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Thursday, May 12, 2011

चेहरे से जरा आँचल जो आपने सरकाया....एक प्रेम गीत जिसमें हँसी भी है और अदा भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 655/2011/95

'गान और मुस्कान' शृंखला में इन दिनों आप सुन रहे हैं कुछ ऐसी फ़िल्मी रचनाएँ जिनमें गायक की हँसी सुनाई पड़ती है। गायिका आशा भोसले के गायकी के कई आयाम हैं, हर तरह के गीत गाने में वो सक्षम हैं, गायन की कोई ऐसी विधि नहीं जिसको उन्होंने आज़माया न हो। शास्त्रीय, पाश्चात्य, भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली, देशभक्ति, मुजरा, शरारती, सेन्सुअस, लोक-संगीत आधारित, हर वर्ग में उन्होंने शीर्ष पर अपने आप को पहुँचाया है। उनकी आवाज़ में जो लोच है, जो खनक है, जो शोख़ी है, वही उनको दूसरी गायिकाओं से अलग करती हैं। गायन तो गायन, उनकी हँसी भी कातिलाना है। आशा जी नें भी बहुत से गीतों में अपनी हँसी बिखेरी है, जिनमें से कुछ गीत छेड़-छाड़ वाले हैं, तो कुछ हल्के फुल्के रोमांटिक कॉमेडी वाले, कुछ सेन्सुअस या मादक, और कुछ गीत ऐसे भी हैं जिनमें वो खुले दिल से हँसती हैं, और ऐसी हँसी हैं कि सुनने वाला भी कुछ देर के लिए अपने सारे ग़म भूल जाये! ऐसा ही एक गीत है १९७२ की फ़िल्म 'एक बार मुस्कुरा दो' का, जिसमें उनसे अनुरोध तो किया जा रहा है मुस्कुराने की, पर वो हँसती हैं, पूरे खुले दिल से हँसती हैं। मुकेश के साथ गाया यह युगल गीत इस फ़िल्म का शीर्षक गीत भी है। "चेहरे से ज़रा आंचल जब आपने सरकाया, दुनिया ये पुकार उठी लो चांद निकल आया"; नायक का नायिका की ख़ूबसूरती की तारीफ़ फ़िल्मी गीतों की एक प्रचलित शैली रही है और यह गीत भी उन्हीं में से एक है।

'एक बार मुस्कुरा दो' फ़िल्म के संगीतकार थे ओ. पी. नय्यर। ओ. पी. नय्यर की पहली पसंद हमेशा मोहम्मद रफ़ी ही रहे हैं, लेकिन जब दोनों में कुछ अन-बन हो गई थी, तब मजबूरन नय्यर साहब को अन्य गायकों की तरफ़ झुकना ही पड़ा। १९६९ की उनकी फ़िल्म 'संघर्ष' में उन्होंने हेमन्त कुमार, महेन्द्र कपूर और मुकेश से गीत गवाये। मुकेश की आवाज़ में इस फ़िल्म का "चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला" सब से लोकप्रिय गीत साबित हुआ और इस गीत की लोकप्रियता को देख कर नय्यर साहब ख़ुद भी चौंक गये थे। नय्यर साहब, जो मुकेश की आवाज़ से हमेशा परहेज़ ही करते आये हैं, जब उन्होंने देखा कि मुकेश का यह गीत 'बिनाका गीत माला' में लगातार १९ हफ़्तों से शीर्ष पायदान पर विराजमान है, तब जाकर उन्हें मुकेश की लोकप्रियता और महत्व का अहसास हुआ। इसके तीन साल बाद जब 'एक बार मुस्कुरा दो' की प्लान बनी तो गायक के लिए मुकेश और किशोर कुमार के नाम चुने गये। भले ही नय्यर साहब नें इन दो गायकों की कभी तारीफ़ नहीं की और इस फ़िल्म के गीतों के रेकॉर्डिंग् के बाद यह भी कहा कि किशोर नें गीत को ठीक तरह से नहीं गाया है, लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि फ़िल्म के फ़्लॉप होने के बावजूद इसके गानें ख़ूब चले थे। "ये दिल लेके नज़राना", "तू और की क्यों हो गई", "सवेरे का सूरज तुम्हारे लिये है", "एक बार मुस्कुरा दो", "रूप तेरा ऐसा दर्पण मे न समाये" और आज का प्रस्तुत गीत "चेहरे से ज़रा आंचल", ये सभी गीत उस ज़माने में ख़ूब चले थे, जब नय्यर साहब के सितारे गरदीश पर जाते दिखाई दे रहे थे। इस फ़िल्म के बाद बस एक फ़िल्म और आई 'प्राण जाये पर वचन न जाये' जिसमें आशा भोसले नें नय्यर साहब के लिए आख़िरी बार गीत गाया। और इस तरह से इस महान संगीतकार की कामयाबी का दौर भी सम्पन्न हुआ। लेकिन दोस्तों, आज हम अपना दिल उदास नहीं करेंगे, बल्कि आशा जी की हँसी के साथ इस गीत का आनंद लेंगे। इस गीत को लिखा है शमसुल हुदा बिहारी, यानी एस. एच. बिहारी नें। वैसे उनके अलावा इस फ़िल्म में इंदीवर और शेवन रिज़्वी नें भी गीत लिखे हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि आशा भोसले के साथ संबंध समाप्त होने के बाद ओ. पी. नय्यर नें जिन गायिकाओं से अपने गीत गवाये उनमें शामिल थे कृष्णा कल्ले, वाणी जयराम, पुष्पा पागधरे, दिलराज कौर, कविता कृष्णमूर्ती।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 16
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस गायिका की हँसी है इस युगल गीत में - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर वही टीम है बधाई सभी को

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, October 25, 2010

पिया पिया मोरा जिया पुकारे...जब किशोर दा ने खूबसूरती से छुपाया आशा की गलती को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 512/2010/212

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कल से हमने शुरु की है लघु शृंखला 'गीत गड़बड़ी वाले', जिसके तहत हम कुछ ऐसे गानें सुन रहे हैं जिनमें किसी ना किसी तरह की गड़बड़ी हुई है, या कोई त्रुटी, कोई कमी रह गई है। कल इसकी पहली कड़ी में आपने सुना कि किस तरह से सहगल साहब ने अमीरबाई की लाइन पर ग़लती से गा उठे और गाते गाते चुप हो गए। बिल्कुल इसी तरह की ग़लती एक बार गायिका आशा भोसले ने भी की थी किशोर कुमार के साथ गाए एक युगल गीत में, जिसमें वो किशोर दा की लाइन पर गा उठीं थीं और गाते गाते रह गयीं। आशा जी की इस ग़लती को किशोर कुमार ने किस तरह से क्लवर अप कर गाने को और भी ज़्यादा लोकप्रिय बना दिया, इसके बारे में हम आपको बताएँगे, लेकिन उससे पहले आपको यह तो बता दें कि यह गीत है १९५५ की फ़िल्म 'बाप रे बाप' का, "पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे, हम भी चलेंगे सइयाँ संग तुम्हारे"। जाँनिसार अख़्तर के बोल और ओ. पी. नय्यर साहब का संगीत। नय्यर साहब के ज़्यादातर डुएट्स आशा और रफ़ी के गाये हुए हैं, लेकिन आशा - किशोर के गाये इस गीत की लोकप्रियता अपनी जगह है। इससे पहले कि आशा भोसले ख़ुद आपको अपनी ग़लती के बारे में बताएँ, हम आपको यह बता दें कि 'बाप रे बाप' अब्दुल रशीद कारदार की फ़िल्म थी जिसमें अभिनय किया किशोर कुमार और चाँद उस्मानी ने। युं तो नौशाद साहब ही कारदार साहब की फ़िल्मों में संगीत देते आए थे, लेकिन १९५२ के बाद ग़ुलाम मोहम्मद, मदन मोहन और रोशन को उन्होंने मौके दिए अपनी फ़िल्मों में, और इस फ़िल्म में वो पहली बार लेकर आए नय्यर साहब को।

और अब इस गीत के सब से महत्वपूर्ण पहलु, यानी कि गड़बड़ी के बारे में जानिए ख़ुद आशा भोसले से। "हमारे किशोर दा, इतने मज़ाकी थे कि जिसकी हद नहीं। पूरा दिन अगर आप उनके साथ गा रहे हों, तो सुबह से लेकर शाम तक इतने हँसाते थे कि हँसते हँसते हमारी आवाज़ भी ख़राब हो जाती थी। हम हाथ जोड़ कर कहते थे, "किशोर दा, प्लीज़ मत हँसाइए, मेरा गला ख़राब हो गया, ख़राश आने लगी"। लेकिन वो बंद ही नही होते थे। एक गाना मैं और हमारे मज़ाकी किशोर दा, हम दोनों गा रहे थे, "पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे", गाना पूरा रिहर्सल होके फ़ाइनल रेकॊर्डिंग् शुरु हुआ। और मैंने ग़लती से उनकी लाइन पे "हँअअ..." ऐसा कह दिया। तो उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे हाथ बढ़ा के कहा कि आगे अब बंद नहीं करना, और वैसे ही रेकॊर्डिंग् चालू रखा। जैसे ही रेकॊर्डिंग् खतम हुआ, गाना खतम हुआ तो मैंने कहा कि "दादा, फिर से करते हैं ना, मैंने ग़लती की, बहुत बड़ी ग़लती की, बीच में बोल दिया"। कहने लगे "बिल्कुल चिंता मत करो, मैं हूँ ना उस पिक्चर में, मैं ही तो हीरो हूँ, जैसे ही हीरोइन गाने लगेगी, मैं उसके मुंह पे हाथ रख दूँगा।" तो दोस्तों, इस तरह से आशा जी की ग़लती को फ़िल्मांकन के ज़रिए कवर-अप कर लिया गया और यह इस गीत की एक मज़ेदार बात भी बन गई। वैसे आपको यह बता दें कि भले ही आशा जी ने अपनी ग़लती का ख़ुद ही इज़हार किया, लेकिन नय्यर साहब का मैंने एक इंटरव्यु पढ़ा है, जिसमें जब उनसे इस बारे में पूछा गया था तो उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया था कि कोई ग़लती हुई है। ख़ैर, इस विवाद में जाने से बेहतर यही है कि इस नटखट चुलबुले युगल गीत का आनंद उठाया जाए.



