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Wednesday, April 21, 2010

ज़ुल्मतकदे में मेरे.....ग़ालिब को अंतिम विदाई देने के लिए हमने विशेष तौर पर आमंत्रित किया है जनाब जगजीत सिंह जी को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८०

ज से कुछ दो या ढाई महीने पहले हमने ग़ालिब पर इस श्रृंखला की शुरूआत की थी और हमें यह कहते हुए बहुत हीं खुशी हो रही है कि हमने सफ़लतापूर्वक इस सफ़र को पूरा किया है क्योंकि आज इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी है। इस दौरान हमने जहाँ एक ओर ग़ालिब के मस्तमौला अंदाज़ का लुत्फ़ उठाया वहीं दूसरी ओर उनके दु:खों और गमों की भी चर्चा की। ग़ालिब एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें महज दस कड़ियों में नहीं समेटा जा सकता, फिर भी हमने पूरी कोशिश की कि उनकी ज़िंदगी का कोई भी लम्हा अनछुआ न रह जाए। बस यही ध्यान रखकर हमने ग़ालिब को जानने के लिए उनका सहारा लिया जिन्होंने किसी विश्वविद्यालय में तो नहीं लेकिन दिल और साहित्य के पाठ्यक्रम में ग़ालिब पर पी०एच०डी० जरूर हासिल की है। हमें उम्मीद है कि आप हमारा इशारा समझ गए होंगे। जी हाँ, हम गुलज़ार साहब की हीं बात कर रहे हैं। तो अगर आपने ग़ालिब पर चल रही इस श्रृंखला को ध्यान से पढा है तो आपने इस बात पर गौर ज़रूर किया होगा कि ग़ालिब पर आधारित पहली कड़ी हमने गुलज़ार साहब के शब्दों में हीं तैयार की थी, फिर तीसरी या चौथी कड़ी को भी गुलज़ार साहब ने संभाला था..... अब यदि ऐसी बात है तो क्यों न आज की कड़ी, आज की महफ़िल भी गुलज़ार साहब के शब्दों के सहारे हीं सजाई जाए। आज की महफ़िल में गुलज़ार साहब का ज़िक्र इसलिए भी लाज़िमी हो जाता है क्योंकि चचा ग़ालिब की जो गज़ल हम आज लेकर हाज़िर हुए हैं, उसे उस शख्स ने गाया है, जिसके गुलज़ार साहब के साथ हमेशा हीं अच्छे संबंध रहे हैं। वैसे भी गज़लों की दुनिया में उन्हें बादशाह हीं माना जाता है... समय आने पर हम उनके नाम का खुलासा जरूर करेंगे, उससे पहले क्यों न गुलज़ार साहब की किताब "मिर्ज़ा ग़ालिब- एक स्वानही मंज़रनामा" से चचा ग़ालिब की ज़िंदगी के कुछ और लम्हात परोसे जाएँ:

पुरानी दिल्ली में एक क़ातिब(वे जो क़िताबों को हाथ से लिखते थे) थे नज़मुद्दीन। नज़मुद्दीन ने मिर्ज़ा ग़ालिब के दीवान की क़िताबत सम्भाल ली थी। एक सुबह जब नज़मुद्दीन मिर्ज़ा ग़ालिब के दीवान की क़िताबत कर रहे थे, सामने एक कोने में उनकी बेगम ने क़िताबत की सियाही उबलने के लिए अँगीठी पर चढा रखी थी। नज़मुद्दीन एक ग़ज़ल की क़िताबत कर रहे थे, उन्होंने शेर पढा-

दाइम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं,
ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं।

नज़मुद्दीन ने दूसरा शेर पढा और अपनी बेगम की तरफ़ देखा-

क्यूँ गर्दिश मुदाम से घबरा न जाये दिल,
इंसान हूँ पियाला-ओ-सागर नहीं हूँ मैं।

बेगम ने गर्म-गर्म सियाही दवात में डालते हुए पूछा-
"किसका कलाम है, यूँ झूम-झूमकर पढ रहे हो?"

नज़मुद्दीन ने अगला शेर पढा-

या रब ज़माना मुझको मिटाता है किसलिए?
लौहे जहाँ पे हर्फ़े-मुकर्रर नहीं हूँ मैं।

"आ हा हा, क्या कमाल की बात कही है। इस जहाँ की तख़्ती पर मैं वह हर्फ़ नहीं जो दुबारा लिखा जा सके... या रब जमाना मुझको मिटाता है किसलिए। क्यूँ मिटाते हो यारों?"
बेगम हैरान हुईं। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था।
"पर ये हज़रत हैं कौन? बड़े दीवाने हो रहे हो उनके शेरों पर।"
नज़मुद्दीन अभी तक उसी नशे में सराबोर थे।
"और कौन हो सकता है? सिर्फ़ मिर्ज़ा हीं ये शेर कह सकते हैं।"
"अरे मिर्ज़ा ग़ालिब?"
बेगम ने माथा पीटा।
"उफ़ अल्लाह! किस कंगाल का काम ले लिया। फूटी कौड़ी भी न मिलेगी उनसे। क़िताबत तो दरकिनार, रोशनाई और क़लम के दाम भी नहीं निकलेंगे। जमाने भर के कर्ज़दार हैं, कुछ जानते भी हो।"
"ज़रा ये दीवान छप जाने दो, बेगम। ज़माना उनका कर्ज़दार न हो गया तो कहना। ऐसे शायर आसानी से पैदा न हीं होते।"
बेगम बड़बड़ाती हुई उठीं-
"हाँ, इतनी आसानी से मरते भी नहीं... रसोई के लिए कुछ पैसे हैं खीसे मैं?"
नज़मुद्दीन ने जेब में हाथ ड़ाला-
"अभी उस रोज़ तो दो रूपए दिए थे।"
"दो रूपए क्या महीने भर चलेंगे?"
"हफ़्ता भर तो चलते। ज़रा किफ़ायत से काम लिया करो।" नज़मुद्दीन ने कुछ रेज़गारी निकालकर दी।

यह वाक्या बहुत सारी बातें बयाँ करता है। अव्वल तो यह कि ग़ालिब के शेरों के शौकीन ग़ालिब की अहमियत जानते थे, लेकिन जिन्हें शेरों के अलावा दुनिया के और भी काम देखने हों उन्हें ग़ालिब से कटकर रहना हीं अच्छा लगता था। यह इसलिए नहीं कि ग़ालिब का बर्ताव बुरा था, बल्कि इसलिए कि ग़ालिब गरीबी के गर्त्त में अंदर तक धँसे हुए थे। और फिर एक गरीब दूसरे गरीब का क्या भला करेगा। वैसे नज़मुद्दीन ने बहुत हीं बारीक बात कही, जो गुलज़ार साहब ने इस किताब की भूमिका में भी कही थी-

"ज़माना उनका कर्ज़दार न हो गया तो कहना।" इस कर्ज़ की मियाद कितनी भी बढा क्यों न दी जाए, हममें इस कर्ज़ को चुकाने की कुवत नहीं।

एक और घटना जो ग़ालिब के अंतिम दिनों की है, जब अंग्रेज फ़ौज़ें दिल्ली का हुलिया बदलने में लगी थीं:

महरौली में पेड़ों से लटकी हुई लाशें झूल रही थीं। कुछ जगह चिताएँ जल रही थीं और चारों तरफ़ धुआँ हीं धुआँ था। कुछ लोग जो मरे हुए लोगों में अपने-अपने रिश्तेदारों को ढूँढ रहे थे। उनमें एक हाजी मीर भी थे। ज़ौक़ के चौक के पासवाले एक लड़के की लाश भी उनमें थी। अब उस धुएँ में ग़ालिब भी मौजूद थे। थोड़ी दूर पर हाफ़िज़ दिखाई दिया। उसके कपड़े तार-तार थे। ग़ालिब ने अपना दोशाला उसे ओढा दिया। हाफ़िज़ ने मिर्ज़ा का लिम्स पहचान लिया-
"मिर्ज़ा नौशा, आप यहाँ क्या कर रहे हैं?"
ग़ालिब ने जवाब में शेर कहा-

बनाकर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं।

"सब खैरियत तो है? आपका हाल क्या है?
"हमारा हाल अब हमसे क्या पूछते हो, हाफ़िज़ मियाँ। कुछ रोज़ बाद हमारे हमसायों से पूछना।"
ग़ालिब अब वहाँ से चल पड़े, बड़बड़ाते हुए-
"अब थक गया ज़िंदगी से- इन दिनों इतने जनाज़े उठाये हैं कि लगता है, जब मैं मरूँगा, मुझे उठानेवाला कोई न होगा।"
ग़ालिब दूर जाने लगे। धुएँ और रौशनी की पेड़ों से छनकर आती शुआएँ उन्हें छू-छूकर ज़मीन पर गिर रही थीं।

इसके ठीक दो साल बाद १५ फ़रवरी, १८६९ के रोज़ मिर्ज़ा ग़ालिब इंतक़ाल फ़र्मा गए। उन्हें चौसठ खम्बा के नज़दीक ख़ानदान लोहारू के कब्रस्तान में दफ़ना दिया गया।

और फिर इस तरह ग़ालिब हमस जुदा हो गए। वैसे ग़ालिब की रुखसती सिर्फ़ जहां-ए-फ़ानी से हुई है, हमारे दिलों से नहीं। दिलों में ग़ालिब उसी तरह जिंदा हैं, जिस तरह उनकी यह शायरी जिंदा है, उनके ये शेर साँसें ले रहे हैं:

वह नश्तर सही, पर दिल में जब उतर जावे
निगाह-ए-नाज़ को फिर क्यूं न आशना कहिये

सफ़ीना जब कि किनारे पे आ लगा 'ग़ालिब'
ख़ुदा से क्या सितम-ओ-जोर-ए-नाख़ुदा कहिये


ग़ालिब पर आधारित इस अंतिम कड़ी में अब वक्त आ गया है कि आखिरी मर्तबा हम उनका लिखा कुछ सुन लें। तो आज जो ग़जल लेकर हम आप सबों के बीच उपस्थित हुए हैं, उसे अपनी मखमली आवाज़ से सजाया है जनाब जगजीत सिंह जी ने। इनके बारे में और क्या कहना। महफ़िल-ए-गज़ल में कई कड़ियाँ इनके नाम हो चुकी हैं। इसलिए अच्छा होगा कि हम सीधे-सीधे ग़ज़ल की ओर रुख कर लें। तो यह रही वह गज़ल:

ज़ुल्मतकदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है
इक शम्मा है दलील-ए-सहर, सो ख़मोश है

दाग़-ए-फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-शब की जली हुई
इक शम्मा रह गई है सो वो भी ख़मोश है

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामी ____ में
"ग़ालिब" सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आतिश" और शेर कुछ यूँ था-

इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश "ग़ालिब"
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने

"आतिश" शब्द की सबसे पहले पहचान की "शरद जी" ने। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

मुझे आतिश समझ कर पास आने से वो डरते हैं
मिटाऊँ फ़ासला कैसे, यही किस्सा इधर भी है ।

जहां पिछली बार हमने "नदीम" को गायब करके लोगों को पशोपेश में डाल दिया था, वहीं इस बार बड़ा हीं आसान शब्द देकर हमने लोगों को अपनी खुशी जाहिर करने का मौका दिया। कौन-सा शब्द कितना सरल या कितना कठिन है,इस बात का अंदाजा हमें सीमा जी के शेरों को गिनकर लग जाता है, जैसे कि इस बार आपने पाँच शेर पेश किए जबकि पिछली बार आपके शेरों की कुल संख्या दो हीं थी। ये रहे उन पाँच शेरों में से हमारी पसंद के दो शेर:

चमक तेरी अयाँ बिजली में आतिशमें शरारेमें
झलक तेरी हवेदाचाँद में सूरज में तारे में (इक़बाल)

बच निकलते हैं अगर आतिह-ए-सय्याद से हम
शोला-ए-आतिश-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं (क़तील शिफ़ाई)

नीलम जी, चोरी तब तक जायज है जब तक कोई सुराग न मिले। कहते हैं ना कि "रिसर्च" उसी को कहते हैं जिसमें "ओरिजनल सोर्स" का पता न चले। अब चूँकि मुझे इस शेर के असल शायर का नाम पता नहीं, इसलिए आप बाइज़्ज़त बरी किए जाते हैं:

ए खुदा !ये क्या दिन मुक़र्रर किया है ,
क्यूंकर ढेर ए बारूद, आतिश से मिलने चल दिया है .

अवध जी, महफ़िल की सैर करने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। यह क्या... आपने जो शेर पेश किया (चचा ग़ालिब का) उसी शेर से "आतिश" शब्द हटाकर तो हमने सवाल पूछा था। आपने सवाल को हीं जवाब बना दिया... गलत बात!!! :)

पूजा जी, आपका शेर तो बड़ा हीं घुमावदार है। इसे समझने में मेरे पसीने छूट गए। खैर.. ३-४ मिनट की मेहनत के बाद मुझे सफ़लता मिल हीं गई। अब देखते हैं बाकी दोस्त इस शेर का कुछ अर्थ निकाल पाते हैं या नहीं:

रकाबत है या आतिश ज़ालिम,
तेरा आना फुरकत का पैगाम हुआ.

मंजु जी, आपकी ये पंक्तियाँ शेर होते-होते रह गईं। वैसे अच्छी बात ये है कि शेर लिखने में आपकी मेहनत साफ़ झलकती है। इस शेर में "सुलगा" और "उजाड़" में काफ़िया-बंदी नहीं हो पा रही। आगे से ध्यान रखिएगा:

जमाने ने नफरत ए आतिश को सुलगा दिया
दो दिलों के मौहब्बत के चमन को उजाड़ दिया .

शन्नो जी, इस बार तो आपने नीलम जी से इंतज़ार करवा लिया। ये आपकी कोई नई अदा है क्या? :) यह रहा आपका शेर:

कोई आतिश बन चला गया
जले दिल को और जला गया.

सुमित जी, इस बार भी कोई शेर नहीं. बहुत ना-इंसाफ़ी है.. इसकी सजा मिलेगी, बराबर मिलेगी..गब्बर साहिबा किधर हैं आप?

अवनींद्र जी, आपको पढना हर बार हीं सुकूनदायक होता है। आज भी वही कहानी है.. ये रही आपकी पंक्तियाँ:

रूह टटोली तो तेरी याद के खंज़र निकले
मय मैं डूबे तो तेरे इश्क के अंदर निकले
हम तो समझे थे होगी तेरी याद की चिंगारी
दिल टटोला तो आतिश के समंदर निकले

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, April 14, 2010

उस पे बन जाये कुछ ऐसी कि बिन आये न बने.. जसविंदर सिंह की जोरदार आवाज़ में ग़ालिब ने माँगी ये दुआ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७९

पिछली किसी कड़ी में इस बात का ज़िक्र आया था कि "ग़ालिब" के उस्ताद "ग़ालिब" हीं थे। उस वक्त तो हमने इस बात पे ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब आज का आलेख लिखने की बारी आई तो हमने सोचा कि क्यों न एक नया मुद्दा,एक नया विषय ढूँढा जाए, अंतर्जाल पर ग़ालिब से जु़ड़ी सारी कहानियों को हमने खंगाल डाला और फिर ढूँढते-ढूँढते बात चचा ग़ालिब के उस्ताद पे आके अटक गई। श्री रामनाथ सुमन की पुस्तक "ग़ालिब" में इस सुखनपरवर के उस्ताद का लेखा-जोखा कुछ इस तरह दर्ज़ है:

फ़ारसी की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने आगराके उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान मौलवी मुहम्मद मोवज्ज़म से प्राप्त की। इनकी ग्रहण शक्ति इतनी तीव्र थी कि बहुत जल्द वह ज़हूरी जैसे फ़ारसी कवियों का अध्ययन अपने आप करने लगे बल्कि फ़ारसी में गज़लें भी लिखने लगे। इसी ज़माने (१८१०-१८११ ई.) में मुल्ला अब्दुस्समद ईरान से घूमते-फिरते आगरा आये और इन्हींके यहाँ दो साल तक रहे। यह ईरान के एक प्रतिष्ठत एवं वैभवसम्पन्न व्यक्ति थे और यज़्द के रहनेवाले थे। पहिले ज़रथुस्त्र के अनुयायी थे पर बाद में इस्लाम को स्वीकार कर लिया था। इनका पुराना नाम हरमुज़्द था। फ़ारसी तो उनकी घुट्टीमें थी। अरबी का भी उन्हें बहुत अच्छा ज्ञान था। इस समय मिर्ज़ा १४ के थे और फ़ारसी में उन्होंने अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली थी। अब मुल्ला अब्दुस्समद जो आये तो उनसे दो वर्ष तक मिर्ज़ा ने फ़ारसी भाषा एवं काव्य की बारीकियों का ज्ञान प्राप्त किया और उनमें ऐसे पारंगत हो गये जैसे ख़ुद ईरानी हों। अब्दुस्समद इनकी प्रतिभा से चकित थे और उन्होंने अपनी सारी विद्या इनमें उँडेल दी। वह इनको बहुत चाहते थे। जब वह स्वदेश लौट गये तब भी दोनों का पत्र-व्यवहार जारी रहा। एकबार गुरु ने शिष्य को एक पत्र में लिखा—"ऐ अजीज़ ! चः कसी? कि बाई हमऽ आज़ादेहा गाह गाह बख़ातिर मी गुज़री।" इससे स्पष्ट है कि मुल्लासमद अपने शिष्य को बहुत प्यार करते थे।

