Monday, January 16, 2017

छाया-गीत आलेख लेखन प्रतियोगिता





छाया-गीत आलेख लेखन प्रतियोगिता





रेडियो और ख़ास तौर से ’विविध भारती’ के नियमित श्रोताओं के लिए एक रोचक प्रतियोगिता लेकर आ रहा है ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’। ’विविध भारती’ का एक प्रसिद्ध कार्यक्रम है ’छाया-गीत’। जैसा कि आप जानते हैं कि इस कार्यक्रम में उद्‍घोषक अपनी पसन्द के गीतों को एक भाव या सूत्र में पिरो कर एक सुन्दर आलेख के साथ प्रस्तुत करते हैं। क्या आपने कभी मन ही मन एक भाव पर आधारित गीतों को पिरोया है? क्या आपने कभी अनजाने में किसी गीत के लिए कुछ काव्यात्मक शब्द कहे हैं? एक ही धागे में पिरो कर क्या आपने भी कभी ऐसी कोई गीत-माला बनाई है? ’छाया-गीत आलेख लेखन प्रतियोगिता’ में आपको यही करना है, अर्थात् आपको ’छाया-गीत’ का एक आलेख तैयार कर हमें भेजना है, ठीक वैसे ही जैसे कि हर रात ’विविध भारती’ पर आप सुनते हैं। आकर्षक और श्रेष्ठ पाँच आलेखों को पुरस्कृत किया जाएगा। इस प्रतियोगिता के नियम इस प्रकार हैं...

प्रतियोगिता के नियम -

1. प्रतियोगी को किसी एक भाव या शीर्षक पर छह गीत चुनने हैं और इन्हें एक सूत्र में पिरो कर ’छाया-गीत’ की शक्ल में एक आलेख तैयार करना है। 

2. चुने गए गीत उनके मुखड़े की पहली पंक्ति और उनके फ़िल्मों के नामों के साथ आलेख के उचित स्थानों में होने चाहिए।

3. एक प्रतियोगी केवल एक ही आलेख भेज सकते हैं।

4. आलेख को हिन्दी में लिखना होगा या फिर हिन्दी का अंग्रेज़ी में लिप्यान्तरण (transliterate) करके भेजना होगा।

5. आलेख chhayageet@yahoo.com के ई-मेल पते पर भेजना होगा।

6. आलेख भेजने की अन्तिम तिथि -  10 फ़रवरी 2017

7. प्रतियोगिता के विजेताओं की घोषणा 24 फ़रवरी 2017 को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ पर की जाएगी।

8. निर्णायक मंडल में कवि, गीतकार, पत्रकार और आकाशवाणी के उद्‍घोषक शामिल होंगे। निर्णायक मंडल का निर्णय अन्तिम निर्णय होगा।

9. पुरस्कार स्वरूप श्रेष्ठ पाँच आलेखों को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ पर प्रतियोगी के नाम और चित्र के साथ प्रकाशित किया जाएगा। साथ ही अगर प्रतियोगी चाहें तो उनका लिखा कोई अन्य लेख भी हम प्रकाशित कर सकते हैं। यह लेख सिनेमा, संगीत (किसी भी तरह का संगीत) या साहित्य के विषयों पर होने चाहिए।


तो देर किस बात की! जल्दी से तय कीजिए कोई एक भाव या विषय, चुनिए मनपसन्द छह गीत, और पिरो डालिए उन्हें एक सूत्र में, और तैयार कीजिए ’छाया-गीत आलेख लेखन प्रतियोगिता’ के लिए अपना सुन्दर आलेख। याद रहे, अन्तिम तिथि 10 फ़रवरी 2017 है!



आयोजक : सुजॉय चटर्जी  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, January 15, 2017

प्रातःकाल के राग : SWARGOSHTHI – 301 : MORNING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 301 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 1 : दिन के प्रथम प्रहर के राग

‘जग उजियारा छाए, मन का अँधेरा जाए...’



 "रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई श्रृंखला- ‘राग और गाने-बजाने का समय’ आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात, संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग बिलावल की एक बन्दिश सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग भैरव पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में भी सुनवा रहे हैं।




पण्डित भीमसेन जोशी
भारतीय कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है। सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। इन सिद्धान्तों की चर्चा हम अगली कड़ी से करेंगे। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। प्रथम प्रहर के कुछ मुख्य राग हैं- बिलावल, अल्हैया बिलावल, अरज, भैरव, अहीर भैरव, आनन्द भैरव, आभेरी, आभोगी, गुणकली, जोगिया, देशकार, रामकली, विभास, वैरागी और भैरवी आदि। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल है- “कोई तारा नज़र नहीं आवे...”। यह बन्दिश हम सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह बन्दिश तीनताल में निबद्ध है।

राग बिलावल : “कोई तारा नज़र नहीं आवे...” : पण्डित भीमसेन जोशी



लता मंगेशकर और सलिल चौधरी
आज का दूसारा प्रातःकालीन राग भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन अथवा वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बाँग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बाँग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म - जागते रहो



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली क्रमांक 301 में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। 




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – मुख्य गायक-स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 21 जनवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 303सरे अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता



‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 299 में हमने आपसे संगीत पहेली का कोई भी प्रश्न नहीं पूछा था। अतः इस अंक की पहेली का कोई भी विजेता नहीं है। अगले अंक से पहेली का उत्तर और विजेताओं के नाम पूर्ववत प्रकाशित करेंगे।

अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ नई लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, January 14, 2017

चित्रकथा - 2: बिमल रॉय की मृत्यु की अजीबोग़रीब दास्तान


अंक - 2

बिमल रॉय की मृत्यु की अजीबोग़रीब दास्तान

“अमृत कुंभ की खोज में...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के दूसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

