Saturday, August 15, 2009

ताक़त वतन की हमसे है, हिम्मत वतन की हमसे है.....जय भारत के वीर जवान,जय जय हिंदुस्तान...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 172

मारा देश आज अपना ६३-वाँ स्वाधीनता दिवस मना रहा है। इस ख़ास पर्व पर हम सभी श्रोताओं व पाठकों का हार्दिक अभिनंदन करते हैं। आज ही के दिन सन् १९४७ में दिल्ली के लाल क़िले की प्राचीर पर नेहरु जी ने पहली बार स्वतंत्र भारत में तिरंगा लहराया था। जिस तरह से तिरंगे की तीन रंगों, गेरुआ, सफ़ेद और हरा, का अपना अपना अर्थ है, महत्व है, इन्ही तीन रंगों के महत्व को उजागर करते हुए आज से अगले तीन दिनों की 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सजेगी। पहला रंग है गेरुआ, यानी कि वीरता का, या वीर रस का। इतिहास गवाह है हम भारतीयों की वीरता का। जब जब देश पर विपदा आन पड़ी है, इस देश के वीर जवानों ने तब तब अपनी जान की परवाह किए बग़ैर देश को हर संकट से उबारा है। फिर चाहे वह दुश्मनों का आक्रमण हो या कोई प्राकृतिक विपदा। ज़्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं, हाल ही में मुंबई आतंकी हमलों के दौरान हमारे जवानों ने जो वीरता दिखायी है कि हमारा सर श्रद्धा से उनके आगे झुक जाता है। तो दोस्तों, वीरता हमारे देश की परंपरा रही है, लेकिन वीर होने का अर्थ हमारा कदापि यह नहीं कि दूसरों पर हम वार करें। इतिहास इस बात का भी गवाह है कि कभी भी हमने किसी मुल्क पर पहले वार नहीं किया है। अक्सर दुश्मनों ने हमारी इस प्रथा को हमारी कमज़ोरी समझने की ग़लती की है, और मात खायी है। ख़ैर, वीर रस पर आधारित हमने जिस गीत को चुना है आज की इस महफ़िल के लिए, वह है फ़िल्म 'प्रेम पुजारी' का। कवि नीरज का लिखा यह गीत है "ताक़त वतन की तुम से है, हिम्मत वतन की तुम से है, इज़्ज़त वतन की तुम से है, इंसान के हम रखवाले"। जहाँ एक ओर वीर रस कूट कूट कर भरा हुआ है गीत के एक एक शब्द में, वहीं दूसरी ओर इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि चाहे उपर से कितने भी कठोर हम दिखें, हमारे अंदर एक कोमल दिल भी बसता है - "देकर अपना ख़ून सींचते देश के हम फुलवारी, बंसी से बंदूक बनाते हम वो प्रेम पुजारी"। पूरा गीत कुल ७ मिनट और २३ सेकन्ड्स का है, गीत दो भागों में बँटा हुआ है, दोनों भागों में तीन तीन अंतरें हैं, कौन सा अंतरा सब से बेहतर है, यह बताना संभव नहीं।

'प्रेम पुजारी' फ़िल्म आयी थी सन् १९७० में जिसका निर्माण व निर्देशन किया था देव आनंद ने। देव आनंद, वहीदा रहमान व नासिर हुसैन अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार थे सचिन देव बर्मन। प्रस्तुत गीत मूलतः एक समूह गान है, लेकिन 'लीड सिंगर्स' हैं मोहम्मद रफ़ी और मन्ना डे। फ़िल्म में इस गीत की ख़ास जगह है। जैसे कि फ़िल्म के शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि फ़िल्म का नायक शांति प्रिय पात्र होगा, जो दुनिया भर में प्यार लुटायेगा। तो फिर ऐसी कहानी में वीर रस और युद्ध पर जानेवाले फ़ौजियों का गीत क्यों? दरअसल कहानी कुछ ऐसी थी कि दुर्गाप्रसाद बक्शी (नासिर हुसैन) आर्मी के रिटायर्ड जनरल हैं जिन्होने अपने ज़माने में बहादुरी के कई झंडे गाढ़े और कई वीरता पुरस्कारों से सम्मानित हुए। लेकिन एक बार पड़ोसी मुल्क के साथ युद्ध में उन्हे अपनी एक टांग गवानी पड़ी और उन्हे नौकरी से रिटायर होना पड़ा। उधर उनके एकलौते बेटे रामदेव बक्शी (देव आनंद) अपने पिता के स्वभाव के बिल्कुल विपरीत है। वो है तो आर्मी में ही, लेकिन वो है प्रेम का पुजारी। किसी पर बंदूक चलाने से उसका हाथ कांपता है। ऐसी ही किसी कारण से वो गिरफ़तार हो जाता है और उसका 'कोर्ट-मार्शल' हो जाता है। अपने पिता को मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं रह जाता। युद्ध में विजय के बाद जहाँ एक तरफ़ दूसरे फ़ौजी जवान जश्न मनाते हुए प्रस्तुत देश भक्ति गीत गा रहे होते हैं, वहीं झाड़ियों के पीछे छुपकर रामदेव रो रहा होता है। इस फ़िल्म की कहानी भी देव साहब ने ही लिखी है, जिसमें उन्होने यही बताने की कोशिश की है कि वीरता का मतलब यह नहीं कि दुश्मनों को बंदूक की गोलियों से उड़ा दिया जाये। हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति हमें यही सिखाती है कि हम दूसरों से प्यार करें और प्यार ही प्यार दुनिया में फैलायें। वीर वो है जो पहले प्रेम से दुश्मनों को जीतने का प्रयास करता है, अगर फिर भी दुश्मन न मानें, तो फिर हमें दूसरे तरीके भी आते हैं। लीजिए, आज का गीत सुनिए और सदैव यह याद रखें कि वीर होने का अर्थ जंग पे जाकर बंदूक से लोगों को मारना नहीं, बल्कि वीरता का अर्थ है लोगों की जानें बचाना। याद रखें कि हम प्रेम के पुजारी हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल के गीत का थीम है "जय विज्ञान".
2. प्रेम धवन है गीतकार इस गीत के.
3. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"आज".

पिछली पहेली का परिणाम -
दिशा जी माफ़ी चाहेंगें कि अंतरे की जगह मुखडा लिखा गया...पर भूल सुधार कर दिया गया था, और आपको सूचित भी इसलिए रोहित जी को अंक मिलेंगें. रोहित जी अब आपके बराबर यानी १० अंकों पर आ चुके हैं. वैसे जो बाकी गीत आप लोगों ने सुझाये वो "जय जवान" थीम पर सटीक नहीं बैठते. वीरता और शौर्य का प्रदर्शन केवल इसी गीत में है...बहरहाल इस छोटी सी बहस से मज़ा दुगना ही हुआ...:)

और हाँ हमारी नियमित श्रोता स्वप्न मंजूषा जी ने देशभक्ति गीतों वाले रविवार विशेष जो कि दिशा जी के संचालन में हुआ था के लिए कुछ लिख भेजा था जो हमें बहुत देर में मिला...पर चूँकि उनके आलेख में आज के हमारे इस गीत का जिक्र था तो हमें लगा कि उसे हम आप सब के साथ आज बाँटें. स्वप्न जी लिखती हैं -

बात उन दिनों की है जब हम कनाडा आये ही थे ...हम अपना पहला १५ अगस्त कनाडा में मना रहे थे. ओटावा की छोटी सी इंडियन कम्युनिटी ने भी १५ अगस्त मनाने थी, एक हाल में सांस्कृतिक कार्क्रम का आयोजन किया गया था, क्योंकि सबको पता था कि मैं भी गाती हूँ इसलिए मुझसे गाने का अनुरोध किया गया था....जैसे ही नाम बुलाया गया स्टेज पर मेरे तीनो बच्चे, मैं और मेरे पति गिटार, और सुरेन जी तबले पर, आ गए...छोटे छोटे बच्चों को देखते ही तालियों की गड़गडाहट से हॉल गूँज उठा...हमने वो गीत गया 'ताक़त वतन की हमसे हैं हिम्मत वतन की हमसे है' मेरे दोनों बेटे सुर में और तन्मयता से गारहे थे, मात्र ६ साल और ७ साल के बच्चे बिटिया मात्र ३ साल की, इतना जोश था के पूरा हॉल गा रहा था और लोग फूट-फूट कर रो रहे थे आज भी सोचती हूँ तो रोमांच से रोंगटे खड़े हो जाते हैं गीत के ख़त्म होते ही मेरे बच्चे न जाने कितनो की गोद में समां गए... उसके बात परंपरा सी बन गयी हर १५ अगस्त और २६ जनवरी को हमारा परिवार ज़रूर ही गाता है, लेकिन इस बार यह नहीं हो पायेगा मेरा छोटा बेटा मेडिकल कॉलेज चला गया है...और बड़े बेटे की परीक्षा उसी दिन है.....
सिर्फ मेरी बेटी दोनों देशों के राष्ट्रीय गीत गाने वाली है...और हम साथ खड़े होंगे अपने तिरंगे को सलामी देने के लिए...
जय हिंद....

इस गीत को गाने के बाद मैंने 'वन्दे-मातरम' आनंद -मठ का गाया.....मुझे नहीं लगता की मैंने उस दिन जैसा गाया वैसा जीवन में फिर कभी गाया...लोग आज भी याद करते हैं मेरा परफॉर्मेंस......शायद देश से बिछड़ने का पहला-पहला अहसास था वो जो आह बन का निकला और वहां बैठे श्रोताओं के ह्रदय मैं समां गया...

आप की इच्छा में जो भी गीत हो सुना दीजियेगा... देशभक्ति का हर गीत सुहाना है मेरे लिए..


हमें यकीन है स्वप्न जी आज इस गीत को यहाँ सुनकर आपने इन सुहाने पलों को फिर से जी लिया होगा

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

स्वतन्त्रता दिवस के शुभ अवसर पर मुंशी प्रेमचंद की विशेष कहानी

सुनो कहानी: मुंशी प्रेमचंद की "कातिल"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने भीष्म साहनी के जन्मदिन पर अनुराग शर्मा की आवाज़ में विशेष कहानी "चीफ़ की दावत" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज स्वतन्त्रता दिवस के शुभ अवसर पर हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द की स्वाधीनता संग्राम की पृष्ठभूमि में लिखी गयी देशभक्त माँ-बेटे की द्वंद्वात्मक और मार्मिक कथा "कातिल", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।
कहानी का कुल प्रसारण समय 28 मिनट 16 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।







मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)


स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष प्रस्तुति


यह विधवा बड़ी सच्चाई और लगन से राष्ट़ की सेवा में लगी हुई थी। शुरू में उसका नौजवान बेटा भी स्वयंसेवकों में शमिल हो गया था। मगर इधर पांच महीनों से वह इस नयी सभा में शरीक हो गया था।
(प्रेमचंद की "कातिल" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)


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#Thirty fourth Story, Jhanki: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2009/28. Voice: Anurag Sharma

Friday, August 14, 2009

कन्हैया किसको कहेगा तू मैया....इन्दीवर साहब को सलाम करें इस जन्माष्ठमी पर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 171