काज़ी अब्दुल वदूद तथा एक-दो और विद्वानों ने अब्दुस्समद को एक कल्पित व्यक्ति बताया है। कहा जाता है कि मिर्जा से स्वयं भी एकाध बार सुना गया कि "अब्दुस्समद एक फर्ज़ी नाम है। चूँकि मुझे लोग बे उस्ताद कहते थे, उनका मुँह बन्द करनेको मैंने एक फ़र्जी उस्ताद गढ़ लिया है।" पर इस तरह की बातें केवल अनुमान और कल्पना पर आधारित हैं। अपने शिक्षण के सम्बन्ध में स्वयं मिर्ज़ा ने एक पत्र में लिखा है—

"मैंने अय्यामे दबिस्तां नशीनीमें ‘शरह मातए-आमिल’ तक पढ़ा। बाद इसके लहवो लईव और आगे बढ़कर फिस्क़ व फ़िजूर, ऐशो इशरतमें मुनमाहिक हो गया। फ़ारसी जबान से लगाव और शेरो-सख़ुन का जौक़ फ़ितरी व तबई था। नागाह एक शख़्स कि सासाने पञ्चुम की नस्ल में से....मन्तक़ व फ़िलसफ़ा में मौलवी फ़ज़ल हक़ मरहूम का नज़ीर मोमिने-मूहिद व सूफ़ी-साफ़ी था, मेरे शहर में वारिद हुआ और लताएफ़ फ़ारसी...और ग़वामज़े-फ़ारसी आमेख़्ता व अरबी इससे मेरे हाली हुए। सोना कसौटी पर चढ़ गया। जेहन माउज़ न था। ज़बाने दरी से पैवन्दे अज़ली और उस्ताद बेमुबालग़ा...था। हक़ीक़त इस ज़बान की दिलनशीन व ख़ातिरनिशान हो गयी।" यानि कि

"पाठशाला में पढने के दिनों में मैने "शरह मातए-आमिल" तक पढा। आगे चलकर खेल-कूद और ऐशो-आराम में मैं तल्लीन हो गया। फ़ारसी जबान से लगाव और शेरो-कविताओं में रूचि मेरी स्वाभाविक थी। तभी ये हुआ कि सासाने-पंचुम की नस्ल में से तर्कशास्त्र और दर्शन में पारंगत एक इंसान जो कि मौलवी फ़ज़ल हक़ मरहूम जैसा हीं धर्मात्मा और संत था, मेरे शहर में दाखिल हुआ (यहाँ पर ग़ालिब का इशारा मुल्ला अब्दुस्समद की ओर हीं है) और उसी से मैने फ़ारसी और अरबी की बारीकियाँ जानीं। धीरे-धीरे फ़ारसी मेरे ज़हन में घर करती गई और एक दिन यूँ हुआ कि यह ज़बान मेरी दिलनशीन हो गई।"

हमने ग़ालिब के उस्ताद के बारे में तो जान लिया (भले हीं लोग कहें कि ग़ालिब का कोई उस्ताद नहीं था, लेकिन हरेक शख्स किसी न किसी को गुरू मानता जरूर है, फिर वह गुरू प्रत्यक्ष हो या परोक्ष, सीधे तौर पे जुड़ा हो या फिर किसी और माध्यम से, लेकिन गुरू की आवश्यकता तो हर किसी को होती है.. ऐसे में ग़ालिब अपवाद हों, यह तो हो हीं नहीं सकता था), अब क्यों न लगे हाथों हम ग़ालिब की शायरी में छुपी जटिलताओं का भी ज़िक्र कर लें। (साभार: अनिल कान्त .. मिर्ज़ा ग़ालिब ब्लाग से)

ग़ालिब अपनी शायरी में बातों को घुमा-फिराकर उनमें जद्दत पैदा करने की कोशिश करते हैं। ग़ालिब के पूर्वार्द्ध जीवन का काव्य तो हिन्दी कवि केशव की भाँति (जिन्हें 'कठिन काव्य का प्रेत' कहा गया है) जान बूझकर दुर्बोध बनाया हुआ काव्य है। ज़नाब 'असर' लखनवी ने ग़ालिब का ही एक शेर उद्धत करके इस विषय पर प्रकाश डाला है :

लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैन,
करता जो न मरता कोई दिन आहोफ़ुँगा और ।

जब किसी ने इसका मतलब पूछा तो ग़ालिब ने कहा :

"यह बहुत लतीफ़ तक़रीर है। लेता को रब्त चैन से, करता मरबूत है में आहोफ़ुँगा से। अरबी में ता'कीद लफ्ज़ी व मान'वी दोनों मा'यूब हैं । फ़ारसी में ता'की़दे मान'वी ऐब और ता'की़दे लफ्ज़ी जायज़ बल्कि फ़सीह व मलीह। रेख्त: तक़लीद है फ़ारसी की। हासिल मा'नी मिस्त्र-ऐन यह कि अगर दिल तुम्हें न देता तो कोई दम चैन लेता, न मरता तो कोई दिन आहो फ़ुँगा करता।"

यानि कि "यह बहुत हीं सुंदर प्रयोग है। यहाँ लेता का संबंध चैन से है और करता का आहोफ़ुँगा से। अरबी में लफ़्ज़ों को इधर-उधर करना जिसमें अर्थ या तो वही रहे या फिर बदल जाए मान्य है, लेकिन फ़ारसी में लफ़्ज़ों के उस हेरफ़ेर को ऐब माना जाता है जिसमें अर्थ हीं बदल जाए, हाँ इतना है कि जब तक अर्थ वही रहे हम शब्दों को आराम से इधर-उधर कर सकते हैं और इससे शायरी में सुन्दरता भी आती है। चूँकि उर्दू की पैदाईश फ़ारसी से हुई है, इसलिए हम इसमें फ़ारसी का व्याकरण इस्तेमाल कर सकते हैं।"

वैसे यह कलाबाज़ी ग़ालिब का अंदाज़ है । वर्ना शेर को इस रूप में लिखा गया होता तो सबकी समझ में बात आ जाती :

देता न अगर दिल तुम्हें लेता कोई दम चैन,
मरता न तो करता कोई दिन आहोफ़ुँगा और।

इसी घुमाव के कारण उनके जमाने के बहुत से लोग उनका मज़ाक उड़ाया करते थे. किसी ने कहा भी :

अगर अपना कहा तुम आप ही समझे तो क्या समझे,
मज़ा कहने का जब है एक कहे और दूसरा समझे।
कलामे मीर समझें और ज़बाने मीरज़ा समझें,
मगर इनका कहा यह आप समझें या खुदा समझें।

मिर्ज़ा शायरी में माहिर थे, लेकिन शायरी के अलावा भी उनके कुछ शौक थे। कहा जाता है कि मिर्ज़ा को शराब और जुए का नशे की हद तक शौक था। जुआ खेलने के कारण वे कई बार हुक्मरानों के हत्थे चढते-चढते बचे थे। ऐसी हीं एक घटना का वर्णन प्रकाश पंडित ने अपनी पुस्तक "ग़ालिब और उनकी शायरी" में किया है:

मई १८४७ ई. में मिर्ज़ा पर एक और आफ़त टूटी। उन्हें अपने ज़माने के अमीरों की तरह बचपन से चौसर, शतरंज आदि खेलने का चसका था। उन दिनों में भी वे अपना ख़ाली समय चौसर खेलने में व्यतीत करते थे और मनोरंजनार्थ कुछ बाजी बदलकर खेलते थे। चांदनी चौक के कुछ जौहरियों को भी जुए की लत थी, अतएव वे मिर्ज़ा ही के मकान पर आ जाते थे। एक दिन जब मकान में जुआ हो रहा था, शहर कोतवाल ने मिर्ज़ा को रंगे-हाथों पकड़ लिया। शाही दरबार (बहादुरशाह ज़फ़र) और दिल्ली के रईसों की सिफ़ारिशें गईं। लेकिन सब व्यर्थ। उन्हें सपरिश्रम छः महीने का कारावास और दो सौ रुपये जुर्माना हो गया। बाद में असल जुर्माने के अतिरिक्त पचास रुपये और देने से परिश्रम माफ़ हो गया और डॉक्टर रास, सिविल सर्जन दिल्ली की सिफ़ारिश पर वे तीन महीने बाद ही छोड़ दिए गए। लेकिन ‘ग़ालिब’ जैसे स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए यह दण्ड मृत्यु के समान था। एक स्थान पर लिखते हैं:

"मैं हरएक काम खुदा की तरफ़ से समझता हूँ और खुदा से लड़ नहीं सकता। जो कुछ गुज़रा, उसके नंग(लज्जा) से आज़ाद, और जो कुछ गुज़रने वाला है उस पर राज़ी हूँ। मगर आरजू करना आईने-अबूदियत(उपासना के नियम) के खिलाफ़ नहीं है। मेरी यह आरजू है कि अब दुनिया में न रहूँ और अगर रहूँ तो हिन्दोस्तान में न रहूँ।" यह दुर्घटना व्यक्तिगत रूप से उनके स्वाभिमान की पराजय का संदेश लाई, अतएव

बंदगी में भी वो आज़ाद-ओ-खुदबी हैं कि हम,
उल्टे फिर आयें दरे-काबा अगर वा न हुआ।।

कहने वाले शायर ने विपत्तियों और आर्थिक परेशानियों से घबराकर अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ‘ज़फ़र’ का दरवाज़ा खटखटाया। बहादुरशाह ज़फ़र ने तैमूर ख़ानदान का इतिहास फ़ारसी भाषा में लिखने का काम मिर्ज़ा के सुपुर्द कर दिया और पचास रुपये मासिक वेतन के अतिरिक्त ‘नज्मुद्दौला दबीरुलमुल्क निज़ाम-जंग’ की उपाधि और दोशाला आदि ख़िलअ़त प्रदान की और यों मिर्ज़ा बाक़ायदा तौर पर क़िले के नौकर हो गए।

इन बातों से यह भी मालूम पड़ता है कि खस्ताहाल आर्थिक स्थिति और शराब/जुए की लत के कारण मिर्ज़ा को कैसे-कैसे दिन देखने पड़े। सुखन के आसमान का चमकता हीरा किन्हीं गलियों में पत्थर के मोल बिकने को मजबूर हो गया। अब इससे ज्यादा क्या कहें.. अच्छा यही होगा कि हम मिर्ज़ा के जाती मामलों पे ध्यान दिए बगैर उनके सुखन को सराहते रहें। जैसे कि मिर्ज़ा के ये दो शेर:

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ-सा कहें जिसे

"गा़लिब" बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे


मिर्ज़ा से जुड़े तीन-तीन किस्सों को हमने आज की इस महफ़िल में समेटा। इतना कुछ कहने के बाद "एक गज़ल सुन लेना" तो बनता है भाई!! क्या कहते हैं आप? है ना? तो चलिए आपकी आज्ञा लेकर हम आज की इस गज़ल से पर्दा उठाते हैं जिसे अपनी आवाज़ से सजाया है जनाब जसविंदर सिंह जी ने। जसविंदर सिंह कौन है, यह बात क्यों न हम उन्हीं के मुँह से सुन लें:- "मैं मुंबई का रहने वाला हूँ और संगीत से जुड़ी फैमिली से संबंध रखता हूं। मेरे गुरु मेरे पिता कुलदीप सिंह हैं, जिन्होंने गज़ल ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’ और गीत ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ को कंपोज किया। अगर मैं गज़ल गायक नहीं होता तो निस्संदेह एक शास्त्रीय गायक होता। अभी तक मेरे तीन एलबम बाज़ार में आ चुके हैं- योर्स ट्रूली, दिलकश और इश्क नहीं आसान।" मेरे हिसाब से जसविंदर जी की यह गज़ल "इश्क़ नहीं आसान" एलबम का हीं एक हिस्सा है। वैसे जो रिकार्डिंग हमारे पास है वो किसी लाईव शो की है..इसलिए दर्शकों की तालियों का मज़ा भी इसमें घुल गया है। यकीन नहीं होता तो खुद सुन लीजिए:

नुक्ताचीं है, ग़म-ए-दिल उस को सुनाये न बने
क्या बने बात, जहाँ बात बनाये न बने

मैं बुलाता तो हूँ उस को, मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल
उस पे बन जाये कुछ ऐसी, कि बिन आये न बने

मौत की राह न देखूँ, कि बिन आये न रहे
तुम को चाहूँ कि न आओ, तो बुलाये न बने

इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो _____ "ग़ालिब"
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "नदीम" और शेर कुछ यूँ था-

तुमसे तो कुछ कलाम नहीं, लेकिन ऐ नदीम
मेरा सलाम कहियो, अगर नामाबर मिले

मालूम होता है कि दूसरे शब्दों की तुलना में यह शब्द थोड़ा मुश्किल था, इसलिए हर बार की तुलना में इस बार हमें कम हीं शेर देखने और सुनने को मिलें। आगे बढने से पहले मैं यह बताता चलूँ कि यहाँ "नदीम" किसी शायर का नाम नहीं ,बल्कि इस शब्द का इस्तेमाल इसके अर्थ(नदीम = जिगरी दोस्त) में हुआ है..

अमूमन ऐसा कम हीं होता है कि शरद जी सीमा जी के पहले महफ़िल में आ जाएँ, लेकिन इस बार की स्थिति कुछ और हीं थी। वैसे यह होना हीं था क्योंकि शरद जी तो अपने वक्त पे हीं थे (आलेख पोस्ट होने के ४ घंटे बाद वो महफ़िल में आए थे), लेकिन सीमा जी हीं कहीं पीछे रह गईं। शरद जी ने अपने स्वरचित शेर से महफ़िल को तरोताज़ा कर दिया। यह रहा आपका शेर:

खंज़र को भी नदीम समझ कर के एक दिन
हाथों से थाम कर उसे दिल से लगा लिया । (स्वरचित)

महफ़िल में अगली हाज़िरी लगाई सीमा जी ने। सीमा जी, हम यहाँ एक हीं शेर पेश कर सकते हैं क्योंकि दूसरा शेर "नदीम" साहब का है। हमें उन शेरों की दरकार थी जिसमें नदीम का कुछ अर्थ निकले। खैर..

ये जो चार दिन के नदीम हैं इन्हे क्या ’फ़राज़’ कोई कहे
वो मोहब्बतें, वो शिकायतें, मुझे जिससे थी, वो कोई और है. (अहमद फ़राज़)

कविता जी, महफ़िल में आपका स्वागत है... प्रस्तुति पसंद करने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। तो लगे हाथों आप भी कोई शेर पेश कर दीजिए ताकि महफ़िल की रवायतें बनी रहें..

अवनींद्र जी, बातों-बातों में आपने कई शेर पेश किए... आपके तीनों शेरों में से मुझे यह शेर बड़ा हीं मज़ेदार लगा,इसलिए इसी को यहाँ डाल रहा हूँ:

कभी तो आओगे मेरी कब्र पे फातिहा पढने ऐ नदीम
कफ़न बिछा के तुम्हे शायरी सुना देंगे ,पका देंगे रुला देंगे

शन्नो जी, इन पंक्तियों में आपने क्या कहने की कोशिश की है, मुझे इसका हल्का-सा अंदाजा हुआ है, लेकिन पूरी तरफ़ से समझ नहीं पाया हूँ... वैसे आपकी यह "कलाकारी" और "अदाकारी" कहाँ से प्रेरित है, मुझे यह पता है :)

यहाँ कोई नदीम नहीं किसी का, ये दुनियां तो है बस अदाकारी की
कोई मरता या जीता है बला से, सबको पड़ी है बस कलाकारी की. (स्वरचित)

मंजु जी, इस बार आपके शेर में बहुत सुधार है.... पढ कर मज़ा आ गया:

गले लगाकर नदीम का रिश्ता आपने जो दिया ,
पूरा शहर इस रस्म का दीवाना हो गया . (स्वरचित)

नीलम जी, अब लगता है कि मुझे भी आपको ठाकुर (ठकुराईन) मानना होगा। अब तक तो मैं बस महफ़िल हीं सजाया करता था, लेकिन अब से मुझे आपके शेरों को पूरा करने का काम भी मिल भी गया है। यह रही मेरी कोशिश:

नदीम नहीं न सही, रकीब ही सही ,
बंदगी नहीं न सही, सलीब ही सही।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, April 7, 2010

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल.. अपने शोख कातिल से ग़ालिब की इस गुहार के क्या कहने!!

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७८

देखते -देखते हम चचा ग़ालिब को समर्पित आठवीं कड़ी के दर पर आ चुके हैं। हमने पहली कड़ी में आपसे जो वादा किया था कि हम इस पूरी श्रृंखला में उन बातों का ज़िक्र नहीं करेंगे जो अमूमन हर किसी आलेख में दिख जाता है, जैसे कि ग़ालिब कहाँ के रहने वाले थे, उनका पालन-पोषण कैसे हुआ.. वगैरह-वगैरह.. तो हमें इस बात की खुशी है कि पिछली सात कड़ियों में हम उस वादे पर अडिग रहे। यकीन मानिए.. आज की कड़ी में भी आपको उन बातों का नामो-निशान नहीं मिलेगा। ऐसा कतई नहीं है कि हम ग़ालिब की जीवनी नहीं देना चाह्ते... जीवनी देने में हमें बेहद खुशी महसूस होगी, लेकिन आप सब जानते हैं कि हमारी महफ़िल का वसूल रहा है- महफ़िल में आए कद्रदानों को नई जानकारियों से मालामाल करना, ना कि उन बातों को दुहराना जो हर गली-नुक्कड़ पर लोगों की बातचीत का हिस्सा होती है। और यही वज़ह है कि हम ग़ालिब का "बायोडाटा" आपके सामने रखने से कतराते हैं।

चलिए..बहुत हुआ "अपने मुँह मियाँ-मिट्ठु" बनना.. अब थोड़ी काम की बातें कर ली जाएँ!! तो आज की कड़ी में हम ग़ालिब पर निदा फ़ाज़ली साहब के मन्त्वय और ग़ालिब की हीं किताब "दस्तंबू" से १८५७ के दौरान की घटनाओं के बारे में जानेंगे।

ग़ालिब के बारे में निदा साहब कहते हैं:

ग़ालिब अपने युग में आने वाले कई युगों के शायर थे, अपने युग में उन्हें इतना नहीं समझा गया जितना बाद के युगों में पहचाना गया. हर बड़े दिमाग़ की तरह वह भी अपने समकालीनों की आँखों से ओझल रहे.