फ़िल्मकार बिमल रॉय एक कहानी पर फ़िल्म बना रहे थे। फ़िल्म तो नहीं बनी पर उस कहानी की एक घटना बिमल रॉय के साथ यूं के यूं घट गई। यह उनके जीवन की आख़िरी घटना थी। यह उनकी मृत्यु की घटना थी। आइए आज ’चित्रकथा’ में इसी अजीबोग़रीब घटना के बारे में जाने जिसका उल्लेख गुलज़ार साहब ने उनकी लघुकथाओं की पुस्तक ’रावी पार’ में ’बिमल दा’ नामक लेख में किया है।




कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो एक बहुत ही कम कार्यकाल में या छोटी सी आयु में अपनी कला, लगन और परिश्रम से ऐसा कुछ कर जाते हैं कि फिर वो अमर हो जाते हैं। बिमल रॉय एक ऐसे ही फ़िल्मकार थे जिन्होंने केवल एक दशक में इतने सारे हिट और उच्चस्तरीय फ़िल्में भारतीय सिनेमा को दी है कि उन्हें अगर भारतीय सिनेमा के स्तंभ फ़िल्मकारों में से एक कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बिमॉल रॉय एक ऐसी संस्था का नाम है जो आज तक प्रेरणास्रोत बनी हुई है। लेकिन आज हम बिमल रॉय की फ़िल्मों की समीक्षा नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक ऐसी आश्चर्यजनक घटना से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं कि जिसे पढ़ कर आप भी दंग रह जायेंगे। अगर फ़िल्म की कहानी के नायक से साथ घटने वाली घटना ख़ुद फ़िल्मकार के साथ घट जाए, और वह भी उसी दिन जिस दिन कहानी में वह घटना घटने वाली हो, तो फिर इसे आप क्या कहेंगे? सिर्फ़ संजोग या कुछ और?

यह किस्सा है एक अजीब संजोग का। यह संजोग जुड़ा है बिमल रॉय और उनकी फ़िल्म के एक चरित्र
से। बात 1955 की रही होगी जब बिमल रॉय ’देवदास’ बना रहे थे। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने के बाद उन्होंने एक और बांगला उपन्यासकार समरेश बसु की एक उपन्यास पढ़ना शुरु किया। उपन्यास पूरी पढ़ डाली। उपन्यास का नाम था "अमृतो कुंभेर संधाने" (अमृत कुंभ की खोज में)। वो इस पर एक बांगला-हिन्दी द्विभाषी फ़िल्म बनाना चाहते थे। हिन्दी संस्करण वाले फ़िल्म का नाम रखा गया ’अमृत कुंभ की खोज में’। समरेश बसु की उपन्यास की कहानी महाकुंभ मेले में होने वाले प्रचलित स्नान पर आधारित थी। ऐसी मान्यता है कि मेले के नौवे दिन, यानी कि जोग-स्नान के दिन प्रयाग के संगम में स्नान करने से व्यक्ति को लम्बी आयु और स्वस्थ जीवन मिलता है। समरेश बसु की उपन्यास के हिसाब से कहानी का मुख्य पात्र बलराम को टी.बी (काली खाँसी) हो जाती है, और वो दिन-ब-दिन कमज़ोर होता जाता है। इस वजह से वो अपनी लम्बी उम्र के लिए इलाहाबाद महाकुंभ के नौवे दिन, यानी कि जोग-स्नान वाले दिन स्नान करने आता है, पर दुर्भाग्य से बलराम पहले ही दिन भगदड़ में मारा जाता है। समरेश बसु की इस कहानी में जिस भगदड़ का पार्श्व रखा गया है, वह हक़ीक़त में 1954 के कुंभ मेले में हुई थी। 3 फ़रवरी के दिन हुई इस भगदड़ में 800 से अधिक लोग मारे गए थे और 2000 बुरी तरह से घायल हुए थे। यह मौनी अमावस्या का स्नान था। इसी भगदड़ का उल्लेख हमें विक्रम सेठ की 1993 की उपन्यास ’A Suitable Boy' में भी मिलता है।

ख़ैर, बिमल रॉय को यह कहानी बहुत पसन्द आई, और उन्हें लगा कि इस कहानी के माध्यम से समाज को एक सशक्त संदेश दिया जा सकता है और साथ ही नाटकीय क्लाइमैक्स की वजह से फ़िल्म आम जनता को भी पसन्द आएगी। मगर कहानी की एक बात उन्हें बहुत खटक रही थी और वह यह कि बलराम का पहले ही दिन मर जाना उन्हें कुछ ठीक नहीं लगा। आख़िर वो एक फ़िल्मकार थे और फ़िल्म बनाना चाह रहे थे। मुख्य नायक के पहले ही दिन मर जाने से वो सहमत नहीं थे। फ़िल्म के फ़्लॉप होने का खतरा उन्हें नज़र आ रहा था। फिर भी उन्होंने इस कहानी पर स्क्रिप्ट लिखने का काम गुलज़ार को दे दिया। यह बात होगी सन् 1959 की। गुलज़ार साहब ने अगले तीन साल तक स्क्रिप्ट पर काम करना जारी रखा। जब जब समय मिलता वो बिमल रॉय से नोट्स लेते और लिखने बैठ जाते। काम अपनी गति से चलने लगा। 