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन उपलक्ष्य पर हम सभी श्रोतायों और पाठकों का हार्दिक अभिनंदन करते हैं। दोस्तों, पिछले दस दिनों से आप किशोर दा के गाये गीतों का आनंद उठा रहे थे। उनके गाये उन गीतों को सुनते हुए हम इस क़दर उनकी आवाज़ में खो गये थे कि आज के इस विशेष पर्व पर प्रसारण योग्य गीत भी हम उन्ही की आवाज़ में चुन बैठे। और हमें पूरा विश्वास है कि प्रस्तुत गीत आप को भी बहुत पसंद आयेगा। श्रीकृष्ण के जन्म की कहानी तो आप को मालूम ही होगी, लेकिन आज के इस गीत के महत्व को बेहतर तरीके से समझने के लिए हम उस पौराणिक कहानी को संक्षेप में आप को बता रहे हैं। देवकी और रोहिणी को मिलाकर राजा वासुदेव की ६ पत्नियाँ थीं। देवकी से विवाह के बाद, देवकी के भाई कंस को यह भविष्यवाणी मिली थी कि देवकी के आठवें पुत्र के हाथों उनका वध होगा। वासुदेव के अनुरोध पर कंस ने देवकी को नहीं मारा, लेकिन देवकी के पहले ६ पुत्रों की जीवन लीला ज़रूर समाप्त कर दी। जब देवकी साँतवीं बार माँ बनने जा रही थीं, तो भगवान विष्णु ने देवकी का गर्भ रोहिणी के कोख में स्थानांतरित कर दिया ताकि उस बच्चे का कंस के हाथों वध न हो। और यह ख़बर जारी कर दिया गया कि देवकी का गर्भपात हो गया है। जब रोहिणी के कोख से देवकी के साँतवें बच्चे का जन्म हुआ तो उसका नाम रखा गया बलराम। उधर नन्दराज और यशोदा गाँव में रोहिणी और उसके बच्चे की देखभाल करते हैं। और इधर देवकी अपने आठवें बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार होती हैं। विष्णु ही देवकी के आठवे संतान के रूप में उसकी कोख में पल रहे होते है, जिनके हाथों कंस का वध होना है, और जिसे मारने के लिए कंस कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ेगा। और उधर यशोदा की कोख में पल रही होती है निद्रा व रात्री की देवी सुभद्रा। अब भगवान विष्णु ने हालात को इस तरह से नियंत्रित किया कि देवकी और यशोदा अपने अपने बच्चे को एक ही समय पर जन्म देंगी और यशोदा अपने बच्चे का लिंग भूल जायेंगी। ऐसा ही हुआ और अष्टमी की उस तूफ़ानी रात में दोनों बच्चों का जन्म होता है, वासुदेव अपने नवजात पुत्र को यशोदा के बगल में रख देता है और यशोदा की नवजात पुत्री को देवकी के पास। इस तरह से कृष्ण के रूप में विष्णु का दोबारा जन्म होता है जिसे नंद और यशोदा पाल पोस कर बड़ा करते हैं, और उधर देवकी और वासुदेव के पास पलती है योशोदा की बेटी। यशोदा कृष्ण पर पूरी ममता लुटाती है, लेकिन बाद में उसे पता चल जाता है जब कृष्ण शैशवस्था में मथुरा के लिए रवाना होता है अपने कंस मामा का वध करने के लिए।

तो दोस्तों, यह थी कहानी श्रीकृष्ण के जन्म की, कि देवकी ने भले ही कृष्ण को जन्म दिया हो, उसे पालपोस कर बड़ा यशोदा ने ही किया। अब हम सीधे आ जाते हैं आज के गीत पर। "हे रे कन्हैया, किस को कहेगा तू मैया, जिसने तुझको जनम दिया के जिसने तुझको पाला"। १९७१ में बनी फ़िल्म 'छोटी बहू' की कहानी कुछ इस तरह थी कि राधा (शर्मीला टैगोर) और मधु (राजेश खन्ना) की शादी तो होती है, लेकिन जल्द ही राधा को कुछ ऐसी बिमारी घेर लेती है कि वो माँ नहीं बन सकती। ऐसे में अपनी जेठानी के बेटे से उसका बहुत लगाव हो जाता है और उसी पर अपनी पूरी ममता लुटाती है। बच्चे का लगाव भी अपनी माँ से ज़्यादा अपनी चाची के साथ हो जाता है। ऐसे में एक राह चलता बैरागी फ़कीर इस गीत को गाते हुए चलता है। यह एक सांकेतिक गीत है, यानी कि 'सीम्बौलिक'। राधा से अपनी जेठानी के बच्चे का लगाव और उस पर लुट रही उसकी ममता को देख कर श्रीकृष्ण और यशोदा की वही कहानी याद आ जाती है। इंदीवर जी के लिखे इस गीत की तारीफ़ शब्दों में संभव नहीं है। "एक ने तुझको जीवन दिया रे, एक ने जीवन संभाला, कन्हैया, किस को कहेगा तू मैया", या फिर "एक ने तन को रूप दिया रे, एक ने मन को ढाला, कन्हैया, किस को कहेगा तू मैया", या "एक ने तुझको दी हैं रे आँखें, एक ने दिया उजाला, कन्हैया, किस को कहेगा तू मैया", हर बार इंदीवर जी की उपमाओं ने दिल को गहराई तक छू लिया। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत की तो क्या कहने, बाँसुरी की मधुर तानों के साथ भक्ति रस की शैली में बनाया हुआ यह श्रीकृष्ण भजन फ़िल्मी भजनों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कल्याणजी-आनंदजी की एक और फ़िल्म 'जॉनी मेरा नाम' के "मोसे मोरा श्याम रूठा" में भी कुछ इसी तरह का रंग हमें दिखायी देता है। तो दोस्तों, किशोर कुमार की आवाज़ में आनंद लीजिए इस भजन का, यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल होनेवाला पहला भजन है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल से शुरू होगा ३ दिनों तक चलने वाला स्वतंत्रता दिवस विशेष ओल्ड इस गोल्ड पर.
2. कल का थीम है -"जय जवान".
3. मुखड़े में शब्द है -"हिमालय".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी बधाई एक बार फिर. ८ अंक हुए आपके. हाँ पराग जी की बात पर गौर कीजियेगा...और पराग आपने बिलकुल किसी की भावनाओं को आहत नहीं किया है..."कैद में है बुलबुल..." हा हा हा...शरद जी और स्वप्न जी....सैयाद बिलकुल नहीं मुस्कुरा रहे हैं पर क्या करें नियम से बंधें हैं सब. तीसरे विजता के मिलने के साथ ही आप दोनों भी एक बार आमने सामने हो सकेंगें, तब तक नौजवानों की भिडंत का आनंद लीजिये..

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रोशन महफिलों के दिलकश फ़साने....आज सुनें/ गुनें फिर एक बार छुट्टियों के बहाने

दोस्तों आज दिन है महफिल-ए-ग़ज़ल का. पर जन्माष्टमी और स्वतंत्रता दिवस को अपने परिवार से साथ मनाने के उद्देश्य से हमारे होस्ट विश्व दीपक तन्हा जी कुछ दिनों की छुट्टी पर हैं. वो लौटेंगें नयी महफिल के साथ अगले शुक्रवार को. तब तक क्यों हम इस अवसर का भी सदुपयोग कर लें. झाँक कर देखें पिछली महफिलों में और सुनें एक बार फिर उन ग़ज़लों को जिनसे आबाद हुई अब तक ये महफिल -

नुसरत फतह अली खान
गुलाम अली
जगजीत सिंह
तलत अज़ीज़
मास्टर मदन
मेहदी हसन
आबिदा परवीन
बेगम अख्तर
पीनाज़ मसानी
इकबाल बानो
सुरेश वाडेकर
रुना लैला
हरिहरन
छाया गांगुली
आशा भोंसले
चित्रा सिंह
मोहम्मद रफी
मन्ना डे

अभी तो हैं और भी बेशकीमती नगीने जिनसे सजेंगी आने वाले दिनों में ये महफिलें...तब तक घूम आयें आज इन फनकारों से सजी इन बीती पोस्टों पर और सुनें इन अनमोल आवाजों की रूहानी दास्ताँ को.

Thursday, August 13, 2009

मुसाफिर हूँ यारों...न घर है न ठिकाना...हमें भी तो किशोर दा को गीतों को बस सुनते ही चले जाना है....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 170

दोस्तों, पिछले ९ दिनों से लगातार किशोर दा की आवाज़ में ज़िंदगी के नौ अलग अलग रूपों से गुज़रते हुए आज हम आ पहुँचे हैं 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़' शृंखला की अंतिम कड़ी में। जिस तरह से एक मुसाफ़िर निरंतर चलते जाता है, ठीक वैसे ही हम भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सुरीले मुसाफ़िर ही तो हैं, जो हर रोज़ एक नया सुरीला मंज़िल तय करते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे हैं। जी हाँ, आज इस शृंखला की आख़िरी कड़ी में बातें उस यायावर की जिसकी ज़िंदगी का फ़लसफ़ा किशोर दा की आवाज़ में ढ़लकर कुछ इस क़दर बयाँ हुआ कि "दिन ने हाथ थाम कर इधर बिठा लिया, रात ने इशारे से उधर बुला लिया, सुबह से शाम से मेरा दोस्ताना, मुसाफ़िर हूँ यारों न घर है न ठिकाना, मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना"। यह फ़िल्म 'परिचय' का गीत है। फ़िल्म १८ अक्टुबर सन् १९७२ में प्रदर्शित हुई थी जिसे लिखा व निर्देशित किया था गुलज़ार साहब ने। फ़िल्म की कहानी आधारित थी अंग्रेज़ी फ़िल्म 'द साउंड औफ़ म्युज़िक' पर, जिसका गुलज़ार साहब ने बहुत ही उन्दा भारतीयकरण किया था। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे जीतेंद्र, जया बच्चन और संजीव कुमार। इस फ़िल्म के गीतों के लिए लता मंगेशकर को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। गुलज़ार साहब और राहुल देव बर्मन की उन दिनों नयी नयी जोड़ी बनी थी, और इसके बाद तो इस जोड़ी ने एक से एक कामयाब म्युज़िकल फ़िल्में हमें दी।

किशोर कुमार के गाये फ़िल्म 'परिचय' के प्रस्तुत गीत को राहुल देव बर्मन ने अपने विशेष जयमाला कार्यक्रम में बजाया था यह कहते हुए - "दोस्तों, अब मैं अपने एक प्रिय दोस्त के लिए कुछ कहूँगा। गुलज़ार। वो मेरे घर गाना लिखने आता है, 'डिरेक्शन' भी देता है, उसके साथ मेरा बहुत जमता है। लेकिन जब वो गाना लिखने बैठता है तो हमारी दुश्मनी शुरु हो जाती है क्योंकि उसके गीत को समझने के लिए मुझे एक या डेढ़ घंटे लगते हैं और मैं जब उसके धुन बनाता हूँ तो उसे समझने में उन्हे दो दिन लग जाते हैं। २/३ दिन के बाद जब दोनों को एक दूसरे का काम समझ में आ जाता है तो दुश्मनी ख़तम होती है। बहुत दिन पहले फ़िल्म 'परिचय' के समय एक दिन मैं किसी कारण से बहुत दुखी था। गुलज़ार आये और कहा कि 'अगर 'मूड' हो तो यह गाना बना देना'। गाना पढ़ते ही एक मिनट के अंदर मैने धुन बना दिया क्योंकि मैं दुखी था और गाने का 'मूड' भी कुछ ऐसा ही था। दो दिन के अंदर गाना रिकार्ड भी कर लिया।" दोस्तों, हर इंसान यहाँ एक मुसाफ़िर है, जो अपना सफ़र तय कर के एक दिन हमेशा के लिए यहाँ से चला जाता है। ठीक वैसे ही जैसे किशोर दा हम से जुदा हो गये थे। आज किशोर दा के गाये तमाम गानें हर रोज़ हमें उनकी याद दिलाते हैं। उनके गाये तमाम गानें सहारे हैं हम सब के, जो हमारे साथ में हर वक़्त चलते हैं, चाहे ख़ुशी हो या ग़म, चाहे जुदाई हो या मिलन। 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़', इस लघु शृंखला के ज़रिये हम ने श्रद्धांजली अर्पित की इस अनूठे हरफ़नमौला फ़नकार को, कला के इस अद्वितीय पुजारी को!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. जन्माष्ठमी पर एक विशेष गीत है ये.
2. आवाज़ है किशोर कुमार की.
3. मुखड़े में शब्द है -"जनम".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी मुबारक बाद...४ अंक हो गए आपके और आप भी अब मनु जी के बराबर आ गए...हमें लगता है कि अपने तीसरे विजेता के लिए हमें लम्बा इंतज़ार करना पड़ेगा. रोहित जी जोर आजमाइश जारी रखिये....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ये बरकत उन हज़रत की है....मोहित चौहान ने किया कबूल गुलज़ार के शब्दों में

ताजा सुर ताल (14)

जीव - नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ सजीव और मेरे साथ है, आवाज़ के हमकदम सुजॉय...

सुजॉय - सभी दोस्तों को मेरा नमस्कार...

सजीव - सुजॉय लगता है ताज़ा सुर ताल धीरे धीरे अपने उद्देश्य में कामियाब हो रहा है. बिलकुल वैसे ही जैसे ओल्ड इस गोल्ड का उद्देश्य आज की पीढी को पुराने गीतों से जोड़ना था, ताज़ा सुर ताल का लक्ष्य संगीत की दुनिया में उभरते नये नामों से बीती पीढी को मिलवाना है और देखिये पिछले अंक में शरद जी ने हमें लिखा कि उन्होंने मोहित चौहान का नाम उस दिन पहली बार सुना था हमें यकीं है शरद जी अब कभी इस नाम को नहीं भूलेंगे...