भारतीय इतिहास में वह पहले शायर थे, जिन्हें सुनी-सुनाई की जगह अपनी देखी-दिखाई को शायरी का मैयार बनाया, देखी-दिखाई से संत कवि कबीर दास का नाम ज़हन में आता है- तू लिखता है कागद लेखी, मैं आँखन की देखी. लेकिन कबीर की आँखन देखी और ग़ालिब की देखी-दिखाई में थोड़ा अंतर भी है. कबीर सर पर आसमान रखकर धरती वालों से लड़ते थे और आखिरी मुगल के दौर के मिर्ज़ा ग़ालिब दोनों से झगड़ते थे, इसी लिए सुनने और पढ़ने वाले उनसे नाराज़ रहते थे. लालकिले के एक मुशायरे में, ख़ुद उनके सामने उनपर व्यंग किया गया.

कलामे मीर समझे या कलामे मीरज़ा समझे
मगर इनका कहा यह आप समझें या ख़ुदा समझे

मीर और मीरज़ा से व्यंगकार की मुशद ग़ालिब से पहले के शायर मीर तकीमीर और मीरज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा थी. ग़ालिब को इस व्यंग्य ने परेशान नहीं किया. उन्होंने इसके जवाब में ऐलान किया:

न सताइश (प्रशंसा) की तमन्ना, न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी (अर्थ) न सही
(हमारे हिसाब से यह शेर इस महफ़िल में अब तक तीन बार उद्धृत किया जा चुका है.. लेकिन क्या करें, शेर है हीं कुछ ऐसा कि हर कोई इसे याद कर जाता है)

मिर्ज़ा ग़ालिब का यह आत्मविश्वास उनकी महानता की पहचान है.

ग़ालिब शब्दों और भावों से खेलना बखूबी जानते हैं, तभी तो जहाँ एक ओर यह कहे जाने पर कि उनके शेरों में कोई अर्थ नहीं होता, उन्हें अपने बचाव में जवाब देना पड़ता है वहीं दूसरी ओर वे खुलेआम इस बात को कुबूल करते हैं कि उनके खत (जो उन्होंने अपनी माशूका को लिखे है) बे-मायने होते हैं। यह ग़ालिब की कला नहीं तो और क्या है:

ख़त लिखेंगे, गर्चे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के


ये तो सभी जानते हैं कि १८५७ के गदर ने ग़ालिब पर खासा असर किया था। कुछ लोग इस गलतफ़हमी के शिकार हैं कि ग़ालिब ने उस दौरान अंग्रेजों का पक्ष लिया था। इसी बात को गलत साबित करने के लिए मशहूर शायर मख़मूर सईदी ने ग़ालिब की किताब ‘दस्तंबू’ और उनके खतों के हवाले से १८५७ की कहानी को ब्यान किया है. इस किताब की भूमिका में उन्होंने ‘दस्तंबू’ के हवाले से ग़ालिब पर की जाने वाली आलोचनाओं का जवाब और जवाज़ (औचित्य) पेश किया है। (सौजन्य: मिर्ज़ा बेग़.. अहदनामा ब्लाग से):

दस्तंबू में लिखी कुछ घटनाओं के आधार पर कुछ लोगों ने ग़ालिब पर अंग्रेज़-दोस्ती का इल्ज़ाम लगाया है लेकिन जिस चीज़ को लोगों ने अंग्रेज़-दोस्ती का नाम दिया है वह दरअसल मिरज़ा ग़ालिब की इंसान-दोस्ती थी. बाग़ी भड़के हुए थे इस लिए बहुत से बेगुनाह अंग्रेज़ मर्द औरतें भी उनके ग़ुस्से का निशाना बने. मिर्ज़ा ग़ालिब ने उन बेगुनाहों के मारे जाने पर दुख प्रकट किया लेकिन उन्होंने उस दुख पर भी परदा नहीं डाला जो अंग्रेज़ों की तरफ़ से बेक़सूर हिंदुस्तानी नागरिकों पर ढ़ाए गए.

११ मई १८५७ से ३१ जुलाई १८५८ की घटनाओं पर आधारित "दस्तंबू" में ग़ालिब ने अपने गद्य का झंडा गाड़ने का दावा भी किया है और कहा है कि यह किताब पुरानी फ़ारसी में लिखी गई है और इसमें एक शब्द भी अरबी भाषा का नहीं आने दिया गया है सिवाए लोगों के नामों के क्योंकि उन को बदला नहीं जा सकता था. उन्होंने इसका नाम ‘दस्तंबू’ इस लिए रखा है कि यह लोगों में हाथों हाथ ली जाएगी जैसा कि उस ज़माने में बड़े लोग ताज़गी और ख़ुशबू के लिए दस्तंबू अपने हाथों में रखा करते थे.

ग़ालिब के नज़दीक पीर यानी सोमवार का दिन बड़ा मनहूस है, बाग़ी सोमवार को ही दिल्ली में दाख़िल हुए थे, सोमवार के दिन ही उनकी हार शुरू हुई थी, जब गोरे सिपाही ग़ालिब को पकड़ कर ले गए वह भी सोमवार था और फिर जिस दिन ग़ालिब के भाई का देहांत हुआ वह भी सोमवार था. ग़ालिब ने इस बारे में लिखा है : “१९ अक्तूबर को वही सोमवार का दिन जिसका नाम सपताह के दिनों कि सूचि में से काट देना चाहिए एक सांस में आग उगलने वाले सांप की तरह दुनिया को निगल गया”

ग़ालिब ने अंग्रेज़ अफ़्सरों और फ़ौजियों की रक्तपाति प्रतिक्रिया पर पर्दा नहीं डाला और साफ़ साफ़ लिख गए:

“शाहज़ादों के बारे में इससे अधिक नहीं कहा जा सकता कि कुछ बंदूक़ की गोली का ज़ख़्म खा कर मौत के मुंह में चले गए और कुछ की आत्मा फांसी के फंदे में ठिठुर कर रह गई. कुछ क़ैदख़ानों में हैं और कुछ दर-बदर भटक रहे हैं. बूढ़े कमज़ोर बादशाह पर जो क़िले में नज़र बंद हैं मुक़दमा चल रहा है. झझ्झर और बल्लभगढ़ के ज़मीनदारों और फ़र्रुख़ाबाद के हाकिमों को अलग-अलग विभिन्न दिनों में फांसी पर लटका दिया गया. इस प्रकार हलाक किया गया कि कोई नहीं कह सकता कि ख़ून बहाया गया.... जानना चाहिए कि इस शहर में क़ैदख़ाना शहर से बाहर है और हवालात शहर के अंदर, उन दोनों जगहों में इस क़दर आदमियों को जमा कर दिया गया कि मालूम पड़ता है कि एक दूसरे में समाए हुए हैं. उन दोनों क़ैदख़ानों के उन क़ैदियों की संख्या को जिन्हें विभिन्न समय में फांसी दी गई यमराज ही जानता है...”

मीर मेहदी के नाम लिखे ख़त में ग़ालिब लिखते हैं. “क़ारी का कुआं बंद हो गया. लाल डुगी के कुएं एक साथ खारे हो गए. ख़ैर खारा पानी ही पीते, गर्म पानी निकलता है. परसों मैं सवार होकर कुएं का हाल मालूम करने गया था. जामा मस्जिद से राज घाट के दरवाज़े तक बे-मुबालग़ा (बिना अतिश्योक्ति) एक ब्याबान रेगिस्तान है... याद करो मिर्ज़ा गौहर के बाग़ीचे के उस तरफ़ को बांस गड़ा था अब वह बाग़ीचे के सेहन के बराबर हो गया है.... पंजाबी कटरा, धोबी कटरा, रामजी गंज, सआदत ख़ां का कटरा, जरनैल की बीबी की हवेली, रामजी दास गोदाम वाले के मकानात, साहब राम का बाग़ और हवेली उनमें से किसी का पता नहीं चलता. संक्षेप में शहर रेगिस्तान हो गया.... ऐ बन्दा-ए-ख़ुदा उर्दू बाज़ार न रहा, उर्दू कहां, दिल्ली कहां? वल्लाह अब शहर नहीं है, कैम्प है, छावनी है. न क़िला, न शहर, न बाज़ार, न नहर.”

एक और ख़त में लिखते हैं. “भाई क्या पूछते हो, क्या लिखूं ? दिल्ली की हस्ती कई जश्नों पर थी. क़िले, चांदनी चौक, हर रोज़ का बाज़ार जामा मस्जिद, हर हफ़्ते सैर जमना के पुल की, हर साल मेला फूल वालों का, ये पांचों बातें अब नहीं. फिर कहो दिल्ली कहां....?”

कुछ खुशियाँ, कुछ मज़ाक, कुछ हँसी-ठिठोली और बहुत सारी ग़म की बातों के बाद अब वक्त है आज की गज़ल से रूबरू होने का। आज हम जो गज़ल आपके सामने लेकर आए हैं, उसमें भी ग़ालिब के ज़ख्मों का ज़िक्र है, इसलिए यह कह नहीं सकता कि लुत्फ़ उठाईये। हाँ इस बात की दरख्वास्त कर सकता हूँ कि "निघत अक़बर" जी ने अपनी आवाज़ के माध्यम से जिस दर्द को जीने की कोशिश की है, उस दर्द का एक छोटा-सा हिस्सा आप भी अपनी नसों में उतार लीजिये। दर्द उतरेगा तो सीसे की तरफ़ चुभेगा ज़रूर लेकिन आपको इस बात का फ़ख्र होगा कि आपने ग़ालिब के ग़मों पे अपनी गलबहियाँ डाली हैं। (कुछ ज्यादा हीं हो गया ना :) क्या कीजियेगा ..मेरी बोलने की आदत नहीं जाती, इसलिए आप अगर मुझसे छुटकारा चाहते हैं तो तुरंत हीं गज़ल सुनने में तल्लीन हो जाएँ) तो आपके सामने पेश-ए-खिदमत है यह गज़ल:

तस्कीं को हम न रोएं, जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
हूरान-ए-ख़ुल्द में तेरी सूरत मगर मिले

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यों तेरा घर मिले

तुमसे तो कुछ कलाम नहीं, लेकिन ऐ ___
मेरा सलाम कहियो, अगर नामाबर मिले

ऐ साकिनान-ए-कुचा-ए-दिलदार देखना
तुमको कहीं जो ग़ालिब-ए-आशुफ़्ता-सर मिले




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तबाही" और शेर कुछ यूँ था-

तुम से बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
इसमें कुछ शाइबा-ए-ख़ूबी-ए-तक़दीर भी था

सही शब्द पहचान कर महफ़िल में पहला कदम रखा "सीमा" जी ने। सीमा जी.. ये रहे आपके तुनीर के तीर:

ज़िक्र जब होगा मुहब्बत में तबाही का कहीं
याद हम आयेंगे दुनिया को हवालों की तरह (सुदर्शन फ़ाकिर)

जो हमने दास्‍तां अपनी सुनाई आप क्‍यूं रोए
तबाही तो हमारे दिल पे आई आप क्‍यूं रोए (राजा मेहंदी अली खान)

सजीव जी, मनीष जी का आशीर्वाद मुझ तक पहुचाने के लिए आपका तहे-दिल से आभार। अब आप मेरे भी नामाबर हो जाईये और मेरी तरफ़ से धन्यवाद-ज्ञापन कर आईये... क्या कहते हैं? :)

शरद जी, क्या बात कह दी आपने! दिल में एक टीस-सी उभर आई...

मुझे तो अपनी तबाही की कोई फ़िक्र नहीं
यही ख्वाहिश है ये इल्ज़ाम तुम पे आए नहीं। (स्वरचित)

मंजु जी, इन आतंकियों के सामने हर चेतावनी छोटी पड़ जाती है, फिर भी इन्हें इनकी औकात तो बताई जानी चाहिए। शब्द अच्छे हैं, आपने अगर इन्हें सही से संवारा होता तो हमारे सामने एक मुकम्मल शेर होता। इसलिए शेर के बजाय मैं इसे छंद हीं कहूँगा:

अरे आतंकी !मत दिखा मेरे मुल्क में तबाही का मंजर ,
तेरे को खत्म करने के लिए आएगा कोई राम -कृष्ण -गाँधी बन कर .(स्वरचित )

नीलम जी, एक शेर तो आपने पेश किया. आपसे हमें और भी शेरों की दरकार है। खैर तब तक के लिए यही सही:

जब से हम तबाह हो गए ,
तुम जहाँपनाह हो गए

एक और बात...आपको अगर शायरी सीखनी हो तो "सुबीर संवाद सेवा" पर हमारे गुरू जी "पंकज सुबीर" की कक्षा में दाखिला ले लें। बहुत फ़ायदा होगा।

शन्नो जी, किस बात का दु:ख है आपको... हँसिए, मुस्कुराईये और महफ़िल में माहौल बनाईये। वैसे ये शेर तो बड़ा हीं वज़नदार रहा:

किसी रकीब ने भी कुछ कहा अगर तो उसे वाह-वाही मिली
हमने जो जहमत उठाई कुछ कहने की तो हमें तबाही मिली

सुमित जी, ऐसे नहीं चलेगा। आप कुछ देर के लिए आते हैं और वही शेर कह जाते हैं जो सीमा जी ने कहा है। शेर कहने से पहले बाकी की टिप्पणियों पर भी तो नज़र दौड़ा लिया करें। :)

अवनींद्र जी, हमारी महफ़िल अच्छे शेरों और गुणी शायरों का कद्र करना जानती है। और इस नाते हमारी नज़रों में आपका कद बेहद ऊँचा है। आपको पढकर लगता है कि लिखने से पहले आप दिल को मथ डालते हैं। हैं ना? ये रहे प्रमाण:

एहसास जब सीने मैं तबाह होता हैं
अश्क तेरी चाहत का गवाह होता है

उसने अपनी तबाही मैं मुझे शामिल ना किया
क्या ये सबब कम हे मेरी तबाही के लिए?

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 31, 2010

कहते हैं अगले ज़माने में कोई "मीर" भी था.. हामिद अली खां के बहाने से मीर को याद किया ग़ालिब ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७७

ज की महफ़िल बाकी महफ़िलों से अलहदा है, क्योंकि आज हम "ग़ालिब" के बारे में कुछ नया नहीं बताने जा रहे..बल्कि माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए (क्योंकि पिछली छह महफ़िलों से हम ग़ालिब की लाचारियाँ हीं बयाँ कर रहे हैं) "बाला दुबे" का लिखा एक व्यंग्य "ग़ालिब बंबई मे" आप सबों के सामने पेश करने जा रहे हैं। अब आप सोचेंगे कि हमें लीक से हटने की क्या जरूरत आन पड़ी। तो दोस्तों, व्यंग्य पेश करने के पीछे हमारा मकसद बस मज़ाकिया माहौल बनाना नहीं है, बल्कि हम इस व्यंग्य के माध्यम से यह दर्शाना चाहते हैं कि आजकल कविताओं और फिल्मी-गानों की कैसी हालत हो गई है.. लोग मक़बूल होने के लिए क्या कुछ नहीं लिख रहे. और जो लिखा जाना चाहिए, जिससे साहित्य में चार-चाँद लगते, उसे किस तरह तिलांजलि दी जा रही है। हमें यकीन है कि आपको महफ़िल में आया यह बदलाव नागवार नहीं गुजरेगा.. तो हाज़िर है यह व्यंग्य: (साभार: कादंबिनी)

दो चार दोस्तों के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब स्वर्ग में दूध की नहर के किनारे शराबे तहूर (स्वर्ग में पी जाने वाली मदिरा) की चुस्कियाँ ले रहे थे कि एक ताज़ा–ताज़ा मरा बंबइया फ़िल्मी शायर उनके रू-ब-रू आया, झुक कर सलाम वालेकुम किया और दोजानू हो कर अदब से बैठ गया। मिर्ज़ा ने पूछा, 'आपकी तारीफ़?' बंबइया शायर बोला, 'हुज़ूर मैं एक हिंदुस्तानी फ़िल्मी शायर हूँ। उस दिन मैं बंबई के धोबी तालाब से आ रहा था कि एक शराबी प्रोडयूसर ने मुझे अपनी मारुति से कुचल डाला।'

ग़ालिब बोले, 'मुबारिक हो मियाँ जो बहिश्त नसीब हुआ वर्ना आधे से ज़्यादा फ़िल्म वाले तो जहन्नुम रसीद हो जाते हैं। ख़ैर, मुझे कैसे याद फ़रमाया।'
बंबइया शायर बोला, 'हुज़ूर, आप तो आजकल वाकई ग़ालिब हो रहे हैं। क़रीब तीस साल पहले आप पर फ़िल्म बनी थी जो खूब चली और आजकल आप 'सीरियलाइज़्ड' हो रहे हैं।' मिर्ज़ा ग़ालिब समझे नहीं। पास बैठे दिल्ली के एक फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटर के मुंशी ने उन्हें टीवी के सीरियल की जानकारी दी।

मिर्ज़ा गहरी साँस छोड़ कर बोले, 'चलो कम से कम मरने के बाद तो मेरी किस्मत जागी, मियाँ। वर्ना जब तक हम दिल्ली में रहे कर्ज़ से लदे रहे, खुशहाली को तरसे और कभी इसकी लल्लो–चप्पो की तो कभी उसकी ठोड़ी पर हाथ लगाया।'
'अरे हुज़ूर, अब तो जिधर देखो आप ही आप महक रहे है,' बंबइया शायर बोला। फिर फ़िल्मी शायर ने अपनी फ्रेंच कट दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा, 'अगर हुज़ूर किसी तरह खुदा से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर बंबई जा पहुँचें तो बस यह समझ लीजे कि सोने से लद कर वापस आएँ। मेरी तो बड़ी तमन्ना है कि आप दो चार फ़िल्मों में 'लिरिक' तो लिख ही डालें।' आस पास बैठे चापलूसों ने भी उसकी बात बड़ी की ओर न जाने कौन-सा फ़ितूर मिर्ज़ा के सर पर चढ़ा कि वे तैयार हो गए।

दूसरे दिन बाकायदा अल्ला मियाँ के यहाँ मिर्ज़ा और उनके तरफ़दार जा पहुँचे और कह–सुन कर उन्होंने अल्ला मियाँ को पटा लिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि मिर्ज़ा ग़ालिब को तीस दिन की 'अंडर लीव' मय टीए डीए के दे दी गई और वे 'बहिश्त एअरलाइन' में बैठ कर बंबई के हवाई अड्‌डे पर जा उतरे।
°°°
बंबइया शायर ने उन्हें सारे अते–पते, और ठिकानों का जायज़ा दे ही रखा था, लिहाज़ा मिर्ज़ा ग़ालिब टैक्सी पकड़कर 'हिंदुस्तान स्टूडियोज़' आ पहुँचे। अंदर जाकर उन्होंने भीमजी भाई डायरेक्टर को उस स्वर्गवासी बंबइये शायर का ख़त दिया। भीम जी भाई उन्हें देखते ही अपने चमचे कांति भाई से बोल, क्या नसीरूद्दीन शाह का कांट्रैक्ट कैंसिल हो गया, कांतिभाई। ये नया बागड़ू मिर्ज़ाग़ालिब के मेकअप में कैसे?