’अमृत कुंभ की खोज में’ के नायक की भूमिका के लिए पहले-पहले दिलीप कुमार का नाम तय हुआ था,
1960  में इलाहाबाद के अर्धकुंभ में फ़िल्माए गए स्टॉक शॉट्स में से एक
पर बाद में सम्भवत: धर्मेन्द्र का नाम फ़ाइनल हुआ था। बिमल रॉय ने योजना बनाई थी 1960 की सर्दियों में जो इलाहाबाद में वार्षिक कुंभ होगा, वो उसमें स्टॉक शॉट्स को शूट करेंगे और उसके दो साल बाद दिसंबर 1964 के महाकुंभ में फ़िल्म की बाकी शूटिंग् करेंगे। लेकिन जब 1960 के वार्षिक कुंभ को शूट करने का समय आया तो दादा बिमल रॉय की तबीयत ख़राब हो गई। वो शूटिंग् पे नहीं जा सके। उन्होंने अपनी जगह गुलज़ार को भेज दिया। काम तो शुरु हो गया पर बिमल दा की तबीयत दिन-ब-दिन बद से बदतर होती चली गई। 
और थोड़े ही दिनों बाद पता चला कि बिमल दा को कैन्सर (कर्कट रोग) है। बीमारी की वजह से धीरे धीरे बिमल रॉय का घर से निकलना बन्द हो गया; उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। फिर भी वो गुलज़ार को घर बुला कर पूछते रहते थे कि तुम अमृत कुंभ पर काम कर रहे हो ना? उन्होंने गुलज़ार को यह भी अनुदेश दिए कि कहानी का मुख्य नायक बलराम पहले दिन मरना नहीं चाहिए। उसे या तो महाकुंभ के तीसरे दिन या पाँचवे दिन मरना चाहिए। बहुत दिनों के विचार-विमर्श के बाद आख़िरकार यह तय हुआ कि बलराम महाकुंभ के नौवे दिन मरेगा यानी कि ठीक जोग स्नान के दिन। जैसे जैसे शूटिंग् का दिन, यानी 1964 का महाकुंभ नज़दीक आ रहा था, वैसे वैसे बिमल दा की हालत और भी ख़राब होती जा रही थी। लगने लगा था कि वो इस फ़िल्म को शूट नहीं कर पाएँगे। लेकिन फिर भी वो बार-बार गुलज़ार को यह हिदायत दे रहे थे कि हमें यह फ़िल्म महाकुंभ के मेले में ही शूट करनी है। बिमल रॉय की क़िस्मत में यह फ़िल्म शूट करना नहीं लिखा था। उनकी बीमारी की वजह से फ़िल्म की शूटिंग् कैन्सल कर दी गई। बिमल दा का अन्त अब दरवाज़े पर आ गया था। 



1964 का महाकुंभ 31 दिसंबर को शुरु होना था। महाकुंभ शुरु हुआ। और इस हिसाब से जोग स्नान, नौवे दिन, यानी कि 8 जनवरी 1965 को पड़ता। फ़िल्म तो बन्द हो गई पर बिमल रॉय का इस फ़िल्म की कहानी से नाता नहीं टूटा। बिमल रॉय ने जिस दिन अपनी कहानी के नायक बलराम का मरना तय किया था, ठीक उसी दिन, जोग-स्नान के दिन, 8 जनवरी 1965 को, मात्र 56 वर्ष की आयु में बिमल रॉय इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर हमेशा के लिए चले गए। इससे बड़ा संजोग और क्या हो सकता है! यह घटना जैसे एक सिहरन सी पैदा करती है हमारे मन-मस्तिष्क में। कुछ बातें, कुछ घटनाएँ ऐसी घट जाती हैं जिन्हें विज्ञान से समझाया नहीं जा सकता, जिनकी व्याख्या विज्ञान द्वारा संभव नहीं। बिमल दा की मृत्यु की यह घटना भी ऐसी ही एक घटना थी।


1943 में ’Bengal Famine' नामक फ़िल्म से अपना करीयर शुरु करने के बाद पचास के दशक में बिमल रॉय भारतीय सिनेमा के एक स्तंभ फ़िल्मकार बन चुके थे। 1953 में ’परिणीता’, ’दो बिघा ज़मीन’, 1954 में ’बिराज बहू’, ’बाप बेटी’, 1955 में ’देवदास’, 1958 में ’यहूदी’ और ’मधुमती’, 1959 में ’सुजाता’ और 1960 में ’परख’ जैसी फ़िल्में देकर बिमल दा शोहरत की बुलन्दी पर जा पहुँचे थे। पर काल के आगे किसी का बस नहीं चलता। उनके इस सफलता को कोई बुरी नज़र लग गई। इस एक दशक के अन्दर उन्हें 11 फ़िल्मफ़ेअर और 6 राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उनकी एक और कालजयी फ़िल्म ’बन्दिनी’ उनकी मृत्यु के बाद प्रदर्शित हुई।

’अमृत कुंभ की खोज में’ तो फिर नहीं बन सकी, पर 1960 के इलाहाबाद के अर्धकुंभ में जो शॉट्स लिए गए थे, उन फ़ूटेज को 11 मिनट की एक लघु वृत्तचित्र के रूप में जारी किया गया। दरसल बिमल दा की मृत्यु के बाद यह फ़ूटेज भी खो गई थी, या यूं कहिए कि इस पर किसी का ध्यान नहीं गया। पर तीन दशक बाद, मार्च 1999 में बिमल दा के पुत्र जॉय रॉय को अकस्मात यह फ़ूटेज मिल गई और वह भी उत्तम अवस्था में। उन्हें जैसे कोई अमूल्य ख़ज़ाना मिल गया हो! तब जॉय ने इन फ़ूटेजों को जोड़ कर 11 मिनट का एक लघु वृत्तचित्र तैयार किया ’Images of Kumbh Mela' शीर्षक से। इस दुर्लभ वृत्तचित्र को नीचे दिए गए यू-ट्युब लिंक पर देखा जा सकता है।