सुजॉय - हाँ सजीव, ये स्वाभाविक ही है. जैसा कि उन्होंने खुद भी लिखा कि जिन दिग्गजों को वो सुनते आ रहे हैं उनके समक्ष उन्हें इन गायकों में वो दम नज़र नहीं आता. पर ये भी सच है कि आज की पीढी इन्हीं नए कलाकारों की मुरीद है तो संगीत तो बहता ही रहेगा...फनकार आते जाते रहेंगें...

सजीव - बिलकुल सही....इसलिए ये भी ज़रूरी है कि हम समझें आज के इस नए दौर के युवाओं के दिलों पर राज़ कर रहे फनकारों को भी. तो सुजॉय जैसा कि हमने वादा किया था कि हम मोहित के दो गीत एक के बाद एक सुनवायेंगे, तो आज कौन सा गीत लेकर आये हैं आप मोहित का...कहीं ये वो तो नहीं जो इन दिनों हर किसी की जुबां पर है ?

सुजॉय - बिलकुल सही पहचाना....पहले प्यार का पहला पहला नजराना...

सजीव - पहले प्यार की बहुत अहमियत है जीवन में....कहते हैं प्यार बस एक ही बार होता है....यानी जो पहला है वही आखिरी भी....क्या मैं सही कह रहा हूँ ?

सुजॉय - १९९३ में जब "हम आपके हैं कौन" प्रर्दशित हुई थी तो उसका एक गीत "पहला पहला प्यार है..." इतना लोकप्रिय हो गया था कि युवा दिलों का एक एंथम जैसा बन गया था...कुछ वैसा ही अब है २००९ में आये फिल्म "कमीने" के इस गीत की बात. बहुत कुछ इस दरमियाँ बदल गया बस नहीं बदला तो यही पहला पहला प्यार....जहाँ अब ये मोहर भी लग गयी है कि यही आखिरी प्यार भी है....

सजीव - इस पहले और आखिरी प्यार को अभिव्यक्ति दी है गुलज़ार साहब ने....उनका लेखन सबसे अलहदा है -

याद है पीपल कि जिसके घने साए थे,
हमने गिलहरी के झूठे मटर खाए थे,
ये बरकत उन हज़रत की है...

सुजॉय - हाँ "ख्वाब के बोझ से....पलकों का कंपकपाना" भी बहुत खूब है, एक बात और ये जो शब्द है "टीपना" (गाल पे), ये बंगला में हम लोग बहुत इस्तेमाल करते हैं, पर हिंदी में इस शब्द का अधिक इस्तेमाल नहीं होता, पर गुलज़ार साहब ने यहाँ बहुत बढ़िया ढंग से पिरोया है गाने में.

सजीव - अब कोई ऐसे शब्द लिखे तो हम तारीफ कैसे न करें भाई....पर जितने सुंदर शब्द है उतना ही सूथिंग और मन लुभावना संगीत है विशाल का और इस तरह के गीत मोहित के फोर्टे हैं जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं. पिछली बार हमने श्रोताओं से पुछा था कि मोहित का सबसे पहला गीत कौन सा था.....हमें सही जवाब नहीं मिला....सुजॉय आप बताएं कि सही जवाब क्या था.

सुजॉय - फ़िल्म संगीत में मोहित चौहान ने क़दम रखा एक 'लो बजट' फ़िल्म 'लेट्स एंजोय' में एक गीत गा कर, जिसके शुरूआती बोल थे "सब से पीछे"। इस गीत ने भले ही उन्हे सब से आगे ला कर खड़ा नहीं किया लेकिन उनकी गाड़ी चल पड़ी थी। थोड़े ही समय में उन्होने फ़िल्म 'रोड' का मशहूर गीत "पहली नज़र में करी थी" गा कर रातों रात सब की नज़र में आ गये। उसके बाद तो जे. ओम प्रकाश मेहरा की क्रांतिकारी फ़िल्म 'रंग दे बसंती' में रहमान ने उनसे गवाया ऐसा गीत जिसने बॉलीवुड के पार्श्वगायक समुदाय में हलचल पैदा कर दी। जी हाँ, वह गीत था "ख़ून चला"। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मोहित चौहान को किसी तरह की संघर्ष नहीं करना पड़ा, उन्होने इस संगीत की दुनिया में कई कई बार वापसी की और फिर से गुमनामी में खो गये। लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनके गाये हुए गीतों को सुनकर अब ऐसा लगने लगा है कि मोहित भाई साहब यहाँ एक लम्बी पारी खेलने वाले हैं।

सजीव - हाँ बिलकुल, वैसे मुझे उनका गाया फिल्म "मैं मेरी पत्नी और वोह" का "गुंचा कोई" सबसे अधिक पसंद है. पर कमीने का ये गीत भी दोस्तों कुछ कम नहीं है. हालाँकि शुरू के बोलों को सुन कर कुछ कुछ "माँ" गीत जो कि फिल्म "तारे ज़मीन पर" का है उसकी याद आती है पर बाद में गीत का अपना एक मोल्ड बन जाता है. आवाज़ की टीम ने इस गीत को भी दिए हैं ४ अंक ५ में से. अब आप सुनें और बतायें कि आपके हिसाब से इस ताज़ा गीत को कितने अंक मिलने चाहिए.

सुजॉय - हाँ बोल कुछ इस प्रकार हैं -

थोड़े भीगे भीगे से थोड़े नम हैं हम,
कल से सोये वोए भी कम हैं हम,
दिल ने कैसी हरकत की है,
पहली बार मोहब्बत की है...
आखिरी बार मोहब्बत की है....

ऑंखें - डूबी डूबी सी सुरमई मध्यम...
झीलें - पानी पानी बस तुम और हम....
बात बड़ी हैरत की है....
पहली बार.....

ख्वाब के बोझ से कंपकपाती हुई,
हल्की पलकें तेरी, याद आता है सब,
तुझे गुदगुदाना, सताना,
यूहीं सोते हुए,
गाल पे टीपना, मीचना ,
बेवजह, बेसबब...
याद है पीपल कि जिसके घने साए थे,
हमें गिलहरी के झूठे मटर खाए थे...
ये बरकत उन हज़रत की है...
पहली बार....



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. गीतकार पियूष मिश्रा ने गुलाल के बाद एक ताजा तरीन फिल्म में एक दिग्गज संगीतकार के साथ काम किया है, कौन सी है ये फिल्म और कौन हैं वो संगीतकार ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब हम दे ही चुके हैं, हमारे श्रोताओं में से कोई इसे सही नहीं पकड़ पाया. पर ख़ुशी इस बात की है कि लगभग सभी श्रोताओं ने रेटिंग देकर हमारा हौंसला बढाया है. जमे रहिये आवाज़ के सगीत सफ़र में यूहीं....


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Wednesday, August 12, 2009

रूप तेरा मस्ताना...प्यार मेरा दीवाना...रोमांस का समां बाँधती किशोर की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 169

हाल ही में एक गीत आया था "कभी मेरे साथ कोई रात गुज़ार तुझे सुबह तक मैं करूँ प्यार", जिसमें सेन्सुयसनेस कम और अश्लीलता ज़्यादा थी। अगर हम आज से ४० साल पीछे की तरफ़ चलें, तो फ़िल्म 'आराधना' में आनंद बक्शी साहब ने एक गीत लिखा था "रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना, भूल कोई हम से न हो जाए"। यह गीत भी मादक और कामोत्तेजक था लेकिन अश्लील कदापि नहीं। दोस्तों, हमने इन दोनों गीतों का एक साथ ज़िक्र यह कहने के लिए किया कि उस पुराने दौर में भी इस तरह के सिचुयशन बनते थे, लेकिन उस दौर के फ़िल्मकार, गीतकार व संगीतकार इन पर ऐसे गानें बनाते थे जो स्थान काल व पात्रों का भी न्याय करे और साथ ही साथ इस बात का भी ध्यान रखें कि उसका फ़िल्मांकन रुचिकर हो, न कि अश्लील। आज 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़' के अंतर्गत सुनिए किशोर दा की आवाज़ में इसी मादक नशीले गीत को, जिसे सुनकर दिल में हलचल सी होने लगती है। गीत के बोल और संगीत मादक और उत्तेजक तो हैं ही, किशोर दा ने भी उसी अंदाज़ में इसे गाया जिस अंदाज़ की इस गीत को ज़रूरत थी।

फ़िल्म 'आराधना' के बारे में विस्तृत जानकारी हम ने आप को शक्ति सामंत पर केन्द्रित शृंखला में दी थी, आप उस पूरे शृंखला को यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं। प्रस्तुत गीत उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी 'बोल्ड' गीत था। सचिनदा ने इस गीत के लिए पहले जो धुन बनाई थी, उसमें किशोर कुमार को कुछ कमी सी लग रही थी, यानी कि जिस नशीले अंदाज़ की ज़रूरत थी वह नहीं आ पा रही थी। तब किशोरदा ने ही इसकी धुन को थोड़ा सा 'मॊर्डन' बना दिया जो बर्मन दादा को भी पसंद आया। अब बारी थी इस गाने के फ़िल्मांकन की। शक्तिदा साधारणतः अपने फ़िल्मों के रिकार्ड किए हुए गाने रात के वक़्त सुना करते थे और उनके फ़िल्मांकन के बारे में योजनाएँ बनाया करते थे। इस गीत के लिए उनके दिमाग़ में एक ख़याल आया कि क्यों ना इस गीत को एक ही 'शॉट' में फ़िल्माया जाए! उन्होने एक काग़ज़ का पन्ना लिया और उस पर तीन अक्षर लिखे - ए, बी, सी। 'ए' नायक के लिए, 'बी' नायिका के लिए, और 'सी' कैमरे के लिए। और इस तरह से वो अपने मन ही मन में गाने का पूरा फ़िल्मांकन क़ैद कर लिया। उन्होने एक गोलाकार 'ट्राली' का इंतज़ाम किया और फ़िल्मालय स्टुडियो में इस गीत को फ़िल्मा लिया गया। शुरु शुरु में कई लोगों ने उनके इस एक शॉट वाले विचार का विरोध किया था। किसी ने यहाँ तक कहा भी था कि "इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शॉट में ले रहा है"। उस समय सभी के सवालों का शक्तिदा ने एक ही जवाब दिया था कि "जब रात को गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि कहाँ 'कट' करूँ"। और इस तरह से यह गीत हिंदी फ़िल्म जगत का पहला गाना बन गया जिसे केवल एक ही शॉट में फ़िल्माया गया था। तो चलिए हम भी इस गीत की मादकता और नशीलेपन का आनंद उठाते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. बेफिक्री के आलम में खुले आसमान में गूंजती किशोर की आवाज़.
2. कल के गीत का थीम है - "यायावरी, सफ़र, आदि".
3. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"दिन".