कांतिभाई ने अपने चश्मे से झाँक कर देखा और बोले, 'वैसे मेकअप आप अच्छा किया है पट्‌ठे का। रहमान भाई ने किया लगता है। पर ये इधर कैसे आ गया? मिर्जा ग़ालिब का शूटिंग तो गुलज़ार भाई कर रहा है।'
तभी मिर्ज़ा ग़ालिब बोले, 'सहिबान, मैं एक्टिंग करने नहीं आया हूँ। मैं ही असली मिर्ज़ा गालिब हूँ, मैं तो फ़िल्म में शायरी करने आया हूँ जिसे शायद आप लोग 'लिरिक' कहते हैं।'
भीम जी भाई बोले, 'अच्छा, तो तुम लिरिक लिखते है।'
मिर्ज़ा बोले, 'जी हाँ।'

भीम जी भाई न फ़ौरन ही अपने असिस्टेंट मानिक जी को बुलाया और हिदायत दी, 'अरे सुनो मानिक जी भाई। इसे ज़रा परखो। 'लिरिक' लिखता है।' मानिक जी भाई ने ग़ालिब को घूर कर देखा और कहा, 'आओ मेरे साथ।'
मानिक जी ग़ालिब को बड़े हाल में ले गए जहाँ आधा दर्जन पिछलग्गुए तुकबंद बैठे थे। मानिक जी बोले, 'पहले सिचुएशन समझ लो।'
मिर्ज़ा बोले, 'इसके क्या मानी, जनाब।'
मानिक जी बोले, 'पहले हालात समझ लो और फिर उसी मुताबिक लिखना है। हाँ तो, हीरोइन हीरो से रूठी हुई बरगद के पेड़ के नीचे मुँह फुलाए बैठी है। उधर से हीरो आता है सीने पर हाथ रख कर कहता है कि तूने अपने नज़रिये की तलवार से मेरे दिल में घाव कर दिया है। अब इस सिचुएशन को ध्यान में रखते हुए लिख डालो एक गीत।'
मिर्ज़ा ग़ालिब ने काग़ज़ पर लिखना शुरू किया और पाँच मिनट बाद बोले, सुनिए हज़रत, नहीं ज़रियते राहत ज़राहते पैकां
यह ज़ख्मे तेग है जिसको कि दिलकुशा कहिए
नहीं निगार को उल्फ़त, न हो, निगार तो है
रवानिए रविशो मस्तिए अदा कहिए

मिर्ज़ा की इस लिरिक को सुनते ही मानिक जी भाई का ख़ास चमचा पीरूभाई दारूवाला बोला, 'बौस, ये तो पश्तो में गीत लिखता है। मेरे पल्ले में तो कुछ पड़ा नहीं, तुम्हारे भेजे में क्या घुसा काय?'
मानिक जी बौखला कर बोले, 'ना जाने कहाँ से चले आते हैं फ़िल्मों में। देखो मियाँ इस तरह ऊल-जलूल लिरिक लिख कर हमें क्या एक करोड़ की फ़िल्म पिटवानी है।'
पर हुज़ूर, मिर्ज़ा बोले, 'मैं आपको अच्छे पाए की शायरी सुना रहा हूँ।'

ये पाए की शायरी है या चौपाये की, मानिक जी लाल पीले होकर बोले, 'तुमसे पहले भी एक पायेदार शायर आया था–क्या नाम था उसका – हाँ, याद आया,जोश। वह भी तुम्हारे माफ़िक लंतरानी बकता था और जब उसकी अकल ठिकाने आई तब ठीक-ठीक लिखने लगा था।'
पीरूजी दारूवाला बोला, 'उसका वह गाना कितना हिट गया था बौस– हाय, हाय। क्या लिखा था ज़ालिम ने, मेरे जुबना का देखो उभार ओ पापी।'
ग़ालिब बोले, 'क्या आप जोश मलीहाबादी के बारे में कह रहे है? वो तो अच्छा ख़ासा कलाम पढ़ता था। वह भला ऐसा लिखेगा।'
'अरे हाँ, हाँ। उसी जोश का मैं ज़िक्र कर रहा हूँ,' मानिक जी भाई बोला, 'बंबई की हवा लगते ही वह रोगनजोश बन गया था।'
तभी पीरूभाई बोले, 'देखो भाई, हमारा टाइम ख़राब मत करो। हमें कायदे के गीत चाहिए। ठहरो तुम्हें कुछ नमूने सुनाता हूँ।'
पीरूभाई दारूवाला ने पास खड़े म्यूज़िक डायरेक्टर बहरामजी महरबानजी को इशारा किया। तभी आर्केस्ट्रा शुरू हो गया। पहले तो आर्केस्ट्रा ने किसी ताज़ा अमरीकन फ़िल्म से चुराई हुई विलायती धुन को तोड़ मरोड़ कर ऐसा बजाया कि वह 'एंगलोइंडियन' धुन बन गई। उसके बाद हीरो उठा और कूल्हे मटका–मटका कर डांस करने लगा। हीरोइन भी बनावटी ग़ुस्से में उससे छिटक–छिटक कर दूर भागती हुई नखरे दिखाने लगी। तभी माइक पर खड़े सिंगर ने गाना शूरू कर दिया – तेरे डैडी ने दिया मुझे परमिट तुझे फँसाने का
इश्क का नया अंदाज़ देखकर ग़ालिब बोले, 'अस्तग़फरूल्ला, क्या आजकल हिंदुस्तान में वालिद अपने बरखुरदार को इस तरह लड़कियाँ फँसाने की राय देते हैं?'
पीरूभाई बोले, 'मियाँ वो दिन गए जब ख़लील खाँ फाख़्ते उड़ाते थे। हिंदुस्तान में तरक्की हम लोगों की बदौलत हुई है। हमारी ही बदौलत आज बाप बेटे शाम को एक साथ बैठ कर विस्की की चुस्की लेते हैं। होटलों में साथ-साथ लड़कियों के संग डिस्को करते है।'
मानिक जी भाई बोले, 'इसे ज़रा चलत की चीज़ सुनाओ, पीरूभाई।'
पीरूभाई ने फिर म्यूज़िक डायरेक्टर को इशारा किया और आर्केस्ट्रा भनभना उठा। ले जाएगे ले जाएगे, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे'
ग़ालिब गड़बड़ा गए। 'क्या आजकल शादी के मौके पर ऐसे गीत गाए जाते हैं?'
पीरूभाई बोले, 'मियाँ, गीत तो छोड़ो, बारात में दूल्हे का बाप और जो कोई भी घर का बड़ा बूढ़ा ज़िंदा हो, वह तक सड़क पर वह डांस दिखाता है कि अच्छे-अच्छे कत्थक कान पर हाथ लगा लें। अरे मर्दों की छोड़ो दूल्हे की दो मनी अम्मा भी सड़क पर ऐसे नाचती है जैसे रीछ। देखो नमूना।'
और मिर्ज़ा को आधुनिक भारतीय विवाह उत्सव का दृश्य दिखलाया गया, जिसमें दूल्हे के अब्बा–अम्मी दादा–दादी बिला वजह और बेताले होकर कूल्हे मटका-मटकाकर उलटी सीधी धमाचौकड़ी करने लगे।

मिर्ज़ा बोले, 'ऐसा नाच तो हमने सन सत्तावन के गदर से पहले बल्लीमारान के धोबियों की बारात में देखा था।'
पीरूभाई दारूवाला खिसियाकर बोले, 'ऐसी की तैसी में गए बल्लीमारान के धोबी मियाँ। आजकल तो घर-घर में यह डिस्को फलफूल रहा है। तभी मुस्कराते हुए मानिक भाई ने कहा, 'अरे, ज़रा पुरानी चाल की चीज़ भी सुनाओ।'
अबकी बार हीरोइन ने लहंगा फरिया पहन कर विशुद्ध उत्तर परदेशिया लोकनृत्य शैली की झलक दिखलाई और वैसे ही हाव–भाव करने लगी। तभी माइक पर किरनबेन गाने लगीं, झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में गीत ख़त्म होते ही मानिक भाई बोले, इसे कहते हैं लिरिक और म्यूज़िक का ब्लेंडिंग। इसके मुकाबले में लिखो तो जानें। बेमानी बक–बक में क्या रखा है।'
यह सुनकर ग़ालिब का चेहरा लाल हो गया। सहसा वे बांगो–पांगो और उसके बगल में बैठे ढोल वाले से ज़ोर से बोले—
तू ढोल बजा भई ढोल बजा।
यह महफ़िल नामाक़ूलों की।
लाहौल विला, लाहौल विला।

उनकी इस लिरिक की चाल को बांगो वाले ने फौरन ही बाँध लिया और उधर आर्केस्ट्रा भी गनगना उठा। मानिक जी भाई और पीरू भाई की बाँछें खिल गईं और वे सब मग्न होकर बक़ौल ग़ालिब 'धोबिया–नृत्य' करने लगे। और जब उनकी संगीत तंद्रा टूटी तो मानिक भाई बोले, वाह, वाह क्या बात पैदा की है ग़ालिब भाई।
पर तब तक ग़ालिब कुकुरमुत्ता हो और स्टूडियो से रफूचक्कर हो कर बहिश्त एअर लाइन की रिटर्न फ्लाइट का टिकट लेकर अपनी सीट पर बैठे बुदबुदा रहे थे —

न सत्ताईस की तमन्ना न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी न सही।

सच कहूँ तो इस व्यंग्य को पढने के बाद हीं मुझे मालूम हुआ कि "माननीय जोश मलीहाबादी" ने भी चालू किस्म के गाने लिखे थे.. मैं जोश साहब का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ/था, लेकिन अब समझ नहीं आ रहा कि मैं कितना सही हूँ/था और कितना गलत!! आखिर इस बदलाव का जिम्मेदार कौन है.. परिस्थितियाँ या फिर शायरों की बदली हुई मानसिकता। आप अपने दिल पर हाथ रखके इस प्रश्न का जवाब ढूँढने की कोशिश कीजिएगा। मुझे यकीन है कि जिस दिन हमें इस प्रश्न का जवाब मिलेगा, उसी दिन हमारे साहित्य/हमारे गीत सुरक्षित हाथों में लौट आएँगे। खैर.. हमारी गज़लें तो "ग़ालिब" के हाथों में सुरक्षित हैं और इसका प्रमाण ग़ालिब के ये दो शेर हैं। मुलाहज़ा फ़रमाईयेगा:

ज़िन्दगी यूँ भी गुज़र ही जाती
क्यों तेरा राहगुज़र याद आया

मैंने मजनूं पे लड़कपन में 'असद'
संग उठाया था कि सर याद आया


ग़ालिब की बातें हो गई, दो(या फिर तीन?) शेर भी हो गएँ, अब क्यों न हम ग़ालिब के हवाले से "ग़ालिब के गुरू" मीर तक़ी "मीर" को याद कर लें। "कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था" - इन पंक्तियों से ग़ालिब ने अपने गुरू को जो श्रद्धांजलि दी है, उसकी मिसाल देने में कई तहरीरें कम पड़ जाएँगी। इसलिए अच्छा होगा कि हम खुद से कुछ न कहें और "हामिद अली खां" साहब को हीं ग़ालिब की रूह उकेरने का मौका दे दें। तो पेश है "उस्ताद" की आवाज़ में "ग़ालिब" की "शिकायतों और इबादतों" से भरी यह गज़ल। हमारा दावा है कि आप इसे सुनकर भाव-विभोर हुए बिना रह न पाएँगे:

हुई ताख़ीर तो कुछ बाइसे-ताख़ीर भी था
आप आते थे, मगर कोई अनाँगीर भी था

तुम से बेजा है मुझे अपनी _____ का गिला
इसमें कुछ शाइबा-ए-ख़ूबी-ए-तक़दीर भी था

तू मुझे भूल गया हो, तो पता बतला दूँ
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख़चीर भी था

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो "ग़ालिब"
कहते हैं अगले ज़माने में कोई "मीर" भी था




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "कायल" और शेर कुछ यूँ था-

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

गज़ल से गुजरकर इस शेर को सबसे पहले पहचाना "तपन" जी ने, लेकिन पिछली बार की हीं तरह इस बार भी सही जवाब देने के बावजूद पहला प्रवेशी विजयी नहीं हो सका,क्योंकि इस महफ़िल में शेर के बिना आना अपशगुन माना जाता है :) इस वज़ह से "शरद" जी इस बार भी "शान-ए-महफ़िल" बने। शरद जी, आपने महफ़िल में ये शेर पेश किए:

हर एक चेहरे को ज़ख्मों का आईना न कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत, इसे सज़ा न कहो ...
मैं वाकीयात की ज़ंजीर का नही कायल
मुझे भी अपने गुनाहों का सिलसिला न कहो ... (राहत इन्दौरी)

सीमा जी, आपके इन शेरों के क्या कहने! नख-शिख हैं चमत्कृत बिन गहने!!

शिकवा-ए-शौक करे क्या कोई उस शोख़ से जो
साफ़ कायल भी नहीं, साफ़ मुकरता भी नहीं (फ़िराक़ गोरखपुरी )

हम तो अब भी हैं उसी तन्हा-रवी के कायल
दोस्त बन जाते हैं कुछ लोग सफ़र में खुद ही (नोमान शौक़ )

सुमित जी, हमें खुशी है कि हम किसी न किसी तरह से आपकी ज़िदगी का हिस्सा बन गए हैं.. आपको एफ़ एम की कमी नहीं खलती और आप जैसे शुभचिंतकों के कारण हमें "इश्क-ए-बेरहम" की कमी नहीं खलती :)

मंजु जी, मेरा मन आपकी इन पंक्तियों का कायल हो गया:

जब से तुम मेरे दिल में उतरे हो ,
मेरा शहर दीवानगी का कायल हो गया .

अवनींद्र जी, आपको पढकर ऐसा नहीं लगता कि किसी नौसिखिये को पढ रहा हूँ। आपमें वह माद्दा है, जो अच्छे शायरों में नज़र आता है, बस इसे निखारिये। ये रहे आपके शेर:

मेरे महबूब मैं तेरा कायल तो बहुत था
पर अफ़सोस.., मैं तेरे काबिल ना हो सका

कौन कहता है कायल हूँ मैं मैखाने का
सूरत -ऐ -साकी ने दीवाना बना रखा है
घूमता रहता है वो शमा के इर्द गिर्द बेबस
या खुदा किस मिटटी से परवाना बना रखा है (क्या बात है.....शुभान-अल्लाह!)

