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Wednesday, May 12, 2010

जो खुद को आज़ाद कहे, वो सबसे बड़ा झूठा है... अनीला की आवाज़ में सुनिए क़तील साहब का बेबाकपन

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८३

स महफ़िल में बस गज़ल की बातें होनी चाहिए, हम यह बात मानते हैं, लेकिन आज हालात कुछ ऐसे हैं कि हमसे रहा नहीं जा रहा। भारतीय क्रिकेट टीम ट्वेंटी-ट्वेंटी के विश्व कप से बाहर हो गई... बाहर होना तो एक बात है, यहाँ तो इस टीम ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए। तीनों के तीनों मैच रेत की तरह मुट्ठी से गंवा दिए। सीरिज से पहले तो हज़ार तरह के वादे किए गए थे लेकिन आखिरकार हुआ क्या.. पिछली साल की तरह हीं बेरंग लौट आई यह टीम। एक ऐसे देश में जहाँ क्रिकेट को धर्म माना जाता है, वहाँ धर्म की इस तरह क्षति हो तो एक आस्तिक क्या करे.... उसके दिल को ठेस तो लगेगी हीं। लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं। कुछ दिनों तक इस हार को याद रखेंगे फिर उसी जोश उसी खरोश के साथ भारतीय टीम के अगले मैच को देखने के लिए तैयार हो जाएँगे। हम हैं हीं ऐसे... लेकिन इन्हीं कुछ दिनों के दरम्यान जितने भी पल, जितने भी घंटे हैं, हमारे लिए वो तो ग़मगीन हीं गुजरेंगे ना। और फिर इसी दौरान आपको अगर ग़ज़ल की महफ़िल सजानी हो तो माशा-अल्लाह.... आपका तो भगवान हीं मालिक है। हमारी आज की मन:स्थिति सौ फ़ीसदी ऐसी हीं है। समझ नहीं आ रहा कि हार का ग़म व्यक्त करें या फिर आज की गज़ल में छुपे भाव। कहाँ से शुरू करें.... इसका कुछ अता-पता हीं नहीं है। लेकिन बात यह है कि हमारी महफ़िल हमारे जीवन का एक अंग है, इसलिए इसे नज़र-अंदाज़ करने का तो सवाल हीं नहीं उठता। यानि कि महफ़िल सजेगी ज़रूर.. भले हीं आज जोश कुछ कम हो, लेकिन जज्बा कम न होगा। तो चलिए हम इस महफ़िल की विधिवत शुरुआत करते हैं।

आज की महफ़िल जिस नज़्म, जिस नगमा के नाम है, उसे हमने "बियोन्ड लव" एलबम से लिया है। इस एलबम की सारी नज़्मों और गज़लों में संगीत सतीश शर्मा का है। उस्ताद बिलायत खान के सुपुत्र सुप्रसिद्ध सितार-वादक सुजात खान ने इस एलबम में अपनी आवाज़ और सितार का कमाल दिखाया है। इतना होने के बावजूद कुछ ऐसा है, जो इस एलबम को दूसरे एलबमों से अलग करता है। किसी भी कविता-प्रेमी के लिए अजीब और अनूठी बात होती है - एक कवि/कवयित्री की आवाज़ में दूसरे किसी शायर की नज़्मों की रिकार्डिंग। जी हाँ, इस एलबम में ऐसी कई सारी नज़्में हैं, जिसे अमेरिका में रहने वाली पाकिस्तानी लेखिका और कवयित्री अनीला अरशद ने अपनी आवाज़ दी है। आज की नज़्म उन्हीं कई सारी नज़्मों में से एक है। इस नज़्म की बात करने से पहले हम आपको इस एलबम की सारी गज़लों/नज़्मों का ब्योरा देना चाहेंगे।

१) कोई पूछे है - सुजात खान
२) प्यार के काफ़िले - सुजात खान
३) ये तारों भरी रात - सुजात खान, अनीला अरशद
४) पिंजरा कब टूटा है - अनीला अरशद
५) मेरे मचले हुए ख्वाबों का महकता है चमन - सुजात खान
६) ऐ मेरे प्यार की खुशबू - अनीला अरशद
७) जवानी के नगमे - सुजात खान, अनीला अरशद

"एक कवयित्री की आवाज़ में किसी दूसरे शायर की नज़्मे" - यह कहने पर आप समझ हीं गए होंगे कि ये सारी गज़लें/नज़्में अनीला की नहीं हैं.. तो फिर कौन है इस रचनाओं का रचयिता। हमने अब तक इस शायर की लिखी तीन-चार गज़लें महफ़िल में पेश की हैं। ये गज़लें कौन-कौन-सी हैं, यह पता करना आपका काम है। इस बहाने आपका रिवीजन भी हो जाएगा। अहा! कहाँ चले? ढूँढने? अरे भाई.... पहले उस शायर का नाम तो जान लीजिए.. क्या कहा? जानते हैं। सही है.. आप तो हमसे भी आगे निकले। हम्म्म..... इतना खुश मत होईये.. हम जानते हैं कि आपको उस शायर का नाम कहाँ से मालूम हुआ है। हमने हीं तो उनका नाम इस आलेख के शीर्षक में डाला है.. जी हाँ, हम "क़तील शिफ़ाई" की हीं बात कर रहे हैं। "बियोन्ड लव" में सारी की सारी गज़लें/नज़्में इन्हीं की लिखी हुई हैं। अब चूँकि क़तील साहब के बारे में ढेर सारी बातें पहले हीं हो चुकी हैं, इसलिए उन्हें दुहराने से कोई फ़ायदा नहीं। लेकिन हाँ, हम उनका लिखा यह शेर तो देख हीं सकते हैं:

मैनें पूछा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठायेगा
आई इक आवाज़ कि तू जिसका मोहसिन कहलायेगा


क़तील साहब की बातें न होंगी, यह माना, लेकिन अनीला? ये कौन हैं..कहाँ से हैं.... क्या करती हैं....यह तो जाना हीं जा सकता है। आगे की पंक्तियों में हम अनीला के बारे में विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। हमने इन पंक्तियों का अनुवाद हिन्दी में करने की कोशिश की, लेकिन हमें ऐसे ढेर सारे शब्द मिलें जिनका हिन्दी में भाषांतरण आसान न था। इसलिए अंतत: हमने यह निर्णय लिया कि क्यों न इसे अंग्रेजी में हीं आपके सामने रख दिया जाए। वैसे भी एक वाक्य अपनी मूल भाषा में हीं ज्यादा सटीक होता है।

Aneela Arshad is a Certified Hypnotherapist, Reiki Master, Teacher and Healer. She owns and operates a Holistic Medical facility in New York where she has, by the grace of God, successfully healed many people suffering from stress, depression, sleep disorders and other related emotional illnesses. She is also an Author, Poet, Playwright and a Screenplay Writer aspiring to spread peace through her writings. Currently, the president of The Arch, a New York based Non-Profit, Cultural Organization; she hopes to reach out to the world through Art and Theatre, thereby bridging the gaps of diversity.

Her first book, The Bounty of Allah was published in 1999 by the Crossroads publishing company. She has written three screenplays, two of which, Where Spirits Soar and The Right and the Wrong, were bought by Nivelli International films. Nightmare at Uch Sharif is in the pre-production phase. She has also produced two plays, Mogul E Azam The Great Mogul and Amir Khusro in 2001 and 2003. She was nominated by the Sub-Continent Peace foundation to receive a proclamation and a Key to the City of Jersey City for her literary endeavors and the passion to address the crimes against women, particularly Muslim women.

THE SILENT LAMEN, her latest work, an anthology of which many poems have been published in various magazines, is a collection of poems based on the true stories of women whose voices have been stifled in a world where being a woman is a curse unto itself. This anthology lays bare the warped reality of women trapped beneath the rubble of a crumbling civilization. It voices the misery of tormented spirits crying out for help.

हमने "बियोन्ड लव" के बारे में जान लिया, अनीला की बातें हो गईं... इस दौरान सुजात खान भी चर्चा का विषय बने.... और तो और हमने क़तील साहब की कातिलाना शायरी भी याद कर ली..... तो फिर आज की नज़्म सुनने-सुनाने में देर करने का कोई कारण नहीं बनता। तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है अनीला की झनकार भरी आवाज़ में वह नज़्म, जो क़तील साहब की बेबाकी का बेजोर उदाहरण है:

पिंजरा कब टूटा है,
कैदी कब छूटा है,
जो खुद को आज़ाद कहे,
वो सबसे बड़ा झूठा है।

जहन किसी का उलझा हुआ है,
माज़ी की ज़ंज़ीरों में,
घिरा हुआ है कोई हाल के
रंगारंग जजीरों में,
किसी को मुस्तकबिल के कुछ
सैयादों ने लूटा है।

इन्सानों की मजबूरी
हालात से जब टकराती है,
बहुत बड़ा एक कैदखाना
ये दुनिया बन जाती है,
इस दुनिया के बाग में
शूली जैसा हर ___ है।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "उफ़क/उफ़ुक" और शेर कुछ यूँ था-

दूर् उफ़क पर् चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम

इस शब्द के साथ सबसे पहले महफ़िल में हाज़िर हुए "शरद जी"। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

उफ़क का ज़िक्र ज़माने में जब भी होता है
ज़मीं को देख देख आसमान रोता है ।

शरद जी के बाद महफ़िल की शोभा बनीं शन्नो जी। आपने यह शेर पेश किया:

उफ़ुक के पार एक और जहाँ होता है
जहाँ न कोई जमी न आसमां होता है. (यह शेर शरद जी से थोड़ा-थोड़ा प्रेरित-सा लग रहा है.. है ना? :) )

मंजु जी, उफ़ुक पर जमीं और आसमान के मिलने के सच को आपने इस शेर में बखूबी दर्शाया है:

जमाना वरदान कहे या शाप ,
उफ़ुक-सा हम दोनों का साथ .

नीरज जी, महफ़िल में आने, महफ़िल को पसंद करने और हमें एक गलती से अवगत कराने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। उम्मीद करता हूँ कि आप आगे भी इसी तरह हमारा साथ देते रहेंगे। हाँ, गुमशुदा शब्द पर शेर कहना मत भूलिएगा। :)

सीमा जी, शायद आपको ध्यान में रखकर हीं किसी गीतकार ने यह कहा था -"देर से आई, दूर से आई... वादा तो निभाया।" वादा निभाने का शुक्रिया। ये रहे आपके शेर:

उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की (क़तील शिफ़ाई)

हद-ए-उफ़क़ पे शाम थी ख़ेमे में मुंतज़र
आँसू का इक पहाड़-सा हाइल नज़र में था (वज़ीर आग़ा)

अवनींद्र जी, महफ़िल से कितना भी दूर जाईये, महफ़िल आपको खींच हीं लाएगी :) और आने पर यह शेर..कमाल है!!

तराश ले अपनी रूह को उफक की मानिंद
अँधेरा जहाँ है सवेरा भी वहीँ है !!

अवध जी, गुलज़ार साहब की यह नज़्म याद दिलाने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। कुछ पंक्तियाँ पेश-ए-खिदमत हैं:

मौत तू एक कविता है.
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको.
ज़र्द सा चेहरा लिए जब चाँद उफक तक पहुंचे.
दिन अभी पानी में हो और रात किनारे के करीब.

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, April 28, 2010

जब भी चूम लेता हूँ इन हसीन आँखों को.... कैफ़ी की "कैफ़ियत" और रूप की "रूमानियत" उतर आई है इस गज़ल में..

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८१

पि छली दस कड़ियों में हमने बिना रूके चचा ग़ालिब की हीं बातें की। हमारे लिए वह सफ़र बड़ा हीं सुकूनदायक रहा और हमें उम्मीद है कि आपको भी कुछ न कुछ हासिल तो ज़रूर हुआ होगा। यह बात तो जगजाहिर है कि ग़ालिब शायरी की दुनिया के ध्रुवतारे हैं और इस कारण हमारा हक़ बनता है कि हम उनसे वाकिफ़ हों और उनसे गज़लकारी के तमाम नुस्खे जानें। हमने पिछली दस कड़ियों में बस यही कोशिश की और शायद कुछ सफ़ल भी हुए। "कुछ" इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि ग़ालिब को पूरी तरह जान लेना किसी के बस में नहीं। फिर भी जितना कुछ हमारे हाथ आया, सारा का सारा मुनाफ़ा हीं तो था। अब जब हमें मुनाफ़े का चस्का लग हीं गया है तो क्यों ना आसमान के उस ध्रुवतारे के आस-पास टिमटिमाते, चमकते, दमकते तारों की रोशनी पर नज़र डाली जाए। ये तारे भले हीं ध्रुवतारा के सामने मंद पड़ जाते हों, लेकिन इनमें भी इतना माद्दा है, इतनी चमक है कि ये गज़ल-रूपी ब्रह्मांड के सारे ग्रहों को चकाचौंध से सराबोर कर सकते हैं। तो अगली दस कड़ियों में (आज की कड़ी मिलाकर) हम इन्हीं तारों की बातें करने जा रहे हैं। बात अब और ज्यादा नहीं घुमाई जाए तो अच्छा....इसीलिए सीधे-सीधे हम मुद्दे पर आते हैं और आज के सितारे से आप सबको रूबरू कराते हैं।

आज की कड़ी जिस शायर के नाम है, उसे मशहूर लेखक और पत्रकार "खुशवन्त सिंह" "आज की उर्दू शायरी का बादशाह" करार देते हैं। अगर यही बात है तो इस सफ़र की शुरूआत के लिए इनसे अच्छा और सटीक शायर और कौन हो सकता है। जी हाँ, हम जिनकी बात कर रहें हैं, उन्हें शायरी की दुनिया में "कैफ़ी" के नाम से जाना जाता है....जबकि उनका पूरा(मूल) नाम सैयद अख़्तर हुसैन रिज़वी है। "कैफ़ी" आज़मी के बारे में खुद कुछ कहने से अच्छा है कि उनकी सुपुत्री "शबानी आज़मी" से उनका परिचय जान लिया जाए। शबाना कहती हैं:

बाप होने के नाते तो अब्बा मुझे ऐसे लगते हैं जैसे एक अच्छा बाप अपनी बेटी को लगेगा, मगर जब उन्हें एक शायर के रूप में सोचती हूँ तो आज भी उनकी महानता का समन्दर अपरम्पार हीं लगता है। मैं ये तो नहीं कहती कि मैं उनकी शायरी को पूरी तरह समझती हूँ और उसके बारे में सब कुछ जानती हूँ, मगर फिर भी उनके शब्दों से जो तस्वीरें बनती हैं, उनके शेरों में जो ताक़त छुपी होती है, उनकी सोच का जो विस्तार है, वो मुझे हैरान-सा कर देता है। वो अपने दु:ख और अपने ग़म को भी दुनिया के दु:ख-दर्द से मिलाकर देखते हैं। उनके सपने सिर्फ़ अपने लिए नहीं, दुनिया के इन्सानों के लिए हैं। चाहे वह झोपड़पट्टी वालों के लिए काम हो या नारी अधिकार की बात या सांप्रदायिकता के विरूद्ध मेरी कोशिश, उन सब रास्तों में अब्बा की कोई न कोई नज़्म मेरी हमसफ़र है। वो "मकान" हो, "औरत" हो या "बहरूपनी" - ये वो मशालें हैं जिन्हें लेकर मैं अपने रास्तों पर चलती हूँ। दुनिया में कम लोग ऐसे होते हैं जिनकी कथनी और करनी एक होती है। अब्बा ऐसे इंसान हैं- उनके कहने और करने में कोई अंतर नहीं है। मैंने उनसे ये हीं सीखा है कि सिर्फ़ सही सोचना और सही कहना हीं काफ़ी नहीं, सही कर्म भी होने चाहिए। अब्बा की ज़िंदगी एक ऐसे इंसान, एक ऐसे शायर की कहानी है, जिसने ज़िन्दगी को पूरी तरह भरपूर जी के देखा है। इनकी शायरी में आप बार-बार देखेंगे- वो अपने दु:खों के मुंडेरों में घिर के नहीं रह जाते बल्कि अपने दु:ख को दुनिया के तमाम लोगों से जोड़ लेते हैं। फिर उनकी बात सिर्फ़ एक इन्सान के दिल की बात नहीं, दुनिया के सारे इन्सानों के दिलों की बात हो जाती है और आप महसूस करते हैं कि उनकी शायरी में सिर्फ़ उनका नहीं, हमारा-आपका-सबका दिल धड़क रहा है।