क्या आप जानते हैं...
कि ओ. पी. नय्यर को १७ वर्ष की आयु में ही एच.एम.व्ही के लिए ख़ुद की कम्पोज़ की गई 'कबीर वाणी' और फिर इनायत हुसैन तथा धनीराम के संगीत निर्देशन में गाने का मौका मिला था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०२ /शृंखला ०२
ये धुन है गीत के पहले इंटर ल्यूड की -


अतिरिक्त सूत्र - इस पीरियड फिल्म में प्राण ने शीर्षक भूमिका की थी

सवाल १ - गायिका की आवाज़ पहचानें - १ अंक
सवाल २ - प्रमुख अभिनेत्री बताएं - १ अंक
सवाल ३ - किस संगीतकार जोड़ी का था संगीत - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी कमाल कर रहे हैं, शरद जी कहाँ हैं ????, अमित और बिट्टू जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, May 3, 2010

मादक गीतों में जब घुलती थी आशा की नशीली आवाज़ तो रवानगी कुछ और ही होती थी

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # १३

क्योंकि आज रिवाइवल हो रहा है एक ऐसे गीत का जो उपज है आशा भोसले, ओ.पी. नय्यर और मजरूह सुल्तानपुरी के तिकड़ी की, तो यह गीत सुनवाने से पहले हो जाए कुछ बातें नय्यर साहब से जुड़ी हुई! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कड़ी नंबर ३२४ में नय्यर साहब से की गई विविध भारती टीम के मुलाक़ात का अंश हमने प्रस्तुत किया था। आज उसी का दोहराव...

अहमद वसी: वक़्त चलता हुआ, चलता हुआ, कभी ना कभी आपको इस उमर पे लाता होगा जहाँ यह गुज़रा हुआ ज़माना जो है, ये गरदिशें जो हैं, ये अक्सर परछाइयाँ बन के चलती रहती हैं। तो क्या आप समझते हैं कि जो वक़्त गुज़रा वो बड़ा सुनहरा वक़्त था?

ओ. पी. नय्यर: वसी साहब, एक तो मैंने आप से अर्ज़ की कि मेरी ज़िंदगी का 'aim and inspiration have been an woman'. अगर उसके अंदर ७०% स्वीट मिली है तो बाक़ी के ३०% अगर मिर्ची भी लगी है तो ३०% मिर्ची में क्यों चिल्लाते हो बेटा, 'you have enjoyed your life, I have loved you, what else do you want'

यूनुस ख़ान: नय्यर साहब, जब आपकी युवावस्था के दिन थे, जब आप कुछ करना चाह रहे थे, तो आपके अंदर का एक अकेलापन ज़रूर रहा होगा आपकी जवानी के दिनों में।

नय्यर: मैं बार बार कई दफ़ा बता चुका हूँ कि मैं सड़कों पे अकेला रोया करता था 'alone in the nights and for no reason'। एक दफ़ा तो हमको मार पड़ी, मैंने बोला हम आपके बेटे ही नहीं हैं, मेरे माँ बाप तो कोई और हैं। बहुत पिटाई हुई, 'But they could not understand the loneliness in me'। हमने धोखा खाया तो पुरुषों से खाया है, औरतों ने धोखा नही दिया है। मेरी ज़िंदगी में कई औरतें रहीं जिनके साथ बड़ा मेरा दिल खोल के बात होती थी, और वो 'this was about when I was 19 years old'। लाहोर में। मैंने उसको २१.५ बरस तक छोड़ा। बड़े हसीन दिन थे वो, क्योंकि एक तो मुझे लाहोर शहर पसंद था, और मेरी जो 'romantic life' शुरु हुई वो लाहोर से हुई।

कमल शर्मा: आपकी जो शादी थी वो अरेन्ज्ड थी या...

नय्यर: 'that was a love marriage'।

यूनुस: नय्यर साहब, बात लाहोर की चल रही थी, आप ने कहा आपकी 'romantic life' वहाँ से शुरु हुई, किस तरह से आप मिलते थे और किस तरह से अपनी बातें करते थे?

नय्यर: यूनुस साहब, पब्लिक में थोड़े मिलेंगे! हम तो कोना ढ़ूंढते थे कि अलग जगह बैठ के बातें करने का मौका मिले। या उसी लड़की के घर ही चले जाते थे।

यूनुस: आप ने कभी किसी को प्रेम पत्र लिखा?

नय्यर: कमाल है कि मेरे पास चिट्ठियाँ रहीं, पर मैं चिट्ठियाँ लिखने के लिए 'I feel bored'. जो कुछ कहना था अपने ज़बान से कह दिया जी।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - ये है रेशमी जुल्फों का अँधेरा...
कवर गायन - कुहू गुप्ता




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


कुहू गुप्ता
कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर इंजिनियर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Saturday, January 16, 2010

चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया...यही शिकायत रही ओ पी को ताउम्र

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 316/2010/16

ज १६ जनवरी, संगीतकार ओ. पी. नय्यर साहब का जन्मदिवस है। जन्मदिन की मुबारक़बाद स्वीकार करने के लिए वो हमारे बीच आज मौजूद तो नहीं हैं, लेकिन हम उन्हे अपनी श्रद्धांजली ज़रूर अर्पित कर सकते हैं उन्ही के बनाए एक दिल को छू लेने वाले गीत के ज़रिए। नय्यर साहब के बहुत सारे गानें अब तक हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में सुनवाया है। आज हम जो गीत सुनेंगे वो उस दौर का है जब नय्यर साहब के गानों की लोकप्रियता कम होती जा रही थी। ७० के दशक के आते आते नए दौर के संगीतकारों, जैसे कि राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि, ने धूम मचा दी थी। ऐसे में पिछले पीढ़ी के संगीतकार थोड़े पीछे ही रह गए। उनमें नय्यर साहब भी शामिल थे। लेकिन १९७२ की फ़िल्म 'प्राण जाए पर वचन न जाए' में उन्होने कुछ ऐसा संगीत दिया कि इस फ़िल्म के गानें ना केवल सुपरहिट हुए, बल्कि जो लोग कहने लगे थे कि नय्यर साहब के संगीत में अब वो बात नहीं रही, उनके ज़ुबान पर ताला लगा दिया। आशा भोसले की आवाज़ में इस फ़िल्म का "चैन से हमको कभी आप ने जीने ना दिया, ज़हर जो चाहा अगर पीना तो पीने ना दिया" एक कालजयी रचना है जिसे लिखा था एस. एच. बिहारी साहब ने और धुन जैसा कि हमने बताया नय्यर साहब का। बड़ा ही नर्मोनाज़ुक संगीत है। नय्यर साहब का आम तौर पर जिस तरह का जोशीला और थिरकता हुआ संगीत रहता था, उसके बिल्कुल विपरीत अंदाज़ का यह गाना है। बहुत ही मीठा है और इसके बोल तो दिल को चीर कर रख देते हैं। आज सुनिए इसी कालजयी रचना को, इस बेमिसाल तिकड़ी, यानी कि एस. एच. बिहारी, ओ. पी. नय्यर, और आशा भोसले को सलाम करते हुए।

ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले ने साथ साथ फ़िल्म संगीत में एक लम्बी पारी खेली है। करीब करीब १५ सालों तक एक के बाद एक सुपर डुपर हिट गानें ये दोनों देते चले आए हैं। कहा जाता है कि प्रोफ़ेशनल से कुछ हद तक उनका रिश्ता पर्सनल भी हो गया था। ७० के दशक के आते आते जब नय्यर साहब का स्थान शिखर से डगमगा रहा था, उन दिनों दोनों के बीच भी मतभेद होने शुरु हो गए थे। दोनों ही अपने अपने उसूलों के पक्के। फलस्वरूप, दोनों ने एक दूसरे से किनारा कर लिया सन् १९७२ में। इसके ठीक कुछ दिन पहले ही इस गीत की रिकार्डिंग् हुई थी। दोनों के बीच चाहे कुछ भी मतभेद चल रहा हो, दोनों ने ही प्रोफ़ेशनलिज़्म का उदाहरण प्रस्तुत किया और गीत में जान डाल दी। फ़िल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इस फ़िल्म के गानें चारों तरफ़ छा गए। ख़ास कर यह गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हो गया था कि फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका ने आशा भोसले को उस साल के अवार्ड फ़ंकशन के लिए 'सिंगर ऒफ़ दि ईयर' चुन लिया। लेकिन दुखद बात यह हो गई कि आशा जी नय्यर साहब से कुछ इस क़दर ख़फ़ा हो गए कि वो ना केवल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड लेने नहीं आईं, बल्कि इस फ़िल्म से यह गाना भी हटवा दिया जब कि गाना रेखा पर फ़िल्माया जा चुका था। फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड फ़ंकशन में नय्यर साहब ने आशा जी का पुरस्कार ग्रहण किया, और ऐसा कहा जाता है कि उस फ़ंकशन से लौटते वक़्त उस अवार्ड को गाड़ी से बाहर फेंक दिया और उसके टूटने की आवाज़ भी सुनी। कहने की आवश्यकता नहीं कि आशा और नय्यर के संगम का यह आख़िरी गाना था। समय का उपहास देखिए, इधर इतना सब कुछ हो गया, और उधर इस गीत में कैसे कैसे बोल थे, "आप ने जो है दिया वो तो किसी ने ना दिया", "काश ना आती अपनी जुदाई मौत ही आ जाती"। ऐसा लगा कि आशा जी नय्यर साहब के लिए ही ये बोल गा रही हैं। बहुत अफ़सोस होता है यह सोचकर कि इस ख़ूबसूरत संगीतमय जोड़ी का इस तरह से दुखद अंत हुआ। ख़ैर, सुनिए यह मास्टरपीस और सल्युट कीजिए ओ. पी. नय्यर की प्रतिभा को!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

जिस राह हम बिछड़े थे,
उस मोड़ पे कभी मिलना,
ये धूप छाया बन जाएगी,
मत पूछना कहाँ,साथ चलना...