शन्नो जी और नीलम जी, महफ़िल को खुशगवार बनाए रखने के लिए आप दोनों का तह-ए-दिल से शुक्रिया। अपनी यह उपस्थिति इसी तरह बनाए रखिएगा।

आसमां की ऊंचाइयों के कायल हुये हैं
जमीं पर कदम जिनके पड़ते नहीं हैं. (शन्नो जी, कमाल है.. थोड़ी-सी चूक होती और मेरी नज़रों से आपका यह शेर चूक जाता..फिर मैं अफ़सोस हीं करता रह जाता.. बड़ी हीं गूढ बात कहीं है आपने)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 24, 2010

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है.. ग़ालिब के ज़ख्मों को अपनी आवाज़ से उभार रही हैं मरियम

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७६

र कड़ी में हम ग़ालिब से जुड़ी कुछ नई और अनजानी बातें आपके साथ बाँटते हैं। तो इसी क्रम में आज हाज़िर है ग़ालिब के गरीबखाने यानि कि ग़ालिब के निवास-स्थल की जानकारी। (अनिल कान्त के ब्लाग "मिर्ज़ा ग़ालिब" से साभार):

ग़ालिब का यूँ तो असल वतन आगरा था लेकिन किशोरावस्था में ही वे दिल्ली आ गये थे । कुछ दिन वे ससुराल में रहे फिर अलग रहने लगे । चाहे ससुराल में या अलग, उनकी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा दिल्ली की 'गली क़ासिमजान' में बीता । सच पूंछें तो इस गली के चप्पे-चप्पे से उनका अधिकांश जीवन जुड़ा हुआ था । वे पचास-पचपन वर्ष दिल्ली में रहें, जिसका अधिकांश भाग इसी गली में बीता । यह गली चाँदनी चौक से मुड़कर बल्लीमारान के अन्दर जाने पर शम्शी दवाख़ाना और हकीम शरीफ़खाँ की मस्जिद के बीच पड़ती है । इसी गली में ग़ालिब के चाचा का ब्याह क़ासिमजान (जिनके नाम पर यह गली है ।) के भाई आरिफ़जान की बेटी से हुआ था और बाद में ग़ालिब ख़ुद दूल्हा बने आरिफ़जान की पोती और लोहारू के नवाब की भतीजी, उमराव बेगम को ब्याहने इसी गली में आये । साठ साल बाद जब बूढ़े शायर का जनाज़ा निकला तो इसी गली से गुज़रा ।

जनाब हमीद अहमदखाँ ने ठीक ही लिखा है :
"गली के परले सिरे से चलकर इस सिरे तक आइए तो गोया आपने ग़ालिब के शबाब से लेकर वफ़ात तक की तमाम मंजिलें तय कर लीं ।"


इन बातों से मालूम होता है कि ग़ालिब वास्तव में आगरा के रहने वाले थे। तो क्यों ना हम आगरा की गलियों का मुआयना कर लें, क्या पता उन गलियों में हमें गज़ल कहते हुए ग़ालिब मिल जाएँ। ("मिर्ज़ा ग़ालिब का घर हुआ ग़ायब" पोस्ट से साभार):

शहर के इतिहासकार और वयोवृद्ध बताते हैं कि कालां महल इलाक़े में एक बड़ी हवेली हुआ करती थी, जहाँ सन् १७९७ में ग़ालिब का जन्म हुआ था। लेकिन कालां महल इलाक़े में कोई भी उस जगह के बारे में पक्के तौर पर नहीं कह सकता, जहाँ मियाँ ग़ालिब का जन्म हुआ था। हालाँकि एक इमारत है, जो ग़ालिब की हवेली की ली गई एक बहुत पुरानी तस्वीर से मिलती-जुलती है। बचपन में मुंशी शिव नारायण को ग़ालिब द्वारा लिखे गए एक पत्र से उनकी हवेली के बारे में जानकारी मिलती है, जिसमें उन्होंने अपने घर के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है। उन्हीं को लिखे एक अन्य ख़त में उन्होंने आर्थिक तंगी के चलते पैतृक सम्पत्ति छोड़ने की इच्छा का भी उल्लेख किया है। उन्होंने अपनी सम्पत्ति १८५७ के गदर के आस-पास सेठ लक्ष्मीचंद को बेच दी थी।

अब एक स्कूल ट्रस्ट उस सम्पत्ति का मालिक है, लेकिन ट्रस्ट प्रबंधन के मुताबिक़ उस सम्पत्ति का ग़ालिब से कुछ लेना-देना नहीं है। पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक़ वहाँ जो ख़ूबसूरत बग़ीचा था, वह कब का ग़ायब हो चुका है और अब वहाँ एक बड़ा सा पानी का टेंक है। इमारत के वर्तमान मालिक के हिसाब से ग़ालिब का उस भवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। हालाँकि तथ्य कुछ और ही बयान करते हैं। १९५७ में ग़ालिब की सालगिरह के मौक़े पर मशहूर उर्दू शायद मैकश अकबराबादी की एक तस्वीर है, जो प्रधानाचार्य के वर्तमान दफ़्तर के ठीक सामने ली गई है।

ग़ालिब से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम १९६० तक बाक़ायदा वहीं आयोजित किए जाते रहे हैं। ट्रस्ट द्वारा बड़े पैमाने पर की गई तोड़-फोड़ और निर्माण के चलते अब भवन काफ़ी बदल चुका है। विख्यात शायर फिराक़ गोरखपुरी और अभिनेता फ़ारुक़ शेख़, जिन्होंने ग़ालिब पर एक फ़िल्म का निर्माण किया था, भी इस इमारत को देखने आए थे। ऐतिहासिक तथ्य पुख़्ता तौर पर इशारा करते हैं कि वही भवन मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्मस्थल है, जहाँ आज एक गर्ल्स इंटर कॉलेज चल रहा है। हालाँकि इस बारे में अभी और शोध की ज़रूरत है कि क्या वही इमारत ग़ालिब की पुश्तैनी हवेली है।

हद ये है कि हमारे देश के सबसे बड़े शायर का घर वीरानियों में गुम है... वीरानियाँ क्या. हमें तो यह भी नहीं पता कि ग़ालिब जब आगरा में थे तो कहाँ रहा करते थे। चलिए... इस बात का शुक्र है कि भले हीं ग़ालिब के निशान ज़मीन से मिट गए हों, लेकिन लोगों के दिलों में जो स्थान ग़ालिब ने बनाया है, उसे कोई मिटा नहीं सकता.. वक़्त के साथ वे निशान और भी पुख्ता होते जा रहे हैं। इसी बात पर क्यों न हम ग़ालिब के चंद शेरों पर नज़र दौड़ा लें:

छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना
छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़िर कहे बग़ैर

"ग़ालिब" न कर हुज़ूर में तू बार-बार अर्ज़
ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर


पिछली महफ़िल में हमने ग़ालिब के जो ख़त पेश किए थे, उनमें ग़म और दु:खों की भरमार थी। माहौल को बदलते हुए आज हम वे दो ख़त पेश कर रहे हैं, जिनसे ग़ालिब का मज़ाकिया लहजा झलकता है। तो ये रहे दो ख़त:

१) ग़ालिब ने अपने एक दोस्त को रमज़ान के महीने में ख़त लिखा। उसमें लिखते हैं "धूप बहुत तेज़ है। रोज़ा रखता हूँ मगर रोज़े को बहलाता रहता हूँ। कभी पानी पी लिया, कभी हुक़्क़ा पी लिया,कभी कोई टुकड़ा रोटी का खा लिया। यहाँ के लोग अजब फ़हम र्खते हैं, मैं तो रोज़ा बहलाता हूँ और ये साहब फ़रमाते हैं के तू रोज़ा नहीं रखता। ये नहीं समझते के रोज़ा न रखना और चीज़ है और रोज़ा बहलाना और बात है"।

२) एक दोस्त को दिसम्बर १८५८ की आखरी तारीखों में ख़त लिखा। उस दोस्त ने उसका जवाब जनवरी १८५९ की पहली या दूसरी तारीख को लिख भेजा। उस खत के जवाब में उस दोस्त को ग़ालिब ख़त लिखते हैं। "देखो साहब ये बातें हमको पसन्द नहीं। १८५८ के ख़त का जवाब १८५९ में भेजते हैं और मज़ा ये के जब तुमसे कहा जाएगा तो ये कहोगे के मैंने दूसरे ही दिन जवाब लिखा है"।

अब हुआ ना माहौल कुछ खुशनुमा। बदले माहौल में निस्संदेह हीं आपमें अब गज़ल सुनने की तलब जाग चुकी होगी। गज़ल तो हम सुना देंगे, लेकिन क्या करें ग़ालिब की लेखनी दु:खों से ज्यादा दूर नहीं रह पाती, इसलिए अगर यह गज़ल सुनकर आप भावुक हो गएँ तो इसमें हमारी कोई गलती न होगी। तो लीजिए पेश है "ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और" एलबम से "मरियम"(इनके बारे में हमें ज़्यादा कुछ पता नहीं चल सका, इसलिए पूरी की पूरी कड़ी हमने ग़ालिब के नाम कर दी, हाँ आवाज़ में वह नशा है वह खनक है, जो यकीनन हीं आपको बाँधकर रखेगी।) की आवाज़ में यह गज़ल:

हर एक बात पे कहते हो तुम कि 'तू क्या है'
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं ____
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "अहद" और शेर कुछ यूँ था-

ता फिर न इन्तज़ार में नींद आये उम्र भर
आने का अहद कर गये आये जो ख़्वाब में

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की अवनींद्र जी ने,लेकिन चूँकि उन्होंने तब कोई शेर पेश नहीं किया, इसलिए "शान-ए-महफ़िल" की पदवी से नवाज़ा जाता है अवनींद्र जी के बाद महफ़िल में उपस्थित होने वाले शरद जी को। शरद जी, इस बार आप पूरे रंग में दीखे और उस रंगे में आपने महफ़िल को भी रंग दिया। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर:

मैनें एहद किया था न उस से मिलूंगा मैं
वो रेत पे लकीर थी पत्थर पे नहीं थी । (स्वरचित)

ग़म तो ये है कि वो अहदे वफ़ा टूट गया
बेवफ़ा कोई भी हो तुम न सही हम ही सही (राही मासूम रज़ा) शुभान-अल्लाह... इस शेर का तो मैं फ़ैन हो गया :)

सीमा जी, आपने दो किश्तों में ४ शेर पेश किए... माज़रा क्या है? :) मज़ाक कर रहा हूँ बस :) यह रही आपकी पेशकश:

कहा था किसने के अहद-ए-वफ़ा करो उससे
जो यूँ किया है तो फिर क्यूँ गिला करो उससे (अहमद फ़राज़)

अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहोत थे जागे सुबह हुई आराम किया (मीर तक़ी 'मीर') .. इस शेर को पढकर जाने क्यों मुझे गुलज़ार साहब की पंक्तियाँ याद आ रही हैं... सारी जवानी कतरा के काटी, पीरी में टकरा गए हैं (दिल तो बच्चा है जी)

तुम्हारे अह्द-ए-वफ़ा को अहद मैं क्या समझूं
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत का ऐतबार नहीं (साहिर लुधियानवी)

अवनींद्र जी, आपने रूक-रूक कर जो शेरों की बौछार की, उससे मैं भींगे बिना नहीं रह सका। अब चूँकि सारे हीं शेर यहाँ डाले नहीं जा सकते, इसलिए लकी ड्रा के सहारे मैंने इन दो शेरों को चुना है :)

ऐ ज़िन्दगी एक एहद मांगता हूँ तुझसे
फ़िर येही खेल हो तो मेरे साथ ना हो (स्वरचित )

वो जब से उम्र कि बदरिया सफ़ेद हो गयी
एहदे वफ़ा तो छोड़ो मुस्कुराता नहीं कोई (स्वरचित ) हा हा हा... क्या खूब कहा है आपने

नीलम जी, आपको हमारी महफ़िल और हमारी पेशकश पसंद आई, इसके लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया। आपने कहा कि आपका शेर चोरी का है, कोई बात नही, लेकिन इस शेर के मालिक का नाम तो बता देतीं। वैसे शेर कमाल का है:

और क्या अहदे वफ़ा होते हैं
लोग मिलते हैं,जुदा होते हैं

शन्नो जी, आपने अनजाने में हीं महफ़िल को जो दुआ दी, उससे मेरा दिल बाग-बाग हो गया... वाह क्या कहा है आपने:

हमें किसी की अहदे वफ़ा का इल्म नहीं
हम और हमारी महफ़िल बरक़रार रहे

मनु जी, आपको समझना इतना आसान नहीं। आप महफ़िल में आए, बड़े दिनों बाद आए, इससे हमें बड़ी हीं खुशी हासिल हुई, लेकिन खतों को पढने के बाद गज़ल सुनना ज़रूरी नहीं समझा.. यह मामला मुझे समझ नहीं आया। थोड़ा खुलकर समझाईयेगा।

सुमित जी और पूजा जी आप लोगों की दुआओं के कारण हीं महफ़िल आज अपनी ७६वीं कड़ी तक पहुँच सकी है। अपना प्यार (और/या) आशीर्वाद इसी तरह बनाए रखिएगा :)

मंजु जी, शेर कहने में आपने बड़ी हीं देर कर दी। अच्छी बात यह है कि आपको वह पता ( http://www.ebazm.com/dictionary.htm ) मिल चुका है, जहाँ से शब्दों के अर्थ मालूम पड़ जाएँगे। यह रहा आपका शेर:

निभानी नहीं आती उसे रस्म अहद वफा की ,
टूटती हैं चूडियाँ हर दिन बेवफाई से .

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 17, 2010

कब से हूँ क्या बताऊँ जहां-ए-ख़राब में.. चचा ग़ालिब की हालत बयां कर रहे हैं मेहदी हसन और तरन्नुम नाज़

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७५

यूसुफ़ मिर्जा,

मेरा हाल सिवाय मेरे ख़ुदा और ख़ुदाबंद के कोई नहीं जानता। आदमी कसरत-ए-ग़म से सौदाई हो जाते हैं, अक़्‍ल जाती रहती है। अगर इस हजूम-ए-ग़म में मेरी कुव्वत मुतफ़क्रा में फ़र्क आ गया हो तो क्या अजब है? बल्कि इसका बावर न करना ग़ज़ब है। पूछो कि ग़म क्या है?

ग़म-ए-मर्ग, ग़म-ए-‍फ़िराक़, ग़म-ए-रिज़्क, ग़म-ए-इज्ज़त? ग़म-ए-मर्ग में क़िलआ़ नामुबारक से क़ताअ़ नज़र करके, अहल-ए-शहर को गिनता हूँ। ख़ुदा ग़म-ए-फ़िराक को जीता रखे। काश, यह होता कि जहाँ होते, वहाँ खुश होते। घर उनके बेचिराग़, वह खुद आवारा। कहने को हर कोई ऐसा कह सकता है़, मगर मैं अ़ली को गवाह करके कहता हूँ कि उन अमावत के ग़म में और ज़ंदों के ‍फ़िराक़ में आ़लम मेरी नज़र में तीर-ओ-तार है। हक़ीक़ी मेरा एक भाई दीवाना मर गया। उसकी बेटी, उसके चार बच्चे, उनकी माँ, यानी मेरी भावज जयपुर में पड़े हुए हैं। इन तीन बरस में एक रुपया उनको नहीं भेजा। भतीजी क्या कहती होगी कि मेरा भी कोई चच्चा है। यहाँ अग़निया और उमरा के अज़दवाज व औलाद भीख माँगते फिरें और मैं देखूँ।

इस मुसीबत की ताब लाने को जिगर चाहिए। अब ख़ास दुख रोता हूँ। एक बीवी, दो बच्चे, तीन-चार आदमी घर के, कल्लू, कल्यान, अय्याज़ ये बाहर। मदारी के जोरू-बच्चे बदस्तूर, गोया मदारी मौजूद है। मियाँ घम्मन गए गए महीना भर से आ गए कि भूखा मरता हूँ। अच्छा भाई, तुम भी रहो। एक पैसे की आमद नहीं। बीस आदमी रोटी खाने वाले मौजूद। मेहनत वह है कि दिन-रात में फुर्सत काम से कम होती है। हमेशा एक फिक्र बराबर चली जाती है। आदमी हूँ, देव नहीं, भूत नहीं। इन रंजों का तहम्मुल क्योंकर करूँ? बुढ़ापा, जोफ़-ए-क़वा, अब मुझे देखो तो जानो कि मेरा क्या रंग है। शायद कोई दो-चार घड़ी बैठता हूँ, वरना पड़ा रहता हूँ, गोया साहिब-ए-फ़राश हूँ, न कहीं जाने का ठिकाना, न कोई मेरे पास आने वाला। वह अ़र्क जो ब-क़द्र-ए-ताक़त, बनाए रखता था, अब मुयस्सर नहीं।

सबसे बढ़कर, आमद आमद-ए-गवर्नमेंट का हंगामा है। दरबार में जाता था, ख़लह-ए-फ़ाख़िरा पाता था। वह सूरत अब नज़र नहीं आती। न मक़बूल हूँ, न मरदूद हूँ, न बेगुनाह हूँ, न गुनहगार हूँ, न मुख़बिर, न मुफ़सिद, भला अब तुम ही कहो कि अगर यहाँ दरबार हुआ और मैं बुलाया जाऊँ त नज़र कहाँ से लाऊँ। दो महीने दिन-रात खन-ए-जिगर खाया और एक क़सीदा चौंसठ बैत का लिखा। मुहम्मद फ़ज़ल मुसव्विर को दे दिया, वह पहली दिसंबर को मुझे दे देगा।

क्या करूँ? किसके दिल में अपना दिल डालूँ?