शबाना जी ने अपने अब्बा को बड़ी हीं बारीकी से याद किया। अब हम ऐसा करते हैं कि कैफ़ी आज़मी की कहानी उन्हीं की जुबानी सुनते हैं:

अपने बारे में यकीन से मैं इतना हीं कह सकता हूँ कि मैं गुलाम हिन्दुस्तान में पैदा हुआ, आज़ाद हिन्दुस्तान में बूढा हुआ और सोशलिस्ट हिन्दुस्तान में करूँगा। समाजवाद के लिए सारे संसार में और स्वयं मेरे देश में एक समय से जो महान संघर्ष हो रहा है, उससे सदैव मेरा और मेरी शायरी का संबंध रहा है। इस विश्वास ने उसी कोख से जन्म लिया है।

मैं उत्तर प्रदेश के जिला आज़मगढ के एक छोटे से गाँव में पैदा हुआ। शायरी तो एक तरह से मुझे खानदानी मिली। मेरे अब्बा सय्यद फ़तह हुसैन रिज़वी मरहूम बाक़ायदा शायर तो नहीं थे, लेकिन शायरी को अच्छी तरह समझते थे। घर में उर्दू-फ़ारसी के दीवान बड़ी संख्या में थे। मैंने ये किताबें उस उम्र में पढीं जब उनका बहुत हिस्सा समझ में नहीं आता था। मुझसे बड़े तीनों भाई भी बाक़ायदा शायर थे यानि बयाज़ (डायरी) रखते थे और तख़ल्लुस भी। सबसे बड़े भाई सैय्यद ज़फ़र हुसैन महरूम की तख़ल्लुस "मज़रूह" थी। उनसे छोटे भाई सैय्यद हुसैन की तख़ल्लुस "बेताब" थी। उनसे छोटॆ भाई सैय्यद शब्बीर हुसैन की तख़ल्लुस "वफ़ा" थी। भाई साहबान जब छुट्टियों में अलीगढ और लखनऊ से घर आते थे तो घर पर अक्सर शे’री महफ़िलें होती थीं जिनमें भाई साहबान के अलावा पूरे क़स्बे के शोअरा शरीक होते थे। भाई साहबान जब अब्बा को अपना कलाम सुनाते और अब्बा उसकी तारीफ़ करते तो मुझे ईर्ष्या होती और मैं बड़ी हसरत से अपने सवाल करता - क्या मैं बःई कभी शे’र कह सकूँगा? लेकिन मैं जब भाईयों के शे’र सुनने के लिए खड़ा हो जाता या चुपचाप कहीं बैठ जाता तो फ़ौरन किसी बुजुर्ग की डाँट पड़ती कि तुम यहाँ क्यों बैठे हो? तुम्हारी समझ में क्या आएगा? घर में जाओ और पान बनवाकर लाओ। मैं पाँव पटकता तक़रीबन रोता हुआ घर में बाजी के पास जाता कि देखिए, मेरे साथ यह हुआ। मैं एक दिन इन सबसे बड़ा शाइर बनकर दिखा दूँगा। बाजी मुस्कुराकर कहती - क्यों नहीं, तुम ज़रूर कभी बड़े शाइर बनोगे, अभी तो यह पान ले जाओ और बाहर दे आओ।

इसी उम्र में एक घटना यह है कि अब्बा बहराइच में थे, क़ज़लबाश स्टेट के मुख़्तार आम या पता नहीं क्या। वहाँ एक तरही मुशायरा हुआ। भाई साहबान लखनऊ से आए थे। बहराइच, गोण्डा, नानपारा और क़रीब-दूर के बहुत से शायर बुलाए गए थे। मुशायरे के अध्यक्ष "मानी जायसी" साहब थे। उनके शेर सुनने का एक खास तरीक़ा था कि वह शे’र सुनने के लिए अपनी जगह पर उकड़ूँ बैठ जाते और अपना सर दोनों घुटनों में दबा लेते और झूम-झूम कर शे’र सुनते और दाद देते। उस वक्त शायर सीनियरिटी से बिठाए जाते थे। एक छोटी-सी चौकी पर क़ालीन बिछा होता और गावतकिया लगा होता। जिस शायर की बारी आती वह इसी चौकी पर आकर एक तरह बहुत आदर से घुटनों के बल बैठता। मुझे मौका मिला तो मैं भी इसी तरह आदर से चौकी पर घुटनों के बल बैठकर अपनी ग़ज़ल जो "तरह" में थी, सुनाने लगा। "तरह" थी "मेहरबां होता, राज़दाँ होता"... वग़ैरह। मैंने एक शे’र पढा:

वह सबकी सुन रहे हैं सबको दाद-ए-शौक़ देते हैं,
कहीं ऐसे में मेरा क़िस्सा-ए-ग़म भी बयाँ होता!


मानी साहब को न जाने शे’र इतना क्यों पसन्द आया कि उन्होंने खुश होकर पीठ ठोंकने के लिए मेरी पीठ पर एक हाथ मारा। मैं चौंकी से ज़मीन पर आ रहा। मानी साहब का मुँह घुटनों में छिपा हुआ था इसलिए उन्होंने नहीं देखा कि क्या हुआ, झूम-झूमकर दाद देते रहे और शे’र दुबारा पढवाते रहे और मैं ज़मीन पर पड़ा-पड़ा शेर दुहराता रहा। यह पहला मुशायरा था जिसमें शायर की हैसियत से मैं शरीक़ हुआ। इस मुशायरे में मुझे जितनी दाद मिली उसकी याद से अब तक परेशान रहता हूँ। उस ज़माने में रोज़ ही कुछ न कुछ लिख किया करता था। कोई नौहा, कोई सलाम, कोई ग़ज़ल।

मेरी नज़्मों और गज़लों के अब तक चार संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं:
१. झंकार २. आखिर-ए-शब ३. आवारा सज्दे ४. इब्लिस की मज्लिस-ए-शूरा (दूसरा इज्लास)

आवारा सज्दे देवनागरी लिपि में मेरा पहला प्रकाशन है। यह मेरी कविताओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें ‘झंकार’ की चुनी हुई चीज़ें भी हैं ‘आख़िर-शब’ की भी। ‘आवारा सज्दे’ मुकम्मल है। मेरी नज़्मों और ग़ज़लों के इस भरपूर संकलन के जरिए मेरे दिल की धड़कन उन लोगों तक पहुँचती है, जिनके लिए वह अब तक अजनबी थी। ’आवारा सज्दे’ की तारीफ़ कई खेमों में हुई। इसी किताब पर मुझे सोवियत लैण्ड नेहरू एवार्ड भी मिला। ’आवारा सज्दे’ पर मुझे साहित्य अकादमी ने भी इनाम दिया। मेरी पूरी साहित्यिक सेवा पर मुझे लोटस एवार्ड भी मिला।

कैफ़ी साहब यूँ तो अपनी क्रांतिकारी गज़लों और नज़्मों के लिए जाने जाते हैं लेकिन चूँकि यहाँ पर हम उनकी एक बड़ी हीं रूमानी गज़ल पेश करने जा रहे हैं तो क्या ना माहौल बनाने के लिए उनका यह शेर देख लिया जाए:

बरस पड़ी थी जो रुख़ से नक़ाब उठाने में
वो चाँदनी है अभी तक मेरे ग़रीब-ख़ाने में


और अब वक़्त है आज की गज़ल से पर्दा उठाने का। तो आज जिस गज़ल से हमारी यह महफ़िल सजने जा रही है, उसे हमने "प्यार का जश्न" एलबम से लिया है। रूप कुमार राठौर की मलाईदार आवाज़ में घुलकर यह गज़ल कुछ ज्यादा हीं मीठी हो गई है। यकीन नहीं होता तो आप खुद हीं आजमा लीजिए। यहाँ पर भले हीं हम यह गज़ल "ओडियो" रूप में आपके सामने पेश कर रहे हैं, लेकिन हम आपसे यह इल्तज़ा करेंगे कि आप इसे युट्युब पर ज़रूर देखें। आखिर "आमिर खान" और "गौरी कार्णिक" को एक-साथ देखने का मौका फिर कहाँ मिलेगा। हमें पूरा विश्वास है कि आपको यह गज़ल अवश्य पसंद आएगी:

जब भी चूम लेता हूँ इन हसीन आँखों को
सौ चिराग अंधेरे में झिलमिलाने लगते हैं।

फूल क्या, ____ क्या, चाँद क्या, सितारे क्या,
सब रक़ीब कदमों पर सर झुकाने लगते हैं।

फूल खिलने लगते हैं उजड़े-उजड़े गुलशन में,
प्यासी-प्यासी धरती पर अब्र छाने लगते हैं।

लम्हे भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है,
लम्हे भर को सब पत्थर मुस्कुराने लगते हैं।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "खयाल" और शेर कुछ यूँ था-

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामी खयाल में
"ग़ालिब" सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है

इस शब्द ने शायद शरद जी के कई सारे जज़्बात जगा दिए तभी तो शरद जी खयालों की दुनिया में ऐसे खोए कि ५-६ शेरों के बाद हीं उन्हें अपनी मदहोशी का इल्म हुआ। आपकी यह पेशकश हमें खूब पसंद आई:

रोज़ अखबारों में पढ़ कर ये ख़याल आया हमें,
इस तरफ़ आती तो हम भी देखते फ़स्ले-बहार । (दुश्यंत कुमार )

इसी ख़याल से मैं रात भर नहीं सोया,
ख्वाब में आके मुझे फिर से वो तड़पाएंगे । (स्वरचित)

कही बे-खयाल हो कर यूं ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले यहाँ मेरी बे-खुदी ने ।

अवध जी, बड़ा हीं बेहतरीन शेर है ये। वाकई साहिर साहब की कलम का कोई जवाब नहीं:

आप आये तो ख्याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया.
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया.

शन्नो जी, आपका इशारा किसकी तरफ़ है.. कहीं नीलम जी तो नहीं :) सच में दिल खोलकर रख दिया है आपने:

अदा का ख्याल क्या आयेगा उसको
जिसे खाकसारी से ही फुर्सत न हो.

मंजु जी, आपके शेरों में आपकी लगन, आपकी मेहनत , आपकी कोशिश झलकती है। मैं इसी का कायल हूँ।

ख़याल की महफिल में तुम जब -जब आए ,
अमावस्या भी पूर्णिमा -सी नजर है आए . (मेरे हिसाब से अमावस और पूनम ज्यादा अच्छे लगते.. )

मनु जी, जगजीत सिंह से आपकी कोई नाराज़गी है क्या। अगर नहीं तो ऐसी टिप्पणी का कारण? :)

उपासना जी (मल्लिका-ए-मक्तूब), आवाज़ पर आपके नक्श-ए-पा देखकर थोड़ी हैरत हुई तो बहुत सारा सुकून भी मिला... भले हीं बहाना "ग़ालिब" का हो, लेकिन जब एक बार आना हो हीं चुका है तो मेरे हिसाब से यह गलती बार-बार की जा सकती है :) क्या कहती हैं आप? और हाँ चचा ग़ालिब के लिए आपका यह शेर भी कमाल का है:

गुफ्तगू में रहे या ख़यालों में हो,
बात ये है कि वो यूँ ही दिल में रहे।

सीमा जी, बड़ी देर कर दी आपने इस बार। खैर.. दिल तो नहीं तोड़ा :) ये रहे आपके शेर:

मिस्ल-ए-ख़याल आये थे आ कर चले गये
दुनिया हमारी ग़म की बसा कर चले गये (फ़ानी बदायूनी )

जब कभी भी तुम्हारा ख़याल आ गया
फिर कई रोज़ तक बेख़याली रही (बशीर बद्र )

पूजा जी, चचा ग़ालिब पर आधारित यह छोटी-सी श्रृंखला पसंद करने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। आपका यह शेर मैं तो समझ हीं गया था, हाँ आपने शब्दार्थ देकर बाकियों का भला ज़रूर किया है। :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, April 7, 2010

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल.. अपने शोख कातिल से ग़ालिब की इस गुहार के क्या कहने!!

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७८

देखते -देखते हम चचा ग़ालिब को समर्पित आठवीं कड़ी के दर पर आ चुके हैं। हमने पहली कड़ी में आपसे जो वादा किया था कि हम इस पूरी श्रृंखला में उन बातों का ज़िक्र नहीं करेंगे जो अमूमन हर किसी आलेख में दिख जाता है, जैसे कि ग़ालिब कहाँ के रहने वाले थे, उनका पालन-पोषण कैसे हुआ.. वगैरह-वगैरह.. तो हमें इस बात की खुशी है कि पिछली सात कड़ियों में हम उस वादे पर अडिग रहे। यकीन मानिए.. आज की कड़ी में भी आपको उन बातों का नामो-निशान नहीं मिलेगा। ऐसा कतई नहीं है कि हम ग़ालिब की जीवनी नहीं देना चाह्ते... जीवनी देने में हमें बेहद खुशी महसूस होगी, लेकिन आप सब जानते हैं कि हमारी महफ़िल का वसूल रहा है- महफ़िल में आए कद्रदानों को नई जानकारियों से मालामाल करना, ना कि उन बातों को दुहराना जो हर गली-नुक्कड़ पर लोगों की बातचीत का हिस्सा होती है। और यही वज़ह है कि हम ग़ालिब का "बायोडाटा" आपके सामने रखने से कतराते हैं।

चलिए..बहुत हुआ "अपने मुँह मियाँ-मिट्ठु" बनना.. अब थोड़ी काम की बातें कर ली जाएँ!! तो आज की कड़ी में हम ग़ालिब पर निदा फ़ाज़ली साहब के मन्त्वय और ग़ालिब की हीं किताब "दस्तंबू" से १८५७ के दौरान की घटनाओं के बारे में जानेंगे।

ग़ालिब के बारे में निदा साहब कहते हैं:

ग़ालिब अपने युग में आने वाले कई युगों के शायर थे, अपने युग में उन्हें इतना नहीं समझा गया जितना बाद के युगों में पहचाना गया. हर बड़े दिमाग़ की तरह वह भी अपने समकालीनों की आँखों से ओझल रहे.

भारतीय इतिहास में वह पहले शायर थे, जिन्हें सुनी-सुनाई की जगह अपनी देखी-दिखाई को शायरी का मैयार बनाया, देखी-दिखाई से संत कवि कबीर दास का नाम ज़हन में आता है- तू लिखता है कागद लेखी, मैं आँखन की देखी. लेकिन कबीर की आँखन देखी और ग़ालिब की देखी-दिखाई में थोड़ा अंतर भी है. कबीर सर पर आसमान रखकर धरती वालों से लड़ते थे और आखिरी मुगल के दौर के मिर्ज़ा ग़ालिब दोनों से झगड़ते थे, इसी लिए सुनने और पढ़ने वाले उनसे नाराज़ रहते थे. लालकिले के एक मुशायरे में, ख़ुद उनके सामने उनपर व्यंग किया गया.

कलामे मीर समझे या कलामे मीरज़ा समझे
मगर इनका कहा यह आप समझें या ख़ुदा समझे

मीर और मीरज़ा से व्यंगकार की मुशद ग़ालिब से पहले के शायर मीर तकीमीर और मीरज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा थी. ग़ालिब को इस व्यंग्य ने परेशान नहीं किया. उन्होंने इसके जवाब में ऐलान किया:

न सताइश (प्रशंसा) की तमन्ना, न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी (अर्थ) न सही
(हमारे हिसाब से यह शेर इस महफ़िल में अब तक तीन बार उद्धृत किया जा चुका है.. लेकिन क्या करें, शेर है हीं कुछ ऐसा कि हर कोई इसे याद कर जाता है)

मिर्ज़ा ग़ालिब का यह आत्मविश्वास उनकी महानता की पहचान है.