अतिरिक्त सूत्र - कल इस बहतरीन गीतकार का जन्मदिन भी है जिन्होंने इस गीत को लिखा है

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी आपने टक्कर दे रखी शरद जी को तगड़ी....२ अंकों के लिए बधाई...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, December 2, 2009

चंदा चांदनी में जब चमके...गीता दत्त और गीता बाली का अनूठा संगम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 278

राग सांकला जी के चुने हुए गीता दत्त के गाए गानें इन दिनों आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ख़ास लघु शृंखला 'गीतांजली' के अन्तर्गत। आज के अंक में गीता दत्त गा रहीं हैं गीता बाली के लिए। जी हाँ, वही गीता बाली जिनकी थिरकती हुई आँखें, जिनके चेहरे के अनगिनत भाव, जिनकी नैचरल अदाकारी के चर्चे आज भी लोग करते हैं। और इन सब से परे यह कि वो एक बहुत अच्छी इंसान थीं। गीता बाली का जन्म अविभाजित पंजाब में एक सिख परिवार में हुआ था। उनका असली नाम था हरकीर्तन कौर। देश के बँटवारे के बाद परिवार बम्बई चली आई और गरीबी ने उन्हे घेर लिया। तभी हरकीर्तन कौर बन गईं गीता बाली और अपने परिवार को आर्थिक संकट से उबारा एक के बाद एक फ़िल्म में अभिनय कर। बम्बई आने से पहले उन्होने पंजाब की कुछ फ़िल्मों में नृत्यांगना के छोटे मोटे रोल किए हुए थे। कहा जाता है कि जब किदार शर्मा, जिन्होने गीता बाली को पहला ब्रेक दिया, पहली बार जब वो उनसे मिले तो वो अपने परिवार के साथ किसी के बाथरूम में रहा करती थीं। किदार शर्मा ने पहली बार गीता बाली को मौका दिया १९४८ की फ़िल्म 'सुहाग रात' में। और इसी फ़िल्म से शुरु हुआ गीता बाली और गीता रॉय का साथ। गीता बाली और गीता दत्त, दोनों ने ही यह साबित किया कि दर्दीले और चुलबुले, दोनों तरह के किरदार और गीत गानें में वो अपनी अपनी जगह पारंगत हैं। १९५१ में गुरु दत्त की पहली हिट फ़िल्म 'बाज़ी' से गीता बाली एक नामचीन अदाकारा बन गईं। देव आनंद ने इस फ़िल्म के बारे में कहा था कि "People came repeatedly to theatres to see Geeta's spirited dancing to "tadbeer se bigdi hui taqdeer bana de". This cemented the bonding between Geeta Bali and Geeta Roy!" शम्मी कपूर गीता बाली की ज़िंदगी में आए जब वे दोनों 'मिस कोका कोला' और 'कॊफ़ी हाउस' जैसी फ़िल्मों में साथ साथ काम कर रहे थे। दोनों ने आगे चलकर शादी कर ली, लेकिन बहुत जल्द गीता बाली इस दुनिया से गुज़र गईं। उस वक़्त शम्मी कपूर 'तीसरी मंज़िल' फ़िल्म में काम कर रहे थे।

गीता बाली की थोड़ी चर्चा हमने की, और अब बारी है आज के गाने की। गीता दत्त की आवाज़ में पेश है गीता बाली पर फ़िल्माया फ़िल्म 'मुजरिम' का गीत "चंदा चांदनी में जब चमके"। वैसे आपको बता दें कि इस फ़िल्म में शम्मी कपूर की नायिका थीं रागिनी; गीता बाली तो बस होटल डान्सर की भूमिका में केवल इसी आइटम सॊंग् में नज़र आईं। इस गीत में गीता बाली को बर्मीज़ लुक्स दिए गए, जिस तरह से हेलेन दिखती थीं। बहुत ही खुशमिजाज़ गीत है और एक बार फिर से ओ. पी. नय्यर साहब की धुन, लेकिन इस बार गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी। इस गीत का शुरुआती संगीत काफ़ी हद तक हमें याद दिलाती है "मेरा नाम चिन चिन चू" के शुरुआती संगीत का। तो दोस्तों, आइए गीत को सुना जाए, पिछले दो गीतों की तरह आज भी बारी है झूमने की। गीता दत्त की आवाज़ में इस तरह के गानें इतने अच्छे लगते हैं कि सच में दिल झूम उठता है। ५० के दशक में नय्यर साहब ने बहुत से इस तरह के गानें गीता दत्त से गवाए हैं, जिनमें से बहुत से गानें आज कहीं से बिल्कुल सुनाई नहीं देते हैं। और आज का गीत उन्ही में से एक है। लेकिन पराग जी के प्रयास का नतीजा है कि आज हम इस गीत को एक बार फिर से जी रहे हैं। आइए सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. एक नेपाली इसाई परिवार में जन्मी अभिनेत्री हैं ये जिन पर ये गीत फिल्माया गया है.
२. वो गायिका के भाई थे जिन्होंने इस गीत को संगीत से सजाया.
३. इस युगल गीत के मुखड़े की अंतिम पंक्ति में शब्द है -"कमल".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी, एक बार फिर आपने पाबला जी को मात देकर बाज़ी मार ली, २१ अंकों के लिए बधाई, पराग जी....आपकी बात सर आँखों पर...सही कहा आपने, सच्चाई यही है.

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, October 28, 2009

इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने...."अदा" के तखल्लुस से गज़ल कह रहे हैं शहरयार साहब

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५७

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं सीमा जी की पसंद की आखिरी गज़ल लेकर। सीमा जी की पसंद औरों से काफ़ी अलहदा है। अब आज की गज़ल को हीं ले लीजिए। लोग अमूमन मेहदी हसन साहब, गुलाम अली साहब या फिर जगजीत सिंह जी की गज़लों की फ़रमाईश करते हैं, लेकिन सीमा जी ने जिस गज़ल की फ़रमाईश की है, उसे आशा ताई ने गाया है। इस गज़ल की एक और खासियत है और खासियत यह है कि आज की गज़ल और आज से दो कड़ी पहले पेश की गज़ल (जिसकी फ़रमाईश सीमा जी ने हीं की थी) में दो समानताएँ हैं। दो कड़ी पहले हमने आपको "गमन" फिल्म की गज़ल सुनाई थी और आज हम "उमराव जान" फिल्म की गज़ल लेकर आप सबके सामने हाज़िर हैं। इन दोनों फ़िल्मों का निर्माण मुज़फ़्फ़र अली ने किया था और इन दोनों गज़लों के गज़लगो शहरयार हैं। ऐसा लगता है कि मुज़फ़्फ़र अली हमारी महफ़िल के नियमित मेहमान बन चुके हैं। अब चूँकि मुज़फ़्फ़र अली और शहरयार के बारे में हम बहुत कुछ कह चुके हैं, इसलिए क्यों न आज आशा ताई के बारे में बातें की जाएँ। ८ सितम्बर १९३३ को जन्मी आशा ताई अब ७६ साल की हो चुकी हैं, लेकिन उन्हें सुनकर उनकी उम्र का तनिक भी भान नहीं होता। वैसे शायद आपको पता हो कि इसी साल इनके एलबम "प्रीसियश प्लैटीनम" को विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ एलबम की सूची में ३७ वाँ स्थान मिला है। इस बारे में पूछने पर वो कहती हैं: मैं उस समय कोलकाता में थी। वहाँ मेरा एक बंगाली एलबम रिलीज़ हो रहा था। पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया, क्योंकि यहाँ अपने देश में तो इस एलबम को लोगों ने सुना भी नहीं है ठीक से। वैसे भी अपने देश से बाहर संगीत को सुनने वाले और सराहने वाले श्रोता बहुत हैं। अपने देश में तब उस संगीत को सराहा जाता है जब विदेश में उसको पसंद किया जाता है। आशा ताई की बात में सच्चाई तो है। अगर हमसे पूछें तो हमने भी अभी तक इस एलबम को नहीं सुना है, हाँ लेकिन फ़ख्र तो होता है कि हमारी एक धरोहर धीरे-धीरे विश्व की धरोहर बनती जा रही है। आज के संगीतकारों में शंकर-एहसान-लाय और मोंटी शर्मा को पसंद करने वाली आशा ताई नए गायक-गायिकाओं में किसी को खास पसंद नहीं करतीं। लता मंगेशकर उन्हें अब भी सबसे प्रिय हैं। इस मामले में उनका कहना है: लता मंगेशकर. हम ४५ साल से एक घर में रहते हैं. मां, हम पाँच भाई-बहन सब साथ रहते थे. जहाँ तक लोगों की बात है तो ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना.’