अभी जो हमने आपके पेश-ए-नज़र किया, वह और कुछ नहीं बल्कि किन्हीं यूसुफ़ मियाँ के नाम ग़ालिब का ख़त था। ग़ालिब के अहवाल (हालात) की जानकारी ग़ालिब के ख़तों से बखूबी मिलती है। इसलिए क्यों ना आज की महफ़िल में ग़ालिब के ख़तों का हीं मुआयना किया जाए। तो पेश है टुकड़ों में ग़ालिब के ख़त:

यह ख़त उन्होंने तब लिखा मालूम होता है, जब दिल्ली में अंग्रेजी फ़ौज़ों और हैज़ा दोनों का एक साथ आक्रमण हुआ था। ग़ालिब लिखते हैं:

पाँच लश्कर का हमला पै दर पै इस शहर पर हुआ। पहला बाग़ियों का लश्कर, उसमें पहले शहर का एतबार लुटा। दूसरा लश्कर ख़ाकियों का, उसमें जान-ओ-माल-नामूस व मकान व मकीन व आसमान व ज़मीन व आसार-ए-हस्ती सरासर लुट गए। तीसरा लश्कर का, उसमें हज़ारहा आदमी भूखे मरे।

चौथा लश्कर हैज़े का, उसमें बहुत-से पेट भरे मरे। पाँचवाँ लश्कर तप का, उसमें ताब व ताक़त अ़मूमन लुट गई। मरे आदमी कम, लेकिन जिसको तप आई, उसने फिर आज़ा में ताक़त न पाई। अब तक इस लश्कर ने शहर से कूच नहीं किया।

मेरे घर में दो आदमी तप में मुब्तिला हैं, एक बड़ा लड़का और एक मेरा दरोग़ा। ख़ुदा इन दोनों को जल्द सेहत दे।

जब शहर में बाढ आई तो ग़लिब ने लिखा:

मेंह का यह आलम है कि जिधर देखिए, उधर दरिया है। आफ़ताब का नज़र आना बर्क़ का चमकना है, यानी गाहे दिखाई दे जाता है। शहर में मकान बहुत गिरते हैं। इस वक़्त भी मेंह बरस रहा है। ख़त लिखता तो हूँ, मगर देखिए डाकघर कब जावे। कहार को कमल उढ़ाकर भेज दूँगा।

आम अब के साल ऐसे तबाह हैं कि अगर बमुश्किल कोई शख़्स दरख़्त पर चढ़े और टहनी से तोड़कर वहीं बैठकर खाए, तो भी सड़ा हुआ और गला हुआ पाए।

अंग्रेजों के हाथों कत्ल हुए अपने परिचितों का मातम करते हुए ग़ालिब लिखते हैं:

यह कोई न समझे कि मैं अपनी बेरौनक़ी और तबाही के ग़म में मरता हूँ। जो दुख मुझको है उसका बयान तो मालूम, मगर उस बयान की तरफ़ इशारा करता हूँ। अँग्रेज़ की क़ौम से जो इन रूसियाह कालों के हाथ से क़त्ल हुए, उसमें कोई मेरा उम्मीदगाह था और कोई मेरा शफ़ीक़ और कोई मेरा दोस्त और कोई मेरा यार और कोई मेरा शागिर्द, कुछ माशूक़, सो वे सबके सब खाक़ में मिल गए।

एक अज़ीज़ का मातम कितना सख्त होता है! जो इतने अज़ीज़ों का मातमदार हो, उसको ज़ीस्त क्योंकर न दुश्वार हो। हाय, इतने यार मरे कि जो अब मैं मरूँगा तो मेरा कोई रोने वाला भी न होगा।

एक और ख़त में ग़ालिब अपना दुखड़ा इस तरह व्यक्त करते हैं:

मेरा शहर में होना हुक्काम को मालूम है, मगर चूँकि मेरी तरफ़ बादशाही दफ्तर में से या मुख़बिरों के बयान से कोई बात पाई नहीं गई, लिहाज़ा तलबी नहीं हुई। वरना जहाँ बड़े-बड़े जागीरदार बुलाए हुए या पकड़े हुए आए हैं, मेरी क्या हक़ीकत थी। ग़रज़ कि अपने मकान में बैठा हूँ, दरवाजे से बाहर निकल नहीं सकता।

सवार होना या कहीं जाना तो बहुत बड़ी बात है। रहा यह कि कोई मेरे पास आवे, शहर में है कौन जो आवे? घर के घर बे-चराग़ पड़े हैं, मुजरिम सियासत पाए जाते हैं, जर्नेली बंदोबस्त 11 मई से आज तक, यानी 5 सितंबर सन् 1857 तक बदस्तूर है। कुछ नेक व बद का हाल मुझको नहीं मालूम, बल्कि हनूजल ऐसे अमूर की तरफ़ हुक्काम की तवज्जोह भी नहीं।

देखिए अंजाम-ए-कार क्या होता है। यहाँ बाहर से अंदर कोई बगैर टिकट का आने-जाने नहीं पाता। तुम ज़िनहार यहाँ का इरादा न करना। अभी देखना चाहिए, मुसलमानों की आबादी का हुक्म होता है या नहीं।

और अब ये जान लेते हैं कि ग़ालिब के ये ख़त आखिर छपे कैसे? तो इस बारे में "ग़ालिब के पत्र" नामक किताब की भूमिका में लिखा है:

उनकी आयु के अंतिम वर्षों में उनके एक शिष्य चौधरी अब्दुल गफ़ूर सुरूर ने उनके बहुत से पत्र एकत्र किए और उनको छापने के लिए ग़ालिब से आज्ञा माँगी। परंतु ग़ालिब इस बात पर सहमत न हुए। सुरूर के साथ-साथ ही मुंशी शिवनारायण 'आराम' और मुंशी हरगोपाल तफ़्ता ने भी इसी प्रकार की आज्ञा माँगी। ग़ालिब ने १८ नवंबर को मुंशी शिवनारायण को लिखा :

'उर्दू खतूत जो आप छपवाना चाहते हैं, यह भी ज़ायद बात है। कोई पत्र ही ऐसा होगा कि जो मैंने क़लम संभालकर और दिल लगाकर लिखा होगा। वरना सिर्फ़ तहरीर सरसरी है। क्या ज़रूरत है कि हमारे आपस के मुआमलात औरों पर ज़ाहिर हों। खुलासा यह कि इन रुक्क़आत का छापा मेरे खिलाफ़-ए-तबअ है।’

ऐसा प्रतीत होता है क मुंशी शिवनारायण और तफ़्ता ने ग़ालिब के पत्रों के छापने का इरादा छोड़ दिया। चौधरी अब्दुल ग़फूर सुरूर शायद इस कारण से रुक गए कि कुछ और पत्र मिल जाएँ। इस बात का अभी तक पता नहीं चला कि किस तरह मुंशी गुलाम ग़ौस ख़ाँ बेखबर ने ग़ालिब के पन्नों को छापने की आज्ञा ले ली। बल्कि बेख़बर की फरमाइश के अनुसार ग़ालिब ने अपने कुछ दोस्तों और शिष्यों को लिखकर अपने पत्रों की नकलें उनको भेजीं। ग़ालिब ने पत्रों के छापने की इजाज़त तो दे दी थी, परंतु वह चाहते यह थे कि इस संग्रह में उनके निजी पत्र शामिल न किए जाएँ।

इन ख़तों के बाद ग़ालिब के शेरों पर नज़र दौड़ा लिया जाए। यह तो सबपे जाहिर है कि ग़ालिब के शेर ख़तों से भी ज्यादा जानलेवा हैं:

बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना

हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब'
जिसकी क़िस्मत में हो आशिक़ का गिरेबां होना


ग़ालिब के ख़त हुए, एक-दो शेर हो गए तो फिर आज की गज़ल क्योंकर पीछे रहे। तो आप सबों की खिदमत में पेश है "नक़्श फ़रियादी" एलबम से "मेहदी हसन" और "तरन्नुम नाज़" की आवाज़ों में ग़ालिब की यह सदाबहार गज़ल। गज़ल सुनाने से पहले हम इस बात का यकीन दिलाते चलें कि बस ग़ालिब हीं एक वज़ह हैं, जिस कारण से हम हर कड़ी में दूसरे फ़नकारों( जैसे कि यहाँ पर तरन्नुम नाज़) के बारे में कुछ बता नहीं पा रहे, क्या करें ग़ालिब से छूटें तो और कहीं ध्यान जाए, हाँ लेकिन एकबारगी ग़ालिब पर श्रृंखला खत्म होने दीजिए फिर हम रही सही सारी कसर पूरी कर देंगे। फिर भी अगर आपको कोई शिकायत हो तो टिप्पणियों के माध्यम से हमें इसकी जानकारी दें और अगर शिकायत न हों तो ऐसे हीं लुत्फ़ उठाते रहें। क्या ख्याल है?:

कब से हूँ क्या बताऊँ जहां-ए-ख़राब में
शब-हाए-हिज्र को भी रखूँ गर हिसाब में

ता फिर न इन्तज़ार में नींद आये उम्र भर
आने का ___ कर गये आये जो ख़्वाब में

मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ए-जाम
साक़ी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में

’ग़ालिब' छूटी शराब, पर अब भी कभी-कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तालीम" और शेर कुछ यूँ था-

पर्तौ-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

बहुत दिनों के बाद किसी ने सीमा जी को पछाड़ा। शरद जी "शान-ए-महफ़िल" बनने की बधाई स्वीकारें। और सीमा जी संभल जाईये.. आपसे मुकाबले के लिए शरद जी मैदान में उतर चुके हैं। यह रही शरद जी की पेशकश:

कहीं रदीफ़, कहीं काफ़िया, कहीं मतला,
शे’र के दाँव-पेच मक्ता-ओ-बहर क्या है ?
अगर मिले मुझे तालीम देने वाला कोई
तो देखना मैं बताऊंगा फिर ग़ज़ल क्या है ? (स्वरचित)

निर्मला जी और सुमित जी, महफ़िल में आने और प्रस्तुति पसंद करने के लिए आप दोनों का तह-ए-दिल से शुक्रिया।

मंजु जी बढिया लिखा है आपने। हाँ, शिल्प पर थोड़ा और काम कर सकती थीं आप, लेकिन कोई बात नहीं। ये रही आपकी पंक्तियाँ:

उनकी निगाहों से तालीम का सबक लेते हैं पर ,
जीवन के पन्ने को भरने के लिए सागर - सी स्याही भी कम पड़ जाती है . (स्वरचित)

नीलम जी और शन्नो जी, आप दोनों के कारण महफ़िल रंगीन बन पड़ी है। अपना प्यार (और डाँट-डपट भी) इसी तरह बनाए रखिएगा। शन्नो जी, मैं कोई गुस्सैल इंसान नहीं जिससे आप इतनी डरती रहें। आप दोनों से बस यही दरख्वास्त है कि बातों के साथ-साथ(या फिर बातों से ज्यादा) शेरो-शायरी को तवज्जो दिया करें (यह एक दरख्वास्त है, धमकी मत मान लीजियेगा...और हाँ नाराज़ भी मत होईयेगा)। ये रहीं आप दोनों की पंक्तियाँ क्रम से: (पहले शन्नो जी, फिर नीलम जी)

हरफन मौला ने पूरी तालीम से रखी दूरी
दवाओं से भी पहचान थी उनकी अधूरी
नीम हकीम खतरे जान बनकर ही सही
एक दिन उन्होंने की अपनी तमन्ना पूरी. (स्वरचित)

तालीम तो देना पर इतना इल्म भी देना उनको
बुजुर्गों कोदिलसे सिजदे का शऊर भी देना उनको (स्वरचित)

सीमा जी, आपके आने के बाद हीं मालूम पड़ता है कि महफ़िल जवान है, इसलिए कभी नदारद मत होईयेगा। ये रहे आपके शेर:

मकतब-ए-इश्क़ ही इक ऐसा इदारा है जहाँ
फ़ीस तालीम की बच्चों से नहीं ली जाती. (मुनव्वर राना)

दुनिया में कहीं इनकी तालीम नहीं होती
दो चार किताबों को घर में पढ़ा जाता है (बशीर बद्र)

अवनींद्र जी, महफ़िल के आप नियमित सदस्य हो चुके हैं। यह हमारे लिए बड़ी हीं खुशी की बात है। ये रहीं आपकी स्वरचित पंक्तियाँ:

तालीम तो ली थी मगर शहूर न आया
संजीदगी से चेहरे पे कभी नूर न आया
तह पड गयी जीभ मैं कलमा रटते रटते
तहजीब का इल्म फिर भी हुज़ूर न आया (स्वरचित )

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 10, 2010

ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक.. उस्ताद बरकत अली खान की आवाज़ में इश्क की इन्तहा बताई ग़ालिब ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७४

क्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को,
तब जाके कहीं हम को ग़ालिब का ख़्याल आया ।
तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका,
अब अपने सुख़न परवर ज़हनों में सवाल आया ।

सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी,
अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है ।
उर्दू के ताल्लुक से कुछ भेद नहीं खुलता,
यह जश्न, यह हंगामा, ख़िदमत है कि साज़िश है ।

जिन शहरों में गुज़री थी, ग़ालिब की नवा बरसों,
उन शहरों में अब उर्दू बे नाम-ओ-निशां ठहरी ।
आज़ादी-ए-कामिल का ऎलान हुआ जिस दिन,
मातूब जुबां ठहरी, गद्दार जुबां ठहरी ।

जिस अहद-ए-सियासत ने यह ज़िन्दा जुबां कुचली,
उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का ग़म क्यों है ।
ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था,
उर्दू पे सितम ढा कर ग़ालिब पे करम क्यों है ।

ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने हैं,
कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएँ ।
जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते हैं,
मुमकिन है कि कुछ अर्सा, इस जश्न पर टल जाएँ ।

यह जश्न मुबारक हो, पर यह भी सदाकत है,
हम लोग हक़ीकत के अहसास से आरी हैं ।
गांधी हो कि ग़ालिब हो, इन्साफ़ की नज़रों में,
हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं ।

"जश्न-ए-ग़ालिब" नाम की यह नज़्म उर्दू के जानेमाने शायर "साहिर लुधियानवी" की है। यह नज़्म उन्होंने १९६८ में लिखी थी। गौरतलब है कि १९६८ में हीं तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन की देखरेख में एक समिति बनाई गई थी, जिसने यह निर्णय लिया था कि ग़ालिब की मृत्यु के सौ साल होने के उपलक्ष्य में अगले साल यानि कि १९६९ में एक ग़ालिब मेमोरियल की स्थापना की जाए। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को उस समिति की अध्यक्षा और फ़खरूद्दीन अली अहमद (जो कि १९७४ में देश के राष्ट्रपति बने) को उस समिति का सेक्रेटरी नियुक्त किया गया। समिति के प्रयासों के बाद १९६९ में तो नहीं लेकिन १९७१ में ग़ालिब इन्स्टीच्युट (ऐवान-ए-ग़ालिब) की स्थापना की गई जिसका उद्धाटन श्रीमती इंदिरा गाँधी ने किया था। इन्स्टीच्युट बन तो गया लेकिन लोगों को इसकी याद साल में एक या दो बार हीं आती है। बशीर बद्र साहब लिखते हैं कि यह इन्स्टीच्युट जिस उद्देश्य से बनाया गया था, वह उद्देश्य कहीं भी फ़लित होता नहीं दीखता... हाँ कभी-कभार मुशायरों का आयोजन हो जाता है, लेकिन उन मुशायरों का रंग शायराना होने से ज़्यादा बेमतलब के चमक-धमक से पुता दिखता है। "साहिर" साहब को इसी बात का अंदेशा था। तभी तो वो कहते हैं कि अगर ग़ालिब को याद करना हीं था तो इसमें २१ साल क्यों लगे। २१ साल तक किसी को यह याद नहीं रहा कि ग़ालिब उर्दू के सर्वश्रेष्ठ (अगर मीर को ध्यान में न रखा जाए क्योंकि ग़ालिब खुद को मीर से बहुत नीचे मानते थे) थे, हैं और रहेंगे, फिर उन्हें नवाज़नें में इतनी देर क्यों। यह महज़ एक खानापूर्ति तो नहीं। तभी तो वो कहते हैं कि पहले जिन गलियों में ग़ालिब बसते थे, वहाँ अब उर्दू कहाँ और फिर उर्दू को मारकर उर्दू के शायर को पहचानना कहाँ की समझदारी है, कहाँ का इंसाफ़ है। कहीं यह मुस्लिम कौम को खुश करने की एक सियासती चाल तो नहीं। साहिर का यह गुस्सा कितना जायज है, यह तो वही जानते हैं (या शायद हम भी जानते हैं, लेकिन खुलकर सामने आना नहीं चाहते), लेकिन इतना तो सच है हीं कि "ग़ालिब हो या गाँधी, इन्हें मारने वाले भी हम हीं हैं और पूजने वाले भी हम हीं हैं।"

साहिर ने तो बस उर्दू की बात की है, लेकिन आज जो हालात हैं उसमें हिन्दी की दुर्दशा भी कुछ कम नहीं। आज की अवाम अगर उर्दू के किसी शब्द का अर्थ न जाने तो यह कहा जा सकता है कि उर्दू अब स्कूलों में उतनी पढाई नहीं जाती, जितनी आजादी के वक्त या पहले पढी-पढाई जाती थी, लेकिन अगर किसी को हिन्दी का कोई शब्द मालूम न हो तो इसे आप क्या कहिएगा। कहने को हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है(वैसे कई लोग यह बात नहीं मानते, लेकिन दिल में सभी जानते हैं) लेकिन ऐसे कई सारे लोग हैं जो हिन्दी को रोमन लिपि में हीं पढ पाते है, देवनागरी पढने में उन्हें अपनी पिछली सात पुश्तें याद आ जाती हैं। तो कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आज इस देश में इसी देश की भाषाएँ (हिन्दी, उर्दू...) नकारी जाने लगी हैं, जो किसी भी भाषा के साहित्य और साहित्यकारों के लिए एक शाप के समान है। चलिए ग़ालिब और साहिर के बहाने हमने कई घावों को कुरेदा, कई ज़ख्मों को महसूस किया.. अब हम ज़रा ग़ालिब के इजारबंद की बात कर लें वो भी उर्दू के जानेमाने शायर निदा फ़ाज़ली के शब्दों में।

ग़ालिब म्यूज़ियम से निकलकर पुरानी दिल्ली की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुज़रकर मैं बल्लीमारान में सहमी सिमटी उस हवेली में पहुँच गया जहाँ ग़ालिब आते हुए बुढ़ापे में गई हुई जवानी का मातम कर रहे थे. इस हवेली के बाहर अंग्रेज़ दिल्ली के गली-कूचों में १८५७ का खूनी रंग भर रहे थे. ग़ालिब का शेर है -

हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ ‘ग़ालिब’ दुश्मन आसमाँ अपना


हवेली के बाहर के फाटक पर लगी लोहे की बड़ी सी कुंडी खड़खड़ाती है. ग़ालिब अंदर से बाहर आते हैं तो सामने अंग्रेज़ सिपाहियों की एक टोली नज़र आती है. ग़ालिब के सिर पर अनोखी सी टोपी, बदन पर कढ़ा हुआ चोगा और इसमें से झूलते हुए ख़ूबसूरत इज़ारबंद
को देखकर टोली के सरदार ने टूटी फूटी हिंदुस्तानी में पूछा, “तुमका नाम क्या होता?”
ग़ालिब - “मिर्जा असदुल्ला खाँ ग़ालिब उर्फ़ नौश.”
अंग्रेज़ -“तुम लाल किला में जाता होता था?”
ग़ालिब-“जाता था मगर-जब बुलाया जाता था.”
अंग्रेज़-“क्यों जाता होता था?”
ग़ालिब- “अपनी शायरी सुनाने- उनकी गज़ल बनाने.”
अंग्रेज़- “यू मीन तुम पोएट होता है?”
ग़ालिब- “होता नहीं, हूँ भी.”
अंग्रेज़- “तुम का रिलीजन कौन सा होता है?”
ग़ालिब- “आधा मुसलमान.”
अंग्रेज़- “व्हाट! आधा मुसलमान क्या होता है?”
ग़ालिब- “जो शराब पीता है लेकिन सुअर नहीं खाता.”
ग़ालिब की मज़ाकिया आदत ने उन्हें बचा लिया.