आपकी बात

’चित्रकथा’ की पहली कड़ी को आप सभी ने सराहा, जिसके लिए हम आपके आभारी हैं। इस कड़ी की रेडरशिप 13 जनवरी तक 154 आयी है। हमारे एक पाठक श्री सुरजीत सिंह ने यह सुझाव दिया है कि क्यों ना इसे हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में प्रकाशित की जाए! सुरजीत जी, आपका सुझाव बहुत ही अच्छा है, लेकिन फ़िलहाल समयाभाव के कारण हम ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। भविष्य में अवकाश मिलने पर हम इस बारे में विचार कर सकते हैं, पर इस वक़्त ऐसा संभव नहीं, इसके लिए हमें खेद है।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Wednesday, January 11, 2017

"मेरे अभिनय को निरंतर संवारा थियटर ने" - राकेश चतुर्वेदी ओम :: एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है 
एपिसोड - 45


ताज़ा प्रदर्शित साफ़ सुथरी पारिवारिक कॉमेडी फिल्म भल्ला @हल्ला डॉट कोम के लेखक निर्देशक राकेश चतुर्वेदी ओम है हमारे आज के मेहमान "एक मुलाकात ज़रूरी है" में. मिलिए इस हरफनमौला फनकार से जो एक अच्छे अभिनेता भी हैं. प्ले पर क्लिक करें और इस मुलाकात का आनंद लें. 



ये एपिसोड आपको कैसा लगा, अपने विचार आप 09811036346 पर व्हाट्सएप भी कर हम तक पहुंचा सकते हैं, आपकी टिप्पणियां हमें प्रेरित भी करेगीं और हमारा मार्गदर्शन भी....इंतज़ार रहेगा.

एक मुलाकात ज़रूरी है के इस एपिसोड के प्रायोजक थे अमेजोन डॉट कॉम, अमोज़ोन पर अब आप खरीद सकते हैं, अरिजीत सिंह के गानों का ये संकलन, खरीदने के लिए क्लिक करें  एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें


मिलिए इन जबरदस्त कलाकारों से भी -
अनवर सागरसंजीवन लालकुणाल वर्माआदित्य शर्मानिखिल कामथमंजीरा गांगुली, रितेश शाह, वरदान सिंह, यतीन्द्र मिश्र, विपिन पटवा, श्रेया शालीन, साकेत सिंह, विजय अकेला, अज़ीम शिराज़ी, संजोय चौधरी, अरविन्द तिवारी, भारती विश्वनाथन, अविषेक मजुमदर, शुभा मुदगल, अल्ताफ सय्यद, अभिजित घोषाल, साशा तिरुपति, मोनीश रजा, अमित खन्ना (पार्ट ०१), अमित खन्ना (पार्ट २), श्रध्दा भिलावे, सलीम दीवान, सिद्धार्थ बसरूर, बबली हक, आश्विन भंडारे , आर्व, रोहित शर्मा, अमानो मनीष, मनोज यादव, इब्राहीम अश्क, हेमा सरदेसाई, बिस्वजीत भट्टाचार्जी (बिबो), हर्षवर्धन ओझा, रफीक शेख, अनुराग गोडबोले, रत्न नौटियाल, डाक्टर सागर

Sunday, January 8, 2017

महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ : SWARGOSHTHI – 300 : RAG KAFI, BHAIRAVI AND DARABARI



स्वरगोष्ठी – 300 में आज

महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ – 2

संगीत पहेली के महाविजेताओं क्षिति, विजया और किरीट का अभिनन्दन




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के दूसरे अंक में कृष्णमोहन मिश्र की ओर से हार्दिक अभिनन्दन है। पिछले अंक में हमने आपसे ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के बीते वर्ष की कुछ विशेष गतिविधियों की चर्चा की थी। साथ ही पहेली के चौथी महाविजेता डी. हरिणा माधवी और तीसरे महाविजेता प्रफुल्ल पटेल से आपको परिचित कराया था और उनकी प्रस्तुतियों को भी सुनवाया था। इस अंक में भी हम गत वर्ष की कुछ अन्य गतिविधियों का उल्लेख करने के साथ ही संगीत पहेली के प्रथम और द्वितीय महाविजेताओं की घोषणा करेंगे और उनका सम्मान भी करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठक और श्रोता जानते हैं कि इस स्तम्भ के प्रत्येक अंक में संगीत पहेली के माध्यम से हम हर सप्ताह भारतीय संगीत से जुड़े तीन प्रश्न देकर आपसे दो प्रश्नों का उत्तर पूछते हैं। आपके दिये गये सही उत्तरों के प्राप्तांकों की गणना दो स्तरों पर की जाती है। ‘स्वरगोष्ठी’ की दस-दस कड़ियों को पाँच श्रृंखलाओं (सेगमेंट) में बाँट कर और फिर वर्ष के अन्त में सभी पाँच श्रृंखलाओं के प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना की जाती है। वर्ष 2016 की संगीत पहेली में अनेक प्रतिभागी नियमित रूप से भाग लेते रहे। 297वें अंक की पहेली के परिणाम आने तक शीर्ष के चार महाविजेता चुने गए। तीसरे और चौथे महाविजेताओं का सम्मान हम पिछले अंक में कर चुके हैं। आज के अंक में हम प्रथम स्थान की दो महाविजेता, विजया राजकोटिया और क्षिति तिवारी तथा द्वितीय स्थान के महाविजेता डॉ. किरीट छाया को सम्मानित करेंगे और उनकी प्रस्तुतियाँ सुनवाएँगे।