कब तक गाती रहेंगी..यह पूछने पर वो मजाकिया अंदाज़ में कहती हैं: मैं आखिरी साँस तक गाना चाहती हूँ. एक ज्योतिषी ने मुझे बताया था कि मैं ८ साल और जीवित रहूँगी लेकिन गाने के बारे में पूछने पर उन्होंने कुछ नहीं कहा तो समझ लीजिए कम से कम आठ साल अभी और गाऊँगी. पिछले ६५ सालों से गा रहीं आशा ताई को अब तक ८ बार फिल्म-फ़ेयर अवार्ड मिल चुका है। इस दौरान उन्होंने १४ से भी ज्यादा भाषाओं में १२००० से भी ज्यादा गानें गाए हैं। पहली फिल्म कैसे मिली..इस बाबत उनका कहना था: दीदी एक मराठी फ़िल्म माझा बाड़ में काम कर रही थी. उसमें गाने का मौका मिला. यह फ़िल्म १९४४ में बनी थी. उसके बाद ‘अंधों की दुनिया’ में वसंत देसाई ने मौके दिया. हंसराज बहल ने मुझे हिंदी फ़िल्म में पहली बार किसी अभिनेत्री के लिए गाने का मौका दिया. मेरा पहला गाना हिट हुआ १९४८ में, जिसके बोल थे- गोरे गोरे हाथों में. आज के दौर का संगीत पहले के संगीत से काफ़ी अलग है...इस बात पर जोर देते हुए वह कहती है: मैं उस वक्त को याद करती हूं, जब कलाकार बिना पैसा लिए कार्यक्रम देने के लिए आ जाते थे। मैंने उस वक्त उस्ताद विलायत खान को सुना था। प्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद विलायत खान द्वारा संगीतबद्ध १९७६ की फिल्म ‘कादंबरी' में मैंने गाया था। उस दौरान कुछ संगीतकार ऐसे थे, जो कार्यक्रम देने के पहले तैयारी करते थे, जबकि कुछ संगीतकार अचानक कार्यक्रम देते थे। उस्ताद विलायत खान दोनों तरह के संगीतकार थे। जब मैंने गाना शुरू किया था तब और आज के संगीत के परिदृश्य में काफी बदलाव आ गया है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे उस्ताद अली अकबर खान, उस्ताद विलायत खान, पंडित रविशंकर और शिव हरि ‘पंडित शिवकुमार शर्मा और पंडित हरि प्रसाद चौरसिया' जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला। वक्त के साथ संगीत में काफी फर्क आया है. ‘नया दौर’ से लेकर ‘रंगीला’ के बीच में संगीत में तकनीक का दखल काफी बढ़ गया है और वर्तमान समय का फिल्मी संगीत बिना रूह के इनसान की तरह हो गया है. आजकल का फिल्मी संगीत सुनकर ऐसा लगता है कि संगीत अपनी रूह को खोज रहा है. बेताल को ताल में ढाला जा रहा है और बेसुरे को सुर में ढाला जा सकता है लेकिन भावनाएँ किसी भी सूरत में नहीं ढाली जा सकती हैं. एक जमाने में सुख और दुख, विरह और मिलन एवं वक्त के मुताबिक गीत लिखे जाते थे और उसी भावना से गाए भी जाते थे, लेकिन अब तो फिल्मी गीतों से कोई भाव निकालना बेहद मुश्किल हो गया है। आजकल ज्यादातर गीतों के बोल अच्छे नहीं होते। हालांकि, लिखने वालों की कमी नहीं है, आज भी गुलजार, जावेद अख्तर और समीर जैसे कई अच्छे गीतकार बॉलीवुड में है।

आशा ताई की बात हो और ओ०पी०नैय्यर साहब और पंचम दा का ज़िक्र न हो, यह कैसे संभव है। इन दोनों को याद करते हुए आशा ताई अतीत के पन्नों में खो-सी जाती हैं: मुझे लोकप्रियता नैयर साहब का साथ मिलने के बाद मिली..यह बात कुछ हद तक सही है. उस जमाने में सी रामचंद्र के गाने भी बहुत हिट हुए. ईना-मीना-डीका बहुत हिट रहा. मैं सिर्फ़ आर डी बर्मन का नाम भी नहीं लूँगी. हर संगीत निर्देशक का मेरे करियर में योगदान रहा है. मसलन मदन जी का ‘झुमका गिरा रे’, रवि साहब का ‘आगे भी जाने न तू’, शंकर जयकिशन का ‘पर्दे में रहने दो’. आर डी बर्मन मेरे पहले भी पसंदीदा संगीतकार थे आज भी हैं और कल भी रहेंगे. ये बात सिर्फ़ मेरे लिए नहीं बल्कि सबके लिए है. सभी संगीत निर्देशक, गायक आज महसूस करते हैं कि उनके जैसा संगीत कोई नहीं दे सकता. उनका गाना सिखाने का तरीका सबसे अलग था. वह गायक को नर्वस नहीं होने देते थे. उन्हें पता था कि गायक को किस तरह गंवाना चाहिए और बड़े ही प्यार से गायक से गीत गवा लेते थे. मुझे उनके गाने गाने में बहुत मजा आता था. वैसे भी मुझे नई चीज़ें करना अच्छा लगता था. बहुत मेहनत से गाते थे. बर्मन साहब को भी अच्छा लगता था कि मैं कितनी मेहनत करती हूँ. तो कुल मिलाकर अच्छी आपसी समझदारी थी. तो मैं कहूँगी कि हमारे बीच संगीत से प्रेम बढ़ा, न कि प्रेम से हम संगीत में नजदीक आए. आजकल जब कोई उनके पुराने गानों को तोड़-मरोड़कर गाता है, उससे दुख होता है. ‘चुरा लिया है तुमने’ को बाद में जिस तरह से गाया गया. उससे मुझे और बर्मन साहब को बहुत दुख हुआ था. अब अगर घर में हीं संगीत-शिरोमणि विराजमान हों तो तुलना होना लाजिमी है। इस बाबत वह कहती हैं: गुलज़ार भाई ने कहा था कि लोग कहते हैं कि आशा नंबर वन है, लता नंबर वन है. उनका कहना था कि अंतरिक्ष में दो यात्री एक साथ गए थे, लेकिन जिसका क़दम पहले पड़ा नाम उसका ही हुआ. मुझे खुशी है कि पहला क़दम दीदी का पड़ा और मुझे इस पर गर्व है. वैसे भी किसी को अच्छा कहने के लिए किसी और को ख़राब कहना ज़रूरी नहीं है. १६ आने खड़ी बात की है आशा ताई ने। तो चलिए आशा ताई के बारे में हमने आपको बहुत सारी जानकारी दे दी, अब हम आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। उससे पहले "शहरयार" साहब का एक बेमिसाल शेर पेश-ए-खिदमत है:

हमराह कोई और न आया तो क्या गिला
परछाई भी जब मेरी मेरे साथ न आयी...


क्या बात है!!! पढकर ऐसा लगता है कि मानो कोई हमारी हीं कहानी सुना रहा हो। आप क्या कहते हैं?

अब पेश है वह गज़ल जिसके लिए आज की महफ़िल सजी है। हमें पूरा यकीन है कि यह आपको बेहद पसंद आएगी। तो लुत्फ़ उठाने के लिए तैयार हो जाईये, हाँ ध्यान देने की बात यह है कि फिल्म उमराव जान में नायिका का नाम "अदा" था, इसलिए शहरयार साहब ने "अदा" तखल्लुस का इस्तेमाल किया है:

जुस्तजू जिस की थी उस को तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

तुझको रुसवा न किया ख़ुद भी _____ न हुये
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने

कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी हमें याद नहीं
ज़िन्दगी तुझको तो बस ख़्वाब में देखा हमने

ऐ "अदा" और सुनाये भी तो क्या हाल अपना
उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तन्हा हमने




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बुनियाद" और शेर कुछ यूं था -

आज जो दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन ये थी कि बुनियाद हिलनी चाहिए....

दुष्यंत कुमार के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना शामिख फ़राज़ ने। आपने "बुनियाद" शब्द पर यह शेर पेश किया:

मुनव्‍वर मां के आगे यूं कभी खुलकर नहीं रोना
जहां बुनियाद हो इतनी नमी अच्‍छी नहीं होती। (मुनव्वर राणा)

इनके बाद महफ़िल की शोभा बनीं सीमा जी। यह रही आपकी पेशकश:

गहे रस्न-ओ-दार के आग़ोश में झूले
गहे हरम-ओ-दैर की बुनियाद हिला दी (अहमद फ़राज़)

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी (साहिर लुधियानवी)

शामिख जी और सीमा जी के बाद महफ़िल में नज़र आए शरद जी। आपने पहली मर्तबा खुद के लिखे शेर नहीं कहे। चलिए कोई बात नही...यह भी सही। चाहे यह शेर आपका न हो, लेकिन क्या खूब कहा है:

हम वो पत्थर हैं जो गहरे गढ़े रहे बुनियादों में,
शायद तुमको नज़र न आए इसीलिए मीनारों में। (आर.सी.शर्मा ’आरसी’)

निर्मला जी, आप आतीं कैसे नहीं...आना तो था हीं, आखिर महफ़िल का सवाल है। बस कभी ऐसा हो कि आपके साथ कुछ शेर भी आ जाएँ तो मज़ा आ जाए।
राकेश जी, महफ़िल में आपका स्वागत है। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

डिग नहीं सकती कभी नीयत सरे बाज़ार में.
शर्त इतनी है कि बस बुनियाद पक्की चाहिए.

इन सब के बाद महफ़िल में आईं मंजु जी। यह रहा आपका अपने हीं अंदाज़ का स्वरचित शेर(जिसे पिछली बार शरद जी ने शेरनी घोषित कर दिया था :) ):

हम तो बुनियाद के बेनाम पत्थर हैं ,
जिस पर महल खड़ा .

महफ़िल में आखिरी शेर कहा कुलदीप जी ने। हुजूर, इस बार आपने बड़ी देर लगा दी। अगली बार से समय का ध्यान रखिएगा। आपने मीराज़ साहब का यह शेर महफ़िल में पेश किया:

हम भी हैं तामीले वतन में बराबर के शरीक
दरो दीवार अगर तुम हो तो बुनियाद हैं हम

दिशा जी और सुमित जी, आप दोनों कहाँ रह गए। महफ़िल में आने के बाद शेर कहने की परम्परा है, पता है ना!

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, January 29, 2009

संगीतकार हमेशा गायक से ऊँचा दर्जा रखता है, मानना था ओ पी नैयर का

(पहले अंक से आगे ...)