मैंने देखा उस रात सोने से पहले उन्होंने अपने इज़ारबंद में कई गाठें लगाई थीं. ग़ालिब की आदत थी जब रात को शेर सोचते थे तो लिखते नहीं थे. जब शेर मुकम्मल हो जाता था तो इज़ारबंद में एक गाँठ लगा देते थे. सुबह जाग कर इन गाठों को खोलते जाते थे और इस तरह याद करके शेरों को डायरी में लिखते जाते थे.

इज़ारबंद से ग़ालिब का रिश्ता अजीब शायराना था. इज़ारबंद दो फारसी शब्दों से बना हुआ एक लफ्ज़ है. इसमें इज़ार का अर्थ जामा होता है और बंद यानी बाँधने वाली रस्सी. औरतों के लिए इज़ारबंद में चाँदी के छोटे छोटे घुँघरु भी होते थे और इनमें सच्चे मोती भी टाँके जाते थे. लखनऊ की चिकन, अलीगढ़ की शेरवानी, भोपाल के बटुवों और राजस्थान की चुनरी की तरह ये इज़ारबंद भी बड़े कलात्मक होते थे। ये इज़ारबंद आज की तरह अंदर उड़स कर छुपाए नहीं जाते थे. ये छुपाने के लिए नहीं होते थे. पुरुषों के कुर्तों या महिलाओं के ग़रारों से बाहर लटकाकर दिखाने के लिए होते थे. पुरानी शायरी में ख़ासतौर से नवाबी लखनऊ में प्रेमिकाओं की लाल चूड़ियाँ, पायल, नथनी और बुंदों की तरह इज़ारबंद भी सौंदर्य के बयान में शामिल होता था। ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे।

ग़ालिब की बात हो गई और ग़ालिब के इज़ारबंद की भी। अब हम ग़ालिब के चंद शेरों पर नज़र दौड़ा लेते हैं:

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है
ताक़त-ए-बेदाद-ए-इन्तज़ार नहीं है

तू ने क़सम मयकशी की खाई है "ग़ालिब"
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है


ग़ालिब के इन शेरों के बाद अब वक्त है आज की गज़ल से रूबरू होने का। इस गज़ल को उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब के छोटे भाई और आज के दौर के महान फ़नकार गुलाम अली के गुरू उस्ताद बरकत अली खां साहब ने गाया है। बरकत अली साहब का जन्म १९०७ में हुआ था और १९६३ में जहां-ए-फ़ानी से उनकी रूख्सती हुई। उन्होंने ग़ालिब को बहुत गाया है। आज की यह गज़ल उनकी इसी बेमिसाल गायकी का एक प्रमाण है। बरकत साहब के बारे में फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। अभी तो मुहूर्त है ग़ालिब के शब्दों और बरकत साहब की आवाज़ में गोते लगाने का। तो तैयार हैं ना आप? :

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक

हम ने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक

पर्तौ-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की ____
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

ग़मे-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्म'अ हर रंग में जलती है सहर होने तक




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफ़िल में मैं गैर-हाज़िर था और सजीव जी आवाज़ के हीं दूसरे कामों में व्यस्त थे, इसलिए महफ़िल में नियमानुसार पिछली महफ़िल के साथी पेश नहीं हो सका। इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। इस महफ़िल से मैं वापस आ चुका हूँ और इस कारण हर चीज ढर्रे पर वापस आ गई है। तो लुत्फ़ लें पिछली महफ़िल की टिप्पणियों का।

पिछली महफिल का सही शब्द था "आस्ताँ" और शेर कुछ यूँ था-

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाये क्यूँ

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की सीमा जी ने। सीमा जी आपने ये सारे बेश-कीमती शेर पेश किए:

हर आस्ताँ पे अपनी जबीने-वफ़ा न रख
दिल एक आईना है इसे जा-ब-जा न रख (लाल चंद प्रार्थी 'चाँद' कुल्लुवी )

वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संग-ए-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यों हो (ग़ालिब)

कोई जबीं न तेरे संग-ए-आस्ताँ पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्द पे अएतमाद् करे
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि तुझ को याद आये (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ )

शरद जी, आपके ये दोनों शेर कमाल के हैं। ख्वातीन-ओ-हज़रात गौर फ़रमाएँगे:

शऊरे सजदा नहीं है मुझको तो मेरे सजदों की लाज रखना ।
ये सर तेरे आस्ताँ से पहले किसी के आगे झुका नहीं है । (शायर पता नहीं)

मै तेरे आस्ताँ के सामने से क्यों गुज़रूँ
जब नहीं सीढियाँ , तू छत पे कैसे आएगी।

निर्मला जी, दिनेश जी, सतीश जी, अरविंद जी... आप सभी का इस महफ़िल में तह-ए-दिल से स्वागत है। उम्मीद करता हूँ कि आपको हमारी महफ़िल पसंद आई होगी इसलिए इल्तज़ा करता हूँ कि आगे भी अपनी उपस्थिति बनाए रखिएगा। एक बात और.. हमारी महफ़िल में खाली हाथ नहीं आते.... मतलब कि एकाध शेर की नवाजिश तो करनी हीं होगी। क्या कहते हैं आप? :)

शन्नो जी.. सुमित जी और नीलम जी आपके जिम्मा हैं। इनमें से कोई भी गैर-हाज़िर रहा तो आपकी हीं खबर ली जाएगी :) चलिए इस बार सुमित जी आ गए हैं, अब दूसरे यानि कि नीलम जी की फ़िक्र कीजिए। बातों-बातों में आपकी पंक्तियाँ तो भूल हीं गया:

ना वो हर चमन का फूल थी
ना वो किसी रास्ते का धूल थी
ना थी वीराने में कोई आस्ताँ
वो थी गुजर गयी एक दास्ताँ। (स्वरचित.. मैने कुछ बदलाव किए हैं, जो मुझे सही लगे :) )

शामिख जी, आखिरकार आप को हमारी महफ़िल की याद आ हीं गई। चलिए कोई बात नहीं.. देर आयद दुरूस्त आयद। ये रहे आपके शेर:

ता अर्ज़-ए-शौक़ में न रहे बन्दगी की लाग
इक सज्दा चाहता हूँ तेरी आस्तां से दूर (फ़ानी बदायूँनी)

शाख़ पर खून-ऐ-गुल रवाँ है वही,
शोखी-ऐ-रंग-गुलिस्तान है वही,
सर वही है तो आस्तां है वही (अनाम)

सुमित जी, महफ़िल में आते रहिएगा नहीं तो शन्नो जी की छड़ी चल जाएगी.. हा हा हा। यह रहा आपका शेर:

फिर क्यूँ तलाश करे कोई और आस्ताँ,
वो खुशनसीब जिसको तेरा आस्ताँ मिले। (अनाम)

अवनींद्र जी, हमें पता नहीं था कि आप इस कदर कमाल लिखते हैं। आपके ये दोनों दो-शेर (चार पंक्तियाँ) खुद हीं इस बात के गवाह हैं:

मेरे कांधे से अपना हाथ उठा ले ऐ दोस्त
इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाऊंगा ......!!
मेरी आस्तां से तुम चुप चाप गुजर जाना
हाल जो पूछ लिया मेरा तो मर जाऊंगा ( स्वरचित )

रूह से लिपटे हुए सितम उठ्ठे
आँखों में लिए जलन उठ्ठे
ओढ़ के आबरू पे कफ़न उठ्ठे
यूँ तेरी आस्तां से हम उठ्ठे (स्वरचित )

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 3, 2010

रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ.. नूरजहां की काँपती आवाज़ में मचल पड़ी ग़ालिब की ये गज़ल

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७३

लाजिम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और,
तनहा गये क्यों अब रहो तनहा कोई दिन और।

ग़ालिब की ज़िंदगी बड़ी हीं तकलीफ़ में गुजरी और इस तकलीफ़ का कारण महज़ आर्थिक नहीं था। हाँ आर्थिक भी कई कारण थे, जिनका ज़िक्र हम आगे की कड़ियों में करेंगे। आज हम उस दु:ख की बात करने जा रहे हैं, जो किसी भी पिता की कमर तोड़ने के लिए काफ़ी होता है। ग़ालिब पर चिट्ठा(ब्लाग) चला रहे अनिल कान्त इस बारे में लिखते हैं:
ग़ालिब के सात बच्चे हुए पर कोई भी पंद्रह महीने से ज्यादा जीवित न रहा. पत्नी से भी वह हार्दिक सौख्य न मिला जो जीवन में मिलने वाली तमाम परेशानियों में एक बल प्रदान करे. इनकी पत्नी उमराव बेगम नवाब इलाहीबख्शखाँ 'मारुफ़’ की छोटी बेटी थीं. ग़ालिब की पत्नी की बड़ी बहन को दो बच्चे हुए जिनमें से एक ज़ैनुल आब्दीनखाँ को ग़ालिब ने गोद ले लिया था.

वह बहुत अच्छे कवि थे और 'आरिफ' उपनाम रखते थे. ग़ालिब उन्हें बहुत प्यार करते थे और उन्हें 'राहते-रूहे-नातवाँ' (दुर्बल आत्मा की शांति) कहते थे. दुर्भाग्य से वह भी भरी जवानी(३६ साल की उम्र) में मर गये. ग़ालिब के दिल पर ऐसी चोट लगी कि जिंदगी में उनका दल फिर कभी न उभरा. इस घटना से व्यथित होकर उन्होंने जो ग़ज़ल लिखी उसमें उनकी वेदना साफ़ दिखाई देती है. कुछ शेर :

आये हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊँ,
माना कि नहीं आज से अच्छा कोई दिन और।
जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे,
क्या ख़ूब? क़यामत का है गोया कोई दिन और।
दिल पर पड़ती और पड़ चुकी कई सारी चोटों की वज़ह से ग़ालिब अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव के आते-आते अपनी मौत की दुआएँ करने लगे थे। हर साल अपनी मौत की तारीख निकाला करते थे और यह देखिए कि हर साल वह तारीख गलत साबित हो जाती थी। एक बार ऐसी हीं किसी तारीख का ज़िक्र जब उन्होंने अपने एक शागिर्द से किया तो शागिर्द के मुँह से बरबस हीं यह निकल पड़ा कि "इंशा अल्लाह, यह तारीख भी ग़लत साबित होगी।" लाख ग़मों में गर्त होने के बावजूद ग़ालिब अपने मजाकिया लहज़े से कहाँ बाज़ आने वाले थे। फिर ग़ालिब ने भी कह डाला कि "देखो साहब! तुम ऐसी फ़ाल मुँह से न निकालो। अगर यह तारीख ग़लत साबित हुई तो मैं सिर फोड़कर मर जाउँगा।" इसे कहते हैं मौत में ज़िंदगी के मज़े लेना या फिर मौत के मज़े लेना। अब जबकि मौत की हीं बात निकल पड़ी है तो क्यों न एक और वाकये का ज़िक्र कर दिया जाए। एक बार जब दिल्ली में महामारी पड़ी तो ग़ालिब के मित्र मीर मेहदी हसन ’मज़रूह’ ने उनका हाल जानने के लिए उन्हें खत लिखा। ग़ालिब ने महामारी की बात तो की लेकिन महामारी को महामारी मानने से इंकार करते हुए यह जवाब भेजा कि "भई, कैसी वबा? जब एक सत्तर बरस के बुड्ढे और सत्तर बरस की बुढ़िया को न मार सकी।" जवाब पढकर मज़रूह लाजवाब हो गए। यह थी ग़ालिब की अदा जो गमों को भी सकते में डाल देती थी कि भाई हमने किससे पंगा लिया है।

ग़ालिब ने अपने इस हालात पर कई सारे शेर कहे हैं। अपनी ज़िंदगी के अंतिम दिनों में ग़ालिब अपने एक शेर का यह मिसरा गुनगुनाया करते थे:
ऐ मर्गे-नागहाँ ! तुझे क्या इंतज़ार है ?

ग़ालिब के गमों की बातें तो हो गईं, अब क्यों न ग़ालिब की हाज़िर-जवाबी की बात कर ली जाए। ग़ालिब अव्वल दर्ज़े के हाज़िर-जवाब थे। मौके को परखना और संभालना उन्हें खूब आता था और संभालते वो भी कुछ इस तरह थे कि सामने वाले को इसकी भनक भी नहीं लगती थी। इस बारे में उस्ताद ज़ौक़ से जुड़ा एक किस्सा हम आपसे बाँटना चाहेंगे जिसे गुलज़ार साहब ने बड़ी हीं खूबसूरती से अपने सीरियल "मिर्ज़ा ग़ालिब" में पेश किया है। यह तो सबको पता है कि ग़ालिब और ज़ौक़ में एक अनबन-सी ठनी रहती थी। तो हुआ यूँ कि:

उस्ताद ज़ौक़ की पालकी मिर्ज़ा के पास गुज़री। उनके मुलाज़िम पालकी के पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। ग़ालिब ने पालकी देखकर तंज़ किया।

हुआ है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता।

ग़ालिब के पास खड़े दो-एक अशख़ास ने दाद दी। "वाह-वाह... मिर्ज़ा मुकर्रर- इरशाद फ़रायें।" पास खड़े लोगों ने मिसरा दोहराया।

उस्ताद ज़ौक़ जब अपनी हवेली पहुँचे तो वे ग़ालिब की फ़िकरेबाज़ी पर काफ़ी नाराज़ थे। उनके सारे शागिर्दों ने अपने-अपने अंदाज़ में नाराज़गी ज़ाहिर की। बातचीत के बाद यह निर्णय लिया गया कि इस वाकये का ज़िक्र बहादुरशाह ज़फ़र से की जाए और किसी भी तरह ग़ालिब को किले में बुलाया जाए। एक शागिर्द ने कहा - "आती जुमेरात मुशायरा है।" दूसरे ने कहा- "बुलवा लीजिए किले में। मट्टी पलीद करके भेजेंगे।" आखिरकार ग़ालिब को दावतनामा भेजा गया।

कि़ले के अंदर- मुशायरे की शाम थी। शायरों में ज़ौक़ के बग़ल में वली और ज़फ़र, ग़ालिब, मुफ़ती वग़ैरह बैठे थे। ज़फ़र ने मुशायरा शुरू होने से पहले हाज़रीन की तरफ़ देखकर कहा -
"हम मश्कुर हैं उन तमाम शोरा और उन सुख़नवर हज़रात के जो आज के मुशायरे में शरीक हो रहे हैं। लेकिन मुशायरे के इफ़तता होने से पहले हम एक बात वाज़य कर देना चाहते हैं कि कुछ शोरा हज़रात शायद हमारे उस्ताद शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ से नालां हैं और सरेराह उनपर जुमले कसते हैं, जो उनके अपने वक़ार को ज़ेब नहीं होता। हम चाहते हैं कि वह ऐसा न करें और आइंदा बाहमी आपसी आदाब-ओ इख़लाक़ की पाबंदी में रहें।"

ग़ालिब समझ गए कि बात किसकी हो रही है। ’यास’ ने सामने आकर ग़ालिब पर वार किया - "मिर्ज़ा नौशा ने सरेराह उस्ताद की शान में जुमला कसा और कहा।" सभी ग़ालिब की तरह देखने लगे। आज़रदा ने पूछा - "क्या कहा.... " ’यास’ ने वह मिसरा दुहरा दिया।

ज़फ़र ने सीधे ग़ालिब से मुख़ातिब होकर पूछा- "क्या यह सच है मिर्ज़ा नौशा?"
ग़ालिब ने इक़बाले जुर्म किया- "जी हुजूर, सच है| मेरी गज़ल के मक़ता का मिसरा-उला(पहली पंक्ति) है।" नाज़रीन चौकन्न हो गए।
आज़रदा ने पूछा- "मक़्ता इरशाद फ़रमायेंगे आप?"