प्रथम महाविजेता  क्षिति  तिवारी
वर्ष 2016 की संगीत पहेली में सर्वाधिक 92 अंक अर्जित कर पेंसिलवानिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश की क्षिति तिवारी ने संयुक्त रूप से प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त किया है। यह तथ्य भी रेखांकन के योग्य हैं कि सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाली दोनों प्रतिभागी महिलाएँ हैं और संगीत की कलाकार और शिक्षिका भी है। संगीत पहेली के कुल 100 अंको में से 92 अंक अर्जित कर वर्ष 2016 की संगीत पहेली में प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त करने वाली जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी की संगीत शिक्षा लखनऊ और कानपुर में सम्पन्न हुई। लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से गायन में प्रथमा से लेकर विशारद तक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। बाद में इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ, जहाँ से उन्होने संगीत निपुण और उसके बाद ठुमरी गायन मे तीन वर्षीय डिप्लोमा भी प्राप्त किया। इसके अलावा कानपुर के वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित गंगाधर राव तेलंग जी के मार्गदर्शन में खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय की संगीत स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। क्षिति जी के गुरुओं में डॉ. गंगाधर राव तेलंग के अलावा पण्डित सीताशरण सिंह, पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र, डॉ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी, डॉ. विद्याधर व्यास और श्री विनीत पवइया प्रमुख हैं। क्षिति को स्नातक स्तर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से ग्वालियर घराने की गायकी के अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति भी मिल चुकी है। कई वर्षों तक लखनऊ के महिला कालेज और जबलपुर के एक नेत्रहीन बच्चों के विद्यालय मे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के बाद वर्तमान में जबलपुर के ‘महाराष्ट्र संगीत महाविद्यालय’ में वह संगीत गायन की शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। ध्रुपद, खयाल, ठुमरी और भजन गायन के अलावा उन्होने प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत लोक संगीत भी सीखा है, जिसे अब वह अपने विद्यार्थियों को बाँट रही हैं। क्षिति जी कथक नृत्य और नृत्य नाटिकाओं में गायन संगत की विशेषज्ञ हैं। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना और भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय की प्रोफेसर कुमकुम धर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय की प्रोफेसर और नृत्यांगना विधि नागर के कई कार्यक्रमों में अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। आज के इस विशेष अंक में श्रीमती क्षिति तिवारी राग भैरवी के एक ध्रुपद रचना को अपना स्वर दे रही हैं। चारताल में बँधे इस ध्रुपद के बोल हैं, -“भस्म अंग गौरी संग...”। इस प्रस्तुति में तबला पर विभास बीन और हारमोनियम पर अभिषेक पँवार ने संगति की है। लीजिए, अब आप यह ध्रुपद सुनिए और प्रथम महाविजेता क्षिति तिवारी का अभिनन्दन कीजिए।

राग भैरवी : ध्रुपद : “भस्म अंग गौरी संग...” : क्षिति तिवारी


प्रथम महाविजेता विजया राजकोटिया
92 अंक प्राप्त कर संयुक्त रूप से प्रथम महाविजेता का गौरव प्राप्त किया है, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने। संगीत की साधना में पूर्ण समर्पित विजया जी ने लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (वर्तमान में विश्वविद्यालय) से संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त की है। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर उनके पिता, विख्यात रुद्रवीणा वादक और वीणा मन्दिर के प्राचार्य श्री पी.डी. शाह ने कई तंत्र और सुषिर वाद्यों के साथ-साथ कण्ठ संगीत की शिक्षा भी प्रदान की। श्री शाह की संगीत परम्परा को उनकी सबसे बड़ी सुपुत्री विजया जी ने आगे बढ़ाया। आगे चलकर विजया जी को अनेक संगीत गुरुओं से मार्गदर्शन मिला, जिनमें आगरा घराने के उस्ताद खादिम हुसेन खाँ की शिष्या सुश्री मिनी कापड़िया, पण्डित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले, सुश्री मीनाक्षी मुद्बिद्री और सुविख्यात गायिका श्रीमती शोभा गुर्टू प्रमुख नाम हैं। विजया जी संगीत साधना के साथ-साथ ‘क्रियायोग’ जैसी आध्यात्मिक साधना में भी संलग्न रहती हैं। उन्होने अपने गायन का प्रदर्शन मुम्बई, लन्दन, सैन फ्रांसिस्को, साउथ केरोलिना, न्यूजर्सी, और पेंसिलवानिया में किया है। सम्प्रति विजया जी पेंसिलवानिया के अपने स्वयं के संगीत विद्यालय में हर आयु के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा प्रदान कर रही हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ पहेली की प्रथम महाविजेता के रूप में अब हम आपको विजया जी के स्वर में एक ठुमरी सुनवाते है। यह ठुमरी राग मिश्र काफी के सुरों की चाशनी से पगा हुआ है। दीपचन्दी ताल में निबद्ध इस ठुमरी के बोल हैं, -“जब से श्याम सिधारे...”। इस प्रस्तुति में तबला पर रत्नाकर नवाथे और हारमोनियम पर सुरेश वेनेगल ने संगति की है। लीजिए, राग मिश्र काफी की ठुमरी सुनिए और विजया जी को महाविजेता बनने पर बधाई दीजिए।