"किस्मत ने हमें मिलाया और किस्मत ने ही हमें जुदा कर दिया....", अक्सर उनके मुँह से ये वाक्य निकलता था. आशा के साथ सम्बन्ध विच्छेद होने के बाद ओ पी का जीवन फ़िर कभी पहले जैसा नही रहा. इस पूरी घटना ने उनके पारिवारिक रिश्तों में भी दरारें पैदा कर दी थी. ये सब उनकी पत्नी, तीन बेटियों और एक बेटे के लिए लगभग असहनीय हो चला था. कुंठा से भरे ओ पी ने किसी साधू की सलाह पर सारी धन संपत्ति, घर (जो लगभग ६ करोड़ का था उन दिनों), गाड़ी, बैंक बैलेंस आदि का त्याग कर सब से अपना नाता तोड़ लिया. पर उनके परिवार ने कभी भी उन्हें माफ़ नही किया....कुछ ज़ख्म कभी नही भरते शायद. 1989 में घर छोड़ने के बाद उन्होंने एक मध्यमवर्गीय महाराष्ट्रीय परिवार के साथ पेइंग गेस्ट बन कर रहने लगे, और मरते दम तक यही उनका परिवार रहा. यहाँ उन्हें वो प्यार और वो सम्मान मिला जिसे शायद उम्र भर तलाशते रहे ओ पी. उस परिवार के एक सदस्या के अनुसार उन्हें अपने परिवार और फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में बात करना बिल्कुल नही अच्छा लगता था. सुरैया, शमशाद बेगम और कभी कभी गजेन्द्र सिंह (स रे गा माँ पा फेम) ही थी जिनसे वो बात कर लिया करते थे. उन्हें होमीयो पेथी का अच्छा ज्ञान था और इसी ज्ञान को बाँट कर वो लोगों की सेवा करने लगे. उनके कुछ जो साक्षात्कार उपलब्ध हैं उनके कुछ अंशों के माध्यम से कोशिश करते हैं और करीब से समझने की हम सब के प्रिय संगीतकार ओ पी को.

पर पहले सुनिए वो गीत जो मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत पसंद है -


"मुझे दिखावे और झूठ से नफ़रत है. मैं लता की आवाज़ का इस्तेमाल किए बिना भी कामियाब रहा. इस बात में कोई शक नही कि लता की आवाज़ में दिव्य तत्व हैं, वो एक महान गायिका हैं, पर उनकी आवाज़ पतली है, मेरे गीतों को जिस तरह की आवाजों की दरकार थी वो शमशाद, गीता और आशा में मुझे मिल गया था." तमाम मतभेदों के बावजूद ओ पी लता को ही सर्वश्रेष्ठ मानते थे. आशा के साथ उन्होंने कमियाबी की बुलंदियों को छुआ, लगभग 70 फिल्मों का रहा ये साथ. बाद में आशा ने आर डी बर्मन से विवाह कर लिया. पर ओ पी ने हमेशा ये कहा कि आर डी ने अपने बेहतर गाने लता से गवाए और आशा को हमेशा दूसरा ही स्थान दिया. रफी को सर्वश्रेष्ठ गायक मानते थे. पर मुकेश और महेंद्र कपूर के साथ भी उनके बेहद कामियाब गीत सुने जा सकते हैं.

उदहारण के लिए "संबंध" का ये गीत ही लीजिये -


ओ पी ने लता मंगेशकर सम्मान को लेने से इनकार कर दिया. उनका तर्क था -"एक संगीतकार कैसे वो सम्मान ले सकता है जो एक गायक या गायिका के नाम पर हों. संगीतकार गायक से उपर होता है. दूसरी बात लता अभी जीवित हैं उनके नाम पर सम्मान देना ग़लत है और तीसरा कारण ये कि मैंने कभी लता के साथ काम नही किया, इसलिए मैं इस पुरस्कार के स्वीकार करने में असमर्थ हूँ...मेरा सबसे बड़ा सम्मान तो मेरे श्रोताओं के प्यार के रूप में मुझे मिल ही चुका है..." सच ही तो है आज भी उनके गीत हम सब की जुबां पर बरबस आ जाते हैं, कौन सा ऐसा राष्ट्रीय त्यौहार है जब ये गीत स्कूलों में नही बजता...



गुरुदत्त को याद कर ओ पी बहुत भावुक हो जाते थे, उस रात को याद कर वो बताते हैं -"उस दिन जब मैं घर आया तो मुझे मेरी पत्नी ने बताया कि राज कपूर का फ़ोन आया था और बता रहे थे कि गुरुदत्त बेतहाशा रोये जा रहे हैं और मुझसे (ओ पी से)मिलना चाह रहे हैं. मैं उस दिन बहुत थका हुआ थे और नींद की ज़रूरत महसूस कर रहा था यूँ भी मुझे अगली सुबह उनसे मिलना ही था तो मैं नही गया...अगली सुबह जब उनके घर पहुँचा तब तक सब खत्म हो चुका था मैंने अपनी आदत स्वरुप खुले आम गीता और वहीदा को उनकी मौत का जिम्मेदार ठहराया. वहीदा शायद मुझसे नफरत करती थी...". संगीत के बदलते रूप से वो दुखी नही थे -"सब कुछ बदलता है समय के साथ लाजमी है संगीत भी बदलेगा. पर सात सुरों की शुद्धता कभी कम नही हो सकती, गीत भद्दे लिखे जा सकते हैं, नृत्य भद्दे हो सकते हैं पर संगीत कभी भद्दा नही हो सकता."



अपनी कुछ बाजीगारियों का ज़िक्र भी उन्होंने किया है कुछ जगहों पर मसलन - "मैं कभी भी १५ मिनट से अधिक नही लेता था कोई धुन बनने में, पर निर्माताओं को हमेशा १०-१५ दिन आगे की तारिख देता था ताकि उन्हें ये काम इतना सरल न लगे..." और उनके इस बयान पर ध्यान दीजिये ज़रा- "मैंने कभी भी अपने समय के संगीतकारों को नही सुना, दूसरे क्या कर रहे हैं मैं जान कर ये जानने की कोशिश नही करता था क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरे संगीत पर उनका या मशहूर होती, चलन में रहती चीज़ों का असर आए. मैं बस अपने ही गीत सुनता हूँ, तब भी और अब भी. एक बात है जिस पर मुझे हमेशा फक्र रहा है वो हैं मेरी इमानदारी अपने संगीत के प्रति, जिसके साथ मैंने कभी समझौता नही किया...". लगता है जैसे ओ पी बस अपने यादगार नग्मों को हम श्रोताओं को देने के लिए ही इस धरती पर आए थे. अन्तिम दो सालों में उन्होंने अपने संगीत को भी सुनना छोड़ दिया था. हाँ पर एक फ़िल्म थी जिसे वो एक दिन में भी कई बार देख लेते थे. १९६५ में आई "ये रात फ़िर न आएगी" के बारे में ओ पी का कहना थे कि इस फ़िल्म को देख कर उन्हें एक अलग ही अनुभूति होती है. नैयर साहब के गीतों से हम आवाज़ की महफ़िल सजाये रखेंगे ये वादा है. फिलहाल आपको छोड़ते हैं इसी फ़िल्म के इस बेहद खूबसूरत गीत के साथ जिसे आवाज़ दी है.....(बताने की ज़रूरत है क्या ?....)




Wednesday, January 28, 2009

बरकरार है आज भी ओ पी नैयर के संगीत का मदभरा जादू

जीनिअस संगीतकार ओ पी नैयर की दूसरी पुण्यतिथि पर विशेष -

१९५२ में एक फ़िल्म आई थी, -आसमान, जिसमें गीता दत्त ने एक बेहद खूबसूरत गीत गाया था -"देखो जादू भरे मोरे नैन..." यह संगीतकार ओ पी नैयर की पहली फ़िल्म थी, जो पहला गाना इस फ़िल्म के लिए रिकॉर्ड हुआ था वो था "बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे..." गायक थे सी एच आत्मा साहब. दो अन्य गीत सी एच आत्मा की आवाज़ में होने थे जो नासिर पर फिल्माए जाने थे और ४ अन्य गीत, गीता ने गाने थे जो नायिका श्यामा पर फिल्मांकित होने थे. फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से आखिरी एक गीत जो फ़िल्म की सहनायिका पर चित्रित होना था उसके बोल थे "जब से पी संग नैना लगे...". नैयर ने इस गीत के लिए लता जी को तलब किया पर जब लता जी को ख़बर मिली कि उन्हें एक ऐसा गीत गाने को कहा जा रहा है जो नायिका पर नही फिल्माया जाएगा (ये उन दिनों बहुत बड़ी बात हुआ करती थी) उनके अहम् को धक्का लगा. वो उन दिनों की (और उसके बाद के दिनों की भी) सबसे सफल गायिका थी. लता ने ओ पी के लिए इस गीत को गाने से साफ़ इनकार कर दिया और जब नैयर साहब तक ये बात पहुँची, तो उन्होंने भी एक दृढ़ निश्चय किया, कि वो अपने कैरिअर में कभी भी लता के साथ काम नही करेंगें. ज़रा सोचिये इंडस्ट्री में कौन होगा ऐसा दूसरा, जो अपनी पहली फ़िल्म में ऐसा दबंग फैसला कर ले और लगभग दो दशकों तक जब तक भी उन्होंने फिल्मों में संगीत दिया वो अपने उस फैसले पर अडिग रहे. उस वक्त वो मात्र २५ साल के थे और पहली और आखिरी बार उन्होंने "जब से पी संग..." गीत के लिए चुना गायिका राजकुमारी को.

बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे (सुनिए ओ पी का सबसे पहला रेकॉर्डेड गीत)


हालांकि “आसमान” और उसके बाद आयी “छम छमा छम” और “बाज़”, तीनों ही फिल्में बुरी तरह पिट गई. पर गायिका गीता रॉय (दत्त) ने इस नए संगीतकार के हुनर को पहचान लिया था, उन्होंने गुरु दत्त से जब वो अपनी पहली प्रोडक्शन पर काम शुरू करने वाले थे ओ पी की सिफारिश की. गीता के आग्रह को गुरु टाल नही पाये और इस तरह ओ पी को मिली "आर पार". इस फ़िल्म ने नैयर ने गीता के साथ मिलकर वो गीत रचे कि आज तक जिनके रिमिक्सिस बनते और बिकते हैं. और इसी के साथ हिन्दी फिल्मों को मिला एक बेमिसाल संगीतकार. “आर पार” के बाद गुरु दत्त प्रोडक्शन के साथ नैयर ने अपनी हैट ट्रिक पूरी की मिस्टर और मिसिस ५५ (१९५५), और सी ई डी (१९५६) से. अब उनका सिक्का चल निकला था.

सुनिए गीता की मदभरी आवाज़ में "हूँ अभी मैं जवां..."


वो जिनके गीत आज भी हमें दौड़ भाग भरी इस जिंदगी में सकून देते हैं, उस ओ पी नैयर साहब के जीवन मगर फूलों की सेज नही रही कभी, कुछ स्वभाव से भी वो शुद्ध थे, खरे को खरा और खोटे को खोटा कहने से वो कभी नही चूकते थे. शायद यही वजह थी कि उनकी फिल्मी दुनिया में बहुत कम लोगों के साथ पटरी बैठी, यहाँ तक कि उनकी सबसे पसंदीदा गायिका गीता दत्त और आशा के साथ भी एक मोड़ पर आकर उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया.

उनके दर्द को ही शायद आवाज़ दे रहे हैं मुकेश यहाँ -


स्कूल कॉलेजों में कभी उनका मन नही लगा था. मात्र 8 वर्ष की आयु में उन्हें लाहोर रेडियो में गाने का अवसर मिला. १० वर्ष की उम्र में वो संगीतकार बन गए पंजाबी फ़िल्म “धुलिया भट्टी” से जिसमें सी एच आत्मा का गाया गीत जिसे एच एम् वी ने रीलीस किया था "प्रीतम आन मिलो..." सुपर हिट साबित हुआ, इस फ़िल्म में उन्होंने एक छोटी सी भूमिका भी की. बँटवारे के बाद वो मुंबई आ गए. १९५२ में "आसमान" से शुरू हुआ संगीत सफर १९९३ में आई "जिद्द" फ़िल्म के साथ ख़तम हुआ. इस A टू Z के बीच ७३ फिल्में आई और ओ पी नैयर अपने कभी न भूल सकने वाले, गुनगुने, दिल के तार बरबस छेड़ते गीतों के साथ संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा के लिए कैद हो गए. "आखों ही आखों में इशारा हो गया..." क्या ये गीत अपने बनने के आज लगभग ५०-५२ सालों के बाद भी उतना ही तारो ताज़ा नही लगता आपको, भाई हमें तो लगता है -



कितनी अजीब बात है कि आल इंडिया रेडियो ने उनके कुछ गीत ब्रोडकास्ट करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था यह कहकर कि इनके बोल और धुन युवा पीढी को पथभ्रमित करने वाले हैं. हँसी आती है आज सोच कर भी (निखिल भाई गौर कीजिये, आप अकले नही हैं). बाद में रेडियो सीलोन पर उनके गीतों को सुनने की बढती चाहत से हार कर ख़ुद मंत्री महोदय को इस अंकुशता को हटाने के लिए आगे आना पड़ा. मात्र ३० साल की उम्र में उन्हें “रिदम किंग” की उपाधि मिल गई थी. उन्होंने संगीतकार के दर्जे को हमेशा ऊँचा माना और एक लाख रुपये पाने वाले पहले संगीत निर्देशक बने. १९५७ में आई "नया दौर" संगीत के आयाम से देखें तो उनके सफर का "मील का पत्थर" थी. शम्मी कपूर के आने के बाद तो ओ पी नैयर के साथ साथ हिन्दी फ़िल्म संगीत भी जैसे फ़िर से जवान हो उठा. मधुबाला ने तो यहाँ तक कह दिया था कि वो अपना पारिश्रमिक उन निर्माताओं के लिए कम कर देंगीं जो ओ पी को संगीतकार लेंगें. मधुबाला की ६ फिल्मों के लिए ओ पी ने संगीत दिया. वो उन दिनों के सबसे मंहगे संगीतकार होने के बावजूद उनकी मांग सबसे अधिक थी. फ़िल्म के शो रील में उनका नाम अभिनेताओं के नाम से पहले आता था. ऐसा पहले किसी और संगीतकार के लिए नही हुआ था, ओ पी ने ट्रेंड शुरू किया जिसे बाद में बहुत से सफल संगीतकारों ने अपनाया.

फ़िल्म १२ o clock का ये गीत सुनिए -"कैसा जादू..." (गौर कीजियेगा इसमें जब गायिका "तौबा तौबा" बोलती है सुनने वालों के दिल में एक अजीब सी कसक उठती है, यही ओ पी का जादू था)


एक साल ऐसा भी आया जब ओ पी की एक भी फ़िल्म नही आई. वर्ष १९६१ को याद कर ओ पी कहते थे -"मोहब्बत में सारा जहाँ लुट गया था..". दरअसल ओ पी अपनी सबसे पसंदीदा पार्श्व गायिका (आशा) के साथ अपने संबंधों की बात कर रहे थे. १९६२ में उन्होंने शानदार वापसी की फ़िल्म 'एक मुसाफिर एक हसीना" से. इसी दशक में उन्होंने "फ़िर वही दिल लाया हूँ"(१९६३), काश्मीर की कली (१९६४, और "मेरे सनम(१९६५) जैसी फिल्मों के संगीत से शीर्ष पर स्थान बरकरार रखा. एक बार वो शर्मीला टैगोर पर फिल्माए अपने किसी गीत पर उनके अभिनय से खुश नही थे, उन्होंने बढ़ कर शर्मीला को सलाह दे डाली कि मेरे गीतों आप बस खड़े रहकर लब नही हिला सकते ये गाने हरकतों के हैं आपको अपने शरीर के हाव भावों का भी इस्तेमाल करना पड़ेगा. शर्मीला ने उनकी इस सलाह को गांठ बाँध ली और अपनी हर फ़िल्म में इस बात का ख़ास ध्यान रखा. ओ पी का सीमित संगीत ज्ञान कभी भी उनके आडे नही आया फ़िल्म "बहारें फ़िर भी आयेंगीं" के गीत "आपके हसीं रुख पे...." के लिए उन्होंने सारंगी का बहुत सुंदर इस्तेमाल किया.

रफी साहब की आवाज़ में पेश है "आपके हसीन रुख पे..."


पर दशक खत्म होते होते अच्छे संगीत के बावजूद उनकी फिल्में फ्लॉप होने लगी. रफी साहब से भी उनके सम्बन्ध बिगड़ चुके थे. गुरु दत्त की मौत के बाद गीता ने ख़ुद को शराब में डुबो दिया था और १९७२ में उनकी भी दुखद मौत हो गई, उधर आशा के साथ ओ पी के सम्बन्ध एक नाज़ुक दौर से गुजर रहा था. ये उनके लिए बेहद मुश्किल समय था. फ़िल्म "प्राण जाए पर वचन न जाए" में आशा ने उनके लिए गाया "चैन से हमको कभी....". अगस्त १९७२ में आखिरकार ओ पी और आशा ने कभी भी साथ न काम करने का फैसला किया और उसके बाद उन्हें कभी भी एक छत के नीचे एक साथ नही देखा गया. १९७३ में जब आशा को अपने इसी गीत के लिए फ़िल्म फेयर मिला तब वो वहां मौजूद नही थी (ऐसा उन्होंने जानकर ही किया होगा). ओ पी ने उनकी तरफ़ से पुरस्कार ले तो लिया, पर घर लौटते वक्त उन्होंने उस ट्रोफी को अपनी कार से बाहर फैंक दिया. कहते हैं उसके टूटने की गूँज आखिरी दम तक उन्हें सुनाई देती रही. जाहिर है, उसके बाद भी उन्होंने काम किया (लगभग १५० गीतों में) अलग अलग गायिकाओं को आजमाया, पर वो जादू अब खो चुका था. कहने को जनवरी २८, २००७ तक ओ पी जीवित रहे पर संगीतकार ओ पी नैयर को तो हम बहुत पहले ही कभी खो चुके थे….

"चैन से हमको कभी ...." (यकीनन ये आशा जी के गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक है..महसूस कीजिये उस दर्द को जो उन्होंने आवाज़ में घोला है)


(जारी...)