ग़ालिब शब्दों और भावों से खेलना बखूबी जानते हैं, तभी तो जहाँ एक ओर यह कहे जाने पर कि उनके शेरों में कोई अर्थ नहीं होता, उन्हें अपने बचाव में जवाब देना पड़ता है वहीं दूसरी ओर वे खुलेआम इस बात को कुबूल करते हैं कि उनके खत (जो उन्होंने अपनी माशूका को लिखे है) बे-मायने होते हैं। यह ग़ालिब की कला नहीं तो और क्या है:

ख़त लिखेंगे, गर्चे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के


ये तो सभी जानते हैं कि १८५७ के गदर ने ग़ालिब पर खासा असर किया था। कुछ लोग इस गलतफ़हमी के शिकार हैं कि ग़ालिब ने उस दौरान अंग्रेजों का पक्ष लिया था। इसी बात को गलत साबित करने के लिए मशहूर शायर मख़मूर सईदी ने ग़ालिब की किताब ‘दस्तंबू’ और उनके खतों के हवाले से १८५७ की कहानी को ब्यान किया है. इस किताब की भूमिका में उन्होंने ‘दस्तंबू’ के हवाले से ग़ालिब पर की जाने वाली आलोचनाओं का जवाब और जवाज़ (औचित्य) पेश किया है। (सौजन्य: मिर्ज़ा बेग़.. अहदनामा ब्लाग से):

दस्तंबू में लिखी कुछ घटनाओं के आधार पर कुछ लोगों ने ग़ालिब पर अंग्रेज़-दोस्ती का इल्ज़ाम लगाया है लेकिन जिस चीज़ को लोगों ने अंग्रेज़-दोस्ती का नाम दिया है वह दरअसल मिरज़ा ग़ालिब की इंसान-दोस्ती थी. बाग़ी भड़के हुए थे इस लिए बहुत से बेगुनाह अंग्रेज़ मर्द औरतें भी उनके ग़ुस्से का निशाना बने. मिर्ज़ा ग़ालिब ने उन बेगुनाहों के मारे जाने पर दुख प्रकट किया लेकिन उन्होंने उस दुख पर भी परदा नहीं डाला जो अंग्रेज़ों की तरफ़ से बेक़सूर हिंदुस्तानी नागरिकों पर ढ़ाए गए.

११ मई १८५७ से ३१ जुलाई १८५८ की घटनाओं पर आधारित "दस्तंबू" में ग़ालिब ने अपने गद्य का झंडा गाड़ने का दावा भी किया है और कहा है कि यह किताब पुरानी फ़ारसी में लिखी गई है और इसमें एक शब्द भी अरबी भाषा का नहीं आने दिया गया है सिवाए लोगों के नामों के क्योंकि उन को बदला नहीं जा सकता था. उन्होंने इसका नाम ‘दस्तंबू’ इस लिए रखा है कि यह लोगों में हाथों हाथ ली जाएगी जैसा कि उस ज़माने में बड़े लोग ताज़गी और ख़ुशबू के लिए दस्तंबू अपने हाथों में रखा करते थे.

ग़ालिब के नज़दीक पीर यानी सोमवार का दिन बड़ा मनहूस है, बाग़ी सोमवार को ही दिल्ली में दाख़िल हुए थे, सोमवार के दिन ही उनकी हार शुरू हुई थी, जब गोरे सिपाही ग़ालिब को पकड़ कर ले गए वह भी सोमवार था और फिर जिस दिन ग़ालिब के भाई का देहांत हुआ वह भी सोमवार था. ग़ालिब ने इस बारे में लिखा है : “१९ अक्तूबर को वही सोमवार का दिन जिसका नाम सपताह के दिनों कि सूचि में से काट देना चाहिए एक सांस में आग उगलने वाले सांप की तरह दुनिया को निगल गया”

ग़ालिब ने अंग्रेज़ अफ़्सरों और फ़ौजियों की रक्तपाति प्रतिक्रिया पर पर्दा नहीं डाला और साफ़ साफ़ लिख गए:

“शाहज़ादों के बारे में इससे अधिक नहीं कहा जा सकता कि कुछ बंदूक़ की गोली का ज़ख़्म खा कर मौत के मुंह में चले गए और कुछ की आत्मा फांसी के फंदे में ठिठुर कर रह गई. कुछ क़ैदख़ानों में हैं और कुछ दर-बदर भटक रहे हैं. बूढ़े कमज़ोर बादशाह पर जो क़िले में नज़र बंद हैं मुक़दमा चल रहा है. झझ्झर और बल्लभगढ़ के ज़मीनदारों और फ़र्रुख़ाबाद के हाकिमों को अलग-अलग विभिन्न दिनों में फांसी पर लटका दिया गया. इस प्रकार हलाक किया गया कि कोई नहीं कह सकता कि ख़ून बहाया गया.... जानना चाहिए कि इस शहर में क़ैदख़ाना शहर से बाहर है और हवालात शहर के अंदर, उन दोनों जगहों में इस क़दर आदमियों को जमा कर दिया गया कि मालूम पड़ता है कि एक दूसरे में समाए हुए हैं. उन दोनों क़ैदख़ानों के उन क़ैदियों की संख्या को जिन्हें विभिन्न समय में फांसी दी गई यमराज ही जानता है...”

मीर मेहदी के नाम लिखे ख़त में ग़ालिब लिखते हैं. “क़ारी का कुआं बंद हो गया. लाल डुगी के कुएं एक साथ खारे हो गए. ख़ैर खारा पानी ही पीते, गर्म पानी निकलता है. परसों मैं सवार होकर कुएं का हाल मालूम करने गया था. जामा मस्जिद से राज घाट के दरवाज़े तक बे-मुबालग़ा (बिना अतिश्योक्ति) एक ब्याबान रेगिस्तान है... याद करो मिर्ज़ा गौहर के बाग़ीचे के उस तरफ़ को बांस गड़ा था अब वह बाग़ीचे के सेहन के बराबर हो गया है.... पंजाबी कटरा, धोबी कटरा, रामजी गंज, सआदत ख़ां का कटरा, जरनैल की बीबी की हवेली, रामजी दास गोदाम वाले के मकानात, साहब राम का बाग़ और हवेली उनमें से किसी का पता नहीं चलता. संक्षेप में शहर रेगिस्तान हो गया.... ऐ बन्दा-ए-ख़ुदा उर्दू बाज़ार न रहा, उर्दू कहां, दिल्ली कहां? वल्लाह अब शहर नहीं है, कैम्प है, छावनी है. न क़िला, न शहर, न बाज़ार, न नहर.”

एक और ख़त में लिखते हैं. “भाई क्या पूछते हो, क्या लिखूं ? दिल्ली की हस्ती कई जश्नों पर थी. क़िले, चांदनी चौक, हर रोज़ का बाज़ार जामा मस्जिद, हर हफ़्ते सैर जमना के पुल की, हर साल मेला फूल वालों का, ये पांचों बातें अब नहीं. फिर कहो दिल्ली कहां....?”

कुछ खुशियाँ, कुछ मज़ाक, कुछ हँसी-ठिठोली और बहुत सारी ग़म की बातों के बाद अब वक्त है आज की गज़ल से रूबरू होने का। आज हम जो गज़ल आपके सामने लेकर आए हैं, उसमें भी ग़ालिब के ज़ख्मों का ज़िक्र है, इसलिए यह कह नहीं सकता कि लुत्फ़ उठाईये। हाँ इस बात की दरख्वास्त कर सकता हूँ कि "निघत अक़बर" जी ने अपनी आवाज़ के माध्यम से जिस दर्द को जीने की कोशिश की है, उस दर्द का एक छोटा-सा हिस्सा आप भी अपनी नसों में उतार लीजिये। दर्द उतरेगा तो सीसे की तरफ़ चुभेगा ज़रूर लेकिन आपको इस बात का फ़ख्र होगा कि आपने ग़ालिब के ग़मों पे अपनी गलबहियाँ डाली हैं। (कुछ ज्यादा हीं हो गया ना :) क्या कीजियेगा ..मेरी बोलने की आदत नहीं जाती, इसलिए आप अगर मुझसे छुटकारा चाहते हैं तो तुरंत हीं गज़ल सुनने में तल्लीन हो जाएँ) तो आपके सामने पेश-ए-खिदमत है यह गज़ल:

तस्कीं को हम न रोएं, जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
हूरान-ए-ख़ुल्द में तेरी सूरत मगर मिले

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यों तेरा घर मिले

तुमसे तो कुछ कलाम नहीं, लेकिन ऐ ___
मेरा सलाम कहियो, अगर नामाबर मिले

ऐ साकिनान-ए-कुचा-ए-दिलदार देखना
तुमको कहीं जो ग़ालिब-ए-आशुफ़्ता-सर मिले




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तबाही" और शेर कुछ यूँ था-

तुम से बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
इसमें कुछ शाइबा-ए-ख़ूबी-ए-तक़दीर भी था

सही शब्द पहचान कर महफ़िल में पहला कदम रखा "सीमा" जी ने। सीमा जी.. ये रहे आपके तुनीर के तीर:

ज़िक्र जब होगा मुहब्बत में तबाही का कहीं
याद हम आयेंगे दुनिया को हवालों की तरह (सुदर्शन फ़ाकिर)

जो हमने दास्‍तां अपनी सुनाई आप क्‍यूं रोए
तबाही तो हमारे दिल पे आई आप क्‍यूं रोए (राजा मेहंदी अली खान)

सजीव जी, मनीष जी का आशीर्वाद मुझ तक पहुचाने के लिए आपका तहे-दिल से आभार। अब आप मेरे भी नामाबर हो जाईये और मेरी तरफ़ से धन्यवाद-ज्ञापन कर आईये... क्या कहते हैं? :)

शरद जी, क्या बात कह दी आपने! दिल में एक टीस-सी उभर आई...

मुझे तो अपनी तबाही की कोई फ़िक्र नहीं
यही ख्वाहिश है ये इल्ज़ाम तुम पे आए नहीं। (स्वरचित)

मंजु जी, इन आतंकियों के सामने हर चेतावनी छोटी पड़ जाती है, फिर भी इन्हें इनकी औकात तो बताई जानी चाहिए। शब्द अच्छे हैं, आपने अगर इन्हें सही से संवारा होता तो हमारे सामने एक मुकम्मल शेर होता। इसलिए शेर के बजाय मैं इसे छंद हीं कहूँगा:

अरे आतंकी !मत दिखा मेरे मुल्क में तबाही का मंजर ,
तेरे को खत्म करने के लिए आएगा कोई राम -कृष्ण -गाँधी बन कर .(स्वरचित )

नीलम जी, एक शेर तो आपने पेश किया. आपसे हमें और भी शेरों की दरकार है। खैर तब तक के लिए यही सही:

जब से हम तबाह हो गए ,
तुम जहाँपनाह हो गए

एक और बात...आपको अगर शायरी सीखनी हो तो "सुबीर संवाद सेवा" पर हमारे गुरू जी "पंकज सुबीर" की कक्षा में दाखिला ले लें। बहुत फ़ायदा होगा।

शन्नो जी, किस बात का दु:ख है आपको... हँसिए, मुस्कुराईये और महफ़िल में माहौल बनाईये। वैसे ये शेर तो बड़ा हीं वज़नदार रहा:

किसी रकीब ने भी कुछ कहा अगर तो उसे वाह-वाही मिली
हमने जो जहमत उठाई कुछ कहने की तो हमें तबाही मिली

सुमित जी, ऐसे नहीं चलेगा। आप कुछ देर के लिए आते हैं और वही शेर कह जाते हैं जो सीमा जी ने कहा है। शेर कहने से पहले बाकी की टिप्पणियों पर भी तो नज़र दौड़ा लिया करें। :)

अवनींद्र जी, हमारी महफ़िल अच्छे शेरों और गुणी शायरों का कद्र करना जानती है। और इस नाते हमारी नज़रों में आपका कद बेहद ऊँचा है। आपको पढकर लगता है कि लिखने से पहले आप दिल को मथ डालते हैं। हैं ना? ये रहे प्रमाण:

एहसास जब सीने मैं तबाह होता हैं
अश्क तेरी चाहत का गवाह होता है

उसने अपनी तबाही मैं मुझे शामिल ना किया
क्या ये सबब कम हे मेरी तबाही के लिए?

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 24, 2010

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है.. ग़ालिब के ज़ख्मों को अपनी आवाज़ से उभार रही हैं मरियम

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७६

र कड़ी में हम ग़ालिब से जुड़ी कुछ नई और अनजानी बातें आपके साथ बाँटते हैं। तो इसी क्रम में आज हाज़िर है ग़ालिब के गरीबखाने यानि कि ग़ालिब के निवास-स्थल की जानकारी। (अनिल कान्त के ब्लाग "मिर्ज़ा ग़ालिब" से साभार):

ग़ालिब का यूँ तो असल वतन आगरा था लेकिन किशोरावस्था में ही वे दिल्ली आ गये थे । कुछ दिन वे ससुराल में रहे फिर अलग रहने लगे । चाहे ससुराल में या अलग, उनकी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा दिल्ली की 'गली क़ासिमजान' में बीता । सच पूंछें तो इस गली के चप्पे-चप्पे से उनका अधिकांश जीवन जुड़ा हुआ था । वे पचास-पचपन वर्ष दिल्ली में रहें, जिसका अधिकांश भाग इसी गली में बीता । यह गली चाँदनी चौक से मुड़कर बल्लीमारान के अन्दर जाने पर शम्शी दवाख़ाना और हकीम शरीफ़खाँ की मस्जिद के बीच पड़ती है । इसी गली में ग़ालिब के चाचा का ब्याह क़ासिमजान (जिनके नाम पर यह गली है ।) के भाई आरिफ़जान की बेटी से हुआ था और बाद में ग़ालिब ख़ुद दूल्हा बने आरिफ़जान की पोती और लोहारू के नवाब की भतीजी, उमराव बेगम को ब्याहने इसी गली में आये । साठ साल बाद जब बूढ़े शायर का जनाज़ा निकला तो इसी गली से गुज़रा ।

जनाब हमीद अहमदखाँ ने ठीक ही लिखा है :
"गली के परले सिरे से चलकर इस सिरे तक आइए तो गोया आपने ग़ालिब के शबाब से लेकर वफ़ात तक की तमाम मंजिलें तय कर लीं ।"


इन बातों से मालूम होता है कि ग़ालिब वास्तव में आगरा के रहने वाले थे। तो क्यों ना हम आगरा की गलियों का मुआयना कर लें, क्या पता उन गलियों में हमें गज़ल कहते हुए ग़ालिब मिल जाएँ। ("मिर्ज़ा ग़ालिब का घर हुआ ग़ायब" पोस्ट से साभार):

शहर के इतिहासकार और वयोवृद्ध बताते हैं कि कालां महल इलाक़े में एक बड़ी हवेली हुआ करती थी, जहाँ सन् १७९७ में ग़ालिब का जन्म हुआ था। लेकिन कालां महल इलाक़े में कोई भी उस जगह के बारे में पक्के तौर पर नहीं कह सकता, जहाँ मियाँ ग़ालिब का जन्म हुआ था। हालाँकि एक इमारत है, जो ग़ालिब की हवेली की ली गई एक बहुत पुरानी तस्वीर से मिलती-जुलती है। बचपन में मुंशी शिव नारायण को ग़ालिब द्वारा लिखे गए एक पत्र से उनकी हवेली के बारे में जानकारी मिलती है, जिसमें उन्होंने अपने घर के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है। उन्हीं को लिखे एक अन्य ख़त में उन्होंने आर्थिक तंगी के चलते पैतृक सम्पत्ति छोड़ने की इच्छा का भी उल्लेख किया है। उन्होंने अपनी सम्पत्ति १८५७ के गदर के आस-पास सेठ लक्ष्मीचंद को बेच दी थी।

अब एक स्कूल ट्रस्ट उस सम्पत्ति का मालिक है, लेकिन ट्रस्ट प्रबंधन के मुताबिक़ उस सम्पत्ति का ग़ालिब से कुछ लेना-देना नहीं है। पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक़ वहाँ जो ख़ूबसूरत बग़ीचा था, वह कब का ग़ायब हो चुका है और अब वहाँ एक बड़ा सा पानी का टेंक है। इमारत के वर्तमान मालिक के हिसाब से ग़ालिब का उस भवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। हालाँकि तथ्य कुछ और ही बयान करते हैं। १९५७ में ग़ालिब की सालगिरह के मौक़े पर मशहूर उर्दू शायद मैकश अकबराबादी की एक तस्वीर है, जो प्रधानाचार्य के वर्तमान दफ़्तर के ठीक सामने ली गई है।