ठुमरी मिश्र काफी : “जब से श्याम सिधारे...” : विजया राजकोटिया


द्वितीय  महाविजेता  डॉ. किरीट  छाया
वोरहीज, न्यूजर्सी के डॉ. किरीट छाया ने वर्ष 2016 की संगीत पहेली में 86 अंक अर्जित कर सूसरा स्थान प्राप्त किया है। किरीट जी पेशे से चिकित्सक हैं और 1971 से अमेरिका में निवास कर रहे हैं। मुम्बई से चिकित्सा विज्ञान से एम.डी. करने के बाद आप सपत्नीक अमेरिका चले गए। बचपन से ही किरीट जी के कानों में संगीत के स्वर स्पर्श करने लगे थे। उनकी बाल्यावस्था और शिक्षा-दीक्षा, संगीत-प्रेमी और पारखी मामा-मामी के संरक्षण में बीता। बचपन से ही सुने गए भारतीय शास्त्रीय संगीत के स्वरो के प्रभाव के कारण किरीट जी आज भी संगीत से अनुराग रखते हैं। किरीट जी न तो स्वयं गाते हैं और न बजाते हैं, परन्तु संगीत सुनने के दीवाने हैं। वह इसे अपना सौभाग्य मानते हैं कि उनकी पत्नी को भी संगीत के प्रति लगाव है। नब्बे के दशक के मध्य में किरीट जी ने अमेरिका में रह रहे कुछ संगीत-प्रेमी परिवारों के सहयोग से “रागिनी म्यूजिक सर्कल” नामक संगीत संस्था का गठन किया है। इस संस्था की ओर से समय-समय पर संगीत अनुष्ठानों और संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। अब तक उस्ताद विलायत खाँ, उस्ताद अमजद अली खाँ, पण्डित अजय चक्रवर्ती, पण्डित मणिलाल नाग, पण्डित बुद्धादित्य मुखर्जी आदि की संगीत सभाओं का आयोजन यह संस्था कर चुकी है। पिछले दिनों विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती की संगीत सभा का फिलेडेल्फिया नामक स्थान पर सफलतापूर्वक आयोजन किया गया था। किरीट जी गैस्ट्रोएंटरोंलोजी चिकित्सक के रूप में विगत 40 वर्षों तक लोगों की सेवा करने के बाद गत जुलाई, 2014 में सेवानिवृत्त हुए हैं। सेवानिवृत्ति के बाद किरीट जी अब अपना अधिकांश समय शास्त्रीय संगीत और अपनी अन्य अभिरुचि, फोटोग्राफी और 1950 से 1970 के बीच के हिन्दी फिल्म संगीत को दे रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ मंच से डॉ. किरीट छाया का सम्पर्क हमारी एक अन्य नियमित प्रतिभागी विजया राजकोटिया के माध्यम से हुआ है। किरीट जी निरन्तर हमारे सहभागी हैं और अपने संगीत-प्रेम और स्वरों की समझ के बल पर वर्ष 2016 की संगीत पहेली में दूसरे महाविजेता बने हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया परिवार उन्हें महाविजेता का सम्मान अर्पित करता है। हमारी परम्परा है कि हम जिन्हें सम्मानित करते हैं उनकी कला अथवा उनकी पसन्द का संगीत सुनवाते हैं। लीजिए, अब हम डॉ. किरीट छाया की पसन्द का एक वीडियो प्रस्तुत कर रहे हैं। यूट्यूब के सौजन्य से अब आप इस वीडियो के माध्यम से उस्ताद विलायत खाँ का सितार पर बजाया राग दरबारी सुनिए। यह रिकार्डिंग 1965 में उस्ताद विलायत खाँ द्वारा कोलकाता की संगीत सभा की है। आप सितार पर राग दरबारी सुनिए और मुझे आज के इस विशेष अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग दरबारी : सितार पर आलाप और गत : उस्ताद विलायत खाँ



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 300वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्म संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – आप इस गीत मुख्य गायिका के स्वर को पहचान कर उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 14 जनवरी, 1017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 302वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 298 और 299 अंक में हमने आपसे कोई प्रश्न नहीं पूछा था, अतः इन अंकों की पहेली का कोई भी विजेता नहीं है। 302वें अंक से हम पुनः पहेली के विजेताओं की घोषणा करेंगे।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आज के अंक में हमने पहेली के महाविजेताओं से आपका परिचय कराया और उनकी पसन्द का अथवा स्वयं उनके द्वारा प्रस्तुत रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक से अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला और उनके गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का हमेशा ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 7, 2017

चित्रकथा - 1: उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ का हिन्दी फ़िल्म-संगीत में योगदान


अंक - 1

उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ का हिन्दी फ़िल्म-संगीत में योगदान

“मधुबन में राधिका नाची रे...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

4 जनवरी 2017 को सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद अब्दुल हालीम जाफ़र ख़ाँ साहब के निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। पद्मभूषण, पद्मश्री, और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का शास्त्रीय-संगीत जगत के साथ-साथ फ़िल्म-संगीत जगत में भी योगदान स्मरणीय है। आइए आज ’चित्रकथा’ के माध्यम से याद करें कुछ ऐसे प्रसिद्ध गीतों को जिन्हें ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगा दिए।





"बहुत गुणी सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का आज देहान्त हुआ। मुझे बहुत दुख हुआ, हमने साथ में बहुत काम किया है। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे! मेरी उनको भावभीनी श्रद्धांजली।"
-- लता मंगेशकर
4 जनवरी 2017


भारतीय सिने संगीत को समृद्ध करने में जितना योगदान संगीतकारों, गीतकारों और गायक-
गायिकाओं का रहा है, उतना ही अमूल्य योगदान रहा है शास्त्रीय संगीत के महान कलाकारों का, जिन्होंने अपने संगीत ज्ञान और असामान्य कौशल से बहुत से फ़िल्मी गीतों को बुलन्दी प्रदान किए हैं, जो अच्छे संगीत रसिकों के लिए किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं। उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ के निधन से सितार जगत का एक चमकता सितारा डूब गया। अब्दुल हलीम साहब का जन्म इन्दौर के पास जावरा ग्राम में सन् 1929 में हुआ था। कुछ समय बाद इनका परिवार बम्बई स्थानान्तरित हो गया। अब्दुल हलीम के पिता उस्ताद जाफ़र खाँ भी सितार के अच्छे ज्ञाता थे। बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिलने के कारण हलीम साहब का संगीत के प्रति लगाव हो जाना स्वाभाविक था। उनकी प्रारंभिक सितार-शिक्षा प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बाबू खाँ से शुरू हुई। उसके बाद उस्ताद महबूब खाँ साहब से सितार की उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त की। अच्छी शिक्षा और अपने आप में लगन, धैर्य और समर्पण से उन्होंने जल्दी ही अपनी कला में पूरी दक्षता प्राप्त कर ली।