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह रोहित जी आप के हुए ८ अंक, मात्र एक जवाब पीछे हैं आप दिशा जी के स्कोर से. वाकई मुकाबला दिलचस्प है. सुमित जी, मंजू जी, और मनु जी ने सहमती की मोहर लगा दी है. शरद जी और स्वप्न जी आप बाकी सब से मीलों आगे हैं इसमें कोई शक है क्या :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

महादेवी वर्मा की विरह-कविता गायें और स्वरबद्ध करें

हिन्द-युग्म ने मई 2009 से गीतकास्ट प्रतियोगिता के माध्यम से महाकवियों की कविताओं को संगीतबद्ध करने की परम्परा शुरू की है। इस क्रम में सबसे पहले हमने हिन्दी कविता के स्वर्णिम काल छायावादी युग के चार स्तम्भ कवियों की एक-एक कविता को संगीतबद्ध करवाने का संकल्प लिया है। उल्लेखनीय है कि हमने चार में से तीन कवियों (जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला) की एक-एक कविता को संगीतबद्ध करने की प्रतियोगिता का सफल आयोजन कर भी लिया है।

आज हम महीयसी महादेवी वर्मा की कविता के लिए संगीतबद्ध प्रविष्टियाँ भेजने की उद्‍घोषणा लेकर उपस्थित हैं। महादेवी वर्मा को विरह की कवयित्री भी कहा जाता है। हमने इनकी एक विरह और मिलन की कल्पना से उपजने वाले भावों से पिरोई कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को संगीतबद्ध करवाने का निर्णय लिया है।

इस कड़ी के प्रायोजक है डैलास, अमेरिका के अशोक कुमार हैं जो पिछले 30 सालों से अमेरिका में हैं, आई आई टी, दिल्ली के प्रोडक्ट हैं। डैलास, अमेरिका में भौतिकी के प्रोफेसर हैं, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के आजीवन सदस्य हैं। और हिन्दी-सेवा के लिए डैलास में एक सक्रिय नाम हैं।

गीत को केवल पढ़ना नहीं बल्कि गाकर भेजना होगा। हर प्रतिभागी इस गीत को अलग-अलग धुन में गाकर भेजे (कौन सी धुन हो, यह आपको खुद सोचना है)।

1) गीत को रिकॉर्ड करके भेजने की आखिरी तिथि 31 अगस्त 2009 है। अपनी प्रविष्टि podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल करें।
2) इसे समूह में भी गाया जा सकता है। यह प्रविष्टि उस समूह के नाम से स्वीकार की जायेगी।
3) इसे संगीतबद्ध करके भी भेजा जा सकता है।
4) श्रेष्ठ तीन प्रविष्टियों को अशोक कुमार की ओर से क्रमशः रु 2000, रु 1000 और रु 1000 के नग़द पुरस्कार दिये जायेंगे।
5) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को डलास, अमेरिका के एफ॰एम॰ रेडियो स्टेशन रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रमों में बजाया जायेगा। इस प्रविष्टि के गायक/गायिका से आदित्य प्रकाश रेडियो के किसी कार्यक्रम में सीधे बातचीत करेंगे, जिसे दुनिया में हर जगह सुना जा सकेगा।
6) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को 'हिन्दी-भाषा की यात्रा-कथा' नामक वीडियो/डाक्यूमेंट्री में भी बेहतर रिकॉर्डिंग के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है।
8) श्रेष्ठ प्रविष्टि के चयन का कार्य आवाज़-टीम द्वारा किया जायेगा। अंतिम निर्णयकर्ता में आदित्य प्रकाश का नाम भी शामिल है।
9) हिन्द-युग्म का निर्णय अंतिम होगा और इसमें विवाद की कोई भी संभावना नहीं होगी।
10) निर्णायकों को यदि अपेक्षित गुणवत्ता की प्रविष्टियाँ नहीं मिलती तो यह कोई ज़रूरी भी नहीं कि पुरस्कार दिये ही जायँ।

महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार'

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करुणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर-संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

Tuesday, August 11, 2009

हम मतवाले नौजवान मंजिलों के उजाले...युवा दिलों की धड़कन बनी किशोर कुमार की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 168

न्म से लेकर मृत्यु तक आदमी की ज़िंदगी उसे कई पड़ावों से पार करवाता हुआ अंजाम की ओर ले जाती है। इन पड़ावों में एक बड़ा ही सुहाना, बड़ा ही आशिक़ाना, और बड़ा ही मस्ती भरा पड़ाव होता है, जिसे हम जवानी कहते हैं। ज़िंदगी में कुछ बड़ा बनने का ख़्वाब, दुनिया को कुछ कर दिखाने का इरादा, अपने परिवार के लिए बेहतर से बेहतर ज़िंदगी की चाहत हर जवाँ दिल की धड़कनों में बसी होती है। साथ ही होता है हला-गुल्ला, ढ़ेर सारी मस्ती, और बिन पीये ही चढ़ता हुआ नशा। नशा आशिक़ी का, प्यार मोहब्बत का। जी हाँ, जवानी के जस्बों की दास्तान आज सुनिए किशोर दा की सदा-जवाँ आवाज़ में। यह है फ़िल्म 'शरारत' का गीत "हम मतवाले नौजवाँ मंज़िलों के उजाले, लोग करे बदनामी कैसे ये दुनियावाले". सन् १९५९ में बनी फ़िल्म 'शरारत' के निर्देशक थे हरनाम सिंह रावल और मुख्य कलाकार थे किशोर कुमार, मीना कुमारी, राजकुमार और कुमकुम। आप को याद होगा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इससे पहले हमने आप को किशोर कुमार और मीना कुमारी पर फ़िल्माया हुआ फ़िल्म 'नया अंदाज़' का "मेरी नींदों में तुम" सुनवाया था। इस फ़िल्म 'शरारत' में भी एक और बड़ा ही ख़ूबसूरत युगल गीत है इस जोड़ी पर फ़िल्माया हुआ, जिसे किशोर दा और गीता दत्त ने गाये हैं और गीत है "तूने मेरा दिल लिया, तेरी बातों ने जादू किया"। इस गीत को हम फिर कभी आपको सुनवायेंगे।

'शरारत' में शंकर जयकिशन का संगीत था। आम तौर पर शंकर जयकिशन ने मुकेश और मोहम्मद रफ़ी से ही ज़्यादा गानें गवाये, लेकिन उन फ़िल्मों में जिनमें किशोर कुमार ख़ुद नायक थे, उनमें किशोर कुमार से गानें गवाना ज़रूरी था। ऐसी ही एक फ़िल्म थी 'करोड़पति' जिसमें किशोर कुमार और शशीकला थे। यह फ़िल्म शशीकला की होम प्रोडक्शन फ़िल्म थी और इस वजह से उन्हे किशोर दा के साथ काफ़ी समय बिताने का मौका भी मिला। किशोर की यादों के उजालों को कुछ इस तरह से शशीकला जी ने विविध भारती पर बिखेरा था - "'करोड़पति' हमारे घर की फ़िल्म थी। उसमें मैं थी, और हमारे किशोर कुमार थे। 'म्युज़िक' था शंकर जयकिशन का। लेकिन फ़िल्म बिल्कुल नहीं चली। गानें भी नहीं चले। शंकर जयकिशन म्युज़िक डिरेक्टर थे, फिर भी नहीं चले। हम कहते थे कि 'करोड़पति' बनाते बनाते हम कंगालपति बन गये। उन दिनों में, मेरा ख़याल है सिर्फ़ ३ या ४ आर्टिस्ट्स टॊप में थे - दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद और किशोर कुमार। उनको मिलना मुश्किल था। किशोर दा 'टाइम' देते थे, मिलते नही थे। 'टाइम' देते थे, कभी नहीं आते थे। आप को मैं उनका आख़िरी क़िस्सा सुनाती हूँ। फ़िल्म तो बन गयी, फ्लॉप भी हो गयी, चली भी नहीं, ये सब हुआ, एक दिन मुझे फ़ोन आता है उनका कि 'शशी, तुम मुझे मिलने आओ'। तो मैं गयी अपने 'फ़्रेन्ड' के साथ मिलने के लिए। तो बात कर रहे हैं, 'मुझे 'हर्ट अटैक' हो गया, ऐसा हुआ, वैसा हुआ'। और 'सडेन्ली' मुझे आवाज़ आती है 'टाइम अप, टाइम अप, टाइम अप '। मैं तो घबरा गयी, मैने कहा 'अरे ये कहाँ से आवाज़ आ रही है?' हँसने लगे 'हा हा हा हा हा... पता है मैं 'हर्ट' का 'पेशंट' हूँ ना, इसलिए यहाँ पे एक 'रिकॉर्डिंग' करके रखी है, ५ मिनट से ज़्यादा किसी से बात नहीं करनी है'। मैने कहा 'किशोर दा, आप ने मुझे डरा ही दिया बिल्कुल!' और बहुत 'ईमोशनल' थे मेरा ख़याल है, 'very emotional person'। उनके तो कितने क़िस्से हैं, जितना सुनायें कम है, पर बहुत ही अच्छे, बहुत ही कमाल के 'आर्टिस्ट', 'जीनियस' भी कहना चाहिए, देखिए गाने भी उन्होने कितने अच्छे लिखे, 'म्युज़िक' भी कितना अच्छा दिया, 'सिंगिंग' तो अच्छा करते ही थे।" दोस्तों, हमने आज के गीत को थोड़ी देर के लिए अलग रख कर आप को शशीकला जी के एक साक्षात्कार के एक अंश से अवगत करवाया जिसमें उन्होने किशोर दा के बारे में बातें कहीं थीं। आशा है आप को अच्छा लगा होगा। तो अब वापस आ जाते हैं आज के गीत पर, और सुनते हैं जवानी के क़िस्से, हसरत जयपुरी के शब्दों में, जो शंकर जयकिशन के संगीत में रच कर किशोर दा की आवाज़ में ढल कर आप तक पहुँच रहा है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. किशोर दा का गाया एक बेहद "सेन्शुअस" गीत.
2. कल के गीत का थीम है - "रोमांस".
3. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"रात".

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी बधाई ६ अंक हुए आपके अब आप तीसरे स्थान पर हैं. पराग जी (१२), दिशा जी (१०), मनु जी हैं ठीक आपके पीछे ४ अंकों के साथ. लगता है मुकाबला दिलचस्प होने वाला है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला.....गुलाम अली की मार्फ़त पूछ रहे हैं आनंद बख्शी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३७

दिशा जी की पसंद की दूसरी गज़ल लेकर आज हाज़िर हैं हम। आज के अंक में जो गज़ल हम आप सबको सुनवाने जा रहे हैं वह वास्तव में तो एक फिल्म से ली हुई है लेकिन हमारे आज के फ़नकार ने इस गज़ल को मंच से इतनी बार पेश किया है कि लोग अब इसे गैर-फ़िल्मी गज़ल मानने लगे हैं। इस गज़ल की गुत्थी इतनी उलझी हुई है कि एकबारगी तो हमें भरोसा हीं नहीं हुआ कि इसे माननीय अनु मलिक साहब ने संगीतबद्ध किया होगा। फिर हमने अंतर्जाल की खाक छान दी ताकि हमें वास्तविक संगीतकार की जानकारी मिल जाए। ज्यादातर जगहों पर अनु मलिक का हीं नाम था ,लेकिन कुछ लोग अब भी यह दावा करते हैं कि इसे गुलाम अली(हमारे आज के फ़नकार) ने खुद हीं संगीतबद्ध किया है। वैसे हमारी खोज को तब विराम मिला जब गुलाम अली साहब का एक साक्षात्कार हमारे हाथ लगा। उन्होंने उस साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि इस गज़ल में संगीत अनु मलिक का हीं है। स्क्रीन इंडिया के एक इंटरव्यू में उनसे जब यह पूछा गया कि अनु मलिक का कहना है कि महेश भट्ट की फ़िल्म "आवारगी" की एक गज़ल "चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना बैठा" को उन्होंने हीं कम्पोज़ किया है। क्या आप भी यह मानते हैं? तो इस पर गुलाम अली साहब ने दो टूक शब्दों में यह जवाब दिया कि "हाँ यह उनकी हीं ओरिजिनल कम्पोजिशन थी। मैने बस उनके लिए हीं नहीं बल्कि नदीम-श्रवण के लिए भी बेवफ़ा फ़िल्म की एक गज़ल को अपनी आवाज़ दी है। ये उनकी अपनी धुने हैं। दिल मानता तो नहीं, लेकिन जब गुलाम अली साहब ने खुद हीं ऐसा कहा है तो सारी अटकलें यहीं समाप्त हो जाती हैं। तो आप सब अब तक यह समझ हीं गए होंगे कि हमारी आज की गज़ल कौन-सी है और इसे किसने अपनी आवाज़ से सजाया है। इस गज़ल के साथ एक और शख्स का नाम जुड़ा है। वैसे तो हिंदी फ़िल्मों में इनसे बड़ा गीतकार आज तक कोई नहीं हुआ लेकिन गज़लों के मामले में इनका हाथ कुछ तंग है। इस हाल में अगर आपको यह पता चले कि आज की गज़ल इन्हीं की लिखी हुई है तो एक सुखद आश्चर्य होता है। तो चलिए जानकारियों का सफ़र शुरू करते हैं गुलाम अली के साथ।