ग़ालिब से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम १९६० तक बाक़ायदा वहीं आयोजित किए जाते रहे हैं। ट्रस्ट द्वारा बड़े पैमाने पर की गई तोड़-फोड़ और निर्माण के चलते अब भवन काफ़ी बदल चुका है। विख्यात शायर फिराक़ गोरखपुरी और अभिनेता फ़ारुक़ शेख़, जिन्होंने ग़ालिब पर एक फ़िल्म का निर्माण किया था, भी इस इमारत को देखने आए थे। ऐतिहासिक तथ्य पुख़्ता तौर पर इशारा करते हैं कि वही भवन मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्मस्थल है, जहाँ आज एक गर्ल्स इंटर कॉलेज चल रहा है। हालाँकि इस बारे में अभी और शोध की ज़रूरत है कि क्या वही इमारत ग़ालिब की पुश्तैनी हवेली है।

हद ये है कि हमारे देश के सबसे बड़े शायर का घर वीरानियों में गुम है... वीरानियाँ क्या. हमें तो यह भी नहीं पता कि ग़ालिब जब आगरा में थे तो कहाँ रहा करते थे। चलिए... इस बात का शुक्र है कि भले हीं ग़ालिब के निशान ज़मीन से मिट गए हों, लेकिन लोगों के दिलों में जो स्थान ग़ालिब ने बनाया है, उसे कोई मिटा नहीं सकता.. वक़्त के साथ वे निशान और भी पुख्ता होते जा रहे हैं। इसी बात पर क्यों न हम ग़ालिब के चंद शेरों पर नज़र दौड़ा लें:

छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना
छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़िर कहे बग़ैर

"ग़ालिब" न कर हुज़ूर में तू बार-बार अर्ज़
ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर


पिछली महफ़िल में हमने ग़ालिब के जो ख़त पेश किए थे, उनमें ग़म और दु:खों की भरमार थी। माहौल को बदलते हुए आज हम वे दो ख़त पेश कर रहे हैं, जिनसे ग़ालिब का मज़ाकिया लहजा झलकता है। तो ये रहे दो ख़त:

१) ग़ालिब ने अपने एक दोस्त को रमज़ान के महीने में ख़त लिखा। उसमें लिखते हैं "धूप बहुत तेज़ है। रोज़ा रखता हूँ मगर रोज़े को बहलाता रहता हूँ। कभी पानी पी लिया, कभी हुक़्क़ा पी लिया,कभी कोई टुकड़ा रोटी का खा लिया। यहाँ के लोग अजब फ़हम र्खते हैं, मैं तो रोज़ा बहलाता हूँ और ये साहब फ़रमाते हैं के तू रोज़ा नहीं रखता। ये नहीं समझते के रोज़ा न रखना और चीज़ है और रोज़ा बहलाना और बात है"।

२) एक दोस्त को दिसम्बर १८५८ की आखरी तारीखों में ख़त लिखा। उस दोस्त ने उसका जवाब जनवरी १८५९ की पहली या दूसरी तारीख को लिख भेजा। उस खत के जवाब में उस दोस्त को ग़ालिब ख़त लिखते हैं। "देखो साहब ये बातें हमको पसन्द नहीं। १८५८ के ख़त का जवाब १८५९ में भेजते हैं और मज़ा ये के जब तुमसे कहा जाएगा तो ये कहोगे के मैंने दूसरे ही दिन जवाब लिखा है"।

अब हुआ ना माहौल कुछ खुशनुमा। बदले माहौल में निस्संदेह हीं आपमें अब गज़ल सुनने की तलब जाग चुकी होगी। गज़ल तो हम सुना देंगे, लेकिन क्या करें ग़ालिब की लेखनी दु:खों से ज्यादा दूर नहीं रह पाती, इसलिए अगर यह गज़ल सुनकर आप भावुक हो गएँ तो इसमें हमारी कोई गलती न होगी। तो लीजिए पेश है "ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और" एलबम से "मरियम"(इनके बारे में हमें ज़्यादा कुछ पता नहीं चल सका, इसलिए पूरी की पूरी कड़ी हमने ग़ालिब के नाम कर दी, हाँ आवाज़ में वह नशा है वह खनक है, जो यकीनन हीं आपको बाँधकर रखेगी।) की आवाज़ में यह गज़ल:

हर एक बात पे कहते हो तुम कि 'तू क्या है'
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं ____
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "अहद" और शेर कुछ यूँ था-

ता फिर न इन्तज़ार में नींद आये उम्र भर
आने का अहद कर गये आये जो ख़्वाब में

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की अवनींद्र जी ने,लेकिन चूँकि उन्होंने तब कोई शेर पेश नहीं किया, इसलिए "शान-ए-महफ़िल" की पदवी से नवाज़ा जाता है अवनींद्र जी के बाद महफ़िल में उपस्थित होने वाले शरद जी को। शरद जी, इस बार आप पूरे रंग में दीखे और उस रंगे में आपने महफ़िल को भी रंग दिया। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर:

मैनें एहद किया था न उस से मिलूंगा मैं
वो रेत पे लकीर थी पत्थर पे नहीं थी । (स्वरचित)

ग़म तो ये है कि वो अहदे वफ़ा टूट गया
बेवफ़ा कोई भी हो तुम न सही हम ही सही (राही मासूम रज़ा) शुभान-अल्लाह... इस शेर का तो मैं फ़ैन हो गया :)

सीमा जी, आपने दो किश्तों में ४ शेर पेश किए... माज़रा क्या है? :) मज़ाक कर रहा हूँ बस :) यह रही आपकी पेशकश:

कहा था किसने के अहद-ए-वफ़ा करो उससे
जो यूँ किया है तो फिर क्यूँ गिला करो उससे (अहमद फ़राज़)

अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहोत थे जागे सुबह हुई आराम किया (मीर तक़ी 'मीर') .. इस शेर को पढकर जाने क्यों मुझे गुलज़ार साहब की पंक्तियाँ याद आ रही हैं... सारी जवानी कतरा के काटी, पीरी में टकरा गए हैं (दिल तो बच्चा है जी)

तुम्हारे अह्द-ए-वफ़ा को अहद मैं क्या समझूं
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत का ऐतबार नहीं (साहिर लुधियानवी)

अवनींद्र जी, आपने रूक-रूक कर जो शेरों की बौछार की, उससे मैं भींगे बिना नहीं रह सका। अब चूँकि सारे हीं शेर यहाँ डाले नहीं जा सकते, इसलिए लकी ड्रा के सहारे मैंने इन दो शेरों को चुना है :)

ऐ ज़िन्दगी एक एहद मांगता हूँ तुझसे
फ़िर येही खेल हो तो मेरे साथ ना हो (स्वरचित )

वो जब से उम्र कि बदरिया सफ़ेद हो गयी
एहदे वफ़ा तो छोड़ो मुस्कुराता नहीं कोई (स्वरचित ) हा हा हा... क्या खूब कहा है आपने

नीलम जी, आपको हमारी महफ़िल और हमारी पेशकश पसंद आई, इसके लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया। आपने कहा कि आपका शेर चोरी का है, कोई बात नही, लेकिन इस शेर के मालिक का नाम तो बता देतीं। वैसे शेर कमाल का है:

और क्या अहदे वफ़ा होते हैं
लोग मिलते हैं,जुदा होते हैं

शन्नो जी, आपने अनजाने में हीं महफ़िल को जो दुआ दी, उससे मेरा दिल बाग-बाग हो गया... वाह क्या कहा है आपने:

हमें किसी की अहदे वफ़ा का इल्म नहीं
हम और हमारी महफ़िल बरक़रार रहे

मनु जी, आपको समझना इतना आसान नहीं। आप महफ़िल में आए, बड़े दिनों बाद आए, इससे हमें बड़ी हीं खुशी हासिल हुई, लेकिन खतों को पढने के बाद गज़ल सुनना ज़रूरी नहीं समझा.. यह मामला मुझे समझ नहीं आया। थोड़ा खुलकर समझाईयेगा।

सुमित जी और पूजा जी आप लोगों की दुआओं के कारण हीं महफ़िल आज अपनी ७६वीं कड़ी तक पहुँच सकी है। अपना प्यार (और/या) आशीर्वाद इसी तरह बनाए रखिएगा :)

मंजु जी, शेर कहने में आपने बड़ी हीं देर कर दी। अच्छी बात यह है कि आपको वह पता ( http://www.ebazm.com/dictionary.htm ) मिल चुका है, जहाँ से शब्दों के अर्थ मालूम पड़ जाएँगे। यह रहा आपका शेर:

निभानी नहीं आती उसे रस्म अहद वफा की ,
टूटती हैं चूडियाँ हर दिन बेवफाई से .

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, February 24, 2010

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है.. ग़ालिब के दिल से पूछ रही हैं शाहिदा परवीन

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७२

पूछते हैं वो कि "ग़ालिब" कौन है,
कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या

अब जबकि ग़ालिब खुद हीं इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं कि ग़ालिब को जानना और समझना इतना आसान नहीं तभी तो वो कहते हैं कि "हम क्या बताएँ कि ग़ालिब कौन है", तो फिर हमारी इतनी समझ कहाँ कि ग़ालिब को महफ़िल-ए-गज़ल में समेट सकें.. फिर भी हमारी कोशिश यही रहेगी कि इन दस कड़ियों में हम ग़ालिब और ग़ालिब की शायरी को एक हद तक जान पाएँ। पिछली कड़ी में हमने ग़ालिब को जानने की शुरूआत कर दी थी। आज हम उसी क्रम को आगे बढाते हुए ग़ालिब से जुड़े कुछ अनछुए किस्सों और ग़ालिब पर मीर तक़ी मीर के प्रभाव की चर्चा करेंगे। तो चलिए पहले मीर से हीं रूबरू हो लेते हैं। सौजन्य: कविता-कोष

मोहम्मद मीर उर्फ मीर तकी "मीर" (१७२३ - १८१०) उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। मीर का जन्म आगरा मे हुआ था। उनका बचपन अपने पिता की देख रेख मे बीता। पिता के मरणोपरांत ११ की वय मे वो आगरा छोड़ कर दिल्ली आ गये। दिल्ली आ कर उन्होने अपनी पढाई पूरी की और शाही शायर बन गये। अहमद शाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले के बाद वह अशफ-उद-दुलाह के दरबार मे लखनऊ चले गये। अपनी ज़िन्दगी के बाकी दिन उन्होने लखनऊ मे ही गुजारे।

अहमद शाह अब्दाली और नादिरशाह के हमलों से कटी-फटी दिल्ली को मीर तक़ी मीर ने अपनी आँखों से देखा था। इस त्रासदी की व्यथा उनके कलामो मे दिखती है, अपनी ग़ज़लों के बारे में एक जगह उन्होने कहा था-

हमको शायर न कहो मीर कि साहिब हमने
दर्दो ग़म कितने किए जमा तो दीवान किया

मीर का ग़ालिब पर इस कदर असर था कि ग़ालिब ने इस बात की घोषणा कर दी थी कि:

’ग़ालिब’ अपना ये अक़ीदा है बकौल-ए-’नासिख’,
आप बे-बहरा हैं जो मो’तक़िद-ए-मीर नहीं।

यानि कि नासिख (लखनऊ के बहुत बड़े शायर शेख इमाम बख्श ’नासिख’) के इन बातों पर मुझे यकीन है कि जो कोई भी मीर को शायरी का सबसे बड़ा उस्ताद नहीं मानता उसे शायरी का "अलिफ़" भी नहीं मालूम।

ग़ालिब मीर के शेरों की कहानी इस तरह बयां करते हैं:

मीर के शेर का अह्‌वाल कहूं क्या ’ग़ालिब’
जिस का दीवान कम अज़-गुलशन-ए कश्मीर नही

ग़ालिब को जब कभी खुद पर और खुद के लिखे शेरों पर गुमां हो जाता था, तो खुद को आईना दिखाने के लिए वो यह शेर गुनगुना लिया करते थे:

रेख्ते के तुम हीं उस्ताद नहीं हो ’ग़ालिब’
कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था

और इसी ग़ालिब के बारे में मीर का मानना था कि:

अगर इस लड़के को कोई कामिल उस्ताद मिल गया और उसने इसे सीधे रास्ते पर डाल दिया, तो लाजवाब शायर बनेगा, वरना मोहमल (अर्थहीन) बकने लगेगा।

वैसे शायद हीं आपको यह पता हो कि भले हीं मीर लखनऊ के और ग़ालिब दिल्ली के बाशिंदे माने जाते हैं लेकिन दोनों का जन्म अकबराबाद (आगरा) में हुआ था। हो सकता है कि यही वज़ह हो जिस कारण से ग़ालिब मीर के सबसे बड़े भक्त साबित हुए। ग़ालिब और मीर की सोच किस हद तक मिलती-जुलती थी इस बात का नमूना इन शेरों को देखने से मिल जाता है:

मीर:

होता है याँ जहाँ मैं हर रोज़ोशब तमाशा,
देखो जो ख़ूब तो है दुनिया अजब तमाशा ।

ग़ालिब :

बाज़ीचए इत्फाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे ।

मीर :

बेखुदी ले गयी कहाँ हमको,
देर से इंतज़ार है अपना ।

ग़ालिब :

हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी,
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती ।

मीर :

इश्क उनको है जो यार को अपने दमे-रफ्तन,
करते नहीं ग़ैरत से ख़ुदा के भी हवाले ।

ग़ालिब :

क़यामत है कि होवे मुद्दई का हमसफ़र 'ग़ालिब',
वह क़ाफिर जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाय है मुझसे ।

उर्दू-साहित्य को मीर और ग़ालिब से क्या हासिल हुआ, इस बारे में अपनी पुस्तक "ग़ालिब" में रामनाथ सुमन कहते हैं:जिन कवियों के कारण उर्दू अमर हुई और उसमें ‘ब़हारे बेख़िज़ाँ’ आई उनमें मीर और ग़ालिब सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। मीरने उसे घुलावट, मृदुता, सरलता, प्रेम की तल्लीनता और अनुभूति दी तो ग़ालिब ने उसे गहराई, बात को रहस्य बनाकर कहने का ढंग, ख़मोपेच, नवीनता और अलंकरण दिये।

मीर के बारे में इतना कुछ जान लेने के बाद यह बात तो ज़ाहिर हीं है कि ग़ालिब पर मीर ने जबरदस्त असर किया था। लेकिन मीर से पहले भी कोई एक शायर थे जिन्होंने ग़ालिब को शायरी के रास्ते पर चलना सिखाया था.. वह शायर कौन थे और वह रास्ता ग़ालिब के लिए गलत क्यों साबित हुआ, इस बात का ज़िक्र प्रकाश पंडित अपनी पुस्तक "ग़ालिब और उनकी शायरी" में इस तरह करते हैं:अपने फ़ारसी भाषा तथा साहित्य के विशाल अध्ययन और ज्ञान के कारण ग़ालिब को शब्दावली और शे’र कहने की कला में ऐसी अनगनत त्रुटियाँ नज़र आईं, मस्तिष्क एक टेढ़ी रेखा और एक-प्रश्न बन गया और उन्होंने उस्तादों पर टीका-टिप्पणी शुरू कर दी। उनका मत था कि हर पुरानी लकीर सिराते-मुस्तकीम सीधा-मार्ग) नहीं है और अगले जो कुछ कह गए हैं, वह पूरी तरह सनद (प्रमाणित बात) नहीं हो सकती। अंदाजे-बयां (वर्णन शैली) से नज़र हटाकर और अपना अलग हीं अंदाज़े-बयां अपनाकर जब विषय वस्तु की ओर देखा तो वहाँ भी वही जीर्णता नज़र आई। कहीं आश्रय मिला तो ‘बेदिल’ (एक प्रसिद्ध शायर) की शायरी में जिसने यथार्थता की कहीं दीवारों की बजाय कल्पना के रंगों से अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर रखी थी। ‘ग़ालिब’ ने उस दीवार की ओर हाथ बढ़ाया तो उसके रंग छूटने लगे और आँखों के सामने ऐसा धुँधलका छा गया कि परछाइयाँ भी धुँधली पड़ने लगीं, जिनमें यदि वास्तविक शरीर नहीं तो शरीर के चिह्न अवश्य मिल जाते थे। अतएव बड़े वेगपूर्ण परन्तु उलझे हुए ढंग से पच्चीस वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने लगभग २००० शे’र ‘बेदिल’ के रंग में कह डाले। मीर के यह कहने पर कि अगर सही उस्ताद न मिला तो यह अर्थहीन शायर बन जाएगा, ग़ालिब ने खुद में हीं वह उस्ताद ढूँढ निकाला। ग़ालिब की आलोचनात्मक दृष्टि ने न केवल उस काल के २००० शे’रों को बड़ी निर्दयता से काट फेंकने की प्रेरणा दी बल्कि आज जो छोटा-सा ‘दीवाने-ग़ालिब’ हमें मिलता है और जिसे मौलाना मोहम्मद हुसैन ‘आज़ाद’ (प्रसिद्ध आलोचक) के कथनानुसार हम ऐनक की तरह आँखों से लगाए फिरते हैं, उसका संकलन करते समय ‘ग़ालिब’ ने हृदय-रक्त से लिखे हुए अपने सैकड़ों शे’र नज़र-अंदाज़ कर दिए थे। तो यह था ग़ालिब के समर्पण का एक उदाहरण.. ग़ालिब की नज़रों में बुरे शेरों का कोई स्थान नहीं था, इसीलिए तो उन्होंने कत्ल करते वक्त अपने शेरों को भी नहीं बख्शा..