फ़िल्मों में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का प्रवेश उनकी इच्छा नहीं बल्कि उनकी ज़रूरत थी। पिता की मृत्यु के कारण उनके सामने आर्थिक समस्या आन पड़ी, और घर का चुल्हा जलता रहे, इस उद्येश्य से उन्हें फ़िल्म जगत में जाना ही पड़ा। कलाकार में कला हो तो वो किसी भी क्षेत्र में कामयाब होता है। हलीम साहब को फ़िल्म-संगीत में कामयाबी मिली और पूरे देश में लोग उन्हें जानने लगे, फ़िल्मी गीतों में उनके बजाए सितार के टुकड़ों को सुन कर भाव-विभोर होने लगे। कहा जाता है कि फ़िल्मों में उन्हें लाने का श्रेय संगीतकार ख़्वाजा ख़ुरशीद अनवर को जाता है जिन्होंने 1947 की फ़िल्म ’परवाना’ के गीतों में उन्हें सितार के टुकड़े बजाने का मौका दिया। यह फ़िल्म पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुन्दन लाल सहगल की अन्तिम फ़िल्म थी। सहगल साहब की आवाज़ में "मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पायी जाती है" और "टूट गए सब सपने मेरे" गीतों और इस फ़िल्म के कुछ और गीतों में हलीम साहब का सितार सुनाई दिया।

1952 में ख़्वाजा ख़ुरशीद अनवर के पाक़िस्तान स्थानान्तरित हो जाने के बाद हलीम साहब और
संगीतकार वसन्त देसाई ने साथ में ’राजकमल कलामन्दिर’ के लिए काफ़ी काम किया। मधुरा पंडित जसराज की पुस्तक ’V. Shantaram - The Man who changed Indian Cinema' में हलीम जाफ़र ख़ान को फ़िल्मों में लाने का श्रेय संगीतकार वसन्त देसाई को दिया है। इस पुस्तक में प्रकशित शब्दों के अनुसार - "Vasant Desai travelled across North India and familiarized himself with many folk styles of singing and music. He invited to Bombay tabla maestro Samta Prasad from Benaras, Sudarshan Dheer from Calcutta to play the Dhol, Ustad Abdul Haleem Jafar Khan, a virtuoso with the sitar, and many more musicians." 1951 में ’राजकमल’ की मराठी फ़िल्म ’अमर भोपाली’ में संगीत देकर वसन्त देसाई को काफ़ी ख्याति मिली। 1955 में शान्ताराम ने बनाई एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’झनक झनक पायल बाजे’, जिसके लिए उन्होंने पूरे देश भर में घूम-घूम कर एक से एक बेहतरीन संगीतज्ञों का चयन किया। संगीत-नृत्य प्रधान इस फ़िल्म के लिए उन्होंने शामता प्रसाद (तबला), शिव कुमार शर्मा (संतूर) और अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ (सितार) को चुना। अभिनेत्री संध्या और विख्यात नृत्यशिल्पी गोपी कृष्ण के जानदार अभिनय और नृत्यों से, शान्ताराम की प्रतिभा से तथा वसन्त देसाई व शास्त्रीय संगीत के उन महान दिग्गजों की धुनों से इस फ़िल्म ने एक इतिहास की रचना की। बताना ज़रूरी है कि केवल इस फ़िल्म के गीतों में ही नहीं बल्कि फ़िल्म के पूरे पार्श्वसंगीत में भी हलीम साहब ने सितार बजाया है।

वसन्त देसाई के यूं तो बहुत से गीतों में हलीम साहब ने सितार बजाए हैं, पर जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही वह थी 1959 की ’गूंज उठी शहनाई’। यह फ़िल्म एक शहनाई वादक के जीवन की कहानी है और इस फ़िल्म के गीतों और पार्श्वसंगीत में शहनाई बजाने वाले और कोई नहीं ख़ुद उस्ताद बिस्मिलाह ख़ाँ साहब थे। ऐसे में सितार के लिए अब्दुल हलीम साहब को लिया गया। यही नहीं इस फ़िल्म में ख़ास तौर से एक जुगलबन्दी रखी गई इन दो महान फ़नकारों की। शहनाई और सितार की ऐसी जुगलबन्दी और वह भी ऐसे दो बड़े कलाकारों की, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था किसी फ़िल्म में। यह जुगलबन्दी राग चाँदनी केदार पर आधारित थी।

संगीतकार सी. रामचन्द्र के गीतों को भी अपनी सुरीली सितार के तानों से सुसज्जित किया अब्दुल हलीम साहब ने। इसका श्रेष्ठ उदाहरण है 1953 की प्रसिद्ध फ़िल्म ’अनारकली’ के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "ये ज़िन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया"। यह गीत लता मंगेशकर के पसन्दीदा गीतों में शामिल है। लता जी का ही चुना हुआ एक और पसन्दीदा गीत है सलिल चौधरी के संगीत में "ओ सजना बरखा बहार आई"। इस लोकप्रिय गीत में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब के सितार के कहने ही क्या! कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनमें बजने वाले म्युज़िकल पीसेस याद रह जाते हैं। और जब जब ऐसे गीतों को गाया जाता है, तो इस म्युज़िकल पीसेस को भी साथ में गुनगुनाया जाता है, वरना गीत अधूरा लगता है। इस पूरे गीत में हलीम साहब का सितार ऐसा गूंजा है कि इसके तमाम पीसेस श्रोताओं के दिल-ओ-दिमाग़ में रच बस गए हैं। ज़रा याद कीजिए लता जी के मुखड़े में "ओ सजना" गाने के बाद बजने वाले सितार के पीस को। 1960 की इस फ़िल्म ’परख’ के इस गीत के बारे में बताते हुए लता जी ने हलीम साहब को भी याद किया था - "मुझे इस गीत से प्यार है। सलिल ने बहुत सुन्दरता से इसकी धुन बनाई है और शैलेन्द्र जी के बोलों को बहुत सुन्दर तरीके से इसमे मिलाया है। बिमल रॉय का साधना पर कैमरा वर्क और बारिश का कोज़-अप अपने आप में अद्भुत है। इस गीत की मेलडी अविस्मरणीय इस कारण से भी है कि इसे अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब जैसे गुणी कलाकार ने सितार के सुन्दर संगीत से सजाया है।"