यह तो सबको पता है कि गुलाम अली साहब ने अपने शुरूआती दिनों में रेडियो लाहौर में गायकी की थी। उन्हीं पुराने दिनों को याद करते हुए बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम "एक मुलाकात" में गुलाम अली साहब कहते हैं: असल में वही दिन थे, जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाया. अब से तकरीबन 50 साल पहले की बात थी, तब मैं 14 साल का था. मैं रेडियो में ऑडीशन देने गया था. वहाँ निदेशक आगा बशीर साहब थे और उनके बगल में अय्यूब रमानी साहब थे. ऑडीशन के दौरान जब लाल बत्ती जली तो मैं घबरा सा गया था. हालाँकि रियाज़ करते रहने के कारण गाने में मुझे झिझक नहीं थी. मैने आ..आ.. ही कहा था उन्होंने कहा कि बस, बस......मुझे बहुत दुख हुआ कि मैं तो इन्हें सुनाने आया था और इन्होंने सुना ही नहीं. बाद में अय्यूब साहब ने मुझसे पूछा कि तुम उदास क्यों हो. मैंने कहा कि आपने तो मुझे सुना ही नहीं. उन्होंने क़ाग़ज दिखाते हुए कहा कि घबराते क्यों हो, बशीर साहब ने 'गुड' नहीं 'एक्सीलेंट' लिखा है. पाँच महीने में ही मेरा नाम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया. पाकिस्तान में ही नहीं हिंदुस्तान में भी मुझे लोग सुनते थे. इसके अलावा उनसे जब पूछा गया कि क्या बड़े गुलाम अली खां साहब ने भी यह कहा था कि तुम मेरा नाम रौशन करोगे तो उनका जवाब कुछ यूँ था: जब मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली साहब से मुझे सिखाने की गुजारिश की तो उन्होंने कहा कि मेरी शागिर्दी क्यों करते हो, मैं तो यहाँ रहता नहीं. फिर मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली के दोस्तों बग़ैरह से सिफ़ारिशें करवाईं और जोर देकर कहा कि आप ही इसे सिखाएं. उन्होंने मुझे कुछ सुनाने के लिए कहा. मैने उन्हीं की ठुमरी 'सैंया बोलो तनिक मुँह से रहियो न जाए....' वो हंसने लगे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और प्यार किया और कहा कि कल आपकी शागिर्दी होगी. सच्ची बात ये है कि ऐसे उस्ताद की शागिर्दी होना मुक़द्दर की बात है. गुलाम अली साहब के अनुसार उनके जीवन और गाने में कोई फ़र्क नहीं है। वे अपने जीवन को अपनी गायकी से अलग करके नहीं देख सकते। उन्हीं के शब्दों में: मेरा तो जीवन और गाना एक ही है. यानी गाना जीवन है और जीवन गाना. मेरे लिए ये आपस में जुड़े हैं. मैं ख़ाली भी होता हूँ तो दिमाग़ में हर समय संगीत ही चलता रहता है. बस मेरा ज़ोर क्लासिकल पर रहता है. जिसे शास्त्रीय संगीत की जानकारी नहीं होगी वो आगे नहीं बढ़ सकता. मेरा तो ये कहना है कि जब भी गाया जाए कुछ हटकर गाया जाए. बस इसी तरह लफ़्जों को सोचते रहते हैं. गुलाम अली से जुड़ी और भी कई सारी मज़ेदार बातें हैं,लेकिन वे सब फिर कभी। अभी आनंद बख्शी साहब (जी हाँ यह गज़ल उन्हीं की लिखी हुई है...चौंक गए ना!) की ओर रूख करते हैं।

आनंद बख्शी साहब एक ऐसे शख्स हैं, जिनके गीतों को सुनकर न जाने कितनी पीढियाँ (हमारी पीढी और हमसे एक सोपान पहले की पीढी तो निस्संदेह)जवान हुई हैं। भले हीं इस दौरान हम में से कई लोगों ने उन्हें भुला दिया हो लेकिन उनके गीतों को भुलाना आसान नहीं। हम जैसे भूले-भटकों को राह दिखाने के लिए हीं "विनय प्रजापति" जी आनंद बख्शी साहब पर एक ब्लाग चला रहे हैं। मौका मिले तो एक बार आप भी चक्कर लगा के आ जाईयेगा। वैसे आनंद बख्शी के जीवन के बारे में कई लोगों ने बहुत कुछ लिखा है, लेकिन चूँकि हमें कुछ अलग करने की आदत है, इसलिए हम उनके सुपुत्र "राकेश आनंद बख्शी" की कही कुछ बातें लेकर यहाँ हाज़िर हुए हैं। ये बातें उन्होंने "सुपर मैग्जीन" के साथ इंटरव्यू में कहीं थी। मेरे पिताजी ने १९५७ से २००२ के बीच ८०० से भी ज्यादा फिल्मों के लिए ३५०० से भी ज्यादा गाने लिखे हैं। इतना होने के बावजूद जब भी वो कोई नया गाना लिखने बैठते तो उन्हें हर बार यह लगता था कि कहीं इस बार वे असफ़ल न हो जाएँ। इस डर के बावजूद वे सफ़ल हुए और इसका एकमात्र कारण यह था कि हर बार वे ग्राउंड ज़ीरो से शुरूआत करते थे। उन्हें अपनी सफ़लता पर तनिक भी दंभ न था। उन्होंने मुझे सिखाया कि "खुद पर संदेह होना या फिर आत्म-विश्वास की कमी आम चीजें हैं। इनसे कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए, बल्कि ये सारी चीजें हीं हमें ताकत देती हैं।" उनका मानना था कि "हिट फ़िल्म बनाना या हिट स्क्रिप्ट लिखना बड़ी बात नहीं है। हिट और फ्लाप तो आते जाते रहते हैं, हमें इन पर ज्यादा सोच-विचार नहीं करना चाहिए। जो चीज मायने रखती है वह यह है कि इनके बाद या इनके दौरान आपका औरों के साथ कैसा बर्ताव रहा है, आप खुद किस तरह के इंसान बन गए हैं या बन रहे हैं और आपने कैसे दोस्त बनाए हैं।" मेरे पिताजी ने अपने डर पर काबू पाने के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं जिनका इस्तेमाल सुभाष घई साहब ने अपनी एक फ़िल्म में भी किया है। उस कविता या कहिए उस गीत का मुखड़ा इस तरह था:

मैं कोई बर्फ़ नहीं जो पिघल जाऊँगा,
मैं कोई हर्फ़ नहीं जो बदल जाऊँगा,
मैं तो जादू हूँ, मैं जादू हूँ, चल जाऊँगा।


कहते हैं कि आनंद बख्शी ने जब "आपकी कसम" के लिए "ज़िंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मकाम वो फिर नहीं आते" लिखा था तो जावेद अख्तर साहब उनके घर तक चले गए थे और उनसे उनकी कलम की माँग कर दी थी। आनंद बख्शी साहब ने कहा कि आपको अपनी कलम देकर यूँ तो मैं बहुत खुश होऊँगा लेकिन क्या करूँ मुझे यह कलम किशोर कुमार ने गिफ़्ट में दी है। आनंद बख्शी साहब नए फ़नकारों को बहुत प्रोत्साहित करते थे। सुखविंदर सिंह उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि "चूँकि मैं खुद एक संगीतकार हूँ इसलिए जब मैं दूसरों के लिए गाता हूँ तो अपना इनपुट दिए बिना रहा नहीं जाता और इसलिए गाना दिल से नहीं कर पाता। बख्शी साहब ने एक बार मुझे कहा था कि जब तुम स्टुडियो में एक गायक की हैसियत से आओ तो अपने अंदर बैठे संगीतकार को घर छोड़कर हीं आना और तब से मैं उनकी इस बात को फौलो कर रहा हूँ। और अब मुझे कोई दिक्कत नहीं आती।" तो ऐसे गुणी थे हमारे आनंद बख्शी साहब। उन्हें याद करते हुए चलिए हम अब सुनते हैं आज की गज़ल। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हजारों घर घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर दिन रात रोता हूँ
ख़ुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मेरे मालिक मेरा दिल क्यों तड़पता है सुलगता है
तेरी मर्ज़ी तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल किसी को तूने अंगारा बना डाला

चमकते चाँद को…

यही आग़ाज़ था मेरा यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था मुझे नाकाम होना था
मुझे तक़दीर ने तक़दीर का मारा बना डाला




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुद्दत के बाद उस ने जो की ___ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े..


आपके विकल्प हैं -
a) करम, b) लुत्फ़, c) मेहर, d) ख़ुशी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "ज़ब्त" और शेर कुछ यूं था -

ज़ब्त लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़,
जालिम अब के भी न रोयेगा तू तो मर जायेगा...

फ़राज़ साहब के इस शेर को सबसे पहले पकड़ा कुलदीप जी ने। उन्होंने इस शब्द पर दो शेर भी पेश किए जिनके शायर के बारे में उन्हें जानकारी नही थी। ये रहे दो शेर:

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सरे बज्म ये क्या हुआ
मेरी आंख कैसे छलक गयी मुझे रंज है ये बुरा हुआ

जनून को ज़ब्त सीखा लूं तो फिर चले जाना
में अपनेआप को संभाल लूं तो फिर चले जाना

इन दो शेरों के साथ-साथ उन्होंने परवीन शाकिर, हफ़िज जौनपुरी, मोहसिन नकवी,शकील बदायूंनी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, शेरो भोपाली, शहजाद अहमद और इब्राहीम जौक़ के भी शेर पेश किए। अब चूँकि सारे शेर यहाँ हाज़िर नहीं किए जा सकते, इसलिए ज़ौक साहब के इस शेर के साथ कुलदीप जी की टिप्पणियों को इज़्ज़त बख्शते हैं। वैसे भी कुलदीप जी ने इस बार वही शेर पेश किए जिसमें "ज़ब्त" शब्द की आमद थी। बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार की शोभा बढाने वाले ज़ौक साहब का शेर कुछ यूँ है:

ना करता ज़ब्त मैं गिरिया तो ऐ "जौक" इक घडी भर में
कटोरे की तरह घड़ियाल के गर्क आसमान होता

शामिख साहब कोई बात नहीं...देर आयद दुरूस्त आयद। जनाब असदुल्लाह खान ग़ालिब के इस शेर के साथ आपने जबरदस्त वापसी की है:

ऐ दिले-ना-आकिबतअंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर
कौन ला सकता है ताबे-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त

फ़िराक़ साहब की पूरी गज़ल वैसे तो हमें खूब भायी लेकिन क्या करें पूरी गज़ल यहाँ पेश नहीं कर सकते इसलिए इसी शेर के साथ काम चला लेते हैं:

ख़बर है तुझको ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत
तेरे हाथों में लुटता जा रहा हूँ

रचना जी, यह क्या, क्या कह रही हैं आप। हमारी इस महफ़िल में आने वाला कोई भी शख्स बड़ा या छोटा नहीं है। हम सब तो गज़लों के मुरीद हैं और इस नाते गज़ल-भाई या गज़ल-बहन हुए। तो फिर भाई-बहनों में क्या ऊँच-नीच। आप इसी तरह अपने शेरों के साथ हमारी महफ़िल की शोभा बढाते रहिए:

सारे गम जब्त करलूं एक सहारा तो दिया होता
चल पड़ता तेरी रह में एक इशारा तो दिया होता

दर्पण जी, अब क्या कहें हम.....चूँकि आप गुलज़ार साहब के बहुत बड़े फ़ैन हैं इसलिए इस नाते तो हमारे दोस्त हुए। फिर आपको चैलेंज क्यों देना। हम तो यह चाहेंगे कि आप गुलज़ार साहब के बारे में अपना कुछ अनुभव लिख कर आवाज़ को hindyugm@gmail.com पर मेल कर दें। वह क्या है कि इस रविवार को हम गुलज़ार साहब पर एक आलेख पेश करने वाले हैं, उनका जन्मदिन जो आ रहा है। आशा करते हैं कि आपकी इंट्री ज़रूर आएगी।

मनु जी, यह क्या.. आप आएँ और दर्पण जी को पहचान कर चल दिए। आपके शेर कहाँ गए?