ग़ालिब किस कदर स्वाभिमानी थे, इसकी मिसाल पेश करने के लिए इस घटना का ज़िक्र लाजिमी हो जाता है:

१८५२ में जब उन्हें दिल्ली कॉलेज में फ़ारसी के मुख्य अध्यापक का पद पेश किया गया और अपनी दुरवस्था सुधारने के विचार से वे टामसन साहब (सेक्रेट्री, गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया) के बुलावे पर उनके यहाँ पहुँचे, तो यह देखकर कि उनके स्वागत को टामसन साहब बाहर नहीं आए, उन्होंने कहारों को पालकी वापस ले चलने के लिए कह दिया(ग़ालिब जहाँ कहीं जाते थे चार कहारों की पालकी में बैठकर जाते थे।) टामसन साहब को सूचना मिली तो बाहर आए और कहा कि चूँकि आप मुलाक़ात के लिए नहीं नौकरी के लिए आए हैं इसलिए कोई स्वागत को कैसे हाज़िर हो सकता है ? इसका उत्तर मिर्ज़ा ने यह दिया कि मैं नौकरी इसलिए करना चाहता हूँ कि उससे मेरी इज़्ज़त में इज़ाफा हो, न कि जो पहले से है, उसमें भी कमी आ जाए। अगर नौकरी के माने इज़्ज़त में कमी आने के हैं, तो ऐसी नौकरी को मेरा दूर ही से सलाम ! और सलाम करके लौट आए।

ग़ालिब के बारे में बातें तो होती हीं रहेंगी। क्यों न हम आगे बढने से पहले इन शेरों पर नज़र दौड़ा लें:

इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दिल की दवा करे कोई (सीधे-सीधे खुदा पर सवाल दागा है ग़ालिब ने)

जब तवक़्क़ो ही उठ गयी "ग़ालिब"
क्यों किसी का गिला करे कोई


और अब पेश है आज की वह गज़ल जिसके लिए हमने महफ़िल सजाई है। इस गज़ल में अपनी आवाज़ से चार चाँद लगाया है जानीमानी फ़नकारा शाहिदा परवीन ने। शाहिदा जी के बारे में हमने इस कड़ी में बहुत सारी बातें की थीं। मौका हो तो जरा उधर से भी घुमकर आ जाईये। तब तक हम दिल-ए-नादाँ को दर्द से लड़ने की तरकीब बताए देते हैं। ओहो.. आ भी गए आप.... तो तैयार हो जाईये दर्द से भरी इस गज़ल को महसूस करने के लिए। इस गज़ल में जिस चोट का ज़िक्र हुआ है, उसे समझने के लिए दिल चाहिए.... और महफ़िल-ए-गज़ल में आए मुसाफ़िर बे-दिल तो नहीं!!:

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुश्ताक़ और वो ___
या इलाही ये माजरा क्या है

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

हाँ भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है

मैंने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "ख़लिश" और शेर कुछ यूँ था:

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

ग़ालिब के दिल की खलिश को सबसे पहले ढूँढ निकाला सीमा जी ने। आपने इस शब्द पर ये सारे शेर पेश किए:

ये किस ख़लिश ने फिर इस दिल में आशियाना किया
फिर आज किस ने सुख़न हम से ग़ायेबाना किया (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ )

ख़लिश के साथ इस दिल से न मेरी जाँ निकल जाये
खिंचे तीर-ए-शनासाई मगर आहिस्ता आहिस्ता (परवीन शाकिर )

गिला लिखूँ मैं अगर तेरी बेवफ़ाई का
लहू में ग़र्क़ सफ़ीना हो आशनाई का
ज़बाँ है शुक्र में क़ासिर शिकस्ता-बाली के
कि जिनने दिल से मिटाया ख़लिश रिहाई का (सौदा )

शरद जी, अगर ग़ालिब आज ज़िंदा होते और उनकी नज़र आपके इस शेर पर जाती तो यकीनन उनके मुँह से वाह निकल जाता। चलिए ग़ालिब की कमी हम पूरा कर देते हैं... वाह! क्या खूब कहा है आपने...

जाने रह रह के मेरे दिल में खलिश सी क्यूं है
आज क्या बे-वफ़ा ने फिर से मुझे याद किया ?

जैन साहब.. बड़ी हीं दिलचस्प और काबिल-ए-गौर बात कह डाली आपने। वैसे भी इश्क में इलाज वही करता है जो रोग दे जाता है..फिर उस चारागर से हीं खलिश छुपा जाना तो खुद के हीं पाँव पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर होगा। है ना? यह रहा आपका शेर:

वाकिफ नहीं थे हम तो तौर-ए-इश्क से
चारागर से भी खलिश-ए-जिगर छुपा बैठे

सुमित जी... शायर से वाकिफ़ कराने का शुक्रिया। आपकी यह बात अच्छी है कि आप अगर महफ़िल से जाते हैं तो फिर शेर लेकर लौटते जरूर हैं। लेकिन यह क्या इस बार भी शायर का नाम गायब.. अगर आपने खुद लिखा है तो स्वरचित का मोहर हीं लगा देते:

वो ना आये तो सताती है खलिश सी दिल को,
वो जो आ जाए तो खलिश और जवां होती है

शन्नो जी, शेर कहना बड़ी बात है.. शेर कैसा है और किस अंदाज़-ओ-लहजे में लिखा है इस बारे में फिक्र करने का क्या फ़ायदा। जो भी मन में आए लिखते जाईये.. यह रही आपकी पेशकश:

मेरे दोस्त के दिल में आज कोई खलिश सी है
लगता है कोई खता हो गयी मुझसे अनजाने में

नीलम जी, चलिए शन्नो जी के कहने पर आपको अपनी महफ़िल याद तो आई। अब आ गई हैं तो लौटने का ज़िक्र भी मत कीजिएगा। एक बात और... अगली बार आने पर कुछ शेर भी समेट लाईयेगा।

अवनींद्र साहब.. महफ़िल आपकी हीं है। इसमें इज़्ज़त देने और न देने का सवाल हीं नहीं उठता। ये रहे आपके लिखे कुछ शेर:

तेरी खलिश सीने मैं इस तरह समायी है
सांस ली जब भी हमने आंख भर आई है !!

चश्मे - नम औ मेरी तन्हाई की धूप तले
खिल रहे हैं तेरी खलिश के सफ़ेद गुलाब

मंजु जी, आपने खुद का लिखा शेर पेशकर महफ़िल की शमा बुझाई। इसके लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया। यह रहा वह शेर:

एक शाम आती है तेरे मिलन का इन्तजार लिए ,
वही रात जाती है विरह की खलिश दिए

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, February 17, 2010

मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता.. चलिए याद करें हम ग़म-ए-रोज़गार से खस्ताहाल चचा ग़ालिब को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७१

होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने
शायर तो वो अच्छा है प' बदनाम बहुत है।

इस शेर को पढने के बाद आप समझ हीं गए होंगे कि आज की महफ़िल किसकी शान में सजी है। आज से बस दो दिन पहले यानि कि १५ फरवरी को इस महान शायर की मौत की १४१वीं बरसी थी। संयोग देखिए कि उससे महज़ दो दिन पहले यानि कि १३ फरवरी को इस शायर के सच्चे और एकमात्र उत्तराधिकारी फैज़ अहमद फ़ैज़ की भी बरसी थी.. फ़र्क बस इतना था कि फ़ैज़ ने १३ फ़रवरी को जन्म लिया था तो १५ फ़रवरी को ग़ालिब ने अपनी अंतिम साँसें ली थीं। आज हमारे बीच फ़ैज़ भी नहीं हैं। इसलिए हम आज अपनी महफ़िल की ओर से इन दोनों महान शायरों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

आपने शायद यह गौर किया हो कि हमारी महफ़िल में आज से पहले फ़ैज़ की चार गज़लें/नज़्में शामिल हो चुकी हैं, लेकिन हमने आज तक ग़ालिब की एक भी गज़ल महफ़िल में पेश नहीं की है। अब यह तो हो हीं नहीं सकता कि कोई महफ़िल सजे, सजती रहे और सजते-सजते सत्तर रातें गुजर जाएँ लेकिन उस महफ़िल में उस शायर का नाम न लिया जाए जिसके बिना महफ़िल क्या, शायरी की छोटी-सी गुफ़्तगू भी अधूरी है। और फिर अगर ऐसा हमारी महफ़िल में हो जाए तब तो जरूर हीं कुछ पोशीदा है, जरूर हीं कुछ ऐसा है जिसने अब तक हमें इस सिम्त बढने से रोके रखा था। कुछ न कुछ खास कारण तो जरूर है। तो लीजिए हम हीं वो कारण, वह सबब, वह मंसूबा बताए देते हैं। जैसा कि हमने बातों हीं बातों में पिछली किसी कड़ी में यह बात छेड़ी थी कि कुछ हीं दिनों में हम ग़ालिब पर एक अंक नहीं, बल्कि अंकों की एक श्रृंखला लेकर हाज़िर होने वाले हैं, तो वायदे के अनुसार आज से लेकर अगली नौ कड़ियों तक हमारी महफ़िलें ग़ालिब के नाम से रोशन होती रहेंगी। और बस यही एक वज़ह थी कि हमने अभी तक ग़ालिब को छुपाकर रखा हुआ था.. हम यह नहीं चाहते थे कि पाठकों के प्यासे दिलों पर ग़ालिब फुहार बनकर गिरें और गायब हो जाएँ, बल्कि हमारी यह मंशा थी कि ग़ालिब जब भी आएँ तो यूँकर बरसें कि बारिश सदियों तक खत्म हीं न हों। तो चलिए हम बारिश की शुरूआत करते हैं........

ग़ालिब के बारे में कुछ भी कहने के लिए गुलज़ार साहब से बेहतर और कौन हो सकता है। गुलज़ार साहब अपनी तामीर की हुई "मिर्ज़ा ग़ालिब" में ग़ालिब का परिचय कुछ इस कदर देते हैं:

गली क़ासिम जान ...

सुबह का झटपटा, चारों तरफ़ अँधेरा, लेकिन उफ़्क़ पर थोङी सी लाली। यह क़िस्सा दिल्ली का, सन १८६७ ईसवी, दिल्ली की तारीख़ी इमारतें। पराने खण्डहरात। सर्दियों की धुंध - कोहरा - ख़ानदान - तैमूरिया की निशानी लाल क़िला - हुमायूँ का मकबरा - जामा मस्जिद।

एक नीम तारीक कूँचा, गली क़ासिम जान - एक मेहराब का टूटा सा कोना -

दरवाज़ों पर लटके टाट के बोसीदा परदे। डेवढी पर बँधी एक बकरी - धुंधलके से झाँकते एक मस्जिद के नकूश। पान वाले की बंद दुकान के पास दिवारों पर पान की पीक के छींटे। यही वह गली थी जहाँ ग़ालिब की रिहाइश थी। उन्हीं तसवीरों पर एक आवाज़ उभरती है -

बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कङ पे बटेरों के क़सीदे
गुङगुङाते हुई पान की वो दाद-वो, वाह-वा
दरवाज़ों पे लटके हुए बोसिदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमयाने की आवाज़ !
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुँह जोङ के चलते हैं यहाँ
चूङी वालान के कङे की बङी बी जैसे
अपनी बुझती हुई सी आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अँधेरी सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चिराग़ॊं की शुरू होती है
असद उल्लाह ख़ान ग़ालिब का पता मिलता है।


ग़ालिब के बारे में जितना और जिस तरह का गुलज़ार साहब ने लिखा और कहा है, उतना कभी किसी और के मुँह से सुनने को नहीं मिला। गुलज़ार साहब ग़ालिब के साथ एक अलग तरह का रिश्ता रखते हैं। यही वज़ह है कि ग़ालिब पर सीरियल बनाने की बस उन्हें हीं सूझी। दूसरे लोग ऐसी हिम्मत और ऐसी हिमाकत करने से कतराते रहे और आज तक कतरा रहे हैं। इस बारे में गुलज़ार साहब का कहना है:

ग़ालिब पर किसी तहक़ीक़ का दावा नहीं मुझे, हाँ ग़ालिब के साथ एक लगाव का दावा ज़रूर करता हूँ।

स्कूल में मौलवी मुजीबुर्रहमान से उर्दू पढी और उन्हीं की बदौलत ग़ालिब, ज़ौक़, ज़फ़र, मोमिन , नासिख़ और दूसरे शोरा से तारूफ़ हुआ। बड़े-बड़े शायर और बड़ी-बड़ी शख्सियतें, उनकी स्वानही उमरी भी पढीं। लेकिन ग़ालिब की स्वानही उमरी पढते हुए, एक अजीब-ओ-ग़रीब अपनेपन का एहसास होता था। शायद इसीलिए हमारे मौलवी साहब भी उन्हें "चचा ग़ालिब" कहकर ख़ताब करते थे। ऐसा कोई ख़ताब किसी और शायर के नाम के साथ कभी नहीं लगाया था। ऐसा होता है, कुछ बड़ी-बड़ी शख़्सियतों से आप रोब खा जाते हैं, कुछ से डरते हैं और कुछ बुजुर्ग ऐसे भी होते हैं जो बुजुर्ग कम और दोस्त ज़्यादा लगते हैं। मौलवी साहब जब-जब ग़ालिब पढाते थे तो ग़ालिब पढते हुए इसी तरह का एहसास होता था।

मैं अक्सर कहा करता हूँ कि ग़ालिब के तीन मुलाज़िम थे, जो हमेशा उनके साथ रहे। एक कल्लू थे, जो आख़िर दम तक उनके साथ रहा, दूसरी वफ़ादार थीं, जो तुतलाती थीं और तीसरा मैं था। वे दोनों तो अपनी उम्र के साथ रेहाई पा गए , मैं अभी तक मुलाज़िम हूँ।

ग़ालिब की शख़्सियत में एक ज़मीन से जुड़ा हुआ मिज़ाज मिलता है.. एक आम इंसान का, जो बड़ी आसानी से ग़ालिब से आइडेंडिफ़ाई करा देता है। ग़ालिब का उधार लेना, उधार न चुका सकने के लिए पुरमज़ह बहाने तलाशना, फिर अपनी ख़फ़्त का इज़हार करना, जज़बाती तौर पर मुझे ग़ालिब के क़रीब ले जाता है। काश मेरी हैसियत होती और मैं ग़ालिब के सारे कर्ज़ चुका देता। अब हाल यह है कि मैं और मेरी नस्ल उसकी कर्ज़दार है।

’चचा ग़ालिब’ कहते हैं तो लगता है, महसूस किया है। सिर्फ़ सोचकर नहीं कह दिया। ज़िंदगी के हर मौके के लिए क़ोटेशन मुहैया कर देते हैं। ग़ालिब की शख़्सियत में मुझे कोई बात ओढी हुई नहीं लगती। शायद इसीलिए ग़ालिब की शख़्सियत इतना मुत्तास्सर करती है और ग्यारह बरस में जो भी मवाद जमा हुआ मेरे पास उससे मैंने ग़ालिब की ज़िंदगी पर एक सीरियल बनाया।

अब आप हीं बताएँ, मैंने ग़ालिब की ’ज़िंदगी बनाई’ या ग़ालिब ने मेरी ज़िंदगी बना दी।

हम भी आप से यही पूछते हैं कि किसने किसकी ज़िंदगी बनाई। वैसे हमारा तो यह मानना है कि दोनों ने हम सबकी ज़िंदगी बना दी है। क्या कहते हैं आप?