Saturday, September 6, 2008

यही वो जगह है - आशा, एक परिचय

बहुमुखी प्रतिभा-यही शब्द हैं जो आशा भोंसले के पूरे कैरियर को अपने में समाहित करते है। और कौन ऐसा है जो गर्व कर सके, जिसने व्यापक तौर पर तीन पीढ़ियों के महान संगीतकारों के साथ काम किया हो। चाहें ५० के दशक में ऒ.पी नय्यर का मधुर संगीत हो या आर.डी.बर्मन के ७० के दशक के पॉप हों या फिर ए.आर.रहमान का लयबद्ध संगीत- आशा जी ने सभी के साथ भरपूर काम किया है। गायन के क्षेत्र में प्रयोग करने की उनकी भूख की वजह से ही उनमें विविधता आ पाई है। उन्होंने १९५० के दशक में हिन्दी सिने जगत के पहले रॉक गीतों में से एक "ईना, मीना, डीका.." गाया। उन्होंने महान गज़ल गायक गुलाम अली व जगजीत सिंह के साथ कईं गज़लों में भी काम किया, और बिद्दू के पॉप व बप्पी लहड़ी के डिस्को गीत भी गाये।

मंगेशकर बहनों में से एक, आशा भोंसले का जन्म ८ सितम्बर १९३३ को महाराष्ट्र के मशहूर अभिनेता व गायक दीनानाथ मंगेशकर के घर छोटे से कस्बे "गोर" में हुआ। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की तरह इन्होंने भी बचपन से ही गाना शुरु कर दिया था। परन्तु अपने पिता से शास्त्रीय संगीत सीखने के कारण वे जल्द ही पार्श्व गायन के क्षेत्र में कूद पड़ी। अप्रैल १९४२ में इनके पिताजी का देहांत हो गया जिसके बाद इनका परिवार पुणे से कोल्हापुर और बाद में मुम्बई जा बसा। करीबन १० वर्ष की उम्र में इन्होंने अपना पहला गीत मराठी फिल्म "माझा बाल" के लिये गाया। आशा अपने जन्म-स्थल को आज भी याद करती हैं और कहती हैं-"मैं अब भी संगली में बिताये अपने बचपन के दिन याद करती हूँ क्योंकि मेरी वजह से ही लता दी स्कूल से भागतीं थीं। मैं संगली को कभी नहीं भूल सकती क्योंकि वहाँ मेरा जन्म हुआ था"।

हम सबकीं आशा
आशा ने पार्श्व गायन की शुरुआत १९४८ में फिल्म "चुनरिया" से कर दी थी। किन्तु उन्हें अपनी जगह बनाने में काफी समय लगा। १९४९ का अंत होते होते लाहौर, बरसात, अंदाज़ और महल जैसी फिल्में आईं और लता मंगेशकर संगीतकारों की पहली पसंद बन गईं थीं। आशा, लता दी जितनी ही प्रतिभाशाली होने के बावजूद अपना सही हक नहीं ले पा रहीं थी। ऐसे भी कईं संगीतकार थे जो लता के बाद शमशाद बेगम और गीता दत्त से गवाने के बारे में सोचते थे। जिसकी वजह से फिल्मी जगत में आशा की जगह न के बराबर थी। काफी हल्के बजट की फिल्में या वो फिल्में जिनमें लता न गा पा रहीं हों, वे ही उन्हें मिल पा रहीं थी। मास्टर कृष्ण दयाल, विनोद, हंसराज बहल, बसंत प्रकाश, धनीराम व अन्य संगीतकार थे जिन्होंने आशा जी के शुरुआती दिनों में उन्हें काम दिया। "चुनरिया" के अलावा १९४९ में आईं "लेख" और "खेल" ही ऐसी फिल्में रहीं जिनमें आशा जी ने गाना गाया। "लेख" में उन्होंने मास्टर कृष्ण दयाल के संगीत से सजा एक एकल गीत गाया व मुकेश के साथ एक युगल गीत -'ये काफिला है प्यार का चलता ही जायेगा..." गाया। १९५३ में "अरमान" के बाद ही उन्हें कामयाबी मिलनी शुरु हुई। एस.डी.बर्मन द्वारा संगीतबद्ध मशहूर गाना-"चाहें कितना मुझे तुम बुलावो जी, नहीं बोलूँगी, नहीं बोलूँगी...' गाया। यही गाना उन्होंने तलत महमूद के साथ भी गाया।

उसके बाद रवि ने उन्हें १९५४ में "वचन" में काम दिया। जहाँ उन्होंने मोहम्मद रफी के साथ फिल्म में एकमात्र गीत गाया-"जब लिया हाथ में हाथ..."। ये अकेला गीत ही उन्हें प्रसिद्धि दिला गया और उन्होंने अपने पैर जमाने शुरु कर दिये। लेकिन एक दो तीन (१९५२), मुकद्दर(१९५०), रमन(१०५४), सलोनी (१९५२), बिजली(१९५०), नौलखा हार(१९५४) और जागृति(१९५३) जैसी कुछ फिल्में ही थी जिनमें उन्होंने एक या दो गाने गाये और यही उनके गाते रहने की उम्मीद थी।

१९५७ उनके लिये एक नईं किरण ले कर आया जब ओ.पी नय्यर जी ने उनसे "तुमसा नहीं देखा" और " नया दौर" के गीत गाने को कहा। उसी साल एस.डी.बर्मन और लता के बीच में थोड़ी अनबन हुई। उधर गीता दत्त भी शादी के बाद परेशान थीं और उपलब्ध नहीं रहती थीं। नतीजतन एस.डी.बर्मन ने भी आशा जी को अपनी फिल्म में लेने का निश्चय किया। उससे अगले साल उन्होंने हावड़ा ब्रिज, चलती का नाम गाड़ी और लाजवंती के कईं सुपरहिट गाने गाये। उसके बाद तो १९७० के दशक तक ओ.पी. नय्यर के लिये आशा जी पहली पसंद बनी रहीं। उसके बाद इन दोनों की जोड़ी में दरार आई। १९६० के दशक में ओ.पी नय्यर के संगीत में आशा जी ने एक से बढ़कर एक बढ़िया गाने गाये। १९७० का दशक उन्हें आर.डी. बर्मन के नज़दीक ले कर आया जिन्होंने आशा जी से कईं मस्ती भरे गीत गवाये। पिया तू अब तो आजा(कारवाँ), दम मारो दम(हरे राम हरे कृष्णा) जैसे उत्तेजक और नईं चुनौतियों भरे गाने भी उन्होंने गाये। जवानी दीवानी (१९७२) के गीत "जाने जां...." में तो उन्होंने बड़ी आसानी से ही ऊँचे और नीचे स्केल में गाना गाया। १९८० में तो उन्होंने गज़ल के क्षेत्र में कमाल ही कर दिया। "दिल चीज़ क्या है..", " इन आँखों की मस्ती..", " ये क्या जगह है दोस्तों..", "जुस्तुजू जिसकी थी.." जैसी सदाबहार गज़लें उनकी उम्दा गायकी निशानी भर हैं। इजाज़त (१९८७) में उन्होंने "मेरा कुछ सामान..: गाना गाया, जिसके लिये उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। ये गाना सबसे मुश्किल गानों में से एक गिना जाता है क्योंकि ये पद्य न हो कर गद्य के रूप में है। ९० के दशक में तो आशा ही छाईं रहीं। चाहें पॉप फिल्मी गीत हो, या पाश्चात्य संगीत की एल्बम हो सभी में आशा जी ही दिखाई पड़ती थीं। वैसे तो उन्होंने गाने गाने कम कर दिये हैं पर आज भी उर्मिला या ऐश्वर्या को रंगीला (१९९४) व ताल ('९९) में आशा जी के गानों पर थिरकते हुए देखा जा सकता है।

आज उनकी आवाज़ पहले से बेहतर और विविधता भरी हो गई है। यदि हम उन्हें संदीप चौटा के "कम्बख्त इश्क.." से पहले आर.डी.बर्मन "तेरी मेरी यारी बड़ी पुरानी.." गाते हुए सुन लें तो भी प्रत्यक्ष तौर पर दोनों आवाज़ों में अंतर करना बहुत कठिन होगा.. जबकि दोनों गानों में ३० बरस का अंतर है!!

दो दिन बाद आशा जी अपना ७५ वां जन्मदिन मनायेंगी, इस अवसर पर संजय पटेल का विशेष आलेख अवश्य पढियेगा, फिलहाल सुनते हैं फ़िल्म "ये रात फ़िर न आयेगी" फ़िल्म का ये मधुर गीत आशा जी की आवाज़ में -



जानकारी स्रोत - इन्टनेट
संकलन - तपन शर्मा "चिन्तक"

Monday, July 14, 2008

"नैना बरसे रिमझिम रिमझिम" - संजय पटेल ने ताज़ा किया एक मार्मिक संस्मरण, संगीत के महान फनकार मदन मोहन को आवाज़ की श्रद्दांजलि

Mangeshkar christened him 'The Emperor Of Ghazals'. She should know because it is in her voice that Madan Mohan created all those masterpieces that set an impossibly high standard for ghazals in films. The irony of the fact is that Madan Mohan couldn't combine class and mass appeal the way an S.D.Burman or Shanker-Jaikishan could. He composed the only way he knew to - with great respect for each of his tunes.

दोस्तो, आज मदन मोहन जी की ३३ वीं पुन्यतिथि है, इस अवसर पर उन्हें याद कर रहे हैं आवाज़ के पारखी संजय पटेल, जानिए उन्हीं की जुबानी ये मार्मिक संस्मरण, जो जुडा है एक अमर गीत " नैना बरसे " से....