मंजु जी, आपकी पंक्तियाँ भी खूबसूरत हैं:

दिल की बज्म में तेरी वफा का राज था .
जब्त कर लिया राज तूने
दिया बेवफा का साथ था

सुमित जी, आप देर हो गए, कोई बात नहीं, आए तो सही। यह रहा आपका शेर:

कमाल ऐ जब्त ऐ मोहब्बत इसी को कहते है,
तमाम उम्र जबान पर न उनका नाम आये।

हमारे कुछ उस्ताद महफ़िल में दिखे हीं नहीं जैसे अदा जी, दिशा जी, पूजा जी, नीलम जी। वहीं शरद जी आए तो लेकिन उन्होंने कोई शेर पेश नहीं किया। आखिर ऐसी नाराज़गी क्यों। उम्मीद करते हैं कि इस बार आप सब टिप्पणी करने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, August 10, 2009

बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते है...कितना सही कहा था शायर ने किशोर में स्वरों में बसकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 167

"फूलों से ख़ूबसूरत कोई नहीं, सागर से गहरा कोई नहीं, अब आप की क्या तारीफ़ करूँ, दोस्ती में आप जैसा प्यारा कोई नहीं"। जी हाँ, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में दोस्त और दोस्ती की बातें। एक अच्छा दोस्त जहाँ एक ओर आप की ज़िंदगी को सफलता में बदल सकता है, वहीं बुरी संगती आदमी को बरबादी की तरफ़ धकेल देती है। इसलिए हर आदमी को अपने दोस्त बहुत सावधानी से चुनने चाहिए। वो बड़े क़िस्मत वाले होते हैं जिन्हे ज़िंदगी में सच्चे दोस्त नसीब होते हैं। कुछ इसी तरह का फ़लसफ़ा आज किशोर दा हमें सुना रहे हैं 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़' के अंतर्गत। "दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं, बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं". यूँ तो दोस्ती पर किशोर दा ने कई हिट गीत गाये हैं जैसे कि फ़िल्म 'शोले' में "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे", फ़िल्म 'दोस्ताना' में "बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा", फ़िल्म 'याराना' मे "तेरे जैसा यार कहाँ", आदि। लेकिन इन सभी गीतों को पीछे छोड़ देता है फ़िल्म 'नमक हराम' का प्रस्तुत गीत। बड़े ही ख़ुबसूरत बोलों में पिरो कर गीतकार आनंद बक्शी साहब ने ख़ूब लिखा है कि "दौलत और जवानी एक दिन खो जाती है, सच कहता हूँ सारी दुनिया दुश्मन हो जाती है, उम्र भर दोस्त लेकिन साथ चलते हैं, दीये जलते हैं..."। बक्शी साहब इस गीत के ज़रिये दुनिया को यह बता गये हैं कि एक आम आदमी की बोलचाल जैसी भाषा में भी बेहतरीन गीत लिखे जा सकते हैं। राहुल देव बर्मन के संगीत की तारीफ़ भी शब्दों में संभव नहीं।

'नमक हराम' सन् १९७३ की हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार फ़िल्म रिलीज़ हुई थी १९ नवंबर को। फ़िल्म 'आनंद' के बाद राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन फिर एक बार साथ साथ आये इस फ़िल्म में, और फिर एक बार वही कामयाबी की कहानी का दोहराव हुआ। बीरेश चटर्जी की कहानी कुछ इस तरह से थी कि सोमू (राजेश खन्ना) एक ग़रीब घर का लड़का है, और विक्की (अमिताभ बच्चन) एक उद्योगपति का बेटा। दोनों में दोस्ती होती है। विक्की के पिता के अस्वस्थ होने की वजह से विक्की को कारखाने का ज़िम्मा अपने उपर लेना पड़ता है, लेकिन युनियन लीडर से भिड़ जाने की वजह से कारखाने में हड़ताल हो जाती है। पिता के अनुरोध पर विक्की माफ़ी तो माँग लेता है, लेकिन बदले की आग में झुलसने लगता है। सोमू के साथ मिलकर वो युनियन लीडर को सबक सीखाने की ठान लेता है। सोमू कारखाने में नौकरी कर लेता है और जल्द ही मज़दूरों को प्रभावित कर ख़ुद युनियन लीडर बन जाता है। विक्की के पिता को विक्की और सोमू की दोस्ती ख़ास पसंद नहीं आती क्योंकि उन्हे लगता है कि सोमू अपने मध्यम वर्गीय विचारों से विक्की को प्रभावित कर रहा है। आख़िर में दोस्ती की जीत होती है या पिता के उसूलों की, यह तो आप ख़ुद ही इस फ़िल्म में कभी देख लीजिएगा। बहरहाल, आप को यह बता दें कि प्रस्तुत गीत के अलावा भी इस फ़िल्म में किशोर कुमार ने कम से कम दो और ऐसे गीत गाये हैं जिन्हे उनके सदाबहार गीतों की फ़ेहरिस्त में शामिल किया जाता है। ये गानें हैं "मैं शायर बदनाम" और "नदिया से दरिया, दरिया से सागर"। ये सभी गीत राजेश खन्ना ने परदे पर गाये थे। फ़िल्म की नायिकायें थीं रेखा और सिमी गरेवाल। फ़िल्म दो-नायक प्रधान फ़िल्म होने की वजह से नायिकाओं को ज़्यादा स्पेस नहीं मिल पाया और शायद इसीलिए इस फ़िल्म में किसी गायिका का गाया कोई गीत ज़्यादा चर्चित नहीं हुआ। तो दोस्तों, सुनिए आज का यह गीत और याद कीजिए अपने सच्चे दोस्तों और अपनी दोस्ती को। लेकिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को भी अपने दोस्तों की लिस्ट में शामिल करना ना भूलिएगा!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक जोशीला गीत किशोर का.
2. कल के गीत का थीम है - "जवानी, यूथ".
3. मुखड़े में शब्द है -"बदनामी".

पिछली पहेली का परिणाम -
हा हा हा...भाई कल की पहेली में हमें खूब मज़ा आया....सभी धुरंधर जहाँ चूक गए वहां मनु जी ने संशय से भरा ही सही, मगर एकदम सही जवाब देकर बाज़ी मारी. देखा मनु जी, अपने पर विश्वास रखिये आप कमाल कर सकते हैं. ४ अंक हुए आपके. सभी श्रोताओं ने जिन्होंने कोशिश की उनकी हम दाद देते हैं.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

स्नेह निर्झर बह गया है कुछ यूँ संगीतबद्ध हुआ

गीतकास्ट प्रतियोगिता- परिणाम-3: स्नेह-निर्झर बह गया है

देखते-देखते आज वह समय भी आ गया, जब हम गीतकास्ट प्रतियोगिता के तीसरे अंक के परिणाम प्रकाशीत व प्रसारित कर रहे हैं। मई महीने में शुरू हुई इस प्रतियोगिता का एक मात्र उद्देश्य यही था कि हिन्दी कविता के प्रतिमानों या यूँ कह लें आधार-स्तम्भों को संगीत से जोड़ा जाये ताकि नई पीड़ी भी उन्हें गुनगुना सके और अपने मन के आँगन में एक स्थान दे सके। इस प्रतियोगिता की शुरूआती दो कड़ियाँ 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' और 'प्रथम रश्मि' बहुत सफल रहीं। श्रोताओं ने बहुत पसंद किया। प्रतिभागिता बढ़ी। उसी का फल है कि तीसरे अंक में जब हमने निराला की एक मुश्किल कविता 'स्नेह-निर्झर बह गया है' चुना तो भी इसमें 18 प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं। हमने तीसरे अंक के लिए प्रविष्टि जमा करने की आखिरी तिथि रखी थी 31 जुलाई 2009। 30 जुलाई तक हमें मात्र 1 प्रविष्टि मिली थी, लेकिन 31 तारीख को यह बढ़कर 18 हो गईं।

कविता मुश्किल तो थी ही, लेकिन हम पिछले 3 अंकों से एक और परेशानी का सामना कर रहे हैं, वह यह कि अलग-अलग प्रकाशन की पुस्तक में कविता की पंक्तियों का अलग-अलग होना। 'स्नेह-निर्झर बह गया है' गीत के दूसरे अंतरे में लोकभारती प्रकाशन, इलहाबाद द्वारा प्रकाशित और रामविलास शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक 'राग-विराग' में शब्द है 'प्रतिभा', तो वहीं वाणी प्रकाशन, दिल्ली से छपी 'निराला संचयिता' में शब्द है 'प्रभा'। गायन में भी उच्चारण की गलतियाँ हुईं, वह शायद इसलिए क्योंकि संस्कृठनिष्ठ शब्दों को सुर पर बिठाना ख़ासा मुश्किल काम है।

फिर भी पाँच जजों ने गीत में गायकी, संगीत, संगीत संयोजन, उच्चारण और प्रस्तुतिकरण जैसे मापदंडों पर इन्हें परखकर सभी के सकारात्मक पक्ष को सराहा। इस बार निर्णायकों में सजीव सारथी, अनुराग शर्मा, यूनुस खान, आदित्य प्रकाश और शैलेश भारतवासी सम्मिलित थे। इनके द्वारा दी गई प्रतिक्रियाओं के आधार पर श्रीनिवास पांडा द्वारा संगीतबद्ध और बिस्वजीत नंदा द्वारा गाई हुई प्रविष्टि प्रथम स्थान पर रखी गई है। यद्यपि गायक ने उच्चारण की कई गलतियाँ की हैं, फिर भी संगीत इतना अनुकूल है कि मन को मोह लेता है।


बिस्वजीत/श्रीनिवास

श्रीनिवास
बिस्वजीत
बिस्वजीत युग्म पर पिछले 1 साल से सक्रिय हैं। हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र में इनके 5 गीत (जीत के गीत, मेरे सरकार, ओ साहिबा, रूबरू और वन अर्थ-हमारी एक सभ्यता) ज़ारी हो चुके हैं। ओडिसा की मिट्टी में जन्मे बिस्वजीत शौकिया तौर पर गाने में दिलचस्पी रखते हैं। वर्तमान में लंदन (यूके) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी कर रहे हैं। इनका एक और गीत जो माँ को समर्पित है, उसे हमने विश्व माँ दिवस पर रीलिज किया था।

श्रीनिवास हिन्द-युग्म के लिए बिलकुल नये संगीतकार हैं, आज हम इनकी पहली प्रस्तुति जारी कर रहे हैं। मूलरूप से तेलगू और उड़िया गीतों में संगीत देने वाले श्रीनिवास पांडा का एक उड़िया एल्बम 'नुआ पीढ़ी' रीलिज हो चुका है। इन दिनों हैदराबाद में हैं और अमेरिकन बैंक में कार्यरत हैं।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 2000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।
गीत सुनें-
64kbps

128kbps



दूसरे स्थान के विजेता भी एक दिग्गज हैं।


रफ़ीक़ शेख

रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था।

पुरस्कार- द्वितीय पुरस्कार, रु 1000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।
गीत सुनें-

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128kbps



तीसरे स्थान के विजेता बॉलीवुड के गायक हैं।


अभिजीत घोषाल

अभिजीत घोषाल बॉलीवुड के उभरते हुए गायक हैं। अभिजीत को सारेगामा में लगातार 11 बार जीतने का और स्वेच्छा से पुरस्कार छोड़ देने का श्रेय प्राप्त हैं। इलाहाबाद से पढ़े-लिखे, पले-बढ़े अभिजीत स्कूल के दिनों में पढ़ने में चेम्पियन थे, बैंक में मैनेजरी भी की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जैव विज्ञान शाखा के गोल्ड-मेडलिस्ट रहे। इनकी माँ को केंसर हो जाने के बाद ये इलाज हेतु उन्हें लेकर मुम्बई आ गये और मायानगरी के होकर रह गये। अभी हाल में इनका एक गीत 'झूमो रे झूमो' रीलिज हुआ जो फिल्म 'किसान' का हिस्सा है और डब्बू मल्लिक ने संगीत दिया है। गायक पं॰ अजॉय चक्रवर्ती से बहुत अधिक प्रभावित अभिजीत को मन्ना डे, मो॰ रफी, हरिहरन, सोनू निगम इत्यादि की गायन शैली पसंद है। अभिजीत को वियेना, ऑस्ट्रिया में हुए फेल्ड्करिच इंटरनेशनल संगीत महोत्वसव में दुनिया भर के संगीतकारों के साथ अपना हुनर दिखाने का मौका मिल चुका है। अभिजीत जिंगल-निर्माण से भी जुड़े रहे हैं, जैसे- 'गरमी अलविदा' (शाहरुख खान-नवरत्न ठंडा कूल-कूल), लुइज़ बैंक्स द्वारा संगीतबद्ध मध्य प्रदेश स्वर्ण जयंती वर्ष में, शान्तनु मोएत्रा द्वारा संगीतबद्ध बांग्लादेश के एकटेल मोबाइल के लिए और कैड्बरीज के लिए इत्यादि। इनके कुछ सोलो एल्बम भी आ चुके हैं; एचएमबी द्वारा प्रदर्शित बांग्ला-एल्बम 'ई प्रोथोम अभिजीत' , म्यूजिक टुडे द्वारा प्रदर्शित 'नीमराना'। प्रस्तुत प्रस्तुति में इनकी आवाज़ मन मोहने में कोई कसर नहीं छोड़ती।

