रिमझिम रिमझिम से जुड़ा एक मार्मिक संस्मरण.
- संजय पटेल

जब हमारे मन में संगीतकार मदन मोहन का स्मरण आता है तब स्वतः ही यह बात स्थापित हो जाती है कि हम उस सुरीले दौर की बात कर रहे हैं जब संगीत में शोर कम और माधुर्य अधिक हुआ करता था। इसका मतलब ये भी नहीं कि वैसा दौर बाद में नहीं आया लेकिन यह निर्विवाद है कि मदन मोहन की बलन का संगीतकार परिदृश्य पर उपस्थित नहीं हुआ। मदनजी को ग़ज़लों का बादशाह कहा जाता है। पोएट्री की उनकी समझ बेमिसाल थी और संगीत की लाजवाब। यही वजह है कि ग़ज़ल जैसी मासूम काव्य विधा मदन मोहन के गीतों में आकर विलक्षण बन जाती है। यह समय का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि मदन मोहन नाक़ामयाब फ़िल्मों के क़ामयाब संगीतकार कहलाए। बात स्पष्ट है कि फ़िल्में ज़रूर पिट गई होंगी लेकिन मदन मोहन का संगीत अजर अमर बन गया।

मदन मोहन के संगीत का जादू कुछ ऐसा अद्भुत है कि आप एक गीत पर रूक कर रह ही नहीं सकते। यदि आप "हम प्यार में जलने वालों को चैन कहॉं, आराम कहॉं (जेलर)' सुन रहे हैं तो लगता है कि यही मदनजी की श्रेष्ठ रचना है लेकिन जैसे ही आपके कानों पर भैरवी में निबद्ध फ़िल्म भाई-भाई का गीत "कदर जाने ना मोरा बालमवा' पड़ता है तो आप पिछले गीत को भूल जाते हैं। शास्त्रीय संगीत हर एक के बूते का नहीं होता इस लिहाज़ से फ़िल्म संगीत एक सामान्य व्यक्ति की ज़िंदगी में सुरीलापन घोलने का बड़ा काम करता है। ज़रा सोचिये यदि मदनजी जैसे संगीतकार फ़िल्म विधा की ओर न आकर शास्त्रीय संगीत की ओर चले जाते तो आप हम जैसे संगीतप्रेमियों का क्या होता।

आज जिस गीत की चर्चा हम कर रहे हैं वह फ़िल्म”वो कौन थी’ से लिया गया है और मुखड़ा आपका मेरा सबका जाना पहचाना है ... "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' सुनने को यह एक बहुत सामान्य गीत है लेकिन जब इसकी पृष्ठभूमि मालूम होती है तो वाकई हमारी आँखों से भी दुःख का बादल बरसने लगता है। हुआ यूँ कि मदनजी के भाई प्रकाश दिल्ली से मुंबई के बीच रेल से यात्रा कर रहे थे। एकदम स्थान तो याद नहीं आ रहा लेकिन यात्रा के दौरान कुछ कुख्यात लुटेरों ने प्रकाशजी की हत्या कर दी। मदनजी अपने सहयोगी घनश्यामजी के साथ भरे मन और थकान भरी सड़क यात्रा से घटना स्थल तक पहुँचे और अपने भाई की लाश को लेकर मुंबई लौटे। अंतिम संस्कार करने के बाद मदन मोहन कुछ ऐसी विचित्र मानसिक स्थिति में आए कि उन्होंने अपने आपको दो-तीन दिनों के लिए अपने कक्ष में बंद कर लिया। जब कुछ समय बीत गया तो परिजन चिंतित हुए और घनश्यामजी को आगामी रिकार्डिंग्स के डेट्स को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ा। हिम्मत करके घनश्यामजी ने मदनजी का दरवाज़ा खटखटाया और उन्हें बताया कि इस फ़िल्म के गीत की रिकार्डिंग के लिए आज के लिये ही स्टूडियो और लताजी को बुक किया हुआ है। घनश्यामजी ने परिस्थिति के मद्देनज़र पूछा कि क्या स्टूडियो की बुकिंग कैंसल करके लताजी को ख़बर कर दूँ? मदनजी का उत्तर चौंकाने वाला था ! उन्होंने कहा नहीं घनश्याम रेकॉर्डिंग आज ही होगी।

ज़रा सोचिये जिस व्यक्ति ने अपने प्रिय भाई को महज़ तीन दिन पहले गंवाया हो वह संगीत कैसे रच सकता है। लेकिन यदि वह व्यक्ति मदन मोहन है तो सब कुछ संभव है। उसी भरे मन से मदन मोहन स्टूडियो पहुँचते हैं रिकार्डिंग शुरू होती है और ये लाजवाब गाना हम संगीतप्रेमियों की अमानत बन जाता है। ये क़िस्सा सुनने के बाद इस गीत को सुनिये तो आपको लगेगा कि दुनिया जहान का सारा दर्द इस गीत में आ समाया है। "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' ये रिमझिम कहीं न कहीं मदनजी के भाई के दुःखद स्मरण की रिमझिम है। कहीं न कहीं मन में समोया दर्द उघाड़ रही है। मदन मोहन के संगीत में लता मंगेशकर की गायकी कुछ अलग ही रंग और अंदाज़ अख़्तियार कर लेती है। १९५६ से लेकर १९७५ तक लताजी ने न जाने कितने गीत मदनजी के संगीत निर्देशन में गाए हैं लेकिन इस गीत में लताजी गीतकार राजा मेहंदी अली ख़ाँ के शब्दों को जैसे अपने गायकी का अमृत स्पर्श प्रदान कर रही है। ऑर्केस्ट्रा और लताजी की गायकी का ब्लेंडिंग मदन मोहन के संगीत में कुछ ऐसा होताहै कि वे एक दूसरे का पूरक बन जाता है। न ये तोला ऊपर न वह माशा नीचे। संगीत को सुने तो मदनजी सुनाई देते हैं, लताजी को सुनें तो लताजी सुनाई देती हैं। कोई एक दूसरे को ओवरलैप नहीं करता है। इस गीत में भी ये सारी ख़ूबियॉं चमकती दिखाई देती हैं।मदन मोहन के संगीत का एक जादू यह भी है कि हो सकता है आप उनकी रचे गीत/ग़ज़ल के शब्द भूल जाएँ लेकिन धुन नहीं भूल सकते. अपने जीवन काल में 93 फ़िल्मों के 612 गीतों को संगीतबध्द करने वाले इस महान संगीत सर्जक ने कुछ ऐसी अनमोल धुनें संगीत प्रेमियों को दी हैं जिन्हें कालातीत ही कहना होगा.समय बदलेगा,रहन-सहन,खानापीना,फ़ैशन,इंसानी फ़ितरतें और बदलेगा हमारी ज़ुबान की तमीज़ लेकिन नहीं बदलेगा मदन मोहन के संगीत का अलौकिक सिलसिला ...हम सब के मन को मालामाल करता हुआ. ...