मदन मोहन के गीत नैना बरसे रिमझिम रिमझिम से जुड़ा एक मार्मिक संस्मरण.
- संजय पटेल

जब हमारे मन में संगीतकार मदन मोहन का स्मरण आता है तब स्वतः ही यह बात स्थापित हो जाती है कि हम उस सुरीले दौर की बात कर रहे हैं जब संगीत में शोर कम और माधुर्य अधिक हुआ करता था। इसका मतलब ये भी नहीं कि वैसा दौर बाद में नहीं आया लेकिन यह निर्विवाद है कि मदन मोहन की बलन का संगीतकार परिदृश्य पर उपस्थित नहीं हुआ। मदनजी को ग़ज़लों का बादशाह कहा जाता है। पोएट्री की उनकी समझ बेमिसाल थी और संगीत की लाजवाब। यही वजह है कि ग़ज़ल जैसी मासूम काव्य विधा मदन मोहन के गीतों में आकर विलक्षण बन जाती है। यह समय का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि मदन मोहन नाक़ामयाब फ़िल्मों के क़ामयाब संगीतकार कहलाए। बात स्पष्ट है कि फ़िल्में ज़रूर पिट गई होंगी लेकिन मदन मोहन का संगीत अजर अमर बन गया।

मदन मोहन के संगीत का जादू कुछ ऐसा अद्भुत है कि आप एक गीत पर रूक कर रह ही नहीं सकते। यदि आप "हम प्यार में जलने वालों को चैन कहॉं, आराम कहॉं (जेलर)' सुन रहे हैं तो लगता है कि यही मदनजी की श्रेष्ठ रचना है लेकिन जैसे ही आपके कानों पर भैरवी में निबद्ध फ़िल्म भाई-भाई का गीत "कदर जाने ना मोरा बालमवा' पड़ता है तो आप पिछले गीत को भूल जाते हैं। शास्त्रीय संगीत हर एक के बूते का नहीं होता इस लिहाज़ से फ़िल्म संगीत एक सामान्य व्यक्ति की ज़िंदगी में सुरीलापन घोलने का बड़ा काम करता है। ज़रा सोचिये यदि मदनजी जैसे संगीतकार फ़िल्म विधा की ओर न आकर शास्त्रीय संगीत की ओर चले जाते तो आप हम जैसे संगीतप्रेमियों का क्या होता।

आज जिस गीत की चर्चा हम कर रहे हैं वह फ़िल्म”वो कौन थी’ से लिया गया है और मुखड़ा आपका मेरा सबका जाना पहचाना है ... "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' सुनने को यह एक बहुत सामान्य गीत है लेकिन जब इसकी पृष्ठभूमि मालूम होती है तो वाकई हमारी आँखों से भी दुःख का बादल बरसने लगता है। हुआ यूँ कि मदनजी के भाई प्रकाश दिल्ली से मुंबई के बीच रेल से यात्रा कर रहे थे। एकदम स्थान तो याद नहीं आ रहा लेकिन यात्रा के दौरान कुछ कुख्यात लुटेरों ने प्रकाशजी की हत्या कर दी। मदनजी अपने सहयोगी घनश्यामजी के साथ भरे मन और थकान भरी सड़क यात्रा से घटना स्थल तक पहुँचे और अपने भाई की लाश को लेकर मुंबई लौटे। अंतिम संस्कार करने के बाद मदन मोहन कुछ ऐसी विचित्र मानसिक स्थिति में आए कि उन्होंने अपने आपको दो-तीन दिनों के लिए अपने कक्ष में बंद कर लिया। जब कुछ समय बीत गया तो परिजन चिंतित हुए और घनश्यामजी को आगामी रिकार्डिंग्स के डेट्स को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ा। हिम्मत करके घनश्यामजी ने मदनजी का दरवाज़ा खटखटाया और उन्हें बताया कि इस फ़िल्म के गीत की रिकार्डिंग के लिए आज के लिये ही स्टूडियो और लताजी को बुक किया हुआ है। घनश्यामजी ने परिस्थिति के मद्देनज़र पूछा कि क्या स्टूडियो की बुकिंग कैंसल करके लताजी को ख़बर कर दूँ? मदनजी का उत्तर चौंकाने वाला था ! उन्होंने कहा नहीं घनश्याम रेकॉर्डिंग आज ही होगी।

ज़रा सोचिये जिस व्यक्ति ने अपने प्रिय भाई को महज़ तीन दिन पहले गंवाया हो वह संगीत कैसे रच सकता है। लेकिन यदि वह व्यक्ति मदन मोहन है तो सब कुछ संभव है। उसी भरे मन से मदन मोहन स्टूडियो पहुँचते हैं रिकार्डिंग शुरू होती है और ये लाजवाब गाना हम संगीतप्रेमियों की अमानत बन जाता है। ये क़िस्सा सुनने के बाद इस गीत को सुनिये तो आपको लगेगा कि दुनिया जहान का सारा दर्द इस गीत में आ समाया है। "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' ये रिमझिम कहीं न कहीं मदनजी के भाई के दुःखद स्मरण की रिमझिम है। कहीं न कहीं मन में समोया दर्द उघाड़ रही है। मदन मोहन के संगीत में लता मंगेशकर की गायकी कुछ अलग ही रंग और अंदाज़ अख़्तियार कर लेती है। १९५६ से लेकर १९७५ तक लताजी ने न जाने कितने गीत मदनजी के संगीत निर्देशन में गाए हैं लेकिन इस गीत में लताजी गीतकार राजा मेहंदी अली ख़ाँ के शब्दों को जैसे अपने गायकी का अमृत स्पर्श प्रदान कर रही है। ऑर्केस्ट्रा और लताजी की गायकी का ब्लेंडिंग मदन मोहन के संगीत में कुछ ऐसा होताहै कि वे एक दूसरे का पूरक बन जाता है। न ये तोला ऊपर न वह माशा नीचे। संगीत को सुने तो मदनजी सुनाई देते हैं, लताजी को सुनें तो लताजी सुनाई देती हैं। कोई एक दूसरे को ओवरलैप नहीं करता है। इस गीत में भी ये सारी ख़ूबियॉं चमकती दिखाई देती हैं।मदन मोहन के संगीत का एक जादू यह भी है कि हो सकता है आप उनकी रचे गीत/ग़ज़ल के शब्द भूल जाएँ लेकिन धुन नहीं भूल सकते. अपने जीवन काल में 93 फ़िल्मों के 612 गीतों को संगीतबध्द करने वाले इस महान संगीत सर्जक ने कुछ ऐसी अनमोल धुनें संगीत प्रेमियों को दी हैं जिन्हें कालातीत ही कहना होगा.समय बदलेगा,रहन-सहन,खानापीना,फ़ैशन,इंसानी फ़ितरतें और बदलेगा हमारी ज़ुबान की तमीज़ लेकिन नहीं बदलेगा मदन मोहन के संगीत का अलौकिक सिलसिला ...हम सब के मन को मालामाल करता हुआ. ...


(मदन मोहन और लता जी जब भी मिले संगीत का नया इतिहास बना)

आइये संगीतकार मदन मोहन को याद करते हुए देखते हैं उन्हीं का रचा,फ़िल्म "वो कौन थी" का यह गीत जो मनोज कुमार और साधना पर फिल्माया गया है.



MADAN MOHAN - "THE UNFORGETABLE" ( A LIFE BRIEF ) ( SOURCE - INTERNET )

Madan Mohan was the son of Rai Bahadur Chunnilal, one of the big names of the 30's and 40's, and a partner in Bombay Talkies and then Filmistan. Madan Mohan was sent to Dehradun to join the army on the insistence of his father. Once he was posted at Delhi, he quit the Army and went to Lucknow to do what he wanted to do, to join All India Radio. His musical roots strengthened in Lucknow because he came across famous people like Ustad Faiyyaz Khan, Ustad Ali Akbar Khan, Roshan Ara Begum, Begum Akhtar, Siddheshwari Devi, and Talat Mehmood, all renowned names in the field of classical music and ghazal singing. He carried their influence with him always, which was clearly evident by his music compositions in his career, and one of the main reasons why he excelled in aesthetic composition inspite of having no formal training in music.
A patriotic Song


Madan Mohan came to Bombay in the late 40's, and assisted S. D. Burman and Shyam Sunder for a brief spell, for films being made by filmistan studios. Madan's first big independant break was Aankhen in 1950. After his film 'Aankhen' Madan and Lata became a great team together and Lata sang for almost all his films. Lata Mangeshkar was the last word for him. The sweetness Madan achieved here in Lata Mangeshkar’s voice is something rare in his repertory. It was never enough that there was enough of only Lata in a Madan tune. Lata used to call Madan ‘Ghazal Ka Shehzadaa’. ‘Woh chup rahen to mere dil ke daag jalte hain’ from the film Jahan Ara and ‘Maine rang li aaj chunariya’ from Dulhan Ek Raat Ki are some others of his compositions. He scored for a theme in mime like Chetan Anand's Heer Ranjha.

Madan Mohan made excellent use of voices of Talat Mahmood and Mohd. Rafi as well. His favourite lyricists were Raja Mehndi Ali Khan, Rajendra Krishan, and Kaifi Azmi. Majrooh Sultanpuri and Sahir Ludhianvi also wrote for him for a few films. Madan’s light compositions have the same individualistic quality as his serious songs. What's more none of his contemporaries had the knack of picking the right instruments for the right song.

Madan Mohan was totally different from the Punjab school of composers dominating Hindi film Music in the late l94O and early 195O's. Even O.P. Naiyyar, for all his sheen of modernity displayed traces of his Punjabi roots but not once could you scent the 'dehati’ Punjabi at work in a Madan Mohan composition. The Punjab school produced some of the finest music in our films. But always you got the impression that it was music literally rooted in the Punjab soil. Here is where Madan Mohan was diametrically different. He was the artistic aristocrat at work. The son of Rai Bahadur Chuni Laal, the Filmistan chief, at work. Madan Mohan's best music belonged to the drawing room that is why Madan had problems consistently equating with the masses. He was essentially a composer for the classes.

Every composer had a favorite raga, Madan had none. Look at the flair and imagination with which he scored for a theme in mime like Chetan Anand's Heer Ranjha. Sachin Dev Burman paid Madan Mohan the ultimate tribute; ‘ I could not have scored Heer Ranjha with half the felicity Madan Mohan did.’ Madan Mohan was still a struggling composer when he created his masterly tunes. And it is when you are struggling that you really create. Later, at least in the l970's, one felt Madan became rather stylized. In other words, he was, composing to live up to his reputation as the ‘Ghazal King’, which cramped his style in the matter of being a freewheeler composer, - a must for films.

He died on July 14th, in the year 1975. He did not live to see the success of two of his very big hits 'Mausam' and 'Laila Majnu'. Most Popular films of Madan Mohan are 'Ashiyana, Madhosh, Baghi, Bhai Bhai, Mastane, Gateway Of India, Dekh Kabeera Roya, Adalat, Chacha Zindabad, Manmauji, Sanjog, Woh Kaun Thi, Jahan Ara, Ghazal, Sharabi, Mera Saaya, Neela Akash, Ek Kali Muskayi, Chirag, Dastak, Heer Ranjha, Haste Zakhma, Mausam, etc.

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