शास्त्रीय संगीत को अपने फ़िल्मी गीतों में उच्चस्तरीय जगह देने में संगीतकार नौशाद का कोई सानी
नहीं। नौशाद साहब ने भी हलीम साहब के सितार का कई महत्वपूर्ण फ़िल्मों में प्रयोग किया। ’मुग़ल-ए-आज़म’ जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्म के समूचे पार्श्वसंगीत में सितार बजाने का दायित्व हलीम साहब को देकर के. आसिफ़ ने अपनी फ़िल्म को इज़्ज़त बख्शी। नौशाद साहब के ही शब्दों में - "उन्होंने (हलीम साहब ने) ना केवल फ़िल्म-संगीत को समृद्ध किया बल्कि मेरे गीतों को इज़्ज़त बक्शी"। 1960 की ही एक और फ़िल्म थी ’कोहिनूर’ जिसमें नौशाद का संगीत था। इस फ़िल्म का मशहूर गीत "मधुबन में राधिका नाची रे" हलीम साहब के सितार के लिए भी जाना जाता है। इस गीत से जुड़ा एक रोचक प्रसंग का उल्लेख किया जाए! नौशाद साहब के शब्दों में, "राग हमीर पर फ़िल्म ’कोहिनूर’ का एक गाना था जिसमें दिलीप साहब सितार बजाते हैं। दिलीप साहब एक दिन मुझसे कहने लगे कि यह क्या पीस बनाया है आपने, मैं फ़िल्म में कैसे अपनी उंगलियों को म्युज़िक के साथ मिला पायूंगा? मैंने कहा कि घबराइए नहीं, क्लोज़-अप वाले शॉट्स में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब की उंगलियों के क्लोज़-अप ले लेंगे, किसी को पता नहीं चलेगा। तो दिलीप साहब ने कहा कि फिर आप ऐक्टिंग् भी उन्हीं से करवा लीजिए! फिर कहने लगे कि मैं ख़ुद यह शॉट दूंगा। फिर वो ख़ुद सितार सीखने लग गए हलीम जाफ़र साहब से। वो तीन-चार महीनों तक सीखे, उन्होंने कह रखा था कि ये सब क्लोज़-अप शॉट्स बाद में फ़िल्माने के लिए। तो जिस दिन यह फ़िल्माया गया मेहबूब स्टुडियो में, शूटिंग् के बाद वो मुझसे आकर कहने लगे कि चलिए साथ में खाना खाते हैं। मैंने कहा बेहतर है। मैंने देखा कि उनके हाथ में टेप बंधा हुआ है। मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो बोले कि आप की ही वजह से यह हुआ है, इतना मुश्किल पीस दे दी आपने, उंगलियाँ कट गईं मेरी शॉट देते देते। तो साहब, ऐसे फ़नकारों की मैं क्या तारीफ़ करूँ!" तो इस तरह से हलीम साहब ने दिलीप कुमार को सितार की शिक्षा दी, और रफ़ी साहब और उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब की आवाज़ों में यह कालजयी रचना रेकॉर्ड हुई।

इन्टरनेट पर प्रकाशित कुछ सूत्रों में हलीम साहब द्वारा संगीतकार मदन मोहन के गीतों में सितार बजाए जाने की बात कही गई है जो सत्य नहीं है। मदन मोहन जी की सुपुत्री संगीता गुप्ता जी से पूछने पर पता चला कि मदन मोहन जी के गीतों में अधिकतर उस्ताद रईस ख़ाँ, उस्ताद विलायत ख़ाँ, और बाद के बरसों में शमिम अहमद ने सितार बजाए।

उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ सितार के एक किंवदन्ती हैं। उनकी मृत्यु से शास्त्रीय संगीत जगत के सितार के क्षेत्र में जो शून्य पैदा हुई है उसे भर पाना मुश्किल है। फ़िल्म-संगीत के रसिक आभारी रहेंगे हलीम साहब के जिन्होंने अपने सितार के जादू से फ़िल्मी गीतों को एक अलग ही मुकाम दी।


आपकी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, January 5, 2017

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए.. पेश-ए-नज़र है अल्लामा इक़बाल का दर्द मेहदी हसन की जुबानी

महफ़िल ए कहकशाँ 18



दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है मोहम्मद अल्लामा इकबाल की लिखी गज़ल मेहदी हसन की आवाज़ में|  



मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी






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allamaiqbal.mp3

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खरा सोना गीत

आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है
सी ए टी कैट...कैट माने बिल्ली
डम डम डिगा डिगा
रुला के गया सपना मेरा
शोख नज़र की बिजिलियाँ
टिम टिम टिम तारों के दीप जले
मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में
वो हमसे चुप हैं
माई री मैं कासे कहूँ
यार बादशाह
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आँखों से जो

नए सुर साधक

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