पुरस्कार- तृतीय पुरस्कार, रु 1000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।
गीत सुनें-

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इन तीनों के अतिरिक्त भी अन्य 4 प्रविष्टियों ने हमारे जजों का ख़ास ध्यान खींचा। एक जज को पारुल ही प्रविष्टि सर्वश्रेषठ लगी तो वहीं एक को कृष्ण राज कुमार की। रुपेश ऋषि के आवाज़ की तारीफ़ लगभग सभी निर्णायकों ने की। गिरीजेश कुमार से कम ही जज इस बार संतुष्ट दिखे क्योंकि उनकी पिछली प्रस्तुति के बाद उनसे उम्मीदें बढ़ गई थीं।


पारुल पुखराज


रुपेश ऋषि


कृष्ण राज कुमार


गिरीजेश कुमार



इनके अतिरिक्त हम कमल किशोर सिंह, रमेश धुस्सा, मनोहर लेले, देवेन्द्र अरोरा, शरद तैलंग, तरुण कुमार, आशुतोष-अभिषेक, नील श्रीवास्तव, अम्बरीष श्रीवास्तव, कवि मुक्तेश्वर बख्श श्रीवास्तव, अभिनव वाजपेयी इत्यादि के भी आभारी है, जिन्होंने इसमें भाग लेकर हमारा प्रोत्साहन किया और इस प्रतियोगिता को सफल बनाया। हमारा मानना है कि यदि आप इन महाकवियों की कविताओं को यथाशक्ति गाते हैं, पढ़ते हैं या संगीतबद्ध करते हैं तो आपका यह छोटा प्रयास एक सच्ची श्रद्धाँजलि बन जाता है और एक महाप्रयास के द्वार खोलता है। हम निवेदन करेंगे कि आप इसी ऊर्जा के साथ गीतकास्ट के अन्य अंक में भी भाग लेते रहें।


इस कड़ी के प्रायोजक हैं डॉ॰ ज्ञान प्रकाश सिंह, जो पिछले 30 वर्षों से मानचेस्टर, यूके में प्रवास कर रहे हैं। कवि हृदयी, कविता-मर्मज्ञ और साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले- ये सभी इनके विशेषण हैं। यदि आप भी इस आयोजन को स्पॉनसर करता चाहते हैं तो hindyugm@gmail.com पर सम्पर्क करें।

Sunday, August 9, 2009

किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदायी...दर्द ऐसा था किशोर की आवाज़ में कि सुनते ही आंख भर आये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 167

'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़'। दोस्तों, इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सज रही है किशोर कुमार के गाये ज़िंदगी के अलग अलग रंगों के गीतों से। आज की कड़ी का जो रंग है, वह ज़रा दर्दीला है। हमेशा मुस्कुराने वाले किशोर दा के इस चेहरे के पीछे एक तन्हा दिल भी था जो उनके दर्द भरे गीतों से छलक पड़ता और सुननेवालों को रुलाये बिना नहीं छोड़ता। गुदगुदाने वाले किशोर ने जब कुछ संजीदे फ़िल्मों का निर्माण किया तो उनमें उनका उदासीन चेहरा लोग पचा नहीं पाये, लिहाज़ा उनकी सब संजीदा फ़िल्में असफल रहीं। लेकिन उनका वह दर्द जब उनके गीतों से बाहर फूट पड़ा तो लोगों ने उन्हे पलकों पर बिठा लिया। उनके गाये दर्द भरे गीत कुछ इस क़दर मशहूर हैं कि म्युज़िक कंपनियाँ समय समय उनके दर्दीले गीतों के कैसेट्स व सीडीज़ जारी करते रहते हैं। ख़ैर, आज इस रंग के जिस गीत को हमने चुना है वह है 'जोशीला' फ़िल्म का, "किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई, मीलों है ख़ामोशी, बरसों हैं तन्हाई". १९७३ की इस फ़िल्म में देव आनंद नायक थे और अभिनेत्रियाँ थीं हेमा मालिनी व राखी। ५० के दशक में जब किशोर दा ने देव साहब के लिए गाना शुरु किया था, तब वो देव साहब के अलावा किसी और के लिए नहीं गाते थे। धीरे धीरे परम्परा टूटी और आगे चलकर किशोर दा अपने समय के सभी नायकों की आवाज़ बने। देव आनंद की यह फ़िल्म 'जोशीला' बॉक्स औफ़िस पर असफल रही, लेकिन एक बार फिर लोगों ने किशोर दा के गाये इस गीत को अपने दिलों में बसा लिया। राहुल देव बर्मन का संगीत और साहिर लुधियानवी के बोल थे इस गीत में। यहाँ यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि साहिर और पंचम का बहुत कम गीतों में साथ रहा, और जब उनके साथ की बात चलती है तो सब से पहले 'जोशीला' का यह गीत ही याद आता है।

दोस्तों, यह गीत हम सभी के साथ साथ पंचम को भी बेहद पसंद था, तभी तो फ़ौजी भा‍इयों के लिए प्रस्तुत 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में उन्होने इस गीत को बजाया था और गीत बजाने से पहले उन्होने क्या कहा था अब यह भी जान लीजिये - "अक्सर हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में ऐसा होता है कि 'म्युज़िक डिरेक्टर' बोलिए, 'प्रोड्युसर' बोलिए, 'डिरेक्टर' बोलिए, सब लोग एक गाने को बहुत पसंद करते हैं, और दो तीन गानों को पसंद करते हैं, और 'पिक्चर' जब 'रिलीज़' होने का 'टाइम' आता है तब तो वो गानें बजना भी शुरु हो जाता है, जिन्हे सब लोग पसंद करने लगते हैं। 'But somehow' बदक़िस्मती है कि 'पिक्चर' पीछे रह जाता है, 'हिट' नहीं हो पाता है, तो वो गानें काफ़ी लोगों को शायद सुनने में नहीं आते हों! इनमें से एक गाना मैं आप को सुनाना चाहता हूँ जो मेरा बहुत प्रिय है। वह गाना बनाने के 'टाइम' में मैने बहुत 'एंजोय' किया, 'पिक्चर रिलीज़' होने के बाद भी 'एंजोय' किया, वह 'पिक्चर' का नाम है 'जोशीला', और बोल लिखे थे साहिर साहब ने।" तो दोस्तों, अब गीत सुनने की बारी है, बस यही कहते चलेंगे कि-

"कोई भी साया नहीं राहों में,
कोई भी आयेगा न बाहों में,
तेरे लिए मेरे लिये कोई नहीं रोने वाला
"

संदेश साफ़ है कि जहाँ तक संभव हो, हमें किसी पर निर्भर नहीं होना चाहिये, अपना रस्ता ख़ुद तय करें, अपनी मंज़िल तक ख़ुद पहुँचे। यह बात हम ने इसलिए कही क्योंकि हम इन दिनों ज़िंदगी के रूपों से आप का परिचय करवा रहे हैं। सुनिए आज का गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. किशोर की आवाज़ में एक और ज़ज्बाती गीत.
2. कल के गीत का थीम है - "दोस्ती".
3. इस फिल्म में दो महानायकों ने साथ काम किया था.

पिछली पहेली का परिणाम -
दिशा जी जबरदस्त वापसी....१२ अंक हो गए आपके. मनु जी सही कहा आपने वाकई बहुत दर्द भरा है किशोर दा ने इस गीत में. निर्मला जी आपकी पसदं के और गीत भी लेकर हम हाज़िर होते रहेंगें. मंजू जी, अदा जी, शरद जी आप सब का भी आभार, और पराग जी आपके लिए बस इतना ही कहेंगें कि संगीत को दशकों में मत बांटिये. सभी में कुछ न कुछ अच्छा है...खैर वैसे आपकी पसंद के एरा में भी जल्द ही लौटेगा ओल्ड इस गोल्ड निश्चिंत रहें....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार सुबह की कॉफी और आपकी पसंद के गीत (12)

जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं

साहित्य, कला और संगीत ऐसे तीन स्तम्भ हैं जो हमारे देश की आन, बान और शान का प्रतीक हैं. इन तीनों ही के योगदान ने देश को सफलता के उच्च शिखर पर पहुँचाया है. इतिहास गवाह है कि साहित्य और संगीत के द्वारा हमारे साहित्यकारों ने देश के लोगों को जागरूक करने का काम किया है. चाहें गुलामी की जंजीरों से आजाद होने की प्रेरणा हो या फिर टुकडों में बँटे देश को जोड़ने का प्रयास, इन साहित्यकारों ने अपना योगदान बखूबी दिया है. इनकी कलम से निकले शब्दों ने पत्थर हृदयों में भी स्वाभिमान और देशप्रेम का जज़्बा पैदा कर दिया. कहते है कि "जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुचे कवि". अर्थात कवियों की कल्पना से कोइ भी अछूता नहीं है. जो काम अन्य लोगों को असंभव दिखा वो कार्य इन कवियों ने अपनी कलम की ताकत के द्वारा कर दिखाया. भारतीय रचनाकार बंकिमचंद्र चटर्जी को कौन नहीं जानता. उनके द्वारा लिखे "वन्दे मातरम" गीत ने करोड़ों भारतीयों के सीने में अपनी जन्मभूमि के प्रति कर्तव्य और प्रेम के भाव को जागृत कर दिया. यही नहीं यह गीत आजादी का नारा बन गया. आज भी इस गीत के स्वर भारतवर्ष की फिजाओं में गूँजते है और देशप्रेमी इस गीत की तान को अपनी आत्मा से अलग नहीं कर पाते. ऐसे में स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर इस गीत का जिक्र और फरमाईश ना हो, मुमकिन ही नहीं. हमारे हिन्दयुग्म के नियमित पाठक व श्रोता पराग सांकला(यू.एस.ए) जी ने "वंदे मातरम" गीत को सुनने की ख्वाहिश के साथ उससे जुड़ी कई बेहतरीन जानकारी भी हमसे बाँटी है.....

"रविवार ७ नवम्बर सन १८७५ में बंकिमचंद्र चटर्जी ने प्रसिद्ध गीत "वन्दे मातरम" लिखा. यूँ तो यह गीत १२५ साल से भी ज्यादा पुराना है. लेकिन आज भी इसकी लोकप्रियता जस की तस है. कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने "वंदे मातरम" गीत को 'बादों स्क्वायर' में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के १८९६ सम्मेलन में गाया था. उसके बाद यह देशभक्ति की मिसाल बन गया जिसके चलते इस पर ब्रिटिश प्रतिबंध भी लगाया गया.

हिन्दी और बांग्ला भाषा में बनी फिल्म आनंदमठ(१९५२) में यह गीत शामिल किया गया इसकी धुन आज भी बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय है. यह धुन संगीतकार हेमंतकुमार ने राग मालकौंस और भैरवी के मिश्रण से बनाई थी. फिल्म में यह गीत लता जी और हेमंत दा ने गाया था. इससे दो साल पहले इस गीत को गीता दत्त जी ने एम दुर्रानी के साथ गाया था. दुर्भाग्य से इस गैरफिल्मी रिकॉर्ड का ऑडियो उपलब्ध नहीं हैं.
"

आइये सुनते है पराग जी की पसंद, और फिल्म आनंद मठ का वह दुर्लभ गीत........ जो शुरू होता हैं "नैनों में सावन" बोलों से. फिर गीत के बोल बन जाते हैं "गूँज उठा जब कोटि कोटि कंठों से आजादी का नारा" साथ ही पृष्ठभूमि में "वन्दे मातरम " का उच्चारण होता रहता है. आशा हैं की आप सभी संगीत प्रेमियों को भी यह गीत पसंद आयेगा.