ग़ालिब ने अबु ज़फ़र की तरफ़ देखा, एक लंबी साँस ली और शेर पूरा किया-

वगरना शहर में ’ग़ालिब’ की आबरू क्या है।

अब याद के चौंकने की बारी थी। आज़रदा ने बेअख्तियार दाद दी। ज़फ़र ने ज़ौक़ की तरफ़ देखा। ज़ौक़ ने बात आगे बढाई - "अगर मक़्ता इतना ख़ूबसूरत है तो पूरी गज़ल क्या होगी, सुनी जाए।"
ज़फ़र ने ग़ालिब से गुजारिश की - "मिर्ज़ा अगर ज़हमत न हो तो पूरी गज़ल सुनाएँ। आज के मुशायरे का आगाज इसी गज़ल से किया जाए।"
रावी ने एलान किया- "शमा महफ़िल असद उल्लाह ख़ान ग़ालिब के सामने लाई जाती है।"

मिर्ज़ा ने जेब टटोली, काग़ज़ निकालकर उँगलियों में रखा और तरन्नुम से अपनी गज़ल पेश की-
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है।

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख से हीं न टपका तो फिर लहू क्या है।


मुशायरे में नई जान आ गई। चारों तरफ़ मिर्ज़ा ग़ालिब की वाह-वाह होने लगी} ख़ुद अबु जफ़र भी दाद देते रहे। ज़ौक़ भी इस शेर पर दाद दिये बगैर न रह सके।
मुफ़ती सदरूद्दीन ग़ालिब के पास हीं बैठे थे। उन्होंने झुककर ग़ालिब के सामने काग़ज़ पर लिखी गज़ल को देखा। काग़ज़ बिलकुल कोरा। उधर नाज़रीन वाह-वाह कर रहे थे। मुकर्रर-मुकर्रर... की आवाज़ें आ रहीं थीं।

यूँ हीं नहीं लोग ग़ालिब के अंदाज़-ए-बयाँ की कद्र करते हैं, मिसालें देते हैं। अगर आपको अब तक यकीन न आया हो तो इन दो शेरों पर जरा गौर कर लें:

मौत का एक दिन मु'अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती


ग़ालिब के बारे में आज बहुत कुछ कहा और बहुत कुछ सुना और अब महफ़िल-ए-गज़ल की रवायतों को मद्देनज़र रखते हुए ग़ालिब की गज़ल सुनने का वक़्त हो चला है। आज की गज़ल जिस फ़नकारा की आवाज़ में है, वो किसी भी नाम की मोहताज़ नहीं हैं। हम इनके ऊपर पहले भी एक कड़ी पेश की थी जिसमें हमने इन्हें तफ़शील से जाना था। जी हाँ, आपने सही पहचाना हम मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की बात कर रहे हैं। तो लीजिए पेश है नूरजहाँ की आवाज़ में यह गज़ल जिसे हमने उनके एलबम "ज़मीन" से लिया है:

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आये क्यूँ
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं ____ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाये क्यूँ

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यूँ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफ़िल में जिन श्रोताओं ने हिस्सा लिया उन सब का आभार, आज हम समय की कमी के चलते सब के नाम के साथ चर्चा नहीं कर पा रहे हैं, माफ़ी चाहेंगें, पर अगली बार दुगनी बातचीत होगी ये वादा है

खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, February 24, 2010

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है.. ग़ालिब के दिल से पूछ रही हैं शाहिदा परवीन

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७२

पूछते हैं वो कि "ग़ालिब" कौन है,
कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या

अब जबकि ग़ालिब खुद हीं इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं कि ग़ालिब को जानना और समझना इतना आसान नहीं तभी तो वो कहते हैं कि "हम क्या बताएँ कि ग़ालिब कौन है", तो फिर हमारी इतनी समझ कहाँ कि ग़ालिब को महफ़िल-ए-गज़ल में समेट सकें.. फिर भी हमारी कोशिश यही रहेगी कि इन दस कड़ियों में हम ग़ालिब और ग़ालिब की शायरी को एक हद तक जान पाएँ। पिछली कड़ी में हमने ग़ालिब को जानने की शुरूआत कर दी थी। आज हम उसी क्रम को आगे बढाते हुए ग़ालिब से जुड़े कुछ अनछुए किस्सों और ग़ालिब पर मीर तक़ी मीर के प्रभाव की चर्चा करेंगे। तो चलिए पहले मीर से हीं रूबरू हो लेते हैं। सौजन्य: कविता-कोष

मोहम्मद मीर उर्फ मीर तकी "मीर" (१७२३ - १८१०) उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। मीर का जन्म आगरा मे हुआ था। उनका बचपन अपने पिता की देख रेख मे बीता। पिता के मरणोपरांत ११ की वय मे वो आगरा छोड़ कर दिल्ली आ गये। दिल्ली आ कर उन्होने अपनी पढाई पूरी की और शाही शायर बन गये। अहमद शाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले के बाद वह अशफ-उद-दुलाह के दरबार मे लखनऊ चले गये। अपनी ज़िन्दगी के बाकी दिन उन्होने लखनऊ मे ही गुजारे।

अहमद शाह अब्दाली और नादिरशाह के हमलों से कटी-फटी दिल्ली को मीर तक़ी मीर ने अपनी आँखों से देखा था। इस त्रासदी की व्यथा उनके कलामो मे दिखती है, अपनी ग़ज़लों के बारे में एक जगह उन्होने कहा था-

हमको शायर न कहो मीर कि साहिब हमने
दर्दो ग़म कितने किए जमा तो दीवान किया

मीर का ग़ालिब पर इस कदर असर था कि ग़ालिब ने इस बात की घोषणा कर दी थी कि:

’ग़ालिब’ अपना ये अक़ीदा है बकौल-ए-’नासिख’,
आप बे-बहरा हैं जो मो’तक़िद-ए-मीर नहीं।

यानि कि नासिख (लखनऊ के बहुत बड़े शायर शेख इमाम बख्श ’नासिख’) के इन बातों पर मुझे यकीन है कि जो कोई भी मीर को शायरी का सबसे बड़ा उस्ताद नहीं मानता उसे शायरी का "अलिफ़" भी नहीं मालूम।

ग़ालिब मीर के शेरों की कहानी इस तरह बयां करते हैं:

मीर के शेर का अह्‌वाल कहूं क्या ’ग़ालिब’
जिस का दीवान कम अज़-गुलशन-ए कश्मीर नही

ग़ालिब को जब कभी खुद पर और खुद के लिखे शेरों पर गुमां हो जाता था, तो खुद को आईना दिखाने के लिए वो यह शेर गुनगुना लिया करते थे:

रेख्ते के तुम हीं उस्ताद नहीं हो ’ग़ालिब’
कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था

और इसी ग़ालिब के बारे में मीर का मानना था कि:

अगर इस लड़के को कोई कामिल उस्ताद मिल गया और उसने इसे सीधे रास्ते पर डाल दिया, तो लाजवाब शायर बनेगा, वरना मोहमल (अर्थहीन) बकने लगेगा।

वैसे शायद हीं आपको यह पता हो कि भले हीं मीर लखनऊ के और ग़ालिब दिल्ली के बाशिंदे माने जाते हैं लेकिन दोनों का जन्म अकबराबाद (आगरा) में हुआ था। हो सकता है कि यही वज़ह हो जिस कारण से ग़ालिब मीर के सबसे बड़े भक्त साबित हुए। ग़ालिब और मीर की सोच किस हद तक मिलती-जुलती थी इस बात का नमूना इन शेरों को देखने से मिल जाता है:

मीर:

होता है याँ जहाँ मैं हर रोज़ोशब तमाशा,
देखो जो ख़ूब तो है दुनिया अजब तमाशा ।

ग़ालिब :

बाज़ीचए इत्फाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे ।

मीर :

बेखुदी ले गयी कहाँ हमको,
देर से इंतज़ार है अपना ।

ग़ालिब :

हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी,
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती ।

मीर :

इश्क उनको है जो यार को अपने दमे-रफ्तन,
करते नहीं ग़ैरत से ख़ुदा के भी हवाले ।

ग़ालिब :

क़यामत है कि होवे मुद्दई का हमसफ़र 'ग़ालिब',
वह क़ाफिर जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाय है मुझसे ।

उर्दू-साहित्य को मीर और ग़ालिब से क्या हासिल हुआ, इस बारे में अपनी पुस्तक "ग़ालिब" में रामनाथ सुमन कहते हैं:जिन कवियों के कारण उर्दू अमर हुई और उसमें ‘ब़हारे बेख़िज़ाँ’ आई उनमें मीर और ग़ालिब सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। मीरने उसे घुलावट, मृदुता, सरलता, प्रेम की तल्लीनता और अनुभूति दी तो ग़ालिब ने उसे गहराई, बात को रहस्य बनाकर कहने का ढंग, ख़मोपेच, नवीनता और अलंकरण दिये।

मीर के बारे में इतना कुछ जान लेने के बाद यह बात तो ज़ाहिर हीं है कि ग़ालिब पर मीर ने जबरदस्त असर किया था। लेकिन मीर से पहले भी कोई एक शायर थे जिन्होंने ग़ालिब को शायरी के रास्ते पर चलना सिखाया था.. वह शायर कौन थे और वह रास्ता ग़ालिब के लिए गलत क्यों साबित हुआ, इस बात का ज़िक्र प्रकाश पंडित अपनी पुस्तक "ग़ालिब और उनकी शायरी" में इस तरह करते हैं:अपने फ़ारसी भाषा तथा साहित्य के विशाल अध्ययन और ज्ञान के कारण ग़ालिब को शब्दावली और शे’र कहने की कला में ऐसी अनगनत त्रुटियाँ नज़र आईं, मस्तिष्क एक टेढ़ी रेखा और एक-प्रश्न बन गया और उन्होंने उस्तादों पर टीका-टिप्पणी शुरू कर दी। उनका मत था कि हर पुरानी लकीर सिराते-मुस्तकीम सीधा-मार्ग) नहीं है और अगले जो कुछ कह गए हैं, वह पूरी तरह सनद (प्रमाणित बात) नहीं हो सकती। अंदाजे-बयां (वर्णन शैली) से नज़र हटाकर और अपना अलग हीं अंदाज़े-बयां अपनाकर जब विषय वस्तु की ओर देखा तो वहाँ भी वही जीर्णता नज़र आई। कहीं आश्रय मिला तो ‘बेदिल’ (एक प्रसिद्ध शायर) की शायरी में जिसने यथार्थता की कहीं दीवारों की बजाय कल्पना के रंगों से अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर रखी थी। ‘ग़ालिब’ ने उस दीवार की ओर हाथ बढ़ाया तो उसके रंग छूटने लगे और आँखों के सामने ऐसा धुँधलका छा गया कि परछाइयाँ भी धुँधली पड़ने लगीं, जिनमें यदि वास्तविक शरीर नहीं तो शरीर के चिह्न अवश्य मिल जाते थे। अतएव बड़े वेगपूर्ण परन्तु उलझे हुए ढंग से पच्चीस वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने लगभग २००० शे’र ‘बेदिल’ के रंग में कह डाले। मीर के यह कहने पर कि अगर सही उस्ताद न मिला तो यह अर्थहीन शायर बन जाएगा, ग़ालिब ने खुद में हीं वह उस्ताद ढूँढ निकाला। ग़ालिब की आलोचनात्मक दृष्टि ने न केवल उस काल के २००० शे’रों को बड़ी निर्दयता से काट फेंकने की प्रेरणा दी बल्कि आज जो छोटा-सा ‘दीवाने-ग़ालिब’ हमें मिलता है और जिसे मौलाना मोहम्मद हुसैन ‘आज़ाद’ (प्रसिद्ध आलोचक) के कथनानुसार हम ऐनक की तरह आँखों से लगाए फिरते हैं, उसका संकलन करते समय ‘ग़ालिब’ ने हृदय-रक्त से लिखे हुए अपने सैकड़ों शे’र नज़र-अंदाज़ कर दिए थे। तो यह था ग़ालिब के समर्पण का एक उदाहरण.. ग़ालिब की नज़रों में बुरे शेरों का कोई स्थान नहीं था, इसीलिए तो उन्होंने कत्ल करते वक्त अपने शेरों को भी नहीं बख्शा..

ग़ालिब किस कदर स्वाभिमानी थे, इसकी मिसाल पेश करने के लिए इस घटना का ज़िक्र लाजिमी हो जाता है:

१८५२ में जब उन्हें दिल्ली कॉलेज में फ़ारसी के मुख्य अध्यापक का पद पेश किया गया और अपनी दुरवस्था सुधारने के विचार से वे टामसन साहब (सेक्रेट्री, गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया) के बुलावे पर उनके यहाँ पहुँचे, तो यह देखकर कि उनके स्वागत को टामसन साहब बाहर नहीं आए, उन्होंने कहारों को पालकी वापस ले चलने के लिए कह दिया(ग़ालिब जहाँ कहीं जाते थे चार कहारों की पालकी में बैठकर जाते थे।) टामसन साहब को सूचना मिली तो बाहर आए और कहा कि चूँकि आप मुलाक़ात के लिए नहीं नौकरी के लिए आए हैं इसलिए कोई स्वागत को कैसे हाज़िर हो सकता है ? इसका उत्तर मिर्ज़ा ने यह दिया कि मैं नौकरी इसलिए करना चाहता हूँ कि उससे मेरी इज़्ज़त में इज़ाफा हो, न कि जो पहले से है, उसमें भी कमी आ जाए। अगर नौकरी के माने इज़्ज़त में कमी आने के हैं, तो ऐसी नौकरी को मेरा दूर ही से सलाम ! और सलाम करके लौट आए।

ग़ालिब के बारे में बातें तो होती हीं रहेंगी। क्यों न हम आगे बढने से पहले इन शेरों पर नज़र दौड़ा लें:

इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दिल की दवा करे कोई (सीधे-सीधे खुदा पर सवाल दागा है ग़ालिब ने)

जब तवक़्क़ो ही उठ गयी "ग़ालिब"
क्यों किसी का गिला करे कोई


और अब पेश है आज की वह गज़ल जिसके लिए हमने महफ़िल सजाई है। इस गज़ल में अपनी आवाज़ से चार चाँद लगाया है जानीमानी फ़नकारा शाहिदा परवीन ने। शाहिदा जी के बारे में हमने इस कड़ी में बहुत सारी बातें की थीं। मौका हो तो जरा उधर से भी घुमकर आ जाईये। तब तक हम दिल-ए-नादाँ को दर्द से लड़ने की तरकीब बताए देते हैं। ओहो.. आ भी गए आप.... तो तैयार हो जाईये दर्द से भरी इस गज़ल को महसूस करने के लिए। इस गज़ल में जिस चोट का ज़िक्र हुआ है, उसे समझने के लिए दिल चाहिए.... और महफ़िल-ए-गज़ल में आए मुसाफ़िर बे-दिल तो नहीं!!:

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुश्ताक़ और वो ___
या इलाही ये माजरा क्या है

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

हाँ भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है

मैंने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "ख़लिश" और शेर कुछ यूँ था:

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

ग़ालिब के दिल की खलिश को सबसे पहले ढूँढ निकाला सीमा जी ने। आपने इस शब्द पर ये सारे शेर पेश किए:

ये किस ख़लिश ने फिर इस दिल में आशियाना किया
फिर आज किस ने सुख़न हम से ग़ायेबाना किया (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ )

ख़लिश के साथ इस दिल से न मेरी जाँ निकल जाये
खिंचे तीर-ए-शनासाई मगर आहिस्ता आहिस्ता (परवीन शाकिर )

गिला लिखूँ मैं अगर तेरी बेवफ़ाई का
लहू में ग़र्क़ सफ़ीना हो आशनाई का
ज़बाँ है शुक्र में क़ासिर शिकस्ता-बाली के
कि जिनने दिल से मिटाया ख़लिश रिहाई का (सौदा )

शरद जी, अगर ग़ालिब आज ज़िंदा होते और उनकी नज़र आपके इस शेर पर जाती तो यकीनन उनके मुँह से वाह निकल जाता। चलिए ग़ालिब की कमी हम पूरा कर देते हैं... वाह! क्या खूब कहा है आपने...

जाने रह रह के मेरे दिल में खलिश सी क्यूं है
आज क्या बे-वफ़ा ने फिर से मुझे याद किया ?

जैन साहब.. बड़ी हीं दिलचस्प और काबिल-ए-गौर बात कह डाली आपने। वैसे भी इश्क में इलाज वही करता है जो रोग दे जाता है..फिर उस चारागर से हीं खलिश छुपा जाना तो खुद के हीं पाँव पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर होगा। है ना? यह रहा आपका शेर:

वाकिफ नहीं थे हम तो तौर-ए-इश्क से
चारागर से भी खलिश-ए-जिगर छुपा बैठे

सुमित जी... शायर से वाकिफ़ कराने का शुक्रिया। आपकी यह बात अच्छी है कि आप अगर महफ़िल से जाते हैं तो फिर शेर लेकर लौटते जरूर हैं। लेकिन यह क्या इस बार भी शायर का नाम गायब.. अगर आपने खुद लिखा है तो स्वरचित का मोहर हीं लगा देते:

वो ना आये तो सताती है खलिश सी दिल को,
वो जो आ जाए तो खलिश और जवां होती है

शन्नो जी, शेर कहना बड़ी बात है.. शेर कैसा है और किस अंदाज़-ओ-लहजे में लिखा है इस बारे में फिक्र करने का क्या फ़ायदा। जो भी मन में आए लिखते जाईये.. यह रही आपकी पेशकश:

मेरे दोस्त के दिल में आज कोई खलिश सी है
लगता है कोई खता हो गयी मुझसे अनजाने में

नीलम जी, चलिए शन्नो जी के कहने पर आपको अपनी महफ़िल याद तो आई। अब आ गई हैं तो लौटने का ज़िक्र भी मत कीजिएगा। एक बात और... अगली बार आने पर कुछ शेर भी समेट लाईयेगा।

अवनींद्र साहब.. महफ़िल आपकी हीं है। इसमें इज़्ज़त देने और न देने का सवाल हीं नहीं उठता। ये रहे आपके लिखे कुछ शेर:

तेरी खलिश सीने मैं इस तरह समायी है
सांस ली जब भी हमने आंख भर आई है !!

चश्मे - नम औ मेरी तन्हाई की धूप तले
खिल रहे हैं तेरी खलिश के सफ़ेद गुलाब

मंजु जी, आपने खुद का लिखा शेर पेशकर महफ़िल की शमा बुझाई। इसके लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया। यह रहा वह शेर:

एक शाम आती है तेरे मिलन का इन्तजार लिए ,
वही रात जाती है विरह की खलिश दिए

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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