चलिए अब ग़ालिब का एक संक्षिप्त परिचय दिए देते हैं। अह्ह्हा. ये क्या, किसी ने हमसे पहले हीं "आवाज़" के इस मंच पर ग़ालिब का परिचय दे रखा है। यकीन नहीं होता तो यहाँ जाईये। परिचय देखकर आपने जान हीं लिया होगा कि आख़िर ग़ालिब कौन-सी बला थे। अगर अब भी मन मे कोई शक़-ओ-शुबह हो तो इन शेरों पर नज़र दौड़ा लीजिए... खुद-ब-खुद जान जाएँगे:

ग़ालिबे ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
रोईए ज़ार ज़ार क्या, कीजिए हाए हाए क्यों

हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पे कहना कि यूँ होता तो क्या होता


अभी तो ग़ालिब के बारे में बात करने को ९ कड़ियाँ पड़ी हैं। हम आपको यकीन दिलाते हैं कि ग़ालिब से जुड़ी कोई भी बात नहीं छूटेगी। आपको ग़ालिब की गज़लों से सराबोर न कर दिया तो कहियेगा। जब गज़ल की बात आ हीं गई है तो क्यों न आज की गज़ल से रूबरू हो लिया जाए। आज की गज़ल को अपनी आवाज़ से सजाया है उस्ताद असद अमानत अली खान साहब ने। हमने आपको इनके अब्बाजान की गाई हुई गज़ल "इंशा जी उठो" सुनवाई थी और उस गज़ल से जुड़ी कुछ कहानियों का भी ज़िक्र किया था। हमने उस दौरान "असद" साह्ब की भी कुछ बातें की थीं। अगर याद न हो तो एक बार वहाँ से हो आएँ। आज चूँकि हम ग़ालिब की गलियों में हीं खोए रह गए, इसलिए असद साहब का ध्यान हीं नहीं रहा। खैर कोई बात नहीं.. आज नहीं तो अगली बार सही। बात नहीं हुई तो क्या हुआ, हम इनकी मीठी आवाज़ का मज़ा तो ले हीं सकते हैं। वैसे मीठी आवाज़ में दर्द भरी गज़ल सुनने का लुत्फ़ कैसा होता है, यह कहने की ज़रूरत नहीं.. आप खुद दर्द के शौकीन हैं.. आप से क्या कहना! :

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जानां
के ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये _____ कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्योँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तस्वीर" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

ऐ ’हश्र’ देखना तो ये है चौदहवीं का चाँद,
या आसमां के हाथ में तस्वीर यार की।

पिछली महफ़िल में गैर-मौजूदगी के बाद सीमा जी इस बार सही समय पर आई, मतलब कि महफ़िल की शुरूआत में हीं। अब आ गई हैं तो आगे से गायब मत होईयेगा। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर:

दिल खिंच रहा है फिर उसी तस्वीर की तरफ़.
हो आयें चलिए मीर तकी मीर की तरफ़. (ज़ैदी जाफ़र रज़ा )

तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती
एक ख़्वाब सा देखा है ताबीर नहीं बनती (ख़ुमार बाराबंकवी )

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते (गुलज़ार )

शरद जी, कहते हैं ना कि "जो बात तुझमें है, तेरी तस्वीर में नहीं".. उसी तरह जो बात आपके लिखे हुए शेर में होती है, वो और कहाँ! यह रहे आपके दो स्वरचित शेर और वो भी अलग-अलग अंदाज़ में:

मिली तस्वीर इक दिन बाप की जो उस के बेटे को
तो बोला ’आप भी डैडी कभी क्या खूब लगते थे’ ।

शीशा-ए-दिल में छुप है ओ सितमगर तेरा प्यार
जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली तस्वीर-ए-यार ।

शन्नो जी, आपके आने से महफ़िल में एक जान-सी आ गई है। बस आप नीलम जी को भी खोज कर ले आएँ तो बात बने। यह रहा आपका लिखा हुआ शेर:

जब-जब शीशा-ए-दिल में एक तस्वीर सी उभरती है
पत्थरों का अहसास भी तभी आ जाता है ख्याल में.

मंजु जी, आपमें यह खासियत है कि हम चाहे कैसा भी शब्द दे दें, आप हर बार अपने हीं लिखे शेर के साथ हाज़िर होती हैं। हमें पसंद है आपकी यह अदा:

ख्यालों के रंगों से रंगी तस्वीर तेरी ,
बेकरारी से मिलन का इंतजार बाकी है .

अवनींद्र साहब, तो आप जान गए ना कि हमारी महफ़िल की शोभा बनने के लिए क्या करना होता है। बस आप सही शब्द की पहचान करें और उस शब्द पर शेर कह दें। आपके पेश किए हुए सारे शेर कमाल के हैं, किन्हीं को भी छोड़ने का मन नहीं कर रहा:

ज़रा-सी देर में जल के राख हो गया,
तेरी तस्वीर को कलेज़े से लगाकर देखा (शायर ? )

मेरे सामने ही कर दिए मेरी तस्वीर के टुकड़े
मेरे बाद उन्ही टुकड़ों को जोड़ कर रोई (अज्ञात)

ग़मों का शोर उठा है या तसव्वुर कि शाम आई
याद जब भी तेरी आई लेके अश्के -जाम आई
तेरे सामने जब भी बैठकर रोना चाहा
तेरी कसम तेरी तस्वीर बहुत काम आई (स्वरचित) वाह! क्या बात है!

सुमित जी, आपने नया शेर तो पेश किया, लेकिन यह नहीं बताया कि इसके शायर कौन हैं। यह रहा वो शेर:

मेरी तस्वीर में रंग किसी और का तो नहीं,
घेर लेते हैं मुझे सब, मैं तमाशा तो नहीं?

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, February 10, 2010

खुशबू उड़ाके लाई है गेशु-ए-यार की.. अपने मियाँ आग़ा कश्मीरी के बोलों में रंग भरा मुख्तार बेग़म ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७०

मने अपनी महफ़िल में इस मुद्दे को कई बार उठाया है कि ज्यादातर शायर अपनी काबिलियत के बावजूद पर्दे के पीछे हीं रह जाते हैं। सारी की सारी मक़बूलियत इन नगमानिगारों के शेरों को, उनकी गज़लों को अपनी आवाज़ से मक़बूल करने वाले फ़नकारों के हिस्से में जाती है। लेकिन आज की महफ़िल में स्थिति कुछ अलग है। हम आज एक ऐसी फ़नकारा की बात करने जा रहे हैं जिनकी बदौलत एक अव्वल दर्ज़े की गायिका और एक अव्वल दर्ज़े की नायिका हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी अवाम को नसीब हुई। इस अव्वल दर्ज़े की गायिका से हम सारे परिचित हैं। हमने कुछ महिनों पहले इनकी दो नज़्में आपके सामने पेश की थीं। ये नज़्में थीं- जनाब अतर नफ़ीस की लिखी "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" और जनाब फ़ैयाज हाशमी की "आज जाने की जिद्द न करो"। आप अब तक समझ हीं गए होंगे कि हम किन फ़नकारा की बातें कर रहे हैं। वह फ़नकारा जिनकी गज़ल से आज की महफ़िल सजी है,वो इन्हीं जानीमानी फ़नकारा की बड़ी बहन हैं। तो दोस्तों छोटी बहन का नाम है- "फ़रीदा खानुम" और बड़ी बहन यानि की आज की फ़नकारा का नाम है "मुख्तार बेग़म"। मुख्तार बेग़म यूँ तो उतना नाम नहीं कमा सकीं, जितना नाम फ़रीदा का हुआ, लेकिन फ़रीदा को फ़रीदा बनाने में इनका बड़ा हीं हाथ था। फ़रीदा जब महज सात साल की थीं तभी उन्होंने अपनी बड़ी बहन मुख्तार बेग़म से "खयाल" सीखना शुरू कर दिया था। अब यह तो सभी जानते हैं कि फ़रीदा के गायन में "खयाल" का क्या स्थान है। इतना हीं नहीं.. ऐसी कई सारी गज़लें(जैसे कि आज की गज़ल हीं) और नज़्में हैं जिन्हें पहले मुख्तार बेग़म ने गाकर एक रास्ते की तामीर की और बाद में उसी रास्ते पर और उस रास्ते पर बने इनके पद-चिह्नों पर चलकर फ़रीदा खानुम ने गायिकी के नए आयाम स्थापित किए। यह अलग बात है कि आज के संगीत-रसिकों को इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं ,लेकिन एक दौर था(१९३० और ४० के दशक में) जब इनकी गिनती चोटी के फ़नकारों में की जाती थी। मेहदी हसन साहब ने जिस वक्त गाना शुरू किया था, उस वक्त बेग़म अख्तर, उस्ताद बरकत अली खान और मुख़्तार बेग़म गज़ल-गायिकी के तीन स्तंभ माने जाते थे। इस बात से आप मुख्तार बेग़म की प्रतिभा का अंदाजा लगा सकते हैं। चलिए लगे हाथों हम मुख्तार बेग़म का एक छोटा-सा परिचय दिए देते हैं।

लोग इन्हें बस एक गायिका के तौर पर जानते हैं, लेकिन ये बँटवारे के पहले हिन्दुस्तानी फिल्मों की एक जानीमानी अभिनेत्री हुआ करती थीं। इन्होंने ३० और ४० के दशक में कई सारी फिल्मों में काम किया था, जिनमें "हठीली दुल्हन", "इन्द्र सभा", "हिन्दुस्तान" , "कृष्णकांत की वसीयत", "मुफ़लिस आशिक़", "आँख का नशा", "औरत का प्यार", "रामायण", "दिल की प्यास" और "मतवाली मीरा" प्रमुख हैं। १९४७ में पाकिस्तान चले जाने के बाद इन्होंने किसी भी फिल्म में काम नहीं किया, लेकिन ये गज़ल-गायिकी करती रहीं।

अभी हमने गायिका(फ़रीदा खानुम) की बात की, अब वक्त है उस नायिका की, जिसे लोग "रानी मुख्तार" के नाम से जानते हैं और वो इसलिए क्योंकि उस नायिका को नासिरा से रानी इन्होंने हीं बनाया था। नासिरा का जन्म इक़बाल बेग़म की कोख से ८ दिसम्बर १९४६ को लाहौर में हुआ था। नासिरा के अब्बाजान मुख्तार बेग़म के यहाँ ड्राईवर थे। अब चूँकि नासिरा के घर वाले उसका लालन-पालन करने में सक्षम नहीं थे इसलिए मुख्तार बेग़म ने उसे गोद ले लिया। मुख्तार बेग़म चाहती थीं कि नासिरा उन्हीं की तरह एक गायिका बने लेकिन नासिरा गायन से ज्यादा नृत्य की शौकीन थी। और इसलिए इन्होंने नासिरा को उस्ताद गु़लाम हुसैन और उस्ताद खुर्शीद से नृत्य की शिक्षा दिलवाई। एक दिन जब जानेमाने निर्देशक "अनवर कमाल पाशा" मुख्तार बेग़म के घर अपनी अगली फिल्म "सूरजमुखी" के फिल्मांकन के सिलसिले में आए तो उनकी नज़र नासिरा पर पड़ी और उन्होंने अपनी फिल्म में नासिरा से काम करवाने का निर्णय ले लिया। और इस तरह नासिरा फिल्मों में आ गईं। इस फिल्म में मुख्तार बेग़म ने गाने भी गाए थे। नासिरा को चूँकि मुख्तार बेग़म रानी बेटी कहकर पुकारती थीं, इसलिए नासिरा को रानी मुख्तार का नाम मिल गया। वैसे आपको शायद हीं यह पता हो कि जानीमानी अभिनेत्री और गायिका "नूर जहां" को यह नाम मुख्तार बेग़म ने हीं दिया था, जो कभी "अल्लाह वसई" हुआ करती थीं।

आज की फ़नकारा के बारे में ढेर सारी बातें हो गईं। अब क्यों न हम आज की गज़ल के गज़लगो से भी रूबरू हो लें। तो आज की गज़ल के गज़लगो कोई और नहीं "मुख्तार बेग़म" के पति जनाब "आग़ा हश्र कश्मीरी" हैं। "आग़ा" साहब का शुमार पारसी थियेटर के स्थापकों में किया जाता है। इन्होंने शेक्सपियर के "मर्चेंट आफ़ वेनीस" का जो उर्दू रूपांतरण किया था, वह आज भी उर्दू की एक अमूल्य कॄति के तौर पर गिनी जाती है.. और उस पुस्तक का नाम है "यहूदी की बेटी"। हमें इस बात का पक्का यकीन है कि आप इस पुस्तक से जरूर वाकिफ़ होंगे, भले हीं आप यह न जानते हों कि इसकी रचना "आग़ा" साहब ने हीं की थी। आग़ा साहब के बारे में बाकी बातें कभी अगली कड़ी में कड़ेंगे, अभी हम उनका लिखा एक शेर देख लते हैं:

वो मुक़द्दर न रहा और वो ज़माना न रहा
तुम जो बेगाने हुए, कोई यगाना न रहा।


इस शेर के बाद अब पेश है कि आज की वह गज़ल जिसके लिए हमने यह महफ़िल सजाई है। इस गज़ल को हमने "औरत का प्यार" फिल्म से लिया है, जिसका निर्देशन श्री ए० आर० करदर साहब ने किया था। यह गज़ल राग दरबारी में संगीतबद्ध की गई है। तो चलिए गज़ल की मासूमियत, गज़ल की रूमानियत के साथ-साथ इस राग की बारीकियों से भी रूबरू हो लिया जाए:

चोरी कहीं खुले ना नसीम-ए-बहार की,
खुशबू उड़ाके लाई है गेशु-ए-यार की।

गुलशन में देखकर मेरे मस्त-ए-शबाब को,
शरमाई जा रही है जवानी बहार की।

ऐ मेरे दिल के चैन मेरे दिल की रोशनी,
और सुबह कई दे शब-ए-इंतज़ार की।

जुर्रत तो देखिएगा नसीम-ए-बहार की,
ये भी बलाएँ लेने लगी जुल्फ़-ए-यार की।

ऐ ’हश्र’ देखना तो ये है चौदहवीं का चाँद,
या आसमां के हाथ में _____ यार की।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मिज़ाज" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

मेरी ज़िन्दगी के चिराग का, ये मिज़ाज कुछ नया नहीं
अभी रोशनी अभी तीरगी, ना जला हुआ ना बुझा हुआ

बड़े हीं मिज़ाज से "मिज़ाज" शब्द की सबसे पहले शिनाख्त शरद जी ने की। शरद जी इस बार आपके अंदाज बदले-बदले से हैं। हर बार की तरह आपका खुद का लिखा शेर किधर है। चलिए कोई बात नहीं.. मुदस्सर हुसैन साहब का यह शेर भी किसी मामले में कम नहीं है:

गए दिनों में मुहब्बत मिज़ाज उसका था
मगर कुछ और ही अन्दाज़ आज उसका था।

निर्मला जी, हौसला-आफ़जाई के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया। आप अपनी ये दुआएँ इसी तरह हमपे बनाए रखिएगा।

मंजु जी, क्या बात है! भला ऐसा कौन-सा हुजूर है, जिसका मिज़ाज इतनी खुशामदों के बाद भी नहीं बन रहा। अब और कितनी मिन्नतें चाहिए उसे:

मौहब्बत का मिजाज उनका अब तक ना बन सका ,
मेरे हजूर!क्या खता है हम से कुछ तो अर्ज कर . (स्वरचित)

सुमित जी, यह क्या... बस इसी कारण से आप हमारी महफ़िल से लौट जाते थे क्योंकि आपको दिए गए शब्द पर शेर नहीं आता था। आपको पता है ना कि यहाँ पर किनका लिखा शेर डालना है, ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। जब आप खुद कुछ लिख न पाएँ तो दूसरे का शेर हीं पेश कर दिया करें। जैसा कि आपने इस बार किया है:

कोइ हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।

ये रहे आपके पूछे हुए शब्दों के अर्थ:
पुख़्ताकार: निपुण
तीर ख़ता होना: तीर निशाने से चूक जाना

शन्नो जी, ऐसी क्या नाराज़गी थी कि आपने हमारी महफ़िल से मुँह हीं मोड़ लिया था। अब हम यह कितनी बार कितनों से कहें कि इस महफ़िल का जो संचालन कर रहा है (यानि कि मैं) वो खुद हीं इस लायक नहीं कि धुरंधरों के सामने टिक पाए.. फिर भी उसमें इतनी जिद्द है कि वो महफ़िल लेकर हर बार हाज़िर होता है। जब आपको किसी महफ़िल में शरीक होना हो तो इसमें कोई हानि नहीं कि आप खुद को भी एक धुरंधर मान बैठें, हाँ अगर आप किसी गज़ल की कक्षा में हैं तब आप एक शागिर्द बन सकती हैं। उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी बात समझ गई होंगी। तो इसी खुशी में पेश है आपका यह ताज़ा-तरीन शेर:

जिन्दगी के मिजाज़ अक्सर बदलते रहते हैं
और हम उसे खुश करने में ही लगे रहते हैं.