नैनों में सावन.......वंदे मातरम


हम बात कर रहे थे अपने कवियों की. बंकिम चंद्र चटर्जी के अलावा अन्य कवियों ने भी स्वतन्त्रता की लड़ाई में अपनी लेखनी को तलवार की तरह इस्तेमाल किया है.लोगों के सोये स्वाभिमान को जगाने के लिये वह लिखते है...."निज भाषा, निज गौरव, देश पर जिसे अभिमान नही, नर नहीं वह पशु है, जिसको स्वदेश से प्यार नहीं".राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने तो संपूर्ण देश में राष्ट्रीयता की भावना ही भर दी थी. उनकी कलम से निकले यह शब्द आत्मा को छूते है......."जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं". हमारे देश के क्रान्तिकारी भी पीछे नहीं थे. जोश और भावों से पूर्ण उनका हृदय भी कविता बन फूट पड़ता था. क्रान्तिकारी भगतसिंह, बिस्मिल और राजगुरु ने जेल में बिताए हुए दिनों के दौरान अनेक गीतों और शेरों को कहा. इनमें "मेरा रंग दे बसंती चोला"और "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" मुख्य हैं. यह शेर व गीत अंग्रेजों के कान में खौलते तेल की तरह पड़ते थे लेकिन भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत थे और रहेंगे. देशप्रेम का भाव ऐसा होता है कि इसके वशीभूत हो व्यक्ति अपनी सुधबुध खो देता है. हमारे साथी निखिल आनंद गिरि जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. निखिल जी हिन्दयुग्म के साथ अपना अनुभव बाँटते हुए बताते है कि.......

'मेरा रंग दे बसंती चोला' और 'सरफरोशी की तमन्ना' जब भी सुनता हूं, रोएं खड़े हो जाते हैं..

"सरफरोशी की तमन्ना" गीत का जो नया वर्ज़न "गुलाल" फिल्म में आया है, ने इस गाने को सर्वकालिक बना दिया है...

नोएडा के स्पाइस मॉल में जब ये फिल्म देख रहा था तो बीच हॉल में खड़ा होकर मस्ती में झूमने लगा...लोग मुझे बैठाने लगे...दो-तीन गानों में ऐसा हुआ....मुझे मज़ा आ रहा था...मन में यही विचार आया कि क्या मैं कभी ऐसा लिख पाऊँगा ?

अभी कारगिल विजय पर कार्यक्रम बना रहा था...तो कई गाने सुनने को मिले....मज़ा आ गया....


निखिल जी ने ख्वाहिश की है गीत "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है".......

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


फिल्म "शहीद" का यह गीत वो जख्म फिर से ताजा कर देता है जो हमारे क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजों से जेल में खाये थे. अगर हम क्रान्तिकारी कवियों की बात करें तो "सियारामसरन गुप्त, श्रीधर पाठक, अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध आदि में भारतेन्दु जी का नाम मुख्य है उन्होंने अपनी कविता में अंग्रेजों की चाटुकारिता करने वाले शासकों को धिक्कारा है.

"गले बाँधि इस्टार सब, जटित हीर मनि कोर,

धावहु धावहु दौरि के कलकत्ता की ओर ।
चढ तुरंग बग्गीन पर धावहु पाछे लागि,
उडुपति संग उडुगन सरसि नृप सुख सोभा पागि।

राजभेट सब ही करो अहो अमीर नवाब,
हाजिर ह्वै झुकि झुकि करौ सब सलाम आदाब।
राजसिंह छूटे सबै करि निज देस उजार,
सेवन हित नृप कुँवर वर धाये बाँधि कतार ।

हिमगिरि को दै पीठ किय काश्मीरेस पयान ।

धाए नृप एक साथ सब करि सूनौ निज ठौर

देखा दोस्तों ये है कलम की धार जो बड़े-छोटे सभी की पोल खोल देती है. इस कलम की ताकत हमें फिल्मों में भी देखने को मिलती है. देशप्रेम और स्वतन्त्रता संग्राम के विषय पर बहुत सी फिल्में बनी है. हमारे एक अन्य श्रोता अनूप मंचाल्वर(पुणे)जी ने देशप्रेम से पूर्ण फिल्मों के बहुत ही भावपूर्ण दृश्य लिखकर भेजे हैं जो सभी को प्रभावित करेंगे..........

"देशभक्ति से पूर्णं कई फिंल्मे बहुत ही अच्छी है. मनोज कुमार, बेन किंग्सले हों या मणि रत्नम, सभी ने फिल्मो में देशभक्ति को बहुत ही सलीखे से दर्शाया है. मुझे दो दृश्य बहुत प्रभावित करते हैं.एक तो "गांधी" फिल्म से है "जब बापू एक नदी पर आते है और एक गरीब महिला को देखकर अपना गमछा पानी में छोड़ देते है ताकि वह महिला अपना तन ढक सके". इस दृश्य में भारत की समकालीन गरीबी और गांधीजी के देश प्रेम को बहुत ही सहजता से दर्शाया है. दूसरा दृश्य "रोजा" फिल्म का है "जब आतंकवादी (पंजक कपूर) तिरंगे को जलाकर फेंकता है तो नायक तिरंगे में लगी आग के ऊपर कूदकर तिरंगे को जलने से बचाता है. यहाँ ए.आर.रहमान द्वारा निर्मित तर्ज (आवाज़ दो हम एक है) माहौल में जोश भर देते है."

इन भावपूर्ण दृश्यो को पढ़ हमारा मन भी रोजा फिल्म का गीत सुनने को मचल उठा है. अनूप मंचाल्वर जी की इच्छा हम जरुर पूरी करेंगे..

भारत हमको जान से प्यारा है


दोस्तों साहित्यकारों और संगीतकारों की ताकत को नकारा नहीं जा सकता. वो अपने लेखन और संगीत से गहरी छाप छोड़ते हैं. हम उनके लेखन में तात्कालिक देश की हालत के भी दर्शन कर सकते हैं इसका प्रमाण है कवि बद्रीनारायण "प्रेमघन" की ये पंक्तियाँ...

कैदी के सम रहत सदा, आधीन और के

घूमत लुंडा बने, शाह शतरंज के। "

खैर यह तो पुराने समय के कवियों की बात हुई. अगर हम आज की बात करें तब भी पायेंगे कि नए लेखक और कवि भी अपने लेखन में देश के तत्कालिक हालातों और घटनाओं को स्थान दे रहे हैं. उनकी रचनाओं में ताजा हालातों को बहुत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है.. कारगिल युद्ध पर कई किताबें लिखी गई हैं व फिल्म भी बनाई गयी है. हमारे नियमित पाठक व श्रोता शरद तेलंग(राजस्थान) कारगिल युद्ध के समय से जुड़ा अनुभव लिखते है कि शहीदों और सैनिकों के प्रति देशवासियों में कितनी इज्जत है....."कारगिल युद्ध के समय की बात है हमारे संगीत दल ने यह तय किया कि हम लोग शहीदों की याद में एक देशभक्ति गीतों का कार्यक्रम विभिन्न जगहों पर आयोजित करेंगे । इसी योजना के तहत हमने कोटा, बून्दी, बारां तथा झालावाड़ जिलों में कार्यक्रम आयोजित किए । सभी जगह बहुत अच्छा अनुभव रहा, लेकिन झालावाड़ कार्यक्रम में मुख्य अतिथि जिला कलेक्टर तथा आर्मी के कुछ अफ़सरों के सामने हमने कार्यक्रम प्रस्तुत किया. तीन चार गीत सुनाने के बाद जब हमने श्रोताओं से अपील की कि जो भी सज्जन शहीद सैनिकों के परिवार हेतु अपना योगदान देना चाहे वो जिला कलेक्टर को मंच पर आकर दे दें. फिर क्या था एक बार जो सिलसिला शुरू हुआ वो थमा ही नही। लोगों का ध्यान गीतों से ज्यादा सैनिकों के लिये योगदान देने में था. उस दिन पहली बार मैनें लोगों में अपने देश और उसकी रक्षा करने वाले सैनिकों के प्रति गज़ब का उत्साह देखा। सभी शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए मैं "उसने कहा था' फिल्म का गीत 'जाने वाले सिपाही से पूछो वो कहाँ जा रहा है' सुनना चाहूँगा"

सही कहा शरद जी ने स्वतन्त्रता दिवस पर इससे अच्छी श्रद्धाजंली तो हो ही नहीं सकती. चलिये सुनते है यह गीत.

जाने वाले सिपाही से पूछो


दिल्ली से ही तपन शर्मा जी हमें लिखते हैं-
"देश भक्ति गीतों की जब बात आती है तो दो गीत ऐसे हैं जो मुझे सबसे अच्छे लगते हैं। एक गीत से गर्व महसूस होता है और दूसरा गीत जोश दिलाता है। देशभक्ति पर आधारित फ़िल्मों में सबसे पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है ’पूरब और पश्चिम’। मनोज कुमार उर्फ़ भारत कुमार ने एक से बढ़कर एक देशभक्ति से ओतप्रोत फ़िल्में बनाईं। उन्हीं में से एक थी पूरब और पश्चिम। और उसी का एक गीत है- "जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने दुनिया को तब गिनती आई"। ये उस गीत के शुरु के बोल हैं। आम लोगों में - "है प्रीत जहाँ की रीत सदा..." ये बोल प्रसिद्ध हैं। इसी गीत के शुरु में जब मनोज कुमार गुनगुनाता है कि- देता न दशमलव भारत तो चाँद पे जाना मुश्किल था..धरती और चाँद की दूरी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था....। ये बोल मुझे गर्वांवित करते हैं। और मैं ये महसूस करने लगता हूँ कि हाँ, हमारे देश में विश्व शक्ति बनने की काबिलियत है बस थोड़ा हौंसला और जोश चाहिये।

और ये जोश मिलता है मेरे अगले पसंदीदा गाने से। फ़िल्म थी "हक़ीकत"। और गाना-"कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों"। आगे के बोल में जब गीतकार ने कहा- "साँसे थमती गईं नब्ज़ जमती गईं..फिर भी बढ़ते कदम को न रूकने दिया.." तब लगता है मानो हम खुद ही बॉर्डर पर हों और दुश्मनों का सामना कर रहे हों। उन शहीदों को बारम्बार नमन करने की इच्छा होती है जिनकी वजह से हम सुरक्षित हैं। रौंगटे खड़ी कर देती हैं अगली पंक्तियाँ- "ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर..जान देने की रुत रोज़ आती नहीं.."। मन में बस एक ही बात उठती है..सीमा की सुरक्षा करना कोई हँसी मजाक नहीं। निडरता और हौंसला और देश पर मर मिटने का जज़्बा चाहिये। कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो अंदर तक हिल न जाये इस गीत को देखकर। इतना खूबसूरत ऊर्जा से भरपूर है ये गीत।
"

चलते चलते सुनते चलें तपन जी की पसंद के ये दो गीत भी
है प्रीत जहाँ की रीत सदा (पूरब और पश्चिम)


कर चले हम फ़िदा (हकीक़त)


देशप्रेम और साहित्यकारों का संबंध तो बहुत पुराना है प्राचीनकाल से लेकर आज तक सहित्यकारों ने बहुत कुछ लिखा है. आज भी उनका यह प्रयास जारी है कि उनकी लेखनी से निकले शब्द किसी एक नागरिक के हृदय मे भी देशप्रेम और स्वाभिमान का बीज बो दें तो काफी है, क्योकि बीज पड़ना जरुरी है अंकुर तो फूटेगा ही. प्रसिद्ध लेखक दुष्यंत जी ने कहा था "महज़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं ये सूरत बदलनी चाहिए, मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में ही सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए". हम भी यही प्रार्थना करते हैं कि लोगों में देश के प्रति लौ लगे. अंत में हम देश के शहीदों और समस्त साहित्यकारों को उनके योगदान के लिये समस्त देशवासियों की ओर से नमन करते है.

सूचना - अगले रविवार सुबह की कॉफी के साथ हम सुनेंगें गुलज़ार साहब के कुछ बेहद दुर्लभ गीत जिनका चयन किया है पंकज सुबीर जी ने. गुलज़ार साहब के बहुत से गीतों ने आप सब को कहीं न कहीं जीवन के किसी मोड़ पर छुआ होगा. उनके उन्हीं ख़ास गीतों से जुडी अपनी यादें हम सब के साथ बांटिये अपने उन अनुभवों को हमें लिख भेजिए. १८ अगस्त को गुलज़ार साहब का जन्मदिन है. हम कोशिश करेंगें कि आपकी मुबारकबाद उन तक पहुंचाएं, आप अपने अनुभव इसी पोस्ट में टिप्पणियों के रूप में भी लिख सकते हैं.तो जल्दी कीजिये कहीं देर न हो जाए.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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