(मदन मोहन और लता जी जब भी मिले संगीत का नया इतिहास बना)

आइये संगीतकार मदन मोहन को याद करते हुए देखते हैं उन्हीं का रचा,फ़िल्म "वो कौन थी" का यह गीत जो मनोज कुमार और साधना पर फिल्माया गया है.



MADAN MOHAN - "THE UNFORGETABLE" ( A LIFE BRIEF ) ( SOURCE - INTERNET )

Madan Mohan was the son of Rai Bahadur Chunnilal, one of the big names of the 30's and 40's, and a partner in Bombay Talkies and then Filmistan. Madan Mohan was sent to Dehradun to join the army on the insistence of his father. Once he was posted at Delhi, he quit the Army and went to Lucknow to do what he wanted to do, to join All India Radio. His musical roots strengthened in Lucknow because he came across famous people like Ustad Faiyyaz Khan, Ustad Ali Akbar Khan, Roshan Ara Begum, Begum Akhtar, Siddheshwari Devi, and Talat Mehmood, all renowned names in the field of classical music and ghazal singing. He carried their influence with him always, which was clearly evident by his music compositions in his career, and one of the main reasons why he excelled in aesthetic composition inspite of having no formal training in music.
A patriotic Song


Madan Mohan came to Bombay in the late 40's, and assisted S. D. Burman and Shyam Sunder for a brief spell, for films being made by filmistan studios. Madan's first big independant break was Aankhen in 1950. After his film 'Aankhen' Madan and Lata became a great team together and Lata sang for almost all his films. Lata Mangeshkar was the last word for him. The sweetness Madan achieved here in Lata Mangeshkar’s voice is something rare in his repertory. It was never enough that there was enough of only Lata in a Madan tune. Lata used to call Madan ‘Ghazal Ka Shehzadaa’. ‘Woh chup rahen to mere dil ke daag jalte hain’ from the film Jahan Ara and ‘Maine rang li aaj chunariya’ from Dulhan Ek Raat Ki are some others of his compositions. He scored for a theme in mime like Chetan Anand's Heer Ranjha.

Madan Mohan made excellent use of voices of Talat Mahmood and Mohd. Rafi as well. His favourite lyricists were Raja Mehndi Ali Khan, Rajendra Krishan, and Kaifi Azmi. Majrooh Sultanpuri and Sahir Ludhianvi also wrote for him for a few films. Madan’s light compositions have the same individualistic quality as his serious songs. What's more none of his contemporaries had the knack of picking the right instruments for the right song.

Madan Mohan was totally different from the Punjab school of composers dominating Hindi film Music in the late l94O and early 195O's. Even O.P. Naiyyar, for all his sheen of modernity displayed traces of his Punjabi roots but not once could you scent the 'dehati’ Punjabi at work in a Madan Mohan composition. The Punjab school produced some of the finest music in our films. But always you got the impression that it was music literally rooted in the Punjab soil. Here is where Madan Mohan was diametrically different. He was the artistic aristocrat at work. The son of Rai Bahadur Chuni Laal, the Filmistan chief, at work. Madan Mohan's best music belonged to the drawing room that is why Madan had problems consistently equating with the masses. He was essentially a composer for the classes.

Every composer had a favorite raga, Madan had none. Look at the flair and imagination with which he scored for a theme in mime like Chetan Anand's Heer Ranjha. Sachin Dev Burman paid Madan Mohan the ultimate tribute; ‘ I could not have scored Heer Ranjha with half the felicity Madan Mohan did.’ Madan Mohan was still a struggling composer when he created his masterly tunes. And it is when you are struggling that you really create. Later, at least in the l970's, one felt Madan became rather stylized. In other words, he was, composing to live up to his reputation as the ‘Ghazal King’, which cramped his style in the matter of being a freewheeler composer, - a must for films.

He died on July 14th, in the year 1975. He did not live to see the success of two of his very big hits 'Mausam' and 'Laila Majnu'. Most Popular films of Madan Mohan are 'Ashiyana, Madhosh, Baghi, Bhai Bhai, Mastane, Gateway Of India, Dekh Kabeera Roya, Adalat, Chacha Zindabad, Manmauji, Sanjog, Woh Kaun Thi, Jahan Ara, Ghazal, Sharabi, Mera Saaya, Neela Akash, Ek Kali Muskayi, Chirag, Dastak, Heer Ranjha, Haste Zakhma, Mausam, etc.

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