लगता है कि पिछली महफ़िल में कही गई मेरी कुछ बातों से सीमा जी और शामिख साहब नाराज़ हो गएँ। अगर ऐसी बात है तो मैं मुआफ़ी चाहता हूँ। लौट आईये.. आप दोनों। आपके बिना यह महफ़िल अधूरी है।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, February 3, 2010

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था.. इक़बाल अज़ीम के बोल और नय्यारा नूर की आवाज़.. फिर क्यूँकर रंज कि बुरा हुआ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६९

इंसानी मन प्रशंसा का भूखा होता है। भले हीं उसे लाख ओहदे हासिल हो जाएँ, करोड़ों का खजाना हाथ लग जाए, फिर भी सुकून तब तक हासिल नहीं होता, जब तक कोई अपना उसके काम, उसकी नियत को सराह न दे। ऐसा हीं कुछ आज हमारे साथ हो रहा है। जहाँ तक आप सबको मालूम है कि आज महफ़िल-ए-गज़ल की ६९वीं कड़ी है और यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते हमने दस महिने का सफ़र तय कर लिया है.. इस दौरान बहुत सारे मित्रों ने टिप्पणियों के माध्यम से हमारी हौसला-आफ़ज़ाई की और यही एकमात्र कारण था जिसकी बदौलत हमलोग निरंतर बिना रूके आगे बढते रहे.. फिर भी दिल में यह तमन्ना तो जरूर थी कि कोई सामने से आकर यह कहे कि वाह! क्या कमाल की महफ़िल सजाते हैं आप.. गज़लों को सुनकर और बातों को गुनकर दिल बाग-बाग हो जाता है। यही एक कमी खलती आ रही थी जो दो दिन पहले पूरी हो गई। दिल्ली के प्रगति मैदान नें चल रहे वार्षिक विश्व पुस्तक मेला में लगे "हिन्द-युग्म" के स्टाल पर जब आवाज़ का कार्यक्रम रखा गया तो देश भर से आवाज़ के सहयोगी और प्रशंसक जमा हुए और उस दौरान कई सारे लोगों ने हमसे महफ़िल-ए-गज़ल की बातें कीं और आवाज़ के इस प्रयास को तह-ए-दिल से सराहा। कईयों को इस बात का आश्चर्य था कि हम ऐसी सदाबहार लेकिन बहुतों के द्वारा भूला दी गई गज़लें कहाँ से चुनकर लाते हैं। और न सिर्फ़ गज़लें हीं बल्कि उन गज़लों और गज़लों से जुड़े फ़नकारों के बारे में ऐसी अमूल्य जानकारियाँ हम ढूँढते हैं तो कहाँ से! कहते हैं ना कि आपकी मेहनत तब सफ़ल हो जाती हैं जब आपकी मेहनत का एक छोटा-सा हिस्सा भी किसी को खुशियाँ दे जाता है... आज हम उसी सफ़लता की अनुभूति कर रहे हैं। हम बता नहीं सकते कि इस आलेख को लिखते समय हमारे दिल और दिमाग की स्थिति क्या है... दिल को छोड़िये हमारा तो अपनी अंगुलियों की जुंबिश पर कोई नियंत्रण नहीं रहा... इसलिए इस कड़ी में अगर काम से ज्यादा बेकाम की बातें हो जाएँ (या हो रही हैं) तो इसमें हमारे चेतन मन का कोई दोष नहीं.. कुछ तो अचेतन है जो हमें लीक से हटने पर मजबूर कर रहा है। वैसे हमें यह पता है कि हमें इतने से हीं खुश नहीं होना है.. अभी और आगे जाना है, अभी और हदें ढकेलनी हैं, गज़लों की वो सारी किताबें खोज निकालनी हैं, जिनके जिल्द तक फट चुके हैं, दीमक जिन्हें कुतर चुका है, लेकिन सपहों पे पड़े हर्फ़ दूर से हीं चमक रहे हैं और हमें अपनी ओर खींच रहे हैं। आपका साथ अगर इसी तरह मिलता रहा तो हमें पूरा यकीन है कि हम उन सारी किताबों को एक नया रूप देने में जरूर सफ़ल होंगे। आमीन!

चलिए.. बातें बहुत हो गईं, अब आज की महफ़िल की विधिवत शुरूआत करते हैं। आज की गज़ल को जिन फ़नकारा ने अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है, उनके सीधेपन और चेहरे से टपकती मासूमियत की मिसालें दी जाती हैं। कहते हैं कि संगीत की दुनिया में उनका आना एक करामात के जैसा था... जो भी हुआ बड़े हीं आनन-फ़ानन में हो गया। बात १९६८ की है। ये फ़नकारा लाहौर के नेशनल कालेज आफ़ आर्ट में टेक्स्टाईल डिजाईन में डिप्लोमा कर रही थीं। उस दौरान कालेज में कई सारे कार्यक्रम होते रहते थे। वैसे हीं किसी एक कार्यक्रम में इस्लामिया कालेज के प्रोफ़ेसर इसरार ने इन्हें गाते हुए सुन/देख लिया। प्रोफ़ेसर साहब ने इनसे युनिवर्सिटी के रेडियो पाकिस्तान के कार्यक्रमों के लिए गाने का अनुरोध किया... और फिर देखिए एक वह दिन था और एक आज का दिन है। आपने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह फ़नकारा, जिनकी हम बातें कर रहे हैं , उनका नाम है नय्यारा नूर। "नय्यारा" का जन्म १९५० में असम में हुआ था। ये लोग रहने वाले तो थे अमृतसर के लेकिन चूँकि व्यवसायी इनका मुख्य पेशा था, इसलिए ये लोग असम में जा बसे थे। "नय्यारा" के अब्बाजान की गिनती मुस्लिम लीग के अगली पंक्ति के सदस्यों में की जाती थी। ठीक-ठाक वज़ह तो नहीं मालूम लेकिन शायद इसी कारण से इनका परिवार १९५८ में पाकिस्तान चला गया। १९७१ आते-आते , नय्यारा ने टीवी और फिल्मों के लिए गाना शुरू कर दिया था। "घराना" और "तानसेन" जैसी फिल्मों ने इन्हें आगे बढने का मौका दिया। पीटीवी के एक कार्यक्रम "सुखनवर" में इनके द्वारा रिकार्ड की गई गज़ल "ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज मुक़ाबिल आ जाए, मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए" ने इनकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए। वैसे देखा जाए तो यह गज़ल इन्हीं के लिए लिखी मालूम होती है। जानकारी के लिए बता दें कि इस गज़ल को लिखा था बहज़ाद लखनवी ने और संगीत से सजाया था मास्टर मंज़ूर हुसैन ने। नय्यारा नूर बेग़म अखर से काफ़ी प्रभावित थीं। कालेज के दिनों में भी वो बेग़म अख्तर की गज़लें और नज़्में गाया करती थीं। उन गज़लों ने हीं नय्यारा को लोगों की नज़रों में चढाया था। बेगम अख्तर की गायिकी का नय्यारा पर इस कदर असर था कि वो बेग़म की गज़लें पुराने तरीके से आर एम पी ग्रामोफ़ोन रिकार्ड प्ल्यर्स पर हीं सुना करती थीं, जबकि आडियो कैसेट्स बाज़ार में आने लगे थे। नय्यारा गायिकी की दूसरी विधाओं की तुलना में गज़लों को बेहतर मानती थीं(हैं)। इनका मानना है कि "गज़लें श्रोताओं पर गहरा असर करती हैं और यह असर दीर्घजीवी होता है।" नय्यारा ने अनगिनत गज़लें गाई है। उनमें से कुछ हैं- "आज बाज़ार में पा-बजौला चलो", "अंदाज़ हु-ब-हु तेरी आवाज़-ए-पा का था", "रात यूँ दिल में तेरी खोई हुई याद आई", "ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर", "कहाँ हो तुम", "वो जो हममें तुममें करार था", "रूठे हो तुम, तुमको कैसे मनाऊँ पिया".... नय्यारा पाकिस्तान के जाने-माने गायक और संगीत-निर्देशक "मियाँ शहरयार ज़ैदी" की बीवी हैं। नय्यारा के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है..लेकिन वो सब कभी दूसरी कड़ी में..

फ़नकारा के बाद अब वक्त है इस गज़ल के गज़लगो से रूबरू होने का, गुफ़्तगू करने का। चूँकि हम भी लेखन से हीं ताल्लुक रखते हैं, इसलिए जायज है कि गज़लगो का नाम आते हीं हममें रोमांच की लहर दौड़ पड़े। लेकिन क्या कीजियेगा... इन शायर की किस्मत भी ज्यादातर शायरों के जैसी हीं है... या फिर ये कहिए कि हमारी किस्मत हीं खराब है कि हमें अपनी धरोहर संभालकर रखना नहीं आता.. तभी तो इनके बारे में जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हैं। खोज-बीन करने पर बस एक फ़ेहरिश्त हासिल हुई है, जिसमें इनकी लिखी कुछ गज़लें दर्ज़ हैं। अब चूँकि हमें इन गज़लों से ज्यादा कुछ भी नहीं मालूम इसलिए हम यही फ़ेहरिश्त आपके सामने पेश किए देते हैं:

१) मगर जुबां से कभी हमने कुछ कहा तो नहीं
२) हमें जिन दोस्तों ने बेगुनाही की सज़ा दी है
३) तुमने दिल की बात कह दी आज यह अच्छा हुआ
४) हँसना नहीं आता मुझे, यह बात नहीं है
५) ये मेरी अना की शिकस्त है, न दवा करो, न दुआ करो
६) उनको मेरी वफ़ाओं का इकरार भी नहीं
७) सोज़-ए-ग़म से जिस कदर शिकवा सदा होते हैं लोग
८) न मिन्नत किसी की, न शिकवा किसी से
९) लाख मैं सबसे खफ़ा होके घर को चला
१०) पैमाने छलक हीं जाते हैं जब कैफ़ का आलम होता है

आपको इनकी ये सब गज़लें या फिर बाकी की और भी गज़लें पढनी हों तो यहाँ जाएँ। अहा! देखिए तो इस हरबराहट में हम इन शायर का नाम बताना हीं भूल गए। तो इन्हीं अज़ीम-उस-शान शायर "इक़बाल अज़ीम" का एक शेर सुनाकर हम इस गलती को सुधारना चाहेंगे:

हमें जिन दोस्तों ने बेगुनाही की सज़ा दी है,
हमारा ज़र्फ़ देखो हमने उनको भी दुआ दी है।


इस शेर के बाद अब पेश है कि आज की वह गज़ल जिसके लिए हमने यह महफ़िल सजाई है। तो डूब जाईये दर्द की इस मदहोशी में... हाँ चलते-चलते यह भी बता दें कि यहाँ पर दो-तीन शेर ज्यादा हीं हैं... वैसे भी शेर हैं जो नय्यारा नूर ने इस गज़ल में नहीं गाए। पर जैसा कि ग़ालिब ने कहा है कि "मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है", इसलिए न हमें शिकायत है और यकीन मानिए आपको भी कोई शिकायत नहीं होगी:

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था, सर-ए-बज़्म रात ये क्या हुआ
मेरी आँख कैसे छलक गयी, मुझे रंज है ये बुरा हुआ

जो नज़र बचा के गुज़र गये, मेरे सामने से अभी अभी
ये मेरे ही शहर के लोग थे, मेरे घर से घर है मिला हुआ

मेरी ज़िन्दगी के चिराग का, ये ____ कुछ नया नहीं
अभी रोशनी अभी तीरगी, ना जला हुआ ना बुझा हुआ

मुझे हमसफ़र भी मिला कोई, तो शिकस्ता हाल मेरी तरह
कई मंजिलों का थका हुआ, कई रास्तों का लुटा हुआ

मुझे जो भी दुश्मन-ए-जाँ मिला, वो ही पुख़्ताकार जफ़ा मिला
न किसी के जख़्म गलत पड़े, न किसी का तीर ख़ता हुआ

मुझे रास्ते मे पड़ा हुआ, एक अजनबी का खत मिला
कहीं खून-ए-दिल से लिखा हुआ, कहीं आँसुओं से मिटा हुआ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "फरियाद" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

किसी के दिल की तू फरियाद है क़रार नहीं,
खिलाए फूल जो ज़ख्मों के वो बहार नहीं

नज़्म को सुनकर इस शब्द की सबसे पहले पहचान की सीमा जी ने। सीमा जी, आप जिस तरह से एक हीं टिप्पणी में सारे शेर एक के बाद एक पेश करती हैं, उससे हमें बड़ी हीं सहूलियत होती है। मैं बाकी मित्रों से भी यह दरख्वास्त करना चाहता हूँ कि आप अपनी पेशकश को एक टिप्पणी या फिर दो टिप्पणियों तक हीं सीमित रखें। इसके लिए आप सबों को अग्रिम धन्यवाद। हम वापस आते हैं सीमा जी की टिप्पणी पर। तो ये रहे आपके शेर:

उन्हीं के इश्क़ में हम नाला-ओ-फ़रियाद करते हैं
इलाही देखिये किस दिन हमें वो याद करते हैं। (ख़्वाजा हैदर अली 'आतिश')

ख़ुदा से हश्र में काफ़िर! तेरी फ़रियाद क्या करते?
अक़ीदत उम्र भर की दफ़अतन बरबाद क्या करते? (सीमाब अकबराबादी)

नाला, फ़रियाद, आह और ज़ारी,
आप से हो सका सो कर देखा| (ख़्वाजा मीर दर्द)

सीमा जी के बाद इस महफ़िल में शरद जी और मंजु जी खुद के लिखे शेरों के साथ हाज़िर हुए। मंजु जी, पिछली बार भले हीं हमने आपको उलाहना दी थी, लेकिन इस बार उसी गलती (आपकी नहीं... हमारी) के लिए हम आपकी प्रशंसा करने को बाध्य हैं... आप भले हीं देर आईं लेकिन दुरूस्त तो आईं। ये रहे आप दोनों के शेर क्रम से:

उन हसीं लम्हों को फिर आबाद करना
तुम लडकपन के भी वो दिन याद करना
लौट आएं फिर से वो गुज़रे ज़माने
बस खुदा से इक यही फ़रियाद करना । (शरद जी)

मेरे मालिक !तेरे दरबार में ,
करूँ बार - बार फरियाद मैं .
मानव में उदय हो मानवतावाद ,
न होगा फिर आतंक का नामोनिशान (मंजु जी)

सुमित जी और राज सिंह जी, आप दोनों बड़ी हीं मुद्दतों के बाद इस महफ़िल में नज़र आए। राज सिंह जी, यह क्या.. जब आप हमारी महफ़िल तक का सफ़र तय कर हीं लेते हैं तो बस मंज़िल (टिप्पणी) से पहले लौट क्यों जाते हैं... उम्मीद करता हूँ कि आप आगे से ऐसा नहीं करेंगे। सुमित जी, यह रही आपकी पेशकश:

कोई फ़रियाद तेरे दिल में दबी हो जैसे,
तूने आँखों से कोई बात कही हो जैसे। (फ़ैज़ अनवर)

शामिख साहब, गणतंत्र दिवस की आपको भी ढेरों बधाईयाँ। आपने ग़ालिब के कई सारे शेर हमारी महफ़िल के सामने रखे... इसी खुशी में हम आपसे यह खुशखबरी बाँटना चाहेंगे कि आने वाले कुछ हीं दिनों में हम ग़ालिब पर एक शृंखला (बस एक महफ़िल नहीं..बल्कि महफ़िलों की लड़ी) लेकर हाज़िर होने वाले हैं। तो संभालिए अपनी धड़कन को और उठने दीजिए चिलमन को :) उससे पहले पेश हैं आपके ये शेर:

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
दिल जिगर तश्ना-ए-फ़रियाद आया (ग़ालिब)

चार लफ़्ज़ों में कहो जो भी कहो
उसको कब फ़ुरसत सुने फ़रियाद सब (जावेद अख्तर)

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते (अकबर इलाहाबादी)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, January 27, 2010

दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है.. मुज़फ़्फ़र वारसी के शब्दों के सहारे पूछ रही हैं मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६८

पिछली दो कड़ियों से न जाने क्यों वह बात बन नहीं पा रही थी, जिसकी दरकार थी। वैसे कारण तो हमें भी पता है और आपको भी। हम इसलिए नहीं बताना चाहते कि खुद की क्या टाँग खींची जाए और आप तो आप ठहरे.. भला आप किसी का दिल क्यों दुखाने लगे। चलिए हम हीं बताए देते हैं... कारण था आलस्य। जैसा कि हमने पिछली कड़ी में यह वादा किया था कि अगली बार चाहे कितनी भी ठंढ क्यों न हो, चाहे कुहरा कितना भी घना क्यों न हो, हम अपनी महफ़िल को पर्याप्त समय देंगे.. बस ४५ मिनट में हीं इति-श्री नहीं कर देंगे और यह तो सभी जानते हैं कि जो वादा न निभाए वो प्यादा कैसा... माफ़ कीजिएगा शहजादा कैसा तो हमें वादा निभाना हीं था, आखिर हम भी तो कहीं के शहजादे हैं.... हैं ना, कहीं और के नहीं तो आपके दिलों के.... मानते हैं ना आप? हमें लगता है कि बातें ज्यादा हो गईं, इसलिए अब काम पर लग जाना चाहिए। काम से याद आया, हमने इन बातों को शुरू करने से पहले कुछ कहा था.. हाँ, यह कहा था कि आप किसी का दिल नहीं दुखाना चाहेंगे। तो हमारी आज की महफ़िल का संदेश भी यही है.. और आज की नज़्म इसी संदेश को पुख्ता करती है। शायर के लफ़्ज़ों में कहें तो "दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है, किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।" आदमी और ज़िंदगी की सही परिभाषा इससे बढकर क्या हो सकती है! कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर शायर न होते तो इन बातों को हम तक पहुँचाता कौन। अब शायर की बात जो चल हीं निकली है तो लगे हाथों शायर से रूबरू भी हो लेते हैं। इस बेहतरीन नज़्म को लिखने वाले शायर का नाम है "मुज़फ़्फ़र वारसी"। अपनी पुस्तक "दर्द चमकता है- मुज़फ़्फ़र वारसी की गज़ले" के प्राक्कथन में सुरेश कुमार लिखते हैं: पाकिस्तानी शायरी में मुज़फ़्फ़र वारसी का नाम एक जगमगाते हुए नक्षत्र की तरह है। उन्होंने यद्यपि उर्दू शायरी की प्रायः सभी विधाओं में अपने विचारों को अभिव्यक्ति दी है। किन्तु उनकी लोकप्रियता एक ग़ज़लगों शायर के रूप में ही अधिक है।

मिरी जिंदगी किसी और की, मिरे नाम का कोई और है,
मिरा अक्स है सर-ए-आईना,पस-ए-आईना कोई और है।

जैसा दिलकश और लोकप्रिय शे’र कहने वाले मुज़फ़्फ़र वारसी ने साधारण बोलचाल के शब्दों को अपनी ग़ज़लों में प्रयोग करके उन्हें सोच-विचार की जो गहराइयाँ प्रदान की हैं, इसके लिए उन्हें विशेष रूप से उर्दू अदब में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मुज़फ़्फ़र वारसी पाकिस्तान के उन चन्द शायरों में से एक हैं, जिनकी ख्याति सरहदों को लाँघ कर तमाम उर्दू संसार में प्रेम और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए खुशबू की तरह बिखरी हुई है। भारत और पाकिस्तान के अनेक विख्यात ग़ज़ल गायकों ने उनकी ग़ज़लों को अपना स्वर देकर उन्हें हिन्दी और उर्दू काव्य-प्रेमियों के बीच प्रतिष्ठित किया है। भारत से प्रकाशित होने वाली प्रायः सभी उर्दू पत्रिकाओं में कई दशकों से उनकी शायरी प्रकाशित हो रही है और वे भारत में भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने कि पाकिस्तान में। ‘बर्फ़ की नाव’, ‘खुले दरीचे बन्द हवा’, ‘कमन्द’ मुज़फ़्फ़र वारसी की ग़ज़लों के प्रसिद्ध उर्दू संग्रह हैं। दर्द चमकता है देवनागरी में उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है।
मुज़फ़्फ़र वारसी एक ऐसे शख्सियत हैं जिनकी उपलब्धियों को बस एक पैराग्राफ़ में नहीं समेटा जा सकता। हमारी मजबूरी है कि हम इनके बारे में आज इससे ज्यादा नहीं लिख सकते, लेकिन वादा करते हैं कि अगली बार जब भी इनकी कोई गज़ल या कोई नज़्म हमारी महफ़िल में शामिल होगी, हम पूरी की पूरी महफ़िल इनके हवाले कर देंगे।

शायर के बाद अब हम इस्तेकबाल करते हैं आज की नज़्म को अपनी आवाज़ से सजाने वाली फ़नकारा का। इन फ़नकारा के बारे में यह कहना हीं काफ़ी होगा कि हर उदीयमान गायक की प्रेरणास्रोत स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने भी जब अपने कैरियर का आगाज किया तो उनपर इनकी गायकी का प्रभाव था। जन्म से अल्ला वसई और प्यार से नूरजहां कही जाने वाली इन फ़नकारा का जन्म २१ सितंबर १९२६ को अविभाजित भारत भारत के कसूर(पंजाब का एक छोटा-सा शहर) नामक स्थान पर हुआ था। (सौजन्य: जागरण): नूरजहां का जन्म पेशेवर संगीतकार मदद अली और फतेह बीबी के परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता की ११ संतानों में एक थीं। संगीतकारों के परिवार में जन्मीं नूरजहां का बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा लगाव था। नूरजहां ने पांच-छह साल की उम्र से ही गायन शुरू कर दिया था। उनकी बहन आइदान पहले से ही नृत्य और गायन का प्रशिक्षण ले रही थीं। उन दिनों कलकत्ता थिएटर का गढ़ हुआ करता था। वहां परफार्मिंग आर्टिस्टों, पटकथा लेखकों आदि की काफी मांग थी। इसी को ध्यान में रखकर नूरजहां का परिवार १९३० के दशक के मध्य में कलकत्ता चला आया। जल्द ही नूरजहां और उनकी बहन को वहां नृत्य और गायन का अवसर मिल गया। उनकी गायकी से प्रभावित होकर संगीतकार गुलाम हैदर ने उन्हें के डी मेहरा की पहली पंजाबी फिल्म शीला उर्फ पिंड दी कुड़ी में बाल कलाकार की संक्षिप्त भूमिका दिलाई। १९३० के दशक के उत्तरा‌र्द्ध तक लाहौर में कई स्टूडियो अस्तित्व में आ गए। गायकों की बढ़ती मांग को देखते हुए नूरजहां का परिवार १९३७ में लाहौर आ गया। डलसुख एल पंचोली ने बेबी नूरजहां को गुल-ए-बकवाली फिल्म में भूमिका दी। इसके बाद उनकी यमला जट (१९४०), चौधरी फिल्म प्रदर्शित हुई। इनके गाने काफी लोकप्रिय हुए। वर्ष १९४२ में नूरजहां ने अपने नाम से बेबी शब्द हटा दिया। इसी साल उनकी फिल्म खानदान आई जिसमें पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसी फिल्म के निर्देशक शौकत हुसैन रिजवी के साथ उन्होंने शादी की। वर्ष १९४३ में नूरजहां बंबई चली आईं। महज चार साल की संक्षिप्त अवधि के भीतर वह अपने सभी समकालीनों से काफी आगे निकल गईं। भारत और पाकिस्तान दोनों जगह के पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी क्लासिक फिल्मों के आज भी दीवाने हैं। अनमोल घड़ी (१९४६) और जुगनू (१९४७) उनकी सबसे बड़ी हिट फिल्म है। अनमोल घड़ी का संगीत नौशाद ने दिया था। उसके गीत आवाज दे कहां है, जवां है मोहब्बत, और मेरे बचपन के साथी जैसे गीत आज भी लोगों की जुबां पर हैं। नूरजहां विभाजन के बाद अपने पति के साथ बंबई छोड़कर लाहौर चली गईं।

रिजवी ने एक स्टूडियो का अधिग्रहण किया और उन्होंने शाहनूर स्टूडियो शुरू किया। शाहनूर प्रोडक्शन ने फिल्म चन्न वे (१९५०) का निर्माण किया जिसका निर्देशन नूरजहां ने किया। यह फिल्म बेहद सफल रही। इसमें तेरे मुखड़े पे काला तिल वे जैसे लोकप्रिय गाने थे। उनकी पहली उर्दू फिल्म दुपट्टा थी। इसके गीत चांदनी रातें...चांदनी रातें आज भी लोगों की जुबां पर हैं। जुगनू और चन्ना वे की ही तरह इसका भी संगीत फिरोज निजामी ने दिया था। नूरजहां की आखिरी फिल्म बतौर अभिनेत्री बाजी थी जो १९६३ में प्रदर्शित हुई। उन्होंने पाकिस्तान में १४ फिल्में बनाईं जिसमें १० उर्दू फिल्में थीं। उन्होंने अपने से नौ साल छोटे एजाज दुर्रानी से दूसरी शादी की। पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें अभिनय को अलविदा करना पड़ा। हालांकि, उन्होंने गायन जारी रखा। पाकिस्तान में पा‌र्श्व गायक के तौर पर उनकी पहली फिल्म जान-ए-बहार (१९५८) थी। उन्होंने अपने आधी शताब्दी से अधिक के फिल्मी कैरियर में उर्दू, पंजाबी और सिंधी आदि भाषाओं में १० हजार गाने गाए। उन्हें मनोरंजन के क्षेत्र में पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान तमगा-ए-इम्तियाज से सम्मानित किया गया था। दिल का दौरा पड़ने से नूरजहां का २३ दिसंबर २००० को निधन हो गया।
यह थी नूरजहां की संक्षिप्त जीवनी। वैसे क्या आपको पता है कि महज ४ सालों में हीं नूरजहां ने हिन्दी-फिल्मी संगीत के आसमान में अपनी स्थिति एक खुर्शीद-सी कर ली थी और इसी कारण इन्हें मल्लिका-ए-तरन्नुम कहा जाने लगा था और यकीन मानिए आज तक यह उपाधि उनसे कोई छीन नहीं पाया है। कहते हैं कि १९४७ में जब नूरजहां ने पाकिस्तान जाने का फैसला लिया था तो खुद युसूफ़ साहब यानि कि दिलीप कुमार ने इनसे हिन्दुस्तान में बने रहने का आग्रह किया था.. अलग बात है कि नूरजहां ने उनकी यह पेशकश यह कहकर ठुकरा दी थी कि "मैं जहां पैदा हुई हूं वहीं जाउंगी।" उनका निर्णय सही था या गलत यह तो वही जानें लेकिन शायद उनके इसी स्वाभिमान को कभी-कभार कुछ लोग उनका घमंड मान बैठते थे। उदाहरण के लिए: कथा-साहित्य के किंवदंती पुरुष सआदत हसन मंटो की नजर में वह मल्लिका-ए-तरन्नुम तो थीं, पर उन्हें वह बददिमाग और नखरेबाज मानते थे। ऐसा क्यों..अगर आप यह जानना चाहते हों तो नूरजहां के अगले गाने का इंतज़ार करें, तभी इस राज़ पर से परदा उठाया जाएगा। कहते हैं ना कि इंतज़ार का फल मीठा होता है, इसलिए "थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए"।

इन बातों के बाद अब वक्त है आज की नज़्म का, जिसे हमने १९६८ में रीलिज हुई फिल्म अदालत से लिया है। नज़्म में संगीत है जनाब तस्सादक हुसैन का। बोल हैं....आप तो जानते हैं कि इस नज़्म में बोल किसके हैं। इस गीत में बड़े हीं तफ्शील से यह बताया गया है कि सही आदमी की पहचान कैसे की जाए। आपको भी जानना हो तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है आज की प्रस्तुति:

दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।

किसी को तुझ से गिला तेरी बेरूखी का न हो,
जो हो चुका है तेरा तू अगर उसी का न हो,
फिर उसके वास्ते ये क़ायनात भी क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।

किसी के दिल की तू _____ है क़रार नहीं,
खिलाए फूल जो ज़ख्मों के वो बहार नहीं,
जो दूसरों के लिए ग़म हो वो खुशी क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।

ये क्या कि आग किसी की हो और कोई जले,
बने शरीक-ए-सफ़र जिसका उससे बचके चले,
जो फ़ासले न मिटा दे वो प्यार हीं क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सूरत" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

जो भी देखे उनकी सूरत
झुकी झुकी अंखियों से प्यार करे

नज़्म को सुनकर इस शब्द की सबसे पहले सही पहचान की सीमा जी ने। हमारी महफ़िल की शोभा बनना सीमा जी आपकी आदत हो चली है। बड़ी हीं भली आदत है..इसे कभी बिगड़ने मत दीजियेगा। ये रही आपकी पेशकश:

ऐ बादशाह्-ए-ख़बाँ-ए-जहाँ तेरी मोहिनी सुरत पे क़ुर्बाँ
की मैं ने जो तेरी जबीं पे नज़र मेरा चैन गया मेरी नींद गई (बहादुर शाह ज़फ़र)

ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा
मेरी सुरत बावली बोली-
...मेरा कौन कसाला झेले? (माखनलाल चतुर्वेदी)

तुम्हारी सुरत पे आईना ठहरता नही
इस सुरत से जमाना गुजरता नही (अजय निदान)

शरद जी ने खुद के लिखे शेर के साथ महफ़िल में हाज़िरी लगाई। साथ-साथ आपने दूसरे शायरों के शेर भी कहे:

जब से मेघों से मुहब्बत हो गई है, सूर्य की धुंधली सी सूरत हो गई है,
झूमता है चन्द्र मुख को देख सागर, आदमी सी इसकी आदत हो गई है। (स्वरचित)

हालाते जिस्म सूरते जाँ और भी खराब, चारों तरफ़ खराब यहाँ और भी खराब,
सोचा था उनके देश में मंहगी है ज़िन्दगी, पर ज़िन्दगी का भाव वहाँ और भी खराब। (दुष्यन्त कुमार)

अजीब सूरते हालात होने वाली है, सुना है, अब के उसे मात होने वाली है,
मैं थक के गिरने ही वाला था उसके कदमों में, मेरी नफ़ी मेरा इसबात होने वाली है। (अमीर क़ज़लबाश)

अवध जी, आपने हबीब वली साहब की बेहतरीन गज़लों/नज़्मों का जो लेखाजोखा हमारे सामने रखा है, हम कोशिश करेंगे कि आने वाले दिनों में ये सारी हीं महफ़िल की रौनक बन जाएँ। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। ये रहे आपकी तरकश के तीर:

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती.
मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती. (मिर्ज़ा ग़ालिब)

या कोई जान बूझ कर अनजान बन गया
या फिर यही हुआ मेरी सूरत बदल गयी। (अदम)

आगे की महफ़िल को हर बार की तरह हीं शामिख जी ने अकेले संभाला। आपने कई सारे शेर पेश किए। हम उनमें से कुछ मोती चुनकर लाए हैं:

जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग (क़तील शिफ़ाई)

कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चुटख़े हुये हैं कब से
टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझ को (गुलज़ार)

देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद
वो कौन है जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती (निदा फ़ाज़ली)

वो प्यारी प्यारी सूरत, वो कामिनी सी मूरत
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना (इक़बाल)

मंजु जी , बड़ी देर कर दी आपने आने में। हमारी महफ़िल का पता भूल गई थीं क्या? कुछ और देर करतीं तो अगली महफ़िल में आपसे मिलना होता। यह रहा आपकी स्वरचित पंक्तियाँ:

जब -जब तुम मुझ से बिछुड़ते हो ,
तब -तब तेरी मोहिनी सूरत सूरज -चाँद -सी साथ निभाती